आईफ़ोन, अदाणी और अयोध्या: क्या है आपस में कनेक्शन? - instathreads

आईफ़ोन, अदाणी और अयोध्या: क्या है आपस में कनेक्शन?

नमस्कार  आई अदानी और
अयोध्या आज का वीडियो आपको ध्यान से देखना
चाहिए कैसे भारत के अखबार अदानी की खबरों
को लेकर मौन व्रत धारण कर लेते हैं और
अयोध्या का नाम आते ही राम-राम जपने लग

जाते हैं आज के वाशिंगटन पोस्ट में एक ऐसी
खबर आई है जिससे पता चलता है कि राम के
देश में सब कुछ ठीक नहीं वैसा तो बिल्कुल
भी नहीं जैसा उनकी मर्यादा के हिसाब से
होना चाहिए अक्टूबर महीने में जो विपक्ष

के साथ सांसदों और कुछ पत्रकारों के आईफो
को एल की तरफ से चेतावनी जारी हुई कि आपके
फोन को स्टेट की तरफ से हैक किया जा रहा
है तब थोड़े समय के लिए बबाल मचा शक की

सुई मोदी सरकार की तरफ घूमी तो सरकार ने
उल्टा आई पर ही आरोप मढ़ा और जांच शुरू कर
दी वाशिंगटन पोस्ट की खबर बताती है कि
सरकार आईफो पर दबाव डाल रही है यहां यह
समझना जरूरी है कि आरोप सरकार पर है शक

सरकार पर है और वही i बनाने वाली
होगा यही बताने के लिए यह वीडियो बनाया है
ताकि आप देख सकें कि पत्रकार और अखबार
जहां पत्रकारिता करनी चाहिए वहां छोड़कर
वहां कर रहे हैं जहां सरकार का कोई डर

नहीं और कोई जवाबदेही नहीं कायदे से
उन्हें राम का तो डर होना ही चाहिए कि कोई
देख रहा होगा कि वे किससे बचकर उनके शरण
में आए हैं अयोध्या का कवरेज होना चाहिए
लेकिन अयोध्या के बहाने अदानी से जुड़ी

सरकार से जुड़ी बड़ी खबरों को गायब कर
देना यह सब बता रहा है कि हम कुछ कहने के
अंतिम दिनों में अब सांस ले रहे हैं पीछा
करते-करते सरकार का साया ही अब सरकार बन
चुका है जरि श और जोसेफ मैन की यह रिपोर्ट

और इसमें इस्तेमाल इस तस्वीर को देखिए
समझिए प्रधानमंत्री एक तरह से एल को
अंगूठा दिखाते प्रतीत हो रहे हैं आपको याद
होगा अक्टूबर महीने में कई सांसदों ने
ट्वीट किया कि i की तरफ से उन्हें

वार्निंग आई है कि आपके फोन को राज्य की
तरफ से से टारगेट किया जा रहा है इसका यही
मतलब हुआ कि सरकार की तरफ से कोई फोन हैक
कर रहा है जासूसी कर रहा है वाशिंगटन
पोस्ट की यह रिपोर्ट कहती है कि जवाब में

सरकार अब एल को ही टारगेट करने लगी है एल
की सिक्योरिटी पर ही सवाल उठाकर जांच के
आदेश दिए गए इससे पता चलता है कि मोदी
सरकार के आलोचकों को कितना कुछ झेलना

पड़ता होगा और मोदी सरकार कहां तक जा सकती
है कि वह फोन हैक कराने लग जाए 23 अगस्त
को ओसीआर पी ने अदानी समूह को ईमेल भेजकर
अपनी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया मांगी और यह

रिपोर्ट काफी छपी थी आप जानते हैं आरोप था
कि उनके भाई ने सेबी के कानूनों का
उल्लंघन कर लाखों मिलियन डॉलर का कारोबार
किया फायदा कमाया इस रिपोर्ट से पत्रकार
आनंद मगना और रवि नायर जुड़े थे आनंद मगना
के फोन की फॉरेंसिक जांच एमनेस्टी

