क़र्ज़े में डूबेंगे, जाएंगे विदेश, पंजाब गुजरात में यह कैसी होड़ - instathreads

क़र्ज़े में डूबेंगे, जाएंगे विदेश, पंजाब गुजरात में यह कैसी होड़

नमस्कार  भारत में एजुकेशन
लोन 00 करोड़ रुपए का हो गया है यह भी
पूरे साल का आंकड़ा नहीं इस साल जनवरी से
लेकर अक्टूबर के बीच भारतीय छात्रों ने

00 करोड़ रुपए के लोन लिए हैं भारतीय
रिजर्व बैंक का यह आंकड़ा है जिसमें कहा
गया है कि एजुकेशन लोन में 20 प्र से अधिक
की वृद्धि हुई है इसमें से 65 प्र लोन

विदेशों में पढ़ाई के लिए लिए गए मा औसतन
40 से 60 लाख के लोन ले रहे हैं सबसे
ज्यादा लोन अमेरिका जाने के लिए लिया जा
रहा है भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया है कि

पिछले 5 साल में 2023 24 के बीच एजुकेशन
लोन में सबसे अधिक उछाल देखा गया है हिंदू
बिजनेस लाइन की इसी साल जून के महीने की
एक रिपोर्ट है कि एजुकेशन लोन के लिए
छात्र 10 से 15 फीसद ब्याज चुका रहे हैं

कई बार बैंक इसलिए भी लोन नहीं देते
क्योंकि उन्हें पता होता है कि कम सैलरी
की नौकरी मिलेगी और ब्याज चुकाना मुश्किल
हो जाएगा लोन भी नहीं चुके आज हम इसी पर
बात करेंगे कि गुजरात और पंजाब में छात्र

विदेश जाने के लिए क्यों होड़ कर रहे हैं
और क्यों दूसरे प्रदेश के बच्चे पिछड़ गए
हैं विदेश मंत्रालय का कहना है कि जनवरी
2023 तक उनके पास जो सूचनाएं हैं उसके
हिसाब से 15 लाख छात्र विदेशों में पढ़

रहे हैं 2022 2 2 में 2122 की तुलना में
एजुकेशन लोन में 17 प्र का उछाल आया है
कोविड के बाद अमेरिका जाने वाले छात्रों
की संख्या में 35 प्र की वृद्धि हुई है
अक्टूबर 22 से सितंबर 23 के बीच अमेरिकी

दूतावास और काउंसलेट ने
140000 छात्रों को वीजा जारी किया भारतीय
छात्रों की वजह से दुनिया की कितनी ही
यूनिवर्सिटियोफकालीकट पहली सीढ़ी है जिस
किसी के पास पैसा है लोन ले सकता है

छात्रवृत्ति हासिल कर सकता है वह पढ़ने के
लिए विदेश जा रहा है उनके हिसाब से वे
बिल्कुल ठीक कर रहे हैं क्योंकि भारत में
पढ़ाई का स्तर गिर गया है उनके मां-बाप

भले ही सोशल मीडिया पर भारत को विश्व गुरु
बताते रहे मगर भीतर भीतर बच्चों को बाहर
भेजने की तैयारी में लगे हुए
हैं अमृतसर एयरपोर्ट पर बुजुर्ग मां-बाप

अपने बच्चों को छोड़ने पहुंचते रहते हैं
इनकी आंखों में उदासी साफ देखी जा सकती है
पंजाब का कोई ना कोई कोना हर दिन अपनों से
जुदा होता रहता है कई मां-बाप जानते हुए

भी कि उनका जीवन अब अकेले का होने वाला है
किसी तरह बच्चों को भारत से बाहर भेज रहे
हैं पंजाब और बेंगलुरु से ऐसे मां-बाप का
एक संगठन भी चलता है जिसका नाम है रीपा

नॉन रेजिडेंट इंडियन पेरेंट्स एसोसिएशन
1998 में बनाई यह संगठन मां-बाप को
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहारा देता है
इसकी अपनी वेबसाइट भी है यह वह मां-बाप है

जिनके बच्चे बाहर चले गए और जिनके लौट कर
आने की उम्मीदें कमजोर पड़ती चली
गई 2011 से 2018 के साल का आंकड़ा आप
देखेंगे तब भी लाख सवा लाख भारतीय भारत की

नागरिकता छोड़ते रहे हैं 2018 के बाद से
इसमें काफी तेजी आती है वैध तरीके से जाने
वाले भारतीयों की संख्या भी बढ़ती है
साथ-साथ अवैध तरीके से जाने वालों की जो

हमने 26 दिसंबर के वीडियो में आपको बताया
सबकी आंखों में एक ही सपना है कमाना है
अच्छा जीवन जीना है और विदेश में बस जाना
है हालांकि भारत की छह ऋतुओं का अपना ही

आकर्षण है और कश्मीर में ही चिनार के
पत्ते जब रंग बदलते हैं तो अमेरिका और
कनाडा की पतझड़ से पहले की रंगीन को मात
देते

इसके बाद भी कनाडा और अमेरिका में जब फॉल
आता है पत्तों के रंग लाल और पीले होने
लगते हैं मुंह से वाव निकलता है वाव
अंग्रेजी का शब्द है जैसे हिंदी में हम
कहते हैं मुंह बा देना वाव के समय वही

होता है देखने वाला चकित रह जाता है जनवरी
2023 में इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट
में बताया गया है कि संयुक्त राष्ट्र की
एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में दुनिया में

अपनी मातृभूमि से बाहर रहने वाली सबसे
बड़ी प्रवा आबादी भारतीयों की थी लगभग 2
करोड़ सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2011 से
16 लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नागरिकता
छोड़ दी जिसमें 2022 में

183 741 लोग शामिल हैं जिन्होंने भारत की
नागरिकता छोड़ दी अमेरिका कनाडा के मकान
मोहल्ले दुकानें अस्पताल सब कुछ इस वीडियो
में भी आपको व्यवस्थित नजर आएंगे गरीबी

इधर भी है लेकिन अवसर और अवसरों की
गुणवत्ता भी इधर ही है जैसा कि इन देशों
में जाकर बस चुके और बसने का जुगाड़ लगाने
वाले भारतीय ही बताते हैं कुछ तो हुआ है

कि भारत की नागरिकता छोड़ने वालों की
संख्या बढ़ी है 2020 में 85000 256
भारतीयों ने नागरिकता छोड़ दी उसके अगले
साल यह संख्या यानी 2021 में
13370 हो गई 2022 में तो पूछिए मत लगता है
उस साल नागरिकता छोड़ने की भग मच गई 2022
में

22620 लोगों ने भारत की नागरिकता को टाटा
बाय बाय कर दिया अमेरिका कनाडा
ऑस्ट्रेलिया को गले लगा लिया यह सारा
आंकड़ा विदेश मंत्रालय का है इसी साल
अगस्त में संसद में रखा गया

है इस वीडियो का मकसद यह बताना नहीं कि
अमेरिका और कनाडा में जो भी है वह अच्छा
ही है कम से कम मैं तो नहीं मानता लेकिन
हम उनकी बात कर रहे हैं जिन्हें लगा कि

अमेरिका और कनाडा में भारत से तो बहुत
अच्छा है और वे झट से भारत छोड़ गए कुछ
अच्छे और प्रतिबद्ध शिक्षकों को छोड़
दीजिए जिनकी संख्या भारत के कॉलेजों में

कुछ में होती है भारत के ज्यादातर कॉलेज
की पढ़ाई घटिया है कहीं क्लास में टीचर
नहीं है टीचर है तो पढ़ाने नहीं आता कहीं
परीक्षा नहीं और कहीं समय पर डिग्री नहीं

जब तक हिंदी प्रदेश का बच्चा पढ़कर निकलता
है वह किसी लायक नहीं रहता यह सवाल उनका
भी होना चाहिए कि क्यों वे विदेशों में
पढ़ाई और नौकरी के अवसरों का पीछा नहीं

करते हैं लेकिन पहला सवाल यह होना चाहिए
कि इस पलायन के पीछे जो कारण है उस पर बात
कौन करेगा और बात कब होगी खराब कॉलेज खराब
नौकरी यही हिंदी प्रदेश की नियति है क्या

युवाओं ने सपने देखने भी बंद कर दिए कब तक
वे अच्छी यूनिवर्सिटी की तलाश में अमेरिका
या कनाडा भागते रहेंगे या पटना के गंगा
घाट पर अरुण कुमार की क्लास है यहां बैठे

छात्रों को देखकर उनका कायल हो जाता हूं
एक अदद सरकारी नौकरी के लिए अपना कितना
कुछ झोक देते हैं इनके इसी जुनून को देखकर
लगता है कि अगर इनके स्कूल और कॉलेज में

मिले होते तो यही छात्र दुनिया भर में छा
गए होते इन छात्रों में प्रतिभा और लगन की
कोई कमी नहीं मगर इनके जीवन में 15 साल तक
खराब स्कूल और घटिया कॉलेजों का लंबा

सिलसिला चलता है जिससे इनकी प्रतिभा और
सपनों को बहुत नुकसान पहुंचता है सभी के
बारे में तो नहीं कह सकता लेकिन मेरा
मानना है कि अगर राजनीति में धर्म को लेकर

सनक पैदा ना की गई होती तो हिंदी प्रदेशों
के लाखों युवाओं का टाइम ही नहीं कटता
इसलिए अभी और दो बड़े मुद्दे आ रहे हैं

मंदिरों के जिसके फेर में भारत की दो
पीढ़ी का पूरा जीवन निकलने वाला है हिंदी
प्रदेश के युवाओं को आप किसी जगह पर मंदिर
का सपना दे दीजिए और किसी जगह पर फैक्ट का
मुझे यकीन है यह मंदिर का सपना चुन लेंगे

मुझे हिंदी प्रदेश के युवा कभी गलत साबित
नहीं करते इसलिए मुझे उन पर गर्व होता है
मेरी बात इस वीडियो में दिख रहे छात्रों
के संदर्भ में नहीं है और हो सकता है यह

छात्र मेरी बात से सहमत भी ना हो लेकिन
मेरा यही मानना है कि इनके जैसे युवाओं को
नौकरी नहीं मिलती है अच्छी सैलरी की नौकरी
नहीं मिलती है लेकिन धर्म की राजनीति ने

हिंदी प्रदेश के युवाओं को जो हिंदू सुख
दिया है उसका हिसाब लगाना किसी
अर्थशास्त्री के बस की बात नहीं इन
छात्रों को अपने इस खराब कॉलेजों का
शुक्रिया अदा करना चाहिए जिनकी वजह से वे

हिंदू सुख महसूस करने लायक हो पाए इसके
बाद भी इन्हें बताया तो जा ही सकता है कि
इन्हीं के पीढ़ी के युवा कनाडा अमेरिका और
ऑस्ट्रेलिया के लिए चुपचाप निकल लिए हम

भूल जाते हैं किसी देश में गोदी मीडिया ने
जेएनयू पर किस तरह हमला किया पीएचडी का
मजाक उड़ाया कहा टैक्स पेयर के पैसे की
बर्बादी है जबकि उसी पीएचडी के लिए लोग

लाखों का लोन ले रहे हैं घर छोड़कर कनाडा
अमेरिका जा रहे हैं क्योंकि उन देशों में
अभी भी रिसर्च की मान्यता है और अच्छी
रिसर्च होती है आपकी नजरों में जेएनयू को

देशद्रोह का अड्डा बताकर इन्हीं गोदी
मीडिया के परिवार के लोग और नेताओं के लोग
अमेरिका कनाडा निकल लिए आखिर क्यों भारतीय
छात्र विदेशी यूनिवर्सिटी की तरफ पलायन कर
रहे हैं ऐसा तो हो नहीं सकता कि करोड़ों

रुपए खर्च करने के बाद करोड़ों रुपए की
सैलरी वाली नौकरी मिल जाती हो वहां गए
छात्रों का भी कहना है कि पढ़ाई अच्छी
होती है सुविधाएं अच्छी हैं काफी कुछ

सीखने को मिलता है अपने प्रोफेसर से कुछ
भी बोल सकते हैं भारतीय छात्र कहां-कहां
नहीं जा रहे हैं अमेरिका कनाडा इंग्लैंड
के अलावा आयरलैंड किर्गिस्तान
उज्बेकिस्तान

फिलिपींस सिंगापुर रूस न्यूजीलैंड फ्रांस
जर्मनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र
पहुंच रहे हैं सबसे अधिक छात्र महाराष्ट्र
तेलंगाना आंध्र प्रदेश और पंजाब से जा रहे
हैं इसके बाद गुजरात दिल्ली और तमिलनाडु

का नंबर आता है हिंदी प्रदेशों के नाम
सूची में नीचे विदेश जाना आसान नहीं
अंग्रेजी जानने की परीक्षा पास करनी होती
है इसके लिए छात्र पीटीई जी आरई आईईएलटीएस
और टॉफल की परीक्षाएं देते हैं कोचिंग पर

4 से 0000 खर्च करते हैं पंजाब से लेकर
गुजरात में इनकी भरमार हो गई है कोचिंग
सेंटर की कनाडा इन दो राज्यों पर काफी
ध्यान दे रहा है क्योंकि यहां के छात्रों

से ही कनाडा की यूनिवर्सिटी भर रही है
2018 में नारायण मूर्ति ने कहा था 70 घंटे
काम करने का लेक्चर देने वाले नारायण
मूर्ति कि 80 फीसद भारतीय युवा किसी नौकरी
के लायक नहीं है क्या आप मानेंगे यह बात

तब उन्होंने कहा कि यहां की शिक्षा
व्यवस्था इसके लिए
जिम्मेदार पंजाब के दक्षिण मालवा का एक
शहर बठिंडा पिछले कुछ सालों में यह शहर एक
आई एलटीएस हब की तरह जाना जाने लगा यह

बठिंडा शहर का अजीत रोड है वहीं का वीडियो
है भले ही शहर की यह सड़क दो इलाकों को
जोड़ती हो पर विदेश जाने की चाहत रखने

वाले हजारों छात्रों के लिए यह सड़क
बठिंडा से सीधे अमेरिका कनाडा ऑस्ट्रेलिया
इंग्लैंड मिडिल ईस्ट और साइप्रस जाती है
बठिंडा की 100 फीट रोड पावर हाउस रोड और
अजीत रोड मिलकर एक ऐसा त्रिकोण बनाते हैं

जिसमें हजारों की संख्या में आईईएलटीएस
कोचिंग सेंटर चलते हैं लाखों की संख्या
में इनमें पंजाब ही नहीं पूरे देश से युवा
छात्र कोचिंग लेने के लिए आते हैं तीन
महीने की कोचिंग की फीस 10000 से 80000 तक

हो सकती है बल्कि इससे ज्यादा भी यह
सड़कें अगर कोचिंग सेंटर और छोटे ढाबों और
दुकानों से भरी हैं तो इनसे सटे रिहायशी
इलाकों में पेइंग गेस्ट और हॉस्टल की

भरमार है विदेश जाने की कोचिंग का खर्च
सिर्फ सेंटर की फीस भरकर पूरा नहीं हो
जाता पीजी या हॉस्टल का किराया मिलाकर
विदेश जाने की लंबी प्रक्रिया में केवल

कोचिंग का कुल मासिक खर्च एक आम किसान
परिवार की औसत मासिक आय से भी बहुत ज्यादा
हो जाता
है सो कॉस्टिंग दीज आप गल करिए स्टार्टिंग

फ्रॉम द बेसिक जिदा बच्चा जद भी किसे भी
कोचिंग लेता है किसे भी ज अपने टेस्ट द
कोचिंग ले सो एवरेज अगर व टेस्ट द फीस
प्लस थ्री मंथ द असी कोचिंग द गल करिए तो

जड़ कॉस्टिंग अराउंड अबाउट 40 टू 0000 दो
चीज द कॉस्टिंग आ जा है उस तो बाद जो
प्रोसेस स्टार्ट हो है जिस विच बच्चे द एक

साल द फीस दे नाल लिविंग एक्सपेंसेस असी
गल करंगे पहला कैनेडा द कैनेडा दे विच एक
साल द जड़ी फीस है एवरेज फीस है ज वो

तकरीबन तकरीबन 9 तो शुरू होके 9 लख 9 लख
इन इंडियन रुपी तो शुरू होके तकरीबन 12
लाख तक जड़ चली जा एंड उस नाल ही ज लिविंग
एक्सपेंसेस जिन कैनेडा दे विच असी कहने

जिस दे विच स्टूडेंट दे अकाउंट दे विच
10200 ज डिपॉजिट होंदे सी जो 31 दिसंबर तक
सी लेकिन कैनेडियन गवर्नमेंट ने उ चेंज
करके आफ्टर फस्ट जनवरी

2635 कैनेडियन डॉलर निकाल सो उस तो अलावा
एक मेडिकल ा स्टूडेंट प्लस एंबेसी फी ज
तुसी न 31 दिसंबर तो पहला कंपेयर करोगे व
जड़ एक कॉस्टिंग सी टिकट तक स्टूडेंट द उस
वीजा कॉस्ट व्ट एवर जिया भी कॉ उ कॉस्टिंग

18 तो 20 लाख कॉस्टिंग लेकिन वही स्टूडेंट
सेम अगर कैनेडा दे विच अप्लाई करेगा एक
जनवरी तो बा ओ द कॉस्टिंग राउंड अबाउट एक
साल द फीस जीआईसी एंड अदर चार्जेस नाल 25
तो 30 लाख ज उ बजट ब कनाडा को पता है कि

भारत से यहां आने की होड़ मच गई है इसलिए
वहां जाने वाले छात्रों के रहने सहने का
खर्चा भी अगले साल यानी 1 जनवरