इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फ़ैसला | Electoral Bonds unconstitutional: - instathreads

इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फ़ैसला | Electoral Bonds unconstitutional:

नमस्कार  204 के चुनाव की
यह सबसे बड़ी खबर है अफसोस कि सुप्रीम
कोर्ट से इस फैसले को आने में कई साल लगे
कई साल तो सुनवाई नहीं हुई सुनवाई पूरी
हुई तो उसके बाद भी इसके आने में तीन

महीने लग गए लेकिन अब जब यह फैसला आया है
तो ठोक बजाकर आया है उम्मीद है आप आज के
वीडियो को सांस रोक कर पूरा देखेंगे देखिए
कि कैसे आपके भारत के लोकतंत्र काला घोटने
के लिए एक संवैधानिक तरीका अपनाया गया और

मोदी सरकार उसे पारदर्शी व्यवस्था बताती
रही आज उस पारदर्शी व्यवस्था के पीछे का
गहरा अंधेरा सामने आ गया है आप सभी के साथ
लगातार धोखा हुआ है सुप्रीम कोर्ट ने
इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया

है इलेक्टोरल बॉन्ड को रद्द कर दिया है इस
फ्रॉड व्यवस्था को लाने के लिए भारतीय
जनप्रतिनिधित्व कानून आयकर कानून और कंपनी
एक्ट में संशोधन किए गए थे उन सभी
संशोधनों को रद्द कर दिया गया है यही नहीं

जो इलेक्टोरल बंड पिछले 15 दिनों में आए
हैं और भुना नहीं गए हैं उन्हें लौटाना
होगा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी वाई
चंद्रचूड़ जस्टिस संजीव खन्ना जस्टिस बी
आर गवई जस्टिस जेवी पार दीवाला और जस्टिस

मनोज मिश्रा की एक संवैधानिक पीठ ने पिछले
साल नवंबर में सुनवाई पूरी कर ली थी और
फैसला सुरक्षित कर लिया था सुनवाई तीन
दिनों तक चली आज फैसला आ गया हम आज के
वीडियो में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के

अलावा इलेक्टोरल बंड से जुड़े सवाल इस
सवाल को कोर्ट तक ले जाने वाले हीरो की भी
बात करेंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के
पीछे कई लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी है वे

हताशा से गुजरे हैं निराशा में डूबे हैं
और आज उम्मीद से लबालब हैं 10 साल में
लोकतंत्र बचाने के कई मोर्चों पर उन्हें
हार मिली है इस जीत ने उन तमाम हारों का

हिसाब आज बराबर कर दिया क्या प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी सुप्रीम कोर्ट कोर्ट के इस
फैसले पर संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी
लेंगे उन्हीं के नेतृत्व में यह कानून पास
हुआ जिसे आज कोर्ट ने असंवैधानिक करार

दिया गोदी मीडिया के कितने पत्रकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने
की हिम्मत कर पाएंगे इलेक्टोरल फंड को

लेकर सारे सवाल आज सही साबित हो गए क्या
पता एक दिन पीएम केयर फंड को लेकर भी यही
हो जाए जो सरकार चुनावी चंदे के मामले में
इतना दु साहसी असंवैधानिक कदम उठा सकती है
उसे आज जवाब देना चाहिए था कि उसने ऐसा

क्यों किया यही नहीं प्रधानमंत्री मोदी की
नाक के नीचे आंखों के सामने उनकी पार्टी
ने चंडीगढ़ में जो किया आपने देखा
लोकतंत्र की हत्या की सुप्रीम कोर्ट ने

पकड़ लिया तब भी कोई नैतिक जिम्मेदारी
लेने सामने नहीं आया 10 दिनों के भीतर
मोदी सरकार और उनकी पार्टी का इतना बड़ा
फ्रॉड सुप्रीम कोर्ट ने पकड़ा है

प्रधानमंत्री के पास आज मौका है इसी सवाल
पर वे पहली बार 10 साल में पहली बार प्रेस
कॉन्फ्रेंस कर दें ईडी और इलेक्टोरल बंड
इन दो के दम पर नरेंद्र मोदी और उनकी

पार्टी ने चुनावी मशीनरी का साम्राज्य
खड़ा कर दिया था ईडी के सहारे विपक्ष के
नेताओं को जेल में डाला गया पार्टी में
तोड़फोड़ की गई तो इलेक्टोरल बंड के सहारे

विपक्ष की आर्थिक क्षमता को कमजोर कर दिया
गया देखते-देखते भारत की राजनीति से
विपक्ष तेजी से गायब होने लगा उसकी
मौजूदगी लाचार बेबस हताश राजनीतिक इकाई के

रूप में रह गई नरेंद्र मोदी की सरकार
201718 में इलेक्टोरल बंड लेकर आई थी आज
सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार
दिया है यह मामूली फैसला नहीं है एक
असंवैधानिक व्यवस्था के सहारे इलेक्टोरल

बॉन्ड का जन्म हुआ धर्म की राजनीति का
तूफान पैदा कर दिया जाता है जब भी इस तरह
के सवाल आते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े
सवालों को भी जनता तक पहुंचने नहीं दिया

गया गोदी मीडिया जो अपने पेशे के धर्म की
रक्षा नहीं कर सका जो संवैधानिक धर्म की
रक्षा नहीं कर सका जब भी इस तरह के सवाल
आते हैं मंदिर के सामने खड़ा हो जाता है

उसका फोटो लेकर धर्म रक्षक बन जाता है और
जनता ने भी इन सवालों की परवाह नहीं की
मगर आज सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बंड को
असंवैधानिक कहते हुए रद्द कर दिया है भारत

के लोकतंत्र के साथ इतना बड़ा फ्रॉड कभी
नहीं हुआ आज वो फ्रॉड धर लिया गया राहुल
गांधी ने लगातार इलेक्टो बॉन्ड को लेकर
सवाल उठाए आज वे भी सही साबित हो गए एक

नेता जो चुनावों में लगातार हारता है मगर
उसके उठाए सवाल लगातार सही साबित होते जा
रहे हैं 18 नवंबर 2019 का राहुल गांधी का
यह ट्वीट है राहुल ने अंग्रेजी में लिखा

है न्यू इंडिया ब्राइब्स एंड इल्लीगल
कमीशंस आर कॉल्ड इलेक्टोरल बंड्स मतलब यही
नया भारत है जहां रिश्वत और अवैध कमीशन को
इलेक्टोरल बॉन्ड कहा जाता है राहुल ने तब
हाफ पोस्ट की एक रिपोर्ट ट्वीट की थी

जिसमें तब के वित्तमंत्री अरुण जेटली
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल देखे
जा सकते हैं आज यह तस्वीर इतिहास का
शिलालेख बन गई है हफ पोस्ट अब बंद हो चुका

है आज भी राहुल गांधी ने ट्वीट किया है कि
नरेंद्र मोदी की एक और भ्रष्ट नीतियों का
सबूत आपके सामने है भाजपा ने इलेक्टोरल
बंड को रिश्वत और कमीशन लेने का माध्यम

बना दिया था आज इस बात पर मुहर लग गई
कांग्रेस पार्टी ने 2019 के घोषणा पत्र
में लिखा है कि सरकार बन गई तो इलेक्टोरल
बांड को समाप्त कर देंगे कांग्रेस चुनाव

हार गई मगर आज वही काम सुप्रीम कोर्ट के
फैसले से हो गया गोदी मीडिया इस सवाल को
लेकर तब भी चुप रहा अब भी चुप रहेगा मगर
कुछ पत्रकार थे इक्का दुक्का ही जो अपना

पेट काटकर लोगों से चंदा जमाकर इलेक्टोरल
बॉन्ड जैसी घटनाओं पर उसके फ्रॉड पर
लगातार रिपोर्टिंग कर रहे थे आज उनके
इरादों की भी जीत हुई है मदर ऑफ
डेमोक्रेसी कहने वाले नरेंद्र मोदी सरकार

का एक फैसला असंवैधानिक घोषित हो गया है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह केवल फायदे
का लेनदेन है क्विद प्रो क्यों है इसका
मतलब यही हुआ कि उद्योगपतियों को फायदा
पहुंचाओ हजारों करोड़ों का चंदा लो उन्हें

लाखों करोड़ का मुनाफे का अवसर दो
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम और जनप्रतिनिधित्व
कानून व कंपनी कानून में किए गए संशोधन
अनुच्छेद 191 ए का उल्लंघन करते हैं सूचना

के अधिकार के विरुद्ध हैं और असंवैधानिक
है कंपनी एक्ट में किए गए संशोधन से
कॉरपोरेट द्वारा असीमित चंदा दिया जाना
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है सुप्रीम कोर्ट

ने बॉन्ड जारी करने वाले स्टेट बैंक से
कहा है कि सबसे पहले बॉन्ड की बिक्री
तुरंत बंद की जाए तीन हफ्ते के भीतर जिन
व्यक्तियों और कंपनियों ने बॉन्ड खरीदे

हैं उनकी जानकारी तैयार की जाए हर बॉन्ड
जो जारी किया गया है उसकी जानकारी
सार्वजनिक करनी होगी बॉन्ड को किसने खरीदा
किस पार्टी को मिला कितने का था और किस
दिन भुनाया गया इसकी जानकारी भी देनी होगी

कोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन बॉन्ड को
भुनाया नहीं गया है और जिनके समाप्त होने
में अभी 15 दिन शेष हैं राजनीतिक दलो को व
बंड लौटा देना पड़ेगा बिल्कुल हम जान
पाएंगे मैं जो ये जो फैसला है सुप्रीम

कोर्ट का मैं समझता हूं कि अपने आप में
ऐतिहासिक है पिछले 20 2 साल में ऐसा कोई
फैसला सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिया ये
फैसला यह दर्शाता है कि जो हमारा लोकतंत्र
है उसमें दो चीजें बहुत जरूरी है पहली बात

एक पारदर्शिता होनी चाहिए जो नागरिक है
उसको पता होना चाहिए
कितना पैसा इलेक्ट्रोल बंड द्वारा किस
पार्टी को गया कितना पैसा दिया और किसने
उस वो इलेक्टरल बंड

खरीदा ये
पारदर्शिता लाई गई है सुप्रीम कोर्ट के
फैसले द्वारा दूसरी बात ये है कि इसके
द्वारा ये भी साफ जाहिर है के सुप्रीम
कोर्ट ने कहा है कि ये जो बाधाएं खत्म की

गई थी संशोधन की वजह से इनकम टैक्स एक्ट
की संशोधन की वजह से रिप्रेजेंटेशन ऑफ
पीपल एकट के संशोधन की वजह से कंपनी एकट
की संशोधन की वजह से ये जो संशोधन किया
गया है यह गलत है और यह आर्टिकल 14 का

उल्लंघन है क्यों क्योंकि कंपनी संशोधन
किया गया
वो वो इसलिए किया गया कानून इलेक्टरल बंड
स्कीम के पहले कोई भी कंपनी जो मुनाफे में
चलती है उसका 10 प्र

एवरेज
मुनाफा वो कंपनी इलेक्ट ब द्वारा पॉलिटिकल
पार्टी को दे सकती थी अब वो लिमिट खत्म हो
गई वो बाधा खत्म हो गई इस कानून द्वारा
इलेक्टरल बंड स्कीम द्वारा कितना भी पैसा

दे तो सुप्रीम कोर्ट ने बोला य गलत है
दूसरा सुप्रीम कोर्ट ने बोला इनकम टैक्स
में एमपन मिलती है वो भी गलत है और तीसरा
जो रिप्रेजेंटेशन प में पॉलिटिकल पार्टी

को बताना पड़ता है कि 20 लाख हज से कितना
पैसा आया ले ब द्वारा वो भी वो भी संशोधन
की वजह से नहीं बताना पड़ेगा तो तीनों
चीजें सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी तो

इसका मतलब ये है कि अब ये
जानकारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को दी जाएगी
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ये जानकारी तीन
हफ्ते में इस इस कोर्ट के फैसले के तीन
हफ्ते में जानकारी इलेक्शन कमीशन को

इंडिया दे कमीशन ऑफ इंडिया को देगी और फिर
इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया जानकारी एक हफ्ते
में अपनी वेबसाइट पे उसको शामिल करेगी
ताकि देश के नागरिक को यह पता चल जाए कि
कितना पैसा कितने कौन से उद्योगपति ने या

कौन से नागरिक ने दिया है इलेक्टोरल बन
द्वारा किसी भी राजनीतिक दल और ये तो साफ
जाहिर है कि सबसे ज्यादा पैसा भाजपा को
मिला है क्योंकि लगभग पाच से 6 हजार करोड़

रुपया उन्होने इलेक्टरल बंड स्कीम द्वारा
इकट्ठा किया है और उसके द्वारा इन्होंने
प्रयास किया है और ये सफल भी रहे हैं कि
बाकी राजनीतिक दल का मुकाबला करही ना जो
राज था उसका पर्दाफाश होने जा रहा है जब

सारे डिटेल सामने आएंगे और साफसाफ हो
जाएगा कि बीजेपी को कौन-कौन सी कंपनी चंदा
दे रही थी कौन-कौन से उद्योगपति चंदा दे
रहे थे और सरकार उस कंपनी और उद्योगपति के
फायदे के लिए क्या-क्या कर रही थी गोदी

मीडिया उसके पीछे-पीछे क्या कर रहा
[संगीत]
था 2014 के बाद से बीजेपी का कोई भी
चुनावी अभियान देखिए रैलियों की सजावट से
लेकर अखबारों और चैनलों में विज्ञापन तक

देखिए राजनीति में पैसे के घोषित अघोषित
ज्ञात अज्ञात खर्चे के सारे सवाल ही गायब
हो गए सबको दिख रहा था मगर कोई पूछ नहीं
रहा था धर्म के नाम पर लोग तमाम तरह के

अधर्म को बर्दाश्त कर रहे थे लगातार खबरें
छप रही थी इलेक्टोरल बंड से आने वाला चंदा
सबसे अधिक बीजेपी के पास जा रहा है साज
करोड़ का चंदा बीजेपी को मिला है बॉन्ड के
अलावा चंदे के रूप में भी कॉरपोरेट का

सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी को मिलता है
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म का
आंकड़ा है कि 20222 में जितने भी कॉरपोरेट
बॉन्ड बिके हैं उसका 90 फीदी बीजेपी को

गया है 20222 के बीच कॉरपोरेट ने 850
करोड़ का चंदा दिया इसमें से 719 करोड़ का
चंदा केवल बीजेपी को गया कांग्रेस को
मात्र 79 करोड़ तो इस तरह कई हजार करोड़
रुपए के चंदे से बीजेपी पैसे के मामले में

सबसे ताकतवर पार्टी हो गई और आर्थिक
क्षमता के हिसाब से भारत के राजनीतिक दलों
के बीच भारी असंतुलन पैदा हो गया कांग्रेस
प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा है कि
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम भ्रष्टाचार का

मामला है जिसमें सीधे-सीधे प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी शामिल हैं आज प्रधानमंत्री
बेनकाब हो गए
हैं आज प्रधानमंत्री एक्सपोज हो गए हैं

बेनकाब हो गए हैं उनका भ्रष्टाचार बेनकाब
हो गया यह
भ्रष्टाचार मैं कहूं बचते बचते हुए कह दूं
कि भाजपा का भ्रष्टाचार है यह इलेक्टोरल
करप्शन है यह सब मुझे लगता है लाग लपेट की

बात होगी यह सीधा-सीधा प्रधान मंत्री
द्वारा किया गया एक भ्रष्टाचार है जिसको
कानूनी जामा पहनाने का प्रयास किया गया
मनी बिल लाकर आपने मनी का इंतजाम कर दिया
विधायक खरीदने के

लिए कोयले की खदान देने के
लिए हवाई अड्डे देने के लिए अपने मित्रों
को उपकृत करने के लिए यह आपके सामने है आज
मैं फिर से हमारी पार्टी की ओर से इस देश
की जनता की ओर से उन तमाम वकीलों को

एक्टिविस्ट को एनजीओस को माननीय सर्वोच्च
न्यायालय को खुले दिल से धन्यवाद देते हैं
कि आपने एक ऐसा आदेश आज पारित किया है
जिससे लोकतंत्र के जिंदा रहने की उम्मीद

हम सबके मन में जागी केंद्र सरकार ने
सुप्रीम कोर्ट में हमेशा ही इलेक्टोरल बंड
का बचाव किया है मगर उसकी दलीलें आज काम
नहीं आई सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक
करार दिया यह ऐसा फैसला है जिसकी गूंज

बाहर कम सुनाई देगी क्योंकि गोदी मीडिया
इस पर घनघोर कवरेज नहीं करेगा इसकी जगह
आपको मंदिर का फोटो दिखाएगा ताकि आप भूल
जाएं कि भारत के लोकतंत्र के साथ इस बॉन्ड

के जरिए कितना बड़ा फ्रॉड किया जा रहा था
2017 में जब यह बंड आया तभी से इसे लेकर
सवाल उठ रहे थे पुरानी खबरें निकाल कर
देखिए लिखा है कि इलेक्टोरल बंड के लिए

शुरू में जो कांसेप्ट नोट बना व किसी
अधिकारी के लेटर पै पर नहीं बल्कि सादे
कागज पर बना यह खेल हो रहा था ना तो सादे
कागज पर तारीख थी ना ही किसी का दस्तखत
पूर्वा अधिकारियों ने इस कागज को देखकर

बताया है कि बाहर से किसी ने लिखा है और
इसकी भाषा अधिकारियों की नहीं लगती है 18
नवंबर 2019 के नितिन सेठी की यह रिपोर्ट
देखिए नितिन सेठी ने तमाम दस्तावेजों के

साथ इस फ्रॉड को तभी उजागर कर दिया बता
दिया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने लगातार
इस पर आपत्ति जताई कि इस तरह से बॉन्ड
नहीं लिया जा सकता है तमाम बैंकों ने कहा

कि इससे धोखाधड़ी बढ़ जाएगी मनी लरिंग
बढ़ेगी मनी लरिंग 2017 का बजट पेश होने
वाला था इसी में इलेक्टोरल बॉन्ड की घोषणा
होने वाली थी इसके जरिए कॉरपोरेट से मोटा

चंदा समेटने के लिए कानूनी जुगाड़ निकाला
जा रहा था बजट पेश होने जा रहा है और किसी
को पता नहीं कि ऐसा कानून आ रहा है बजट
पेश होने से 4 दिन पहले रिजर्व बैंक से
राय मांगी जाती है इतना बड़ा फैसला और

आखिरी मिनट में रिजर्व बैंक से राय मांगी
जाती है तब के राजस्व सचिव हंस मुख अधिया
के जवाब के अनुसार तब तक वित्त विधेयक की
कॉपी छप गई थी फिर भी रिजर्व बैंक

इलेक्टोरल बंड को लेकर कई आपत्तियां दर्ज
कराता है जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता है
रिजर्व बैंक की आपत्ति गोपनीयता को लेकर
थी तो जवाब मिला कि दान देने की गोपनीयता

ही इसका उद्देश्य है बजट पेश करने से 4
दिन पहले एक सीनियर टैक्स अफसर को कुछ
गड़बड़ियां नजर आती हैं उसे इरादा समझ आ
जाता है कि इसके जरिए बड़े कॉरपोरेशन
बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी पहचान छिपा लेंगी

और बेपनाह दौलत राजनीतिक दलों के आगे बिछा
देंगी यह तभी मुमकिन होगा जब भारतीय
रिजर्व बैंक के अधिनियम में बदलाव किया
जाए उसी दिन उसी दिन वित्त मंत्रालय की

तरफ से रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर को
ईमेल भेजा जाता है और उनसे तुरंत टिप्पणी
मांगी जाती है 30 जनवरी 2017 को रिजर्व
बैंक कहता है कि उसके अधिनियम में संशोधन
करने से गलत परंपरा शुरू होगी मनी लरिंग

बढ़ जाएगी पैसा किसी तीसरी पार्टी का होगा
और खरीदने वाला कोई और होगा इससे
पारदर्शिता का लक्ष्य पूरा नहीं होगा है
ना यह कमाल रिजर्व बैंक और वित्त विभाग के
अफसर को यह शक है कि मनी लरिंग बढ़ जाएगी

तो क्या मनी लरिंग के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड
लाया गया था मनी लरिंग के आरोप में विपक्ष
के ना जाने कितने नेता जेलों में बंद कर
दिए गए भ्रष्टाचार के हर दूसरे मामले को
मनी लरिंग का मामला बना दिया जाता है ताकि

जेल में ही सड़ते रहे और बेल ना मिले क्या
इलेक्टोरल बंड के जरिए मनी लरिंग का खेल
हुआ है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज
नीतिक प्रक्रिया पर व्यक्ति से ज्यादा असर
कंपनियों का होता है कंपनियां मनमाने
तरीके से चंदा दे सके इसके लिए मनमाने

तरीके से कंपनी एक्ट के सेक्शन 182 में
संशोधन कर दिया गया और इसी के साथ कंपनी
और व्यक्ति दोनों को बराबर कर दिया गया
जबकि चंदा देने वाले एक व्यक्ति की तुलना

में कंपनी अपने चंदे के बदले राजनीतिक दल
और उसकी सरकार से कहीं ज्यादा बड़े फायदे
हासिल कर सकती है कोर्ट ने कहा कि इन
संशोधनों से मुनाफे और घाटे में चल रही
कंपनियों के बीच के फर्क को मिटाना

मुश्किल होता है इसलिए इन संशोधनों को
रद्द कर दिया गया यह बात हमने तब भी बताई
थी जब अदानी पूर्व एंडडी टीवी में प्राइम
टाइम किया करता था कि इस संशोधन के बाद

मनी लरिंग का खेल हो सकता है हमने
इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कई प्राइम टाइम
किए बाद में अपने
आशंका सुप्रीम कोर्ट में साबित हो गई ये

तो नहीं कह सकते म हो रही थी तो बात त की
बात है इन्वेस्टिगेशन की बात है तो जब
हमें क् प्रो को पता चल जाएगा तो निश्चित
रूप से कोई ना कोई तो एफआईआर दर्ज होगी

ईडी का मुकदमा दर्ज होगा हम प्रयास करेंगे
लेकिन जो इनका इतिहास हैय इसको दर्ज नहीं
होने देंगे लेकिन यह बात जरूर है कि कोई अ
कानून नहीं आ सकता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट

ने जब फैसला किया कि यह धाक है तो जो
पुराना कानून लागू था वही लागू रहेगा
उसमें अगर संशोधन लाना चाहे तो ला सकते
हैं लेकिन ये स्कीम रद्द की गई है और इसके

द्वारा जो भी पैसा कमाया है भाजपा ने और
लगभग पा से 6 हज करोड़ रुपया कमाया है
उसका फिर उसके द्वारा इन्होंने अपनी
संपत्ति के अपने दफ्तर बनाए शायद आरएसएस
के दफ्तर बनाए खर्चा

किया एयरप्लेन में जो एमएल ले जाए गए बाकी
देशों में ताकि सरकार गिने गिराई जाए ये
सब ये काम इन्होंने किए इसी पैसा के
द्वारा तो और इससे कोई कार्य धन के साथ

कोई तालुक नहीं क्योंकि काला धन तो इससे
जुड़ा हुआ नहीं है य तो सारा वाइट का पैसा
है तो ये सुप्रीम कोर्ट ये सरकार को कहना
कि काले धन की वजह से काले धन के दुरुपयोग

से हम ये कानून ला रहे हैं यह तो आपको भी
मालूम है मुझे भी मालूम है कितना काला धन
यहां खर्च होता है रोज खर्च होता है और
इसके अलावा खर्च होता है

तो तो ये तो एक इलेक्टरल बॉन्ड स्कीम
इलेक्शन का इसका कोई ताल्लुकात नहीं था ये
ये बॉन्डिंग बिटवीन कॉर्पोरेट सेक्टर और
और और भाजपा ये इसका मकसद सुप्रीम कोर्ट

के फैसले के बाद भी राजनीतिक दल चंदे का
रास्ता निकाल लेंगे लेकिन 2018 से लेकर
2024 के बीच इलेक्टोरल बंड के जरिए जो खेल
हुआ है उसका पाई पाई का हिसाब जनता के बीच
पहुंचना चाहिए कपिल सिब्बल कहते हैं कि

मोदी सरकार का यह सबसे बड़ा घोटाला है
कोर्ट के फैसले के बाद सब सामने आ जाएगा
जनता को अंधेरे में रखने के लिए पारदर्शी
का मतलब ही बदल दिया गया सबको पता था कि
स्टेट बैंक सरकार के नियंत्रण में चलता है
तो सरकार को पता रहेगा कि किस कंपनी ने

विपक्ष को चंदा दिया किसने बीजेपी को जो
विपक्ष को चंदा देगा उसके साथ क्या हुआ यह
कहानी भी कभी सामने आएगी जब दौर बदलेगा
यही कारण है कि विपक्षी दल आर्थिक रूप से
जरजर होते चले गए आज वो खेल पकड़ में आ

गया एक महीने के भीतर यानी मार्च खत्म
होते जानकारी चुनाव आयोग के वेबसाइट पर आ
जानी चाहिए मैं सब राजनीतिक दलों से आग्रह
करूंगा इसको एक राष्ट्रीय अभियान
राष्ट्रीय मूवमेंट के द्वारा इलेक्शन में

बताया जाए देश की जनता को किस तरीके से
बीजेपी ने तो मैं समझता हूं कि सबसे बड़ा
स्कम मोदी जी हमेशा कहते रहे हैं कि कहां
है स्कम वो बीजेपी के खिलाफ तो य साबित हो

गया क है स्कम तो आपके द्वारा ही हैम किया
हुआ और और ये
एक
राष्ट्रीय मूवमेंट बनना चाहिए और सभी
राजनीतिक दलों में इसमें शामिल होना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विपक्ष के लिए
बड़ी जीत है सरकार के खिलाफ कई मामलों में
कोर्ट से उसे निराशा मिल रही थी पूर्व
जजों ने भी सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को

लेकर निराशा जाहिर की और तर्क संगत नहीं
बताया एक दिन पहले उमर खालिद ने सुप्रीम
कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली 14
फरवरी का दिन भारत के न्यायिक इतिहास में

सबसे उदास करने वाला दिन रहा कि एक युवक
ने अपनी याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस ले
ली 14 बार उसके मामले की सुनवाई नहीं हो
सकी इन सभी को याद करते हुए सामने रखते

हुए आज के फैसले को देखिए शायद इसीलिए आज
का फैसला एक ऐसा फैसला है जिसने चंद
उद्योगपतियों के हाथ में चुनावी व्यवस्था
के गुलाम बन जाने की एक बड़ी कोशिश रोक दी

और वह कोशिश कौन कर रहा था आप जानते हैं
और मैं बता चुका हूं कपिल सिब्बल प्रशांत
भूषण शदान फरासत निजाम पाशा विजय हंसारिया
ने बहस की है आज सिब्बल अपने घर में ही
मीडिया से घिरे रहे तबीयत ठीक नहीं होने

के कारण फैसले को ऑनलाइन ही सुना मगर ऐसे
कितने सवालों को लेकर सिब्बल और प्रशांत
भूषण और निजाम पाशा जैसे वकील हालात से
लोहा लेते रहे हैं क्या बाकी वकीलों को यह

सब सवाल नजर नहीं आ रहे हैं क्या उन्हें
आज के दिन नहीं लग रहा होगा कि उन्हें भी
ऐसे वक्त में अपनी संवैधानिक भूमिका
निभानी चाहिए इन सभी वकीलों ने अपने वकील
होने का आज फर्ज निभा दिया इन वकीलों की

बदौलत ही इतना बड़ा चुनावी घोटाला भारत के
सामने आ सका है इस मामले में याचिका दायर
करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर
डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एडीआर है कॉमन कॉज
है सीपीएम पार्टी है और कांग्रेस की नेता
जया ठाकुर हैं सीपीएम के नेता सीताराम यच

ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले
का स्वागत किया है एडीआर की रिपोर्ट
लगातार छप रही थी जगदीप छोकर लगातार लिख
रहे थे बोल रहे थे कि चंदा केवल बीजेपी को
जा रहा है यह बंड एक किस्म का घोटाला है

इन सभी की बात आज सही साबित हो गई इसमें
सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो 2017 में
कोशिश की गई थी कि हमारे चुनाव व्यवस्था
में एक ऐसा प्रावधान कर दिया जाए के
जिसमें जो मुख्य पॉलिटिकल पार्टिया हैं और

जो सत्तारूढ़ दल है उनको जितना पैसा मर्जी
कोई भी दे दे और उसका पता किसी को भी ना
लगे तो वो एक गड़बड़ को हटा दिया गया
यह जो हमारे चुनाव सुधार पहले था वह भी

कोई बहुत बढ़िया नहीं था उसमें भी बहुत
इंप्रूवमेंट करने की जरूरत है वह हम लोग
करने की कोशिश कर रहे हैं और करते रहेंगे
लेकिन यह जो एक नई दिक्कत 2017 में लगाई
गई थी वह व आज हट गई है और इससे यह

देशवासियों को मेरे ख्याल में यकीन होगा
के संविधान में अभी भी विश्वास रखना
पॉसिबल है और देश की जो सबसे बड़ी अदालत
है वो कानून को एक ही तरीके से सबको

अप्लाई करती है और इसमें जो एक लेवल
प्लेइंग फील्ड नहीं रही थी अनइवन लेवल
प्लेइंग फील्ड हो गई थी उसको लेवल कर दिया
गया है और दूसरे जो वोटरों का या नागरिकों

का सूचना के अधिकार का हक था कि उनको
सूचना मिले राजनीतिक दलों के चंदे के बारे
में वो
भी हो गया था उसको भी इन्होंने हटा दिया
है तो मैं समझता हूं राजनीतिक दलों को और
खास तौर पर सत्तारूढ़ दल जो हैं उनको इससे

बहुत सबक मिलना चाहिए और उनको यह ध्यान
रखना चाहिए कि इस तरह के हथकंडे अपनाने से
वह देश के चुनाव व्यवस्था को अपने कब्जे
में नहीं कर सकते हैं पहले ही हमारे देश
में लोगों को सही से जानकारी नहीं होती थी

कि कहां से पैसे आ रहे हैं क्योंकि बहुत
सारा चंदा पॉलिटिकल पार्टी के पास कैश में
आता था वह बताती ही नहीं थी कि किसने उनको
कैश दिया है लेकिन जो बैंकिंग चैनल्स से

पैसा आता था उसके बारे में लोग जानकारी रख
पाते थे अब इलेक्टोरल बंड्स ने वो जो पैसा
बैंकिंग चैनल से आ रहा है इलेक्टोरल बंड्स
के जरिए वह भी गोपनीय बना दिया तो यह तो
पूरी तरह से लेजिटिमाइज हो गई कि असीमित

पैसे आते रहे पॉलिटिकल पार्टीज के पास और
वो चाहे बैंकिंग चैनल से आए चाहे कैश से
आए लोगों को बिल्कुल मालूम ही ना पड़े कि
कौन पैसे दे रहा है पॉलिटिकल पार्टी को और

यह पूरे पर्दे के पीछे काम चलता रहे जिस
जो कि हम जानते हैं भ्रष्टाचार की जड़ रही
है किक बैक्स जो होते हैं पूरे तमाम जो

करप्शन होती है पॉलिटिकल करप्शन है
हाईएस्ट लेवल्स पे करप्शन है वो इसी तरीके
से हमारे देश में होती आई और इलेक्टोरल
बंड्स के जरिए से उसको पूरी पूरी तरह से

लेजिटिमाइज भी कर दिया गया जो पैसे
बैंकिंग चैनल से आ रहे थे उसके लिए भी तो
आज जो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है
उसमें कोर्ट ने यही कहा है कि किसी भी
लोकतंत्र में यह नहीं हो सकता कि जो लोग

वोटर हैं जो सिटीजन हैं वो यह ना जान पाए
कि किसने पैसे दिए पॉलिटिकल पार्टी को अब
से पॉलिटिकल पार्टीज जो हैं वो इलेक्टोरल
बंड्स के जरिए से फंड्स नहीं ले पाएंगी

एडीआर के जगदीप छोकर के साथ-साथ रिटायर्ड
कोमोडोर लोकेश बत्रा ने अनगिनत आरटीआई किए
वे भी इस जीत के नायक हैं उनकी जानकारी ने
इस फ्रॉड को हर तरफ से घेर लिया कभी वे

नासिक के सरकारी प्रिंटिंग प्रेस से पूछा
करते थे कि कितना बॉन्ड प्रिंट हुआ है तो
कभी राजस्व विभाग से सरकार के ही कई
विभागों में आरटीआई दायर कर लोकेश बत्रा
ने उस दौर में वो कर दिखाया जब कई लोग हाथ

पर हाथ धरकर बैठ गए हैं कि अब कुछ नहीं हो
सकता लोकेश बत्रा ने यह भी उजागर कर दिया
कि पारदर्शी होने के नाम पर यह बॉन्ड लाया
गया है मगर सरकार डिजिटल पेमेंट से बचना

चाहती थी आखिर दुनिया भर को डिजिटल पेमेंट
का लेक्चर देने वाली सरकार इलेक्टोरल
बॉन्ड के मामले में केवल डिजिटल पेमेंट से
क्यों बच रही थी सरकार जानती थी कि लोकेश
बत्रा जैसे लोकतंत्र के सच्चे सिपाही

आरटीआई करेंगे इसलिए इलेक्टोरल बॉन्ड को
आरटीआई से अलग किया गया यानी कोई नहीं जान
सकता था कि किस कंपनी ने चंदा दिया किसने
बंड खरीदा सुप्रीम कोर्ट ने कहा ऐसा करना

आरटीआई का भी उल्लंघन है क्या हो रहा है
स्टेट बैंक जिस दिन खत्म करता है ना काम
अगले दिन एक पत्र लिखा जाता है स्टेट बैंक
ऑफ इंडिया ने पूरा बरा दिया जाता है उसके

नीचे लिखा जाता है कितने सर्विस चार्ज
उसको यह लोग कमीशन बोलते हैं और जो कमीशन
है वह डिजिटल प अलग लगती है
और जो फिजिकल अलग लग फिजिकल में मानते चेक
और डा स्टेट बैंक जो है वो केवाईसी करता

है उसको पता है किसने खरीदा और हर
इलेक्टरल बंड की जो प्रोमस नोट है उसके
ऊपर एक सीक्रेट डिजिटल एक नंबर होता है जो
यवी लाइट में है तो जो एन कश करेगा बैंक
ब्रांच उसको पता हैय जनन है कि फ है तो

बैंक के पास ये पता होता है कितने किया
किस पॉलिटिकल पार्टी ने और दूसरा यह है कि
बैंक से कोई भी इन्वेस्टिगेट एजेंसी लाइक
ईडी सीबीआई कु पूछ सकते हैं हमें ये प

उसके पूछने का मतलब गवर्नमेंट को भी पता
होता आरबीआई कहता था पहले तो मान नहीं रहे
थे जब उसके पास बहुत दबाव डाल दिया और
उनका जो आरबीआई एक्ट को अमेंड कर दिया गया
तो उन्होंने कहा कम से कम क्योंकि ये

करेंसी बनाना हमारा चार्टर है हम बनाएंगे
हम छाप
बेचेंगे वो गवर्नमेंट ने नहीं माना
उन्होंने कहा हम किसी और बैंक को ऑथराइज
करेंगे

तो उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को थरा
कर दिया आरबीआई से वो भी छीन लिया उसके
बाद भी आरबीआई के जो गवर्नर थे उर्जित
पटेल जी उन्होंने बारबार पूर्व हमारे लेट

अ जती जी को पत्र भी दो तीन लिख के और यह
सितंबर के 2000 1 तक लिखते चले गए वो ये
कह रहे थे कि अगर आपने करना है तो इसमें
तो शल कंपनी बन

जाएगी जैसे इलेक्शन कमीशन ने कहा था कोई
रिकॉर्ड ही नहीं रहेगा तो उन्होंने कहा कम
से कम इसको डिजिटल डी मैट जिस फॉर्म में
होता है उस फॉर्म में जो बिकते हैं उस

तरीके से बेचे जाए सरकार ने उनके जवाब में
लिखा जो अपने सेकरी थे कि वो तो हमारा
सारा परपज ही खत्म हो जाएगा हम चाहते हैं
कि जो डोनर है उनका नाम चके तो मतलब पूरी

फाइलो में एक ही चीज था किसी तरीके से जो
डोनर है जो पैसा डोनेट करते हैं उनका नाम
बा इसके चक्कर में उन्होंने इस इसकी वजह
से उन्होंने सभी लॉ बदले गए तो कितना कुछ

हो रहा था मगर सरकार को पता था कि दबदबे
की राजनीति के लिए धन चाहिए और धन मिलता
रहे कॉरपोरेट खुलकर उसकी पार्टी को धन दे
सके इसलिए कानून चाहिए ऐसा नहीं कि
इलेक्टोरल बंड से दूसरे दलों को चंदा नहीं

मिला मगर सबसे अधिक और कई गुना अधिक चंदा
बीजेपी को ही मिला इलेक्टोरल बंड के लिए
फाइनेंस बिल का सहारा लिया गया 2018 में
इसे नोटिफाई कर दिया गया चुनावी चंदे की

व्यवस्था को साफ सुथरा करने के नाम पर
इलेक्टोरल बॉन्ड लाया गया मगर इसे लाने का
तरीका भी फ्रॉड था और जिस इरादे से लाया
गया वो भी फ्रॉड निकला सुप्रीम कोर्ट के
फैसले से साफ हो जाता है कॉरपोरेट चंदा

देगा तो उसका नाम और चेहरा गुप्त रहेगा आप
पैसे का लेनदेन करें तो आपका आधार और पैन
कार्ड एक दूसरे से खाते से जोड़ दिया जाता
है आपकी सारी जानकारी सरकार के पास पहुंच

जाती है और राजनीतिक दल मूल रूप से बीजेपी
को छक्कन देने वाली कंपनियों की जानकारी
आज आपसे गुप्त रहेगी यह खेल आपको अब भी
समझ जाना चाहिए याद रहना चाहिए कि शुरू
में रिजर्व बैंक और चुनाव आयोग दोनों ने

इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ अपनी आपत्ति
दर्ज कराई थी संसद में इसके पास हो जाने
के बाद तक चुनाव आयोग ने लिखित रूप में
कानून व न्याय मंत्रालय से कहा था कि

इलेक्टोरल बॉन्ड के रास्ते राजनीतिक दलों
को विदेशी स्त्रोत से मिलने वाले अवैध
चंदे को छिपाने में सहायता मिलेगी
रिटायर्ड कोमोडोर लोकेश बत्रा ने आरटीआई
के जरिए इन आपत्तियों के कागजात निकाले थे

जिसके बाद नितिन सेठी ने अपनी रिपोर्ट
फाइल की सवाल उठ रहे थे कि चंदा देने वाला
शेल कंपनी बनाएगा काला धन राजनीतिक दलों
के यहां खपा देगा तब तो चुनाव आयोग भी

चाहता था कि इलेक्टोरल बॉन्ड वापस ले लिया
जाए कानून मंत्रालय ने इन आपत्तियों को
वित्त मंत्रालय के पास भेज दिया मगर वित्त
मंत्रालय ने अनदेखा कर दिया फिर भी
अक्टूबर 2018 के अंत तक चुनाव आयोग

इलेक्टोरल बॉन्ड को वापस लेने की बात करता
रहा इसके लिए कई बार रिमाइंडर भी भेजा गया
लेकिन वित्त मंत्रालय ने अनदेखा कर दिया
तो ऐसा क्या हासिल किया जाना था रिजर्व

बैंक ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड पारदर्शी
नहीं है चुनाव आयोग को सर्वोपरि मानने का
लेक्चर देने वालों ने चुनाव आयोग की बात
नहीं सुनी चुनाव आयोग ने इस इलेक्टोरल बंड

का विरोध किया इसके बाद भी इलेक्टोरल बंड
का कानून बनाया गया हर स्तर पर झूठ बोला
जा रहा था कुछ छिपाया जा रहा था तो कुछ
आधा अधूरा कहा जा रहा था दिसंबर 20188 में

राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसद
मोहम्मद नदीम उल हक ने सवाल किया क्या
चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बंड को लेकर
आपत्ति दर्ज कराई थी तब वित्त राज्य

मंत्री पी राधा कृष्णन ने जवाब दिया
आपत्ति दर्ज नहीं कराई जबकि रिजर्व बैंक
और चुनाव आयोग दोनों ने आपत्ति दर्ज कराई
थी बाद में निर्मला सीतारमण को मानना पड़ा
कि चुनाव आयोग ने आपत्ति दर्ज कराई थी उस

समय तक उस समय तक रिटायर्ड कोमोडोर लोकेश
बत्रा आरटीआई के जरिए इन आपत्तियों के
कागजात निकाल चुके थे तब सांसद नदीम उल हक
ने विशेषाधिकार के हनन का मा मामला दर्ज
कर दिया लेकिन इसके बाद भी वित्त राज्य

मंत्री अपने पहले जवाब पर अड़े रहे अप्रैल
2019 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से
कहा कि आयोग इलेक्टोरल बंड के खिलाफ नहीं
है लेकिन इनके गुमनाम होने के खिलाफ है
सोचिए अभी तक

16500 करोड़ का इलेक्टोरल बॉन्ड बिका है
इनमें से 95 फीदी चंदा 1 करोड़ वाले बॉन्ड
से आया है इसका मतलब है कि अमीर लोगों का
दबदबा बढ़ा है इतना ज्यादा पैसा कोई धन्ना

सेट दे सकता है या फिर कोई कंपनी अब सबके
नाम सामने आएंगे तो पर्दा हटेगा कानून इस
तरह से बनाया जाता है कि विदेशी कंपनियां
भी बॉन्ड खरीद सकती थी आपको विदेशी फंड या
चंदे के नाम पर डराया जाता है कितने ही

संस्थानों को मिलने वाला विदेशी फंड बंद
करवा दिया गया मगर राजनीतिक दलों को
विदेशी कंपनियां चंदा दे सकती थी और उनका
नाम गुप्त रहेगा इसका इंतजाम मोदी सरकार
ने इलेक्टोरल बॉन्ड में कर दिया था यह

सवाल भारत की जनता गोदी मीडिया और उसके
संपादकों ने क्यों नहीं पूछा कि विदेशी
कंपनियों को गुप्त रूप से चंदा देने की
छूट क्यों दी जा रही है इस भ्रम में ना
रहे कि इसकी खोजी रिपोर्टिंग गोदी मीडिया

कर रहा था गोदी मीडिया इतिहास में केवल
इसीलिए दर्ज किया जाएगा कि इसने भारत के
लोकतंत्र की हत्या करने में भूमिका निभाई
पत्रकारिता के लिए इसे कभी याद नहीं किया

जाएगा द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के नितिन
सेठी ने सबसे पहले इलेक्टोरल बंड पर छह
पार्ट में रिपोर्ट जारी की नवंबर 2019 से
लेकर 30 जनवरी 2020 के बीच उन की सारी

रिपोर्ट छपती है कमोडोर बत्रा ने अपने
सारे दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए कि कोई भी
इन्हें पढ़ ले जांच ले कि उनकी बात सही है
या नहीं नितिन सेठी ने हजारों पन्नों के

दस्तावेजों का महीनों अध्ययन किया तब जाकर
इसे प्रकाशित किया उनकी रिपोर्ट तमिल
अंग्रेजी हिंदी और मलयालम में है न्यूज़
लांड्री पर सारी रिपोर्ट हिंदी में मिल

जाएगी सोचिए एक पत्रकार जो अपने दम पर
लोगों के चंदे से पत्रकारिता कर रहा है वो
ऐसी रिपोर्टिंग करता है लेकिन जिस गोदी

मीडिया को जनता के पैसे से ही सैकड़ों
करोड़ों रुपए के विज्ञापन मिलते हैं उनके
यहां ऐसी पत्रकारिता नहीं होती है आपके
पैसे से ही आपका गला घोटा जा रहा है मेरी

यह बात लिखकर अभी तुरंत अपने पर्स में रख
ले जब 2017 में सरकार ने य इलेक्टोरल बंड
स्कीम निकाली तभी हम लोग समझ गए थे यह एक
तरीके से करप्शन को एक लीगल जामा पहनाने

का प्रयास हो रहा है लेकिन हमें सबूत
चाहिए थे कागजी जहां कागजों पर साफ दिखे
कि क्या किया गया है उस समयम लोकेश पत्रा
और हम जैसे कुछ लोग यह कागज ढूंढने में लग
गए 2018 में स्कीम चल पड़ी पैसा जमा होने

लग गया 2018 के आखिर तक आते आते यह कागज
कमोडो लोकेश पत्रा के हाथ लगे उन्होने
हमको रिपोर्टर्स कलेक्टिव को य कागज सौंप
दिए यह विश्वास के साथ कि हम पढ़ के

समझेंगे और सच्चाई बिना डरे बताएंगे चार
महीने वह कागज हम पढ़ते रहे कागज पढ़ते
पढ़ते अपने सोर्सेस बनाए जिन से समझने की
कोशिश करी कि कागजों में क्या-क्या है

क्या करने का प्रयास हो रहा है चार महीने
बाद उस समय चाहे हम लोगों के पास पैसा
नहीं था लेकिन हिम्मत थी वह कागज हमने छह
पाठ की श्रंखला में अलग-अलग भाषाओं में एक

साथ छापा उसमें दिखाया कि कैसे सरकार ने
आरबीआई इलेक्शन कमीशन इन सबके विचारों को
नजरअंदाज करके यह स्कीम चलाने
का प्रयास किया था यह भी दिखाया कि कैसे

सरकार ने जो स्कीम को अपनी स्कीम को तोड़
के पार्टी के लिए पैसा ज्यादा चंदा जमा
करने का प्रयास करती
रही वह सारे कागजात सुप्रीम कोर्ट के केस
में लगे एविडेंस के तौर पर लेकिन हमने फिर

परसू करना शुरू किया जब देखा कि सुप्रीम
कोर्ट इसमें ज्यादा जल्दी नहीं चल रहा है
डेढ़ दो साल करने के बाद जब सुप्रीम कोर्ट
ने कुछ इलेक्टोरल बंड्स का डाटा सील्ड

एनवलप में बुला के अपने पास जेब में रख
लिया था हमने वो सील्ड एनवेलप का डाटा
दोबारा निकाला और दिखाया कि कैसे ज्यादातर
पैसा इलेक्टोरल बंड से जो आ रहा था सिर्फ
भाजपा को गया था सारी रिपोर्ट यही बताती

है कि इस कानून के पीछे का इरादा सही नहीं
था यह पारदर्शी कानून नहीं था यह एक ऐसा
कानून था जिसके जरिए पैसे के सोर्स को
गुप्त रखना था गोपनीयता की बात को समझना

जरूरी है सरकार ने बार-बार यही कहा हमारा
मकसद है दान देने वाले की पहचान सामने ना
आए क्योंकि इससे पारदर्शिता सुनिश्चित
होगी मगर जब पहचान गोपनीय होती है तो किसी
कंपनी के शेयर होल्डर को भी इसकी जानकारी

नहीं होगी कि कंपनी का पैसा कहां-कहां लग
रहा है ना ही किसी पार्टी को वोट करने
वालों को पता होगा कि उनकी पार्टी को पैसा
कहां से मिल रहा है जीतने के बाद यह

पार्टी उस पैसे के बदले में उस कंपनी के
लिए क्या करेगी सुप्रीम कोर्ट ने आज जो
कहा है वही बात वही बात 1957 में दो
अलग-अलग फैसलों में बम बबे और कोलकाता हाई
कोर्ट ने कही थी दोनों अदालतों ने

कंपनियों द्वारा सरकार को निर्बाध चुनावी
दान देने के खतरों के बारे में चेताया था
बम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस
एम सी छावला ने कहा था ये एक ऐसा खतरा

होगा जो बहुत तेजी से बड़ा हो सकता है और
जो इस देश में लोकतंत्र का गला घूंट सकता
है केस यह था कि टाटा आयरन एंड स्टील
चुनावी चंदा देने की अनुमति चाहती थी टाटा
के वकील ने कहा कि कंपनी इतना तो कर ही

सकती है कि अपनी सालाना बैलेंस शीट में
चंदे की जानकारी शामिल करें लेकिन चीफ
जस्टिस ने कहा कि यह शर्त बहुत कमजोर होगी
उन्होंने कहा कि सिर्फ यह काफी नहीं होगा
कि शेयरधारकों को पता चले कि किसे चंदा

दिया गया है मगर यह भी जरूरी है कि
मतदाताओं को पता चले कि पार्टी को चंदा
कैसे मिल रहा है उन्होंने कहा कि अगर
मतदाता को पार्टी के बारे में जानकारी

नहीं है तो कोई भी लोकतंत्र सुचारू रूप से
काम नहीं कर सकता है इलेक्टोरल बॉन में
ठीक उल्टा हुआ दोनों बातें उलट दी गई ऐसा
कानून लाया गया कि कंपनी के शेयर धारकों

को भी पता ना चले और मतदाताओं को भी आपकी
आंखों के सामने इतना बड़ा घोटाला हो गया
फिर भी वह कहते हैं हमारी सरकार के दौर
में कोई घोटाला नहीं हुआ नमस्कार

Leave a Comment