इंटरनेशनल ने की और उसे वाशिंगटन पोस्ट से
साझा किया है ईमेल करने के 24 घंटे बाद भी
आनंद के फोन में पेगासस पहुंच गया डाल
दिया गया वही पेगासस जो इसराइल का

सॉफ्टवेयर है और यह कंपनी केवल सरकार को
सॉफ्टवेयर बेचने का दावा करती है अदानी के
प्रवक्ता ने इस हैकिंग में शामिल होने से
इंकार किया है उनका बयान इस रिपोर्ट में
छपा है उनका कहना है कि कंपनी को बदनाम

करने के लिए यह सब चलाया जाता रहता है और
हम खंडन कर चुके हैं पत्रकार के फोन में
जासूसी होने लग जाए इसका मतलब है कि अब यह
फोन जानलेवा हो चुका है अगर आपको लगता है
कि यह सब बड़ी बात नहीं है अयोध्या में जो

हो रहा है वही बड़ी बात है तब फिर क्या ही
किया जा सकता है एक साल हो गया हिंडन बर्ग
की रिपोर्ट के उसके बाद अदानी समूह को
लेकर कितनी ही वेबसाइट और अखबारों में
खोजी रिपोर्टें आई क्या हुआ कुछ भी नहीं

मामूली खंडन के साथ रिपोर्ट छपी और सब छू
मंत्र लेकिन क्या यह डरने की बात नहीं कि
कोई पत्रकार इस समूह को ईमेल करे
प्रतिक्रिया मांगे और उसके फोन में पै

घुसा दिया जाए उसकी जासूसी होने लग जाए
ठीक है अदानी समूह ने खंडन कर दिया लेकिन
क्या खंडन कर देने से सारे सवालों के जवाब
मिल जाते हैं वैसे ही जैसे आरोप सरकार पर

है और जांच भी सरकार कर रही है पत्रकारिता
करने वालों पर कितना खतरा है फोन बनाने
वाली कंपनी एल भी नहीं बच सकी उस पर भी
दबाव है इसलिए वाशिंगटन पोस्ट की यह खबर
अखबारों में खासकर हिंदी के अखबारों से

गायब हो सकती है कहीं छप भी जाएगी तो इस
तरह से कि पढ़ने वालों को कुछ भी समझ ना
आए हिंदी अखबारों को आप गौर से देखिए तो
पता चलेगा कि पत्रकार असली मुद्दों को
छोड़कर खबरों को खोजना और सूंघना बंद कर

किन मुद्दों पर पत्रकारिता कर रहे हैं और
उसकी भाषा क्या है शैली क्या है किस खबर
को एक दो लाइन में निपटा दे रहे हैं और
किस पर लगातार हफ्तों हफ्तों भी नहीं

महीनों लिख रहे हैं इस बात का अध्ययन किया
जाना चाहिए कि हिंदी के अखबारों ने
अयोध्या और राम मंदिर के निर्माण को लेकर
किस तरह से कवरेज किया है इस कवरेज में
अयोध्या के लोगों की कितनी आवाज है शहर

में इतना बड़ा बदलाव हुआ क्या उससे
प्रभावित लोगों की आवाजें इन खबरों में
हैं दूसरी तरफ राम मंदिर से जुड़ी खबरों
का अध्ययन बताएगा कि किस तरह इन अखबारों
ने एक-एक सूचना को बड़ा बनाया बल्कि बड़ा

बने इसलिए हर सूचना को खबर योग्य बनाया
मिसाल के तौर पर जागरण ने एक दिन छापा कि
रामलला की पूजा के लिए जोधपुर से पहुंचा छ
क्विंटल देसी घी

जोधपुर से बैलों के पांच रथों पर देसी घी
कलश में भरकर लाया गया उस दौरान राजस्थान
में चुनाव हो रहे थे आप याद कीजिए क्या
किसी को यह नहीं दिखा कि पांच रथ देसी घी

लेकर अयोध्या जा रहे हैं इन रथों के आसपास
लोगों की किस तरह की गतिविधियां हैं क्या
किसी को नहीं दिखा इसका मतलब है कि विपक्ष
के सिस्टम को भी जमीन की कोई खबर नहीं

होती ना पता है कि जमीन पर जो वह देख रहे
हैं उसे कैसे सामने लाना है लो के पांच रत
जब देसी घी लेकर अयोध्या पहुंचे तब यह खबर
जागरण में छपती है आज के दैनिक भास्कर के

विजय उपाध्याय ने अपने रिपोर्ट में लिखा
है कि अयोध्या हिंदू धर्म की थीम पर सज
गया है हिंदू धर्म की थीम इस वक्त जो
अयोध्या में हो रहा है उसके लिए शायद यह

सटीक पंक्ति लगती है 13 किलोमीटर लंबे राम
पथ पर दोनों तरफ की जो दुकाने हैं उस पर
जय श्रीराम और सीताराम लिख दिया गया है
दैनिक भाषा ने इस खबर में लिखा है कि एक
आचार्य और प्रधानमंत्री सहित पांच लोग

गर्भगृह में होंगे खबर में लिखा है कि
प्राण प्रतिष्ठा के वक्त मूर्ति की आंखों
से जब पट्टी हटाई जाएगी उस वक्त गर्भगृह
में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दाई र
मूर्ति के पीछे खड़े होंगे गर्भगृह में

मोहन भागवत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
राज्यपाल आनंदी बेन होंगी इसके अलावा एक
आचार्य भी अब आप गौर कीजिए प्रधानमंत्री क
खड़े होंगे जब मूर्ति से पर्दा हटेगा

कैमरा मूर्ति पर होगा और फ्रेम में कौन
दिखेगा भगवान राम के साथ प्रधानमंत्री
मोदी यानी इस जगह की पहली तस्वीर में वही
होंगे हमेशा हमेशा के लिए एक से एक

राजनेताओं नेने इस देश में मंदिर बनवाए
होंगे मगर किसी ने खुद को फ्रेम के हिसाब
से इस तरह से नहीं सोचा होगा ऐसी तस्वीर
के बारे में उन्हें ध्यान भी नहीं आया

होगा हो सकता है कि ऐसा ना हो मेरा अंदाजा
गलत हो मगर जब यह पंक्ति पढ़ रहा था तो
यही लगा कि ऐसा भी हो सकता है पंक्ति फिर
से पढ़ देता हूं प्राण प्रतिष्ठा के वक्त

मूर्ति की आंखों से जब पट्टी हटाई जाएगी
उस वक्त गर्भगृह में प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी दाई ओर मूर्ति के पीछे खड़े होंगे
दैनिक भास्कर ने अपनी खबर में एक दिलचस्प
जानकारी और दी है वह यह कि सूत्रों के

मुताबिक सारे वैदिक कार्य प्रधानमंत्री ही
करेंगे यह खबर भी सूत्रों के हिसाब से आ
रही है कि प्रधानमंत्री ही सारे वैदिक
कार्य करेंगे अब देखिए विपक्ष के कुछ
नेताओं ने पूरे प्रकरण को प्रायोजन को

राजनीतिकरण करने की बात उठाई तो उनके बारे
में किस तरह के बयान आए राम विरोधी हैं
हिंदू विरोधी हैं लेकिन गर्भगृह में
प्रधानमंत्री के साथ मोहन भागवत की
उपस्थिति क्या राजनीतिकरण नहीं है 26

अक्टूबर को ही दैनिक जागरण ने छाप दिया था
कि संघ पर परिवार के हाथ में रामलला की
प्राण प्रतिष्ठा की कमान क्या यह हेडलाइन
काफी नहीं है कि यह आयोजन केवल धार्मिक
नहीं है राजनीतिक भी है क्या सुप्रीम

कोर्ट ने ये आदेश दिया था कि आरएसएस इसका
आयोजन कराएगा क्या हमारे पास इसकी
व्यवस्था के लिए दूसरे और तंत्र नहीं
आलोचना का ऐसा भय बना दिया गया है सहमति
की ऐसी रेत बिछा दी गई है उसे इतना तपा

दिया गया है कि उस रेत पर चलकर कोई सवाल
नहीं पूछना चाहता हम लोगों ने सवालों को
कितने स्तर पर खत्म किया है कुचला है इसी
डर से सवाल ही बदल गए जब संघ के हाथ में
कमान है तो जाहिर है बुलाने को लेकर

राजनीति होगी जिन्हें नहीं बुलाया जा रहा
है उसका मतलब निकाला जाएगा इसलिए व गुहार
लगा रहे हैं कि हमें नहीं बुलाया गया 28
दिसंबर के दिन दैनिक जागरण के पहले पन्ने
पर यह खबर छपी है लिखा है कि राम मंदिर के

सिंह द्वार के सामने होगा मोदी का संबोधन
भाषण की जगह संबोधन लिखा है कित इतनी सफाई
से राजनीतिक गतिविधि को राजनीति से अलग
बताने के लिए भाषण की जगह संबोधन का

इस्तेमाल किया जाता है खबर में लिखा गया
है कि इसके लिए आयोजन स्थल का चुनाव हो
रहा है अग्रिम कतार में संत महात्मा
बैठेंगे और उनके पीछे देश भर से आए

विशिष्ट अतिथि यह साफ नहीं कि विपक्ष के
नेताओं को भी भाषण अर्थात संबोधन या
संबोधन अर्थात भाषण सुनना पड़ेगा या वे
इसमें शामिल नहीं होंगे जरूरी नहीं कि आप
आलोचना के नर से ही अखबारों को पढ़ें वैसे

तो आज के दौर में कुछ भी लीक से हटकर
पढ़ने को आलोचना देश विरोधी धर्म विरोधी
कह दिया जाता है तब भी आपको इन खबरों का
अलग से अध्ययन करना चाहिए देश का मानस

कैसे बदल चुका है या बदल दिया गया है इसका
ढांचा आपको पत्रकारिता के वाक्यों में नजर
आएगा आपको पता चलेगा कि पत्रकारिता की
शब्दावली बदल गई है नए-नए शब्द आए हैं

जैसे हिंदी के अखबार अब शहीद का इस्तेमाल
नहीं करते बल बलिदानी लिखते हैं अमर उजाला
और दैनिक जागरण में मैंने बलिदानी ही देखा
है यह हमेशा से लिखा जाता रहा है या 2014

के बाद से बलिदानी लिखा जाने लगा मैं दावे
के साथ नहीं कह सकता मगर अध्ययन करना
चाहिए कई बार इन शब्दों को पढ़कर लगता है
कि भारत भले ही संवैधानिक रूप से हिंदू

राष्ट्र नहीं है मगर हिंदी की पत्रकारिता
ने हिंदू राष्ट्र के लिए अपने शब्द अपने
वाक्य अभी से तैयार कर लिए हैं अफसोस कि
किसी शोधकर्ता ने इन बदलावों पर ध्यान

नहीं दिया ध्यान रहे कि अखबारों के पन्ने
पर यह बदलाव जनता की मांग पर नहीं हुआ
होगा अखबारों ने अपनी तरफ से जनता पर थोपा
है यह 27 अक्टूबर का दैनिक जागरण है लिखा
है राम जन्म के योग में होगी राम लला के

विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा प्रधानमंत्री
मोदी करेंगे गर्भगृह में स्थापित
प्रधानमंत्री ने अनुष्ठान में मुख्य यजमान
के तौर पर शामिल होने की सहमति दे दी है
शिवाजी का राज्याभिषेक कराने वाले के वंशज

कराएंगे ग प्राण प्रतिष्ठा लेकिन अब प्राण
प्रतिष्ठा प्रधानमंत्री करा रहे हैं मगर
उस समय यही खबर छपी थी अक्षत पूजन सं
प्रस्फुटित होगा प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव

का उल्लास अगली खबर विद्यालयों में रामायण
से जुड़े प्रसंगों पर होंगी प्रतियोगिताएं
अगली खबर जहां-जहां चरण पड़े रघुवर के
वहां लगेंगे श्रीराम स्तंभ अगली खबर

अभेद्य होगी राम मंदिर की सुरक्षा अगली
खबर अमेरिका में राम मंदिर का ज
निकली कार रैली और अगली खबर देश के
कोने-कोने से अयोध्या के लिए चलेंगी विशेष
ट्रेनें 1000 ट्रेनें चलेंगी राम मंदिर का

सुपरस्ट्रक्चर लगभग पूरा अयोध्या महोत्सव
आमंत्रण यात्रा की शुरुआत 48 दिनों तक
होगी रामलला की राग सेवा वाल्मीकि रामायण
पर आधारित होगी अयोध्या की कथा शतचंडी
महायज्ञ की ऊर्जा से अयोध्या की धरती होगी

उर्वरा प्राण प्रतिष्ठा से पूर्व वार्डों
की सूरत बदले
रामलला के उत्सव के लिए बनाया गया अभियान
गीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से
अभियान गीत बनाया गया है इस गीत के बोल है

हृदय श्री रघुवर जी के अवधपुरी में प्राण
प्रतिष्ठा होना है निमंत्रण को स्वीकार
करो अब सबको अयोध्या चलना है अगली खबर
प्रसाद और रजक भेंट करर जोड़ा जा रहा है

भावनात्मक रिश्ता मतदाताओं को उनकी भूमिका
याद दिला रही है विहिप यानी विश्व हिंदू
परिषद खबर में लिखा है कि विधानसभा चुनाव

के समय अब विश्व हिंदू परिषद के नेता
रामनगरी में घर-घर पहुंचकर लोगों को राम
जन्मभूमि के रज कण यानी मिट्टी और रामलला
का भोग प्रसाद भेंट कर रहे हैं आगे यह भी

लिखा है कि अभी विश्व हिंदू परिषद के
नेताओं में अयोध्या से बाहर 40-50
विधानसभा क्षेत्रों में वितरित करने पर
मंथन चल रहा है प्रसाद जिसमें बड़ी इलायची
का दाना है क्या यह राजनीतिकरण नहीं था यह

खबर यूपी विधानसभा चुनाव के समय की है इन
खबरों से गुजरते हुए आप अयोध्या राम मंदिर
के निर्माण और राजनीति के बारे में कितना
कुछ जानते हैं विपक्ष को पता ही नहीं कि

राम मंदिर के उद्घाटन के नाम पर गांव-गांव
तक किस तरह के कार्यक्रमों को पहुंचाया जा
रहा है उसके जरिए किस तरह की राजनीति जमाई
जा रही है तभी मैंने पहले भी कहा है कि

जनवरी आएगा 10 साल के मुद्दे हवा में उड़
जाएंगे जनता के पास दूसरे मुद्दों पर
सोचने का वक्त ही नहीं होगा 24 का चुनाव
राम मंदिर का चुनाव है और इसी पर लड़ा

जाएगा विपक्ष के इस नेता को बात समझ में आ
गई है रैलियां करने और दिल्ली में प्रेस
कॉन्फ्रेंस करने से उनकी बात जनता के बीच
नहीं पहुंचेगी चैनलों के पास राम मंदिर के

अलावा कुछ नहीं होगा इसलिए इस नेता को
पैदल ही चलकर जनता के बीच जाना होगा गोदी
मीडिया और आरएसएस जनता को राम मंदिर के
अभियान में झोंक देंगे उसके पास राहुल को
सुनने के लिए और उनकी बातों पर विचार करने

के लिए नाना समय बचेगा ना भेजे में जगह एक
तरह से यह ठीक भी है कि यह नेता पैदल चलते
रहे 14 जनवरी से 20 मार्च के बीच राहुल
गांधी भारत न्याय यात्रा पर निकलेंगे
मणिपुर से लेकर मुंबई के बीच 14 राज्यों

के 85 जिलों से गुजरेंगे सवाल है राहुल
न्याय यात्रा के जरिए राम मंदिर के
समानांतर क्या अपने मुद्दों को खड़ा कर
पाएंगे एक तरफ जनता हजारों ट्रेन से
अयोध्या जा रही होगी ले जाई जा रही होगी

दूसरी तरफ यह नेता अकेला जनता के बीच पैदल
चला जा रहा होगा भारतीय राजनीति के विखंडन
का यह दृश्य हमेशा हमेशा के लिए याद किया
जाएगा कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल चलने
के बाद मणिपुर से मुंबई के बीच इस यात्रा

