कर्पूरी की आरक्षण नीति, मुसलमान और भाजपा | Karpoori's reservation policy, Muslims in Bihar and BJP - instathreads

कर्पूरी की आरक्षण नीति, मुसलमान और भाजपा | Karpoori’s reservation policy, Muslims in Bihar and BJP

नमस्कार भारतर रत्न कपूरी
ठाकुर को मिला है और चर्चा बिहार में
सरकार के अदला बदली की ज्यादा हो रही है
कपूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर बीजेपी
नीतीश कुमार को कपूरी के एक और राजनीतिक

वारिस लालू यादव से अलग करने की कोशिश में
है मगर इस हंगामे में जिन्हें भारत रत्न
मिला है उनके राजनीतिक जीवन और राजनीतिक
दौर की कहीं कोई चर्चा नहीं इस वीडियो को

पूरा देखिए का काफी कुछ जानने को मिलेगा
26 जनवरी के वीडियो में हमने बताया कि जब
कपूरी ठाकुर ने बिहार में पहली बार अति
पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया तब जनसंघ
के नेताओं ने उन्हें गालियां दी उनकी

सरकार गिरा दी लेकिन आज उसी जनसंघ से
निकली बीजेपी कपूरी ठाकुर को भारत रत्न
देकर उनकी विरासत पर दावा करने निकली है
कपूरी ठाकुर ने केवल अति पिछड़ी जातियों
को ही आरक्षण नहीं दिया बल्कि मुसलमानों

की 36 प्रकार की पिछड़ी जातियों को भी
आरक्षण दिया आप जानते हैं कि बीजेपी और
आरएसएस मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने के
सख्त खिलाफ है लेकिन कपूरी ठाकुर का यह
फैसला भारत की राजनीति में एक ऐसी बुनियाद

डाल गया कि बीजेपी बिहार में इसका जिक्र
तक नहीं करती कभी कह नहीं पाती कि वह
सत्ता में आएगी तो इस आरक्षण को पलट देगी
यही कर्पूरी ठाकुर की राजनीति थी सही बात
की राजनीति और सही के लिए अड़ जाने की

राजनीति जिस तरह कपूरी ठाकुर ने अंग्रेजी
में पास होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी
और यूनिवर्सिटी और सरकारी नौकरियों में
अति पिछड़ी जातियों के लिए दरवाजे खोल दिए
उसी तरह मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण

देकर मुसलमानों के लिए हर स्तर पर
प्रतिनिधित्व के दरवाजे खोल दिए बिहार में
लंबे समय तक के लिए वैचारिक संतुलन बन गया
यही कारण है कि कपूरी ठाकुर की विरासत की
बात कम हो रही है केवल भारत रत्न भारत
रत्न का जाप हो रहा है बल्कि वह भी बंद हो

चुका है कपूरी ठाकुर की सरकार के समय ही
मुस्लिम समाज को लेकर व्यापक प्रस्ताव
तैयार किए गए करपुरी उर्दू को राजभाषा तो
नहीं बना सके मगर इसे बनाने पर अड़े रहे
प्रस्ताव तैयार कर कैबिनेट में ले आए मगर

जनसंघ के दबाव के कारण पास नहीं हो सका
बाद में आगे चलकर कांग्रेस की जगन्नाथ
मिश्रा की सरकार ने उर्दू को दूसरी
राजभाषा का दर्जा दिया कपूरी ठाकुर की
सरकार कम समय चली मगर इतने ही कम समय में

उन्होंने और उनके शिक्षा मंत्री गुलाम
सरवर ने उर्दू और मुस्लिम छात्रों के हित
में इतने फैसले लिए कि बिहार की राजनीति
में और सामाजिक स्तर पर भी मुसलमानों का
प्रतिनिधित्व बदल गया उर्दू में पढ़ाई
होने से उर्दू टीचर के लिए बड़ी संख्या

में मुस्लिम नौजवान बहाल हुए सरकारी
दफ्तरों में उर्दू में जवाब देने के कारण
उर्दू अनुवाद कों को नौकरियां मिली उर्दू
माध्यम स्कूलों को मान्यता देकर रोजगार के

नए अवसर सर खुले 1977 में जब कपूरी
मुख्यमंत्री बने तो मुसलमानों की सभी
पिछड़ी जातियों के छात्रों की शिक्षा
मुफ्त कर दी उस समय तक केवल अति पिछड़ी
जातियों को ही यह सुविधा मिल रही थी 1973
में बिहार में उर्दू अकादमी की स्थापना तो

हो चुकी थी 1978 में कपूरी ने इसका बजट 10
करोड़ कर दिया कपूरी ठाकुर के समय में ही
बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड को
मान्यता दी गई ऐसा कर कपूरी ठाकुर ने ने

पिछड़ा वाद का राजनीतिक मैदान काफी बड़ा
कर दिया उनका पिछड़ा वाद केवल हिंदू समाज
की जातियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि
मुस्लिम जातियों के पिछड़ेपन को भी

उन्होंने ईमानदार नजर से देखा और सरकारी
नीतियों में उन्हें शामिल किया इसका लाभ
समाजवादी आंदोलन को इस तरह मिला कि
मुसलमानों का बहुत बड़ा हिस्सा कांग्रेस

को छोड़ समाजवादी धरों की पार्टियों के
साथ लंबे समय तक बना रहा बीजेपी कभी नहीं
चाहेगी कि करपुरी ठाकुर के इस योगदान की
चर्चा हो तेलंगाना चुनाव में बीजेपी के
नेता योगी आदित्यनाथ भाषण दिया करते थे कि
सरकार में आए तो मुसलमानों का आरक्षण

समाप्त कर देंगे मुस्लिम आरक्षण
असंवैधानिक है महाराष्ट्र में भी जब जाति
के आधार पर मुस्लिम पिछड़ी जातियों को
आरक्षण देने का मसला आया तो बीजेपी ने
विरोध किया और कहा कि यह संवैधानिक है हम

नहीं होने देंगे कर्नाटका में मुसलमानों
को आरक्षण मिल रहा था उसे 203 के विधानसभा
चुनाव के करीब आते-आते बीजेपी की सरकार ने
रद्द कर दिया अमित शाह ने बकायदा इस फैसले
का बचाव किया और कहा कि भाजपा धर्म पर
आधारित आरक्षण में विश्वास नहीं करती है

बाद में कोर्ट ने आरक्षण खारिज करने वाले
निर्णय पर अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी
अपने समय में कपूरी ठाकुर ने मुसलमानों के
लिए जितने फैसले लिए शायद ही किसी और समय
में इतने फैसले लिए गए होंगे यह भी ध्यान

में रखने की बात है कि ओबीसी के 27 प्र
आरक्षण में मुसलमानों की पिछड़ी जातियों
को भी आरक्षण मिलता है और केंद्र सरकार ने
कभी छेड़छाड़ नहीं की इस आरक्षण की
बुनियाद कपूरी ठाकुर ने रखी थी कपूरी के
समय के जनसंघ ने तो पूरे आरक्षण का ही

विरोध किया था क्या मुसलमान क्या हिंदू
सभी पिछड़ी जातियों के आरक्षण का विरोध
किया था मैं आपको बताना चाहता हूं कि जो
बीजेपी की सरकार करपुरी ठाकुर को भारत
रत्न की दे रही है वह मुसलमानों को इंपावर

करने के खिलाफ दिखती है कर्नाटक में कमीशन
का रिपोर्ट है बैकवार्डनेस है मुसलमानों
में और इस बैकवार्डनेस के आधार पर 4 फीसद
रिजर्वेशन मुसलमानों को दिया जाता है
बीजेपी की सरकार ने उस रिजर्वेशन को कैंसल
किया और उसका विरोध करती है तेलंगाना में

कमीशन का रिपोर्ट है बैकवार्डनेस है एमरिक
डाटा है और मुसलमानों में जो पिछड़ी
जातियां है तेलंगाना में उनको रिजर्वेशन
दिया गया है बीजेपी उसका भी विरोध करती है
महाराष्ट्र में महमूद उर रहमान कमेटी की

रिपोर्ट सच्चर कमेटी की रिपोर्ट एंपर कल
डाटा और यहां पे जो बैकवर्ड जो कास्ट है
मुसलमानों में उनको 5 फी रिजर्वेशन दिया
गया है बीजेपी उसका भी विरोध करती है रा
आउटलेट से 2014 में एक किताब आई मुस्लिम

पॉलिटिक्स ऑफ बिहार चेंजिंग कंटोस इसके
लेखक डॉक्टर मोहम्मद सज्जाद ने बताया कि
60 और 70 के दशक में उर्दू का मसला
मुस्लिम राजनीति का केंद्रीय मसला बन गया
डॉकर सज्जाद लिखते हैं कि उर्दू पर खुलकर

स्टैंड लेने के कारण बिहार में मुसलमान
कांग्रेस से दूर होने लगे और जनता पार्टी
की तरफ जाने लगे जेपी के आंदोलन का आधार
इस कारण भी बड़ा हुआ कपूरी ठाकुर उर्दू को
दूसरी राजभाषा का दर्जा दिए जाने पर अड़

गए उर्दू के कारण समाजवादी आंदोलन में
पढ़े-लिखे मुस्लिम नेता उभरकर सामने आए और
प्रमुख स्थान हासिल किया कांग्रेस ने इसे
समझने में देरी कर दी जब जब देखा कि उर्दू
के कारण मुसलमान लोक दल की तरफ जा रहे हैं
तब जाकर कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में
बिहार में उर्दू को दूसरी राजभाषा का

दर्जा दिए जाने की बात शामिल की 1980 में
चुनाव जीतने के दो दिन के भीतर कांग्रेस
ने इसे लागू करने की घोषणा की कपूरी ठाकुर
की नजर हमेशा जमीन पर होती थी हम आमतौर पर
उर्दू के सवाल को भाषा के सवाल तक सीमित

रखते हैं मगर कपूरी ठाकुर जानते थे कि
उर्दू का सवाल प्रति धत्व का सवाल है एक
भाषा के कारण इसे बोलने वालों को आप
स्कूलों से लेकर नौकरियों में पीछे नहीं

रख सकते उनके फैसलों ने मुस्लिम समाज के
पिछड़े तबके को ऊपर आने की रस्सी थमा दी
और पढ़े लिखे लोगों को आगे आकर नेतृत्व
संभालने का मौका दिया उर्दू को कपूरी

ठाकुर ने अलग नजरिए से देखा उनके खिलाफ
नारे लगते थे मौलवी कपूरी ठाकुर मुर्दाबाद
मगर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की उर्दू को
लेकर वे रोमांटिक नहीं थे व्यावहारिक थे
यही कारण था कि उनका विरोध होने लगा कपूरी

की सरकार में शामिल जनसंघ ने विरोध शुरू
कर दिया व सरकार जो है उसका 33 सूत्री
कार्यक्रम जो है बना था उस 33 सतरी
कार्यक्रम में एक कार्यक्रम यह भी था कि

बिहार में हम द्वितीय राज भाष उर्दू को
द्वितीय राज भाषा बनाएंगे यह बात कहां से
1965 में बड़ा भारी आंदोलन
था समाजवादी उसमें शामिल थे सावादी उसमें
शामिल थे डॉक्टर लोहिया 9 अगस्त को पटना

में गिरफ्तार किए गए थे कई जगह लाठी और
गली चली थी उस समय एक मुस्लिम नेता जिनका
नाम गन सरवर है जो बाद में बिहार विधानसभा
का स्पीकर भी बने कई विभागों के मंत्री
रहे उनका प्रदु हुआ और वो वक्त उस समय का

वक्त ऐसा था कि
अधिकांश मुस्लिम नेता और मुस्लिम समाज
कांग्रेस के साथ था वैसे माहौल में गुलाम
सर्वर साहब जो है ये जो 65 का आंदोलन चला
कांग्रेस के खिलाफ उसमें उनका अवतरण हुआ

और इतने जबरदस्त वक्ता थे मैंने उनका भाषण
खुद सुना था मैंने भीड़ को हज 4 हज 5 हजार
भीड़ को र में बहा देना उनके लिए बहुत
आसान था और व
एकने अखबार भी निकालते थे जिसका नाम संगम
था और संगम भी आग उबलने ही वाला था जिस

तरह से उनके भाषण से गर्मी पैदा होती थी
उसी तरह से उनके मने संगम के वजह से होता
है उनकी पृष्ठ भूमि थी व नेशनलिस्ट
मुसलमानों के खिलाफ जो कमल ना था मुस्लिम

लीग थी उसके युवा शाखा के बिहार के व
अध्यक्ष थे उनके ऊपर आरोप था कई मुकदमे
उनके ऊपर थे लेकिन जो सरकार बनी सरकार को
को बनाने में उनकी बहुत भूमिका रही
इसलिए एक अजीब ढंग की स्थिति पैदा हुई कि

साहब इतना बड़ा काम हो रहा था सकाल की
स्थिति थी सरकार ने उर्दू को कैसे द्वितीय
राज भाषा जो है वो बना दिया उसके खिलाफ
भयानक आंदोलन शुरू
हुआ आपको याद है रांची में बड़ा भारी दंगा
हुआ और मेरे पिताजी उस समय गृह मंत्री थे

पुलिस मंत्री
थे
वहां कैसे कैसे स्थिति नियंत्रित हुई हम
खुद उसके माने आई विटनेस है हमने देखा है
अपनी आंखों से क्या हालत रही है वहां और

कई चीजों को हमने नई चीजों को जाना
उसमें सवाल उठता है कि साहब 33 सूत्री जो
कार्यक्रम बना था उसका ब वा
यावा जो है वह था उर्दू को द्वितीय राज
भाषा बनाने का उसमें गुलाम सरवर साहब का

कहना है कि नहीं साब उर्दू जो है व फारसी
मेंही लिखी जाएगी व देवनागरी लिपि में
नहीं लिखी जाएगी उसको लेकर बड़ा भारी
आंदोलन चला हिंदी साहित्य सम्मेलन में और

बाकी जनसंघ के लोगों ने उस समय यह थे
ठाकुर प्रसाद जी थे ठाकुर प्रसाद जी के
पुत्र हैं रवि शंकर जी ठकर प्रसाद जी ने
कहा कि हम साब टुकड़ा टुकड़ा कर देंगे अगर
द्वितीय राज भाषा इसको बनाया गया कपूरी

ठाकुर ने भी दो बार जनसंघ के साथ मिलकर
सरकार बनाई मगर दोनों बार उन्हें जनसंघ की
विचारधारा और राजनीति का तूफान झेलना पड़ा
जिस समय कपूरी ठाकुर बिहार में अपनी पकड़

बना रहे थे उसी समय जनसंघ और उनके अपने दल
के भीतर की ताकतें उनकी जड़ें कमजोर कर
रही थी उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा
दिए जाने का बिहार में बहुत विरोध हुआ कई
जगहों पर हिंसा भड़क उठी रांची हटिया में

दंगे हो गए साहित्यकार और पत्रकार
फणीश्वरनाथ रेणु ने इस पूरे घटनाक्रम पर
बेहतरीन रिपोर्ट लिखी है इस रिपोर्ट में
रेणु दंगों के कारणों को देखते हैं और साथ
ही साथ वे उन लोगों को भी देख रहे होते
हैं जो दंगों की जमीन तैयार करते हैं और

अनजान बने रहते हैं रेणु की इस रिपोर्ट
में एक नाम आता है गुलाम सरवर का गुलाम
सरवर बिहार विधानसभा के स्पीकर भी बने और
मंत्री भी रहे उर्दू को लेकर उन्होंने
जबरदस्त आंदोलन चलाया था और लिखा था अतीत

के इन प्रसंगों को पलटकर जब आप देखेंगे तो
पाएंगे कि दंगे कराने दंगों के पीछे की
मानसिकता पैदा करने का तंत्र 60 और 70 के
दशक में ही काफी मजबूत और विकसित हो चुका
था कभी भी सेकुलर सरकारों ने उस मानसिकता
को कुचलने का प्रयास नहीं किया बल्कि

सेकुलर ताकतों ने भी सांप्रदायिकता का
सहारा लिया जिसकी प्रतिक्रिया में
बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बड़ी और ताकतवर
होती चली गई नतीजा यह हुआ कि आज बहुसंख्यक
समाज के लड़के दंगाई बन रहे हैं
मोटरसाइकिल पर धार्मिक ध्वज लगाकर

अल्पसंख्यक समाज के मोहल्लों में जाते हैं
ललकार हैं गालियां देते हैं गाली देने
वाले संगीत पर डांस करते हैं फणीश्वरनाथ
रेणु की रिपोर्ट का शीर्षक दिलचस्प है
जुनूनी तूफान बाख और बेखबर जनता यह लेख 24

सितंबर 1967 का है इस लेख में रेणु बिहार
में चल रही कई तरह की लहरों का जिक्र करते
हैं बताते हैं कि घटनाएं इतनी तेजी से घट
रही हैं कि अब लोग उनको खबर या समाचार
नहीं कहकर आम बात समझने लगे हैं विधानसभा

में गालियां दी जा रही हैं रेलगाड़ियों पर
हमला हो रहा है परीक्षा भवनों पर हमले हो
रहे हैं कोने-कोने से अमन चैन गायब है
रेणु लिखते हैं कि करपुरी ठाकुर और पुलिस
मंत्री रामानंद तिवारी कड़ी कार्रवाई की

धमकियां देने लगे इन सब बातों से राजनीतिक
क्षेत्र में एक उम्मीद और बंद चली थी कि 6
महीने तक राज करने के बाद उपमुख्यमंत्री
कपूरी ठाकुर 33 सूत्री कार्यक्रम के उर्दू
वाले कार्यक्रम को उसी चतुराई से चलाने का

कौशल सीख चुके होंगे जिस तरह कांग्रेसी
शास ने चलाया था मगर ऐसा नहीं हुआ और हुआ
यह कि 28 जुलाई को विधानसभा भवन के सामने
और एक लहर फिर आई और थपेड़ों से विधानसभा
भवन की हर ईंट को कपा गई उस उमड़ती हुई

भीड़ में उर्दू विरोधी जनता में मौजूद
सरकार के दुश्मन नंबर एक पार्टी के लोग ही
नहीं दोस्त एवं साझीदार पार्टी के लोग भी
थे फणीश्वरनाथ रेणु लिखते हैं 1967 की

सरकार अकाल से निपट रही थी भ्रष्टाचार
अराजकता से लड़ रही थी जनहितकारी और
प्रगतिशील सरकार थी सरकार को किन-किन
ताकतों का सामना करना पड़ रहा था इन सब की
जानकारी के बावजूद यह कर्मठ समाजवादी

मंत्री इस फील चक्कर में कैसे पड़ गया
रेणु को पढ़ते हुए उस समय के पटना का
दृश्य सामने घूमने लगता है 12 अगस्त 1967
को पटना के गांधी मैदान में एक सभा होती
है इसमें कांग्रेस के नेता डॉक्टर लक्ष्मी
नारायण सुधांशु बिहार में जनसंघ के

संस्थापक ठाकुर प्रसाद और कवि नागार्जुन
ने भाषण दिया था रेणु लिखते हैं कि सभा
में प्रस्ताव पेश किया नागार्जुन जी ने
नागार्जुन ने कहा कुछ लोगों ने मुझसे कहा

कि नागार्जुन जी आप भी उर्दू का विरोध
करते हैं क्या आप भी जनसंघ हो गए मैंने
कहा अगर उर्दू का विरोध करना जनसंघ होना
है तो मैं 100 जनसंघ होने को तैयार यार
हूं यह भी रेणु के ही शब्द है जो मैं पढ़

रहा हूं 12 अगस्त की विरोध सभा में बोलने
वालों में बस एक ही वक्ता ऐसा था जिसकी हर
बात पर गांधी मैदान तालियों की गड़गड़ाहट
से गूंज उठता था जनसंघ के नेता ठाकुर

प्रसाद जी ने कहा नागार्जुन जी ने अभी
जनसंघ ी होने की बात कही मगर मैं तो जनसंघ
का प्रतिष्ठा और जन्मदाता हूं जनसंघ कोई
ऐसी वैसी पार्टी नहीं है हर शहर और गांव

की गली में मोर्चा लेने की ताकत है अगर
सरकार ने उर्दू विधेयक को वापस नहीं लिया
तो आप यह जान लीजिए मैं इस सरकार के
टुकड़े टुकड़े कर
दूंगा ठाकुर प्रसाद बीजेपी के सांसद और
पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के

पिता हैं रविशंकर प्रसाद भी राजनीति में
परिवारवाद का विरोध करते हैं कई खबरें
आपको मिल जाएंगे जिसमें रविशंकर प्रसाद
परिवारवाद को राजनीति और लोकतंत्र का खतरा
बता बताते हैं बिहार की राजनीति में हर

कोई जानता है अपने पिता ठाकुर प्रसाद के
कारण रविशंकर प्रसाद भी महत्त्वपूर्ण होते
चले गए यह तब की बात है जब समाजवादी धड़े
में परिवारवाद एक बड़ा मुद्दा बन चुका था
मगर वह कांग्रेस को टारगेट करने के लिए

ज्यादा था खुद को परिवारवाद से बचाने के
लिए नहीं था रेणु ने अपनी रिपोर्ट में
गुलाम सर्वर के बारे में लिखा है कि वे
राष्ट्रवादी मुसलमानों के विरोधी थे और

सांप्रदायिकता के पोषक और प्रचारक भी उन
दिनों गुलाम साहब पर कई मुकदमे दायर हुए
कि उनके अखबार में सांप्रदायिकता को
उभारने वाली बातें छपी हैं महामाया बाबू
की सरकार बनने में गुलाम सरवर के भाषणों

की बहुत भूमिका थी मुख्यमंत्री बनते ही
महामाया बाबू ने गुलाम सरवर के खिलाफ दर्ज
सारे मुकदमे वापस ले लिए क्या गुलाम सरवर
सांप्रदायिक थे क्या वे उर्दू को लेकर
दूसरे समुदाय को भड़का रहे थे उन्होंने
हमेशा उर्दू के लिए दूसरी राजभाषा का

दर्जा चाहा हिंदी के दर्जे को हटाने की
मांग नहीं की क्या इस वजह से वे
सांप्रदायिक हो गए कि वे उर्दू को फारसी
लिपि में लिखे जाने की मांग कर रहे थे

क्या हिंदी को किसी और लिपि में लिखा जाना
कोई स्वीकार कर सकता था गुलाम सरवर जी के
राजनीति का जहां तक सवाल है तो यह छात्र
जीवन में बिहार मुस्लिम स्टूडेंट फेडरेशन
के हिस्सा थे ऐसा कहा जाता है लेकिन उसके

बाद उन्होंने उर्दू की राजनीति तो की है
कि उन्हें आर्टिकल 347 के
हिसाब से उसके अनुसार द्वितीय राज राज
राजभाषा बनाया जाए बिहार का सेकंड ऑफिशियल

लैंग्वेज बनाने का आंदोलन व 1951 से
लगातार चलाते रहे और वह आंदोलन 1989 में
पूर्ण रूप से सफल हुआ तो 1951 से 1989 तक
य आंदोलन चलता ही रहा गुलाम सरवर जी की
राजनीति को वह हिंदी विरोध की राजनीति

नहीं किए उन्होंने उर्दू की राजनीति की
लेकिन हिंदी विरोध की राजनीति नहीं की है
1965 में उन पर एक मुकद्दमा चला था और उस
मुकदमा में यह था कि संगम उनका जो संगम
अखबार था उर्दू का पहले साप्ताहिक था बाद

में डेली हो गया दैनिक हो गया उस अखबार
में उन्होंने कोई कुछ दंगों की रिपोर्ट
लिखी थी मार्च 1964 के दंगों की कुछ
रिपोर्ट लिखी थी जिसमें से कई रिपोर्टों
में से यानी 39 रिपोर्ट रिपोर्ट छपी थी

रिपोर्ट या लेख जो भी था उन 39 में से
केवल एक में वह गलत पाए गए थे और उन पर
जुर्माना वगैरह हुआ था और उसको लेकर के
हाई कोर्ट गए थे तो हाई कोर्ट के मुकदमे
का उस मुकदमे का हाई कोर्ट का जो फैसला है

वह इंडियन कानून ओजी पर पड़ा हुआ है
अपलोडेड है उसमें क्लियर दिखाया जाता है
कि जजों
ने 39 39 रिपोर्ट और एसेज को एनालाइज करके
एक में उनको गलत पाया था तो इसलिए इस पूरे

राजनैतिक जीवन पर अगर गुलाम सरवर के नजर
डाला जाए तो 1951 से लेकर और 2004 तक वह
जीवित रहे उसमें उन्होंने कोई हिंदू
विरोधी या उस तरह की सांप्रदायिक राजनीति
या हिंदी विरोधी राजनीति उन्होंने नहीं की
है गुलाम सर्वर अगर सांप्रदायिक हैं तो भी

हिंदी के इतने बड़े प्रगतिशील कवि को
उर्दू विरोधी हो जाने और खुद को जनसंघ
लाइन पर चले जाने की जरूरत क्यों पड़ गई
ऐसी छूट लेने पर वे क्यों उतारू हो गए आप
उर्दू विरोधी और जनसंघ अपने यकीन और समझ
के हिसाब से होते हैं हिंदू सांप्रदायिकता

का विरोध करते-करते आप मुस्लिम
सांप्रदायिकता को गले नहीं लगाते उसी तरह
मुस्लिम सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर
हिंदू सांप्रदायिकता के सांप को गले में

नहीं लपेट दे सवाल उठता है कि खुद को
जनसंघ कहने में नागार्जुन जैसे कवि आरएसएस
और जनसंघ के राजनीतिक वजूद को अनदेखा करने
की चालाकी कर गए उस समय तक आरएसएस और
जनसंघ की सोच बिल्कुल साफ हो चुकी थी

गांधी की हत्या हो चुकी थी रेणु ने अपनी
इसी रिपोर्ट में नागार्जुन को बहुत बारीक
नजर से देखा है वे लिखते हैं कि आधा दर्जन
से अधिक स्थानीय प्रगतिवादी साहित्य कों
की ओर से एक सम्मिलित वक्तव्य तैयार किया

गया उस पर हस्ताक्षर लेने के लिए जो लोग
घूम रहे थे उनमें नागार्जुन जी भी थे उस
वक्तव्य में कांग्रेस और साहित्य सम्मेलन
और सेठों भ्रष्टाचारियों मुनाफा खोर को

पानी पीपी करर कोसा गया था जनसंघ का कहीं
नाम नहीं था और जब बातें छेड़ने की कोशिश
की गई तब पता चला कि तख्ता पलटने का असली
खतरा जनसंघ से है बीपी मंडल से नहीं इसलिए

जनसंघ को कोई साझेदारी पार्टी नाराज नहीं
करना चाहती रेणु लिखते हैं कि उर्दू को
बिहार की दूसरी भाषा बनाने की बात पर
नागार्जुन अंत तक विरोध करते रहेंगे ऐसा
उन्होंने जोर देकर कहा है लेकिन कोई जोर

देकर यह नहीं कहता कि अब ऐसा रक्तपात भाषा
के नाम पर कभी नहीं होगा क्योंकि हम सभी
सब कुछ जानकर भी अनजान बने रहने का बहाना
करते हैं अथवा कुछ नहीं जानते हुए भी सब

कुछ जानने का दम भरते हैं रेणु ही इस तरह
से लिख सकते थे उनकी इस रिपोर्ट में सब
कुछ साफ-साफ दिख जाता है और दिख जाते हैं
नागार्जुन मुझे नहीं पता हिंदी साहित्य की
प्रगतिशील धारा में नागार्जुन के इस जनसंघ

प्रेम को किस तरह से देखा गया है एक महान
साहित्यकार ने अपने समय के एक बेजोड़ कवि
को किस तरह पकड़ा है उसकी करुणा और
मार्मिकता से भरी कविताओं के पीछे खड़े
नागार्जुन को कितना साफ-साफ देख लिया है

यह रेणु का कमाल है रांची हटिया के दंगे
को लेकर रेणु ने लिखा है कि उस समय वहां
एक पर्चा वितरित हुआ जिस पर लिखा था उर्दू
लेकर रहेंगे मांओं को सलाम रेणु आगे लिखते
हैं कि 22 अगस्त को ही रांची में उत्पाद
शुरू हुआ उर्दू विरोधियों और उर्दू

समर्थकों में पहले मुठभेड़ रोड़े बाजी फिर
छुड़ बाजी और आग जनी लूट दंगा दंगा 23
अगस्त सूरज की रोशनी के साथ बात फैल रही
है दिनमान का विशेष प्रतिनिधि पटना के

मुस्लिम मोहल्लों सब्जीबाग से लेकर
बाकरगंज की गली में अहले सुबह घूम घूम कर
देख रहा है हर चेहरे पर आतंक हर कूचे में
सन्नाटे का आलम दुकाने खुली हैं अद खुली

हैं मगर खाली हैं नान बाई कसाई अत्तार और
चाय की दुकानों पर लोग उर्दू नहीं हिंदी
पत्र आर्यावर्त अथवा प्रदीप पढ़ रहे हैं
चुपचाप कोई राय जनी नहीं करता है कोई

बातें नहीं करता है तो क्या रांची की याग
की लपट यहां तक उर्दू विधेयक वापस लो
पाकिस्तान के दलाल लो होशियार खुदा खैर
करे यहां भी शुरू हुआ आधा दर्जन नौजवान
नारे लगा रहे हैं और प्रचार कर रहे हैं

भाइयों आज शाम को रांची हत्याकांड पर रोश
प्रकट करने के लिए खून का बदला खून खैर
हुआ कि नारे लगाने वाले गिरफ्तार कर लिए
गए दफा 144 लागू कर दी गई रांची दंगे में
कई लोग मारे गए रेणु की एक पंक्ति पर नजर

गई उन्होंने लिखा है 24 अगस्त रांची में
15 मरे हर अखबार पढ़ने वाला इस संख्या को
पांच या 10 से गुना कर लेता है
सांप्रदायिकता यही तो करती है सब कुछ बढ़ा

चढ़ा कर पेश करती है दंगों के वक्त एक
दूसरे को लेकर जो बयानबाजी होती है उसके
बारे में रेणु ने जिक्र किया है और मैं
शब्द शब् पढ़ना चाहता हूं उधर दंगे की आग
घुघुआ रही है और राजनीतिक पार्टियों के

नेताओं के वक्तव्य बाजी जारी है जनसंघ के
नेता ठाकुर प्रसाद की राय में इस दंगे के
पीछे पाकिस्तान स्थानी एजेंटों और पीकिंग
पंथिया के हाथ हैं कम्युनिस्ट पार्टी
दक्षिण के जगन्नाथ सरकार ने जनसंघ को
सरासर दोषी ठहराया है दिल्ली में

उपमुख्यमंत्री ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस
में बार-बार बिहार हिंदी साहित्य संमेलन
के अधिकारियों और बिहार कांग्रेस के
प्रचार मंत्रियों की चर्चा की है बिहार
कांग्रेस के नेताओं ने एक स्वर से इस दंगे
के लिए सरकार को दोषी ठहराया है मगर पुलिस

मंत्री रामानंद तिवारी एकदम मौन है वह
रांची में शमशान साधना कर रहा है भूतों
प्रेतों और पिशाच से लड़ रहा है रेणु इस
रिपोर्ट में किसी को नहीं छोड़ते लोहिया
को भी नहीं वे लिखते हैं कि डॉक्टर लोहिया

और राजनारायण रांची से पहले पटना आते हैं
144 लगी है फिर भी गांधी मैदान में सभा
करने की अनुमति दी जाती है ऐसा लगता है कि
डॉक्टर साहब शुरू से अंत तक सांप्रदायिकता
की आग बुझाने वाली बात कहेंगे मगर वे ऐसा
नहीं करते हैं डॉक्टर साहब ने मंडल से

शुरू करके मंडल पर ही अपना भाषण समाप्त कर
दिया मंडल यानी बीपी मंडल की बात हो रही
है जो मंडल आयोग के अध्यक्ष थे मगर तब
बीपी मंडल बिहार की कुर्सी पर नजर गड़ाए
बैठे थे नीतीश कुमार के मित्र उदयकांत की
किताब है नीतीश कुमार पर राजकमल से छपी है

₹ 700 की है इसमें उदयकांत लिखते हैं कि
बीपी मंडल कांग्रेस में थे वहां से निकलकर
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में आए
मुख्यमंत्री बनना चाहते थे मगर नहीं बन
सके तो उन्होंने शोषित दल बनाकर कांग्रेस

के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल
कर ली राम मनोहर लोहिया की खूब आलोचना की
इस किताब के पेज नंबर 128 पर उदयकांत
लिखते हैं कि ताज्जुब की बात है कि मंडल
जी के कार्यकाल में विपक्ष द्वारा सारी
अर्हता एं पूरी करने के बाद भी कोई भी

व्यक्ति नेता प्रतिपक्ष के रूप में नामजद
नहीं था यद्यपि कपूरी जी नेता प्रतिपक्ष
बनाए जा सकते थे मंडल जी नए राजा तो बन गए
लेकिन यह राज सुख उनके हिस्से में रहा
मात्र 21 दिनों के लिए कई जगहों पर पढ़ने
को मिला है कि बीपी मंडल ने कपूरी ठाकुर

को रोकने की भरपूर कोशिश की वीडियो के
जरिए इस तरह के राजनीतिक प्रसंगों को
बताना कभी भी पूरा संतोष नहीं देता कई बार
जरूरी चीजें छूट जाती हैं और कई बार
छोड़नी पड़ जाती हैं हम यह भी नहीं जानते
कि आप दर्शकों को यह वीडियो कितना रोचक

लगेगा लेकिन पढ़ते हुए लगा कि उस समय की
बात आपको बतानी चाहिए रांची दंगों को काबू
करने में पुलिस मंत्री रामानंद तिवारी की
बहुत तारीफ होती है उनके ही बेटे हैं
शिवानंद तिवारी जो इस वक्त आरजेडी में

नेता हैं सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड
जस्टिस रघुवर दयाल की अध्यक्षता में एक
जांच कमेटी बनती है रांची हटिया दंगों पर
इस कमेटी की रिपोर्ट फिर से पढ़ी जाए
इसमें लिखा है कि जब उर्दू को दूसरी भाषा
का दर्जा देने का गैर आधिकारिक विधेयक पेश

हुआ तब जनसंघ हिंदी साहित्य सम्मेलन और
कांग्रेस के कुछ सदस्य से विधानसभा तक
मार्च करते हैं सेशन चल रहा होता है उस
दौरान वे भीतर जाते हैं और उर्दू विरोधी
नारों के साथ कपूरी ठाकुर के खिलाफ अभद्र
नारे लगाते हैं 12 से 26 अगस्त 1967 के

बीच उर्दू के खिलाफ मीटिंग करने का फैसला
होता है जनसंघ रांची में मीटिंग करती है
पर्चे बांटती है कि उर्दू को यह दर्जा
नहीं मिलना चाहिए इन सभाओं में कहा जाता
है कि उर्दू विरोधी जुलूस में भाग लेने से

देश को दूसरे विभाजन से रोका जा सकेगा और
पाकिस्तान के चंगुल में जाने से बचाया जा
सकेगा तो पाकिस्तान का भूत तब से खड़ा
किया जाता रहा है ऐसे पर्चे भी बांटे जाते
हैं रघुवर कमेटी लिखती है कि जिनमें उर्दू
के समर्थकों के खिलाफ गलत भाषा का प्रयोग

होता
है यह वीडियो आज का है और रांची का है देश
का कोना-कोना टकराव की खबरों और आशंकाओं
से धड़क रहा है जस्टिस रघुवर दयाल कमेटी
की रिपोर्ट में शामिल एक गुमनाम मंत्री का
बयान याद रखा जाना चाहिए जो कहते हैं कि

ऐसे माहौल को पनपने से रोकने का काम सिर्फ
सरकार का नहीं है सभी राजनीतिक दलों का है
सभी समुदायों के लोगों को महसूस कराया
जाना चाहिए कि वह एक देश के हैं और उन्हें
साथ रहना है सरकार के यह गुमनाम मंत्री

कहते हैं कि किसी समुदाय के बारे में उसके
विदेशी या बाहरी होने की अवधारणा को जाना
होगा सरकार के एक दूसरे मंत्री समिति के
सामने बयान देते हैं कि दोनों समुदाय के
बीच गहरा अविश्वास इन घटनाओं के पीछे का

असल कारण है दंगा हुआ था दंगा सुनियोजित
भले ना हो मगर दंगे के पीछे की मानसिकता
आज भी सुनियोजित तरीके से फैलाई जा रही है
अब तो
संग का नाम नहीं लेते हैं किसी पक्ष का
नाम नहीं लेते बल्कि सरल शब्दों में

समझाने लग जाते हैं लोहिया कहते हैं
दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं है यह अद्भुत
देश है कई बातों में क्या गीता क्या और
कोई किताब कोई भी श्लोक उसमें अहिंसा को
और अभय को बहुत जगत दी जाती है जैसे गीता

में बड़े गुण गिनाए जाते हैं तो एक दफे तो
अभय को सबसे ऊंचा रखा गया है मेरी भी यही
राय है मनुष्य के लिए सबसे बड़ा गुण है
अभय निर्भय होना किसी से डरो मत जब डराओ ग
नहीं डरो ग नहीं तभी तो निर्भय हो सकोगे

हिंसा मत करो लेकिन किसी की पीठ में छुरा
घूप देना 10050 की टोली बनाकर एक दो चार
आदमियों के ऊपर चढ़ बैठना नन्हे नन्हे
बच्चों को खत्म कर देना यह तो हिंसा भी
नहीं है मैं नहीं जानता कि इसको क्या कहूं

यह तो विक्षुब्ध क्रूरता है जानवर भी ऐसा
नहीं करता जो कौम क्रूर हिंसा सीख जाती है
10050 का झुंड बना कर के एक दो चार के ऊपर
टूटना सीख जाती है वह कौम फिर परदेसी
हमलावर के सामने बहादुरी नहीं दिखा सकती

वह कमजोर हो जाती है वह अपनी रक्षा नहीं
कर सकती उसका देश गुलाम बन जाता है इसलिए
इस बात पर आप सब लोगों को बहुत ताकत और
धीरज के साथ सोच विचार करना है इस भाषण के
कुछ महीनों के बाद लोहिया इस दुनिया को
विदा कह जाते हैं नहीं डरने की बात आज

राहुल गांधी कर रहे हैं और नीतीश कुमार
बीजेपी से लड़ने निकले थे विपक्ष को एकजुट
करने निकले थे मगर बीजेपी के साथ जा रहे
हैं कपूरी ठाकुर के समय का दौर याद किया
जाना चाहिए तभी भारत रत्न दिए जाने का

मतलब पूरा होगा सांप्रदायिकता से लड़ते
हुए भी कपूरी ठाकुर बेझिझक सही फैसले लेते
रहे जिन ताकतों के कारण वे सत्ता में लंबे
समय तक नहीं रह सके उन्हीं ताकतों की नई
पीढ़ी उन्हें सम्मानित कर कर रही है और
बिहार में फिर से सत्ता हासिल कर सकती है

नीतीश बीजेपी के साथ पहले भी गए हैं आगे
भी जा सकते हैं कपूरी ठाकुर की विरासत
इतनी हल्की नहीं कि भारत रत्न का मुकुट
पहनाकर बीजेपी हासिल कर ले या हो सकता है
कि पिछड़ी जातियों ने ही कपूरी ठाकुर को
भुला दिया हो कपूरी उनके लिए केवल मूर्ति

और पोस्टर रह गए हो विचारों में कपूरी की
जगह जय श्री राम ने जगह ले ली हो बिर की
राजनीति में वैचारिक भूख मर चुकी है एक ही
भूख है और आप उस भूख के बारे में जानते
हैं नमस्कार

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