के परिणाम और प्रभाव की चर्चा के लिए गोदी
मीडिया में अब कोई जगह नहीं है उन जगहों
को राम के नाम से भर दिया जाएगा राहुल
गांधी हार और जीत की चिंता से मुक्त बल्कि
तीन-तीन राज्यों में करारी हार के बाद भी

धूल झाड़ करर फिर से चलने के लिए खड़े हो
गए
हैं लगातार हार के बीच खड़े होने और चलने
की यह कहानी अद्भुत होते हुए भी राजनीति
की अयोध्या पहुंच पाएगी या नहीं इसकी
भविष्यवाणी करना मेरा काम नहीं मगर

अयोध्या पहुंचकर मोदी की राजनीति राजनीति
नहीं रह जाएगी या होते हुए जरूर देख रहा
हूं वे धर्म की ओट में धर्म का नाम लेकर
राजनीति का रास्ता तय करते चले जा रहे हैं
कांग्रेस कहती रह जाएगी कि प्रधानमंत्री

मणिपुर नहीं गए मणिपुर पर नहीं बोले और
प्रधानमंत्री मोदी राम का नाम जपते हुए
चुनावी बेड़ा पार कर जाएंगे भारत की
राजनीति में बिना मुद्दों का यह चुनाव
उनके लिए सबसे आसान चुनाव होने जा रहा है

काश इतनी ही शिद्दत से इन अखबारों में
जनता के सवालों को कवर किया गया होता
वाशिंगटन पोस्ट में आई अदानी और भारत
सरकार को लेकर जो खबर छपी है उससे कवर
किया जाता सरकार से सवाल पूछा जाता

पिछले 10 साल की कई बड़ी खबरें जिन्हें
पत्रकारों ने जान जोखिम में डालकर अपनी
नौकरी गवाकर आपके सामने लाने की कोशिश की
क्या इन अखबारों में उन्हें जगह दी गई
चैनलों पर उन पर बहस हुई बेहतर होता कि

गहन अध्ययन से इसका जवाब खोजा जाए थोड़ी
मेहनत आप कीजिए पत्रकारिता का भी धर्म
होता है उसकी मर्यादा होती है मगर हिंदी
चैनलों और अखबारों अंग्रेजी अखबारों और

चैनलों ने भी उसे रट डाला जिस गोदी मीडिया
से पत्रकारिता के धर्म की रक्षा नहीं हुई
वह धर्म की रक्षा में पत्रकार बना फिर रहा
है टीवी चैनलों के जरिए इस पूरे आयोजन को

चुनावी माहौल में बदल दिया जाएगा इसी आंधी
पर हर तरह की मर्यादा धूल बनकर उड़ती नजर
आएगी हमने तो केवल दो अखबारों की खबरों का
यह जिक्र किया जिस तरह से इन अखबारों ने
नियमित रूप से कवरेज किया है इतनी मेहनत

की है इसकी पहचान की जरूरत है अगर
उन्होंने नहीं किया होता तो आज से 50 साल
बाद जब आप इतिहास के पन्ने पलटने जाए
आएंगे तो पलटने के लिए आपको पन्ना ही नहीं
मिलता कम से कम आप देख सकते हैं कि किस
तरह से कवर किया जा रहा है जब से मंदिर

बनना शुरू हुआ है तब से इन दो अखबारों ने
हर दिन हर ईंट के रखे जाने को कवर किया है
अयोध्या को लेकर दोनों के बीच खूब
प्रतियोगिता भी दिखती है कभी जागरण में
एक्सक्लूसिव तो कभी उजाला में एक्सक्लूसिव

यूपी का कोई भी पाठक जो इन अखबारों को
पढ़ता है हो ही नहीं सकता कि उसकी नजर
अयोध्या की खबर पर ना पड़े कोई शोधकर्ता
इस पर रिसर्च कर सकता है है कि कितनी
खबरें छपी हैं इन खबरों के जरिए किस तरह

का माहौल बनाया गया इन खबरों में किस तरह
के शब्दों के इस्तेमाल हुए यह भी अध्ययन
का विषय होना चाहिए मुझे पूरा भरोसा है कि
भास्कर से लेकर हिंदुस्तान ने भी कम मेहनत

नहीं की होगी इतनी मेहनत के बाद अगर यूपी
के पाठकों को इन खबरों के बारे में पता
नहीं तो बेहद अफसोस की बात है अखबारों के
पत्रकार जानते हैं कि अब कौन सी खबर नहीं
छपे गी उनका दिल भी अफसोस करता है कि यह

करने के लिए नहीं आए थे मगर कर रहे हैं
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट बहुत लंबी है
सोचिए एक तरफ अयोध्या जगमगा रहा है दूसरी
तरफ इसी देश की पत्रकारिता को अंधेरे में
दबोच कर फेंक दिया गया है अयोध्या की

खबरें जानने के लिए आप जागरण और उजाला पढ़
सकते हैं मगर अदानी की खबरें जानने के लिए
आपको वाशिंगटन पोस्ट पढ़ना पड़ेगा हो सकता
है कि अब जहाज पकड़कर अमेरिका ही जाना पड़
जाए वाशिंगटन पोस्ट की इस खबर में

क्या-क्या नहीं बताया गया है i में पैकसिस
कैसे घुसा इसका जवाब नहीं मिला
फोन को सरकार की तरफ से कोई हैक कर रहा है
तो सरकार उसी के पीछे पड़ गई वाशिंगटन
पोस्ट ने लिखा है कि सरकार की तरफ से

सवालों की बौछार के बाद एल का सिक्योरिटी
एक्सपर्ट बाहर से दिल्ली आता है यह बात
नवंबर महीने की है जब वह टेक्नोलॉजी
मंत्रालय के अधिकारियों से मिलता है एल से
जवाब तलब होता है एल ने अपना बचाव किया

कहा कि जब एल इस तरह की सूचना देता है आग
है तो आपको पता होता है कि आग है भारत
सरकार के इलेक्ट्रॉनिक मंत्रालय ने
वाशिंगटन पोस्ट को जवाब दिया है कि हमने
इस मामले में जांच शुरू की है अभी तक एल

ने जांच में मदद की है सरकार पर आरोप है
कि वह फोन हैक करवा रही थी पत्रकारों
सांसदों के फोन की जासूसी करवा रही थी और
सरकार ही इस मामले की कितनी गंभीरता से

जांच कर रही है सच तक पहुंचने के सारे
रास्ते बंद हो चुके हैं इस रिपोर्ट में
लिखा है कि एप्ल दबाव में है एल के सामने
चुनौती है कि भारत काफी बड़ा बाजार है मगर
सामने सरकार है क्या मोदी सरकार भी इतनी

बड़ी कंपनी को बाजार छोड़ने पर मजबूर कर
देगी या दोनों मिलकर एक रास्ता चुन लेंगे
समझौते का रास्ता फिर एल उस वादे का क्या
करेगी जो दुनिया भर के उपभोक्ताओं से करती
है कि उसका फोन सबसे सुरक्षित है जो लोग

इस भरोसे एल फोन खरीदते हैं अगर वह भी
सुरक्षित नहीं निकला तो इतना पैसा क्यों
देंगे रही बात फोन की तो क्या किया जाए हर
समय इस शक में जीने से अच्छा है कि अब
सोचा जाए क्या इस फोन को गंगा में फेंक

दिया जाए और चला जाए अयोध्या जहां सारा
देश ले जाया जा रहा है जहां सारी
पत्रकारिता पत्रकार ता छोड़कर पहुंचाई जा
चुकी है यमुना पारकर सरयु पहुंचने से पहले
ही भारत की पत्रकारिता ने खुद को अरावली

से आने वाली रेतों में डुबो लिया है रगड़
लिया है खत्म कर लिया है कितना खतरा उठा
रहे हैं वे लोग चंद पत्रकार चंद
कार्यकर्ता चंद लेखक चंद वकील जो खबरों का
पीछा कर रहे हैं उन बातों का पता लगा रहे
हैं जिन्हें सरकार छिपाना चाहती है उनके

फोन की जासूसी हो रही है जेल का खतरा
मंडरा रहा है फिर भी राम भक्त वह बना हुआ
है जो पत्रकारिता छोड़कर अयोध्या में
राम-राम करने जा रहा है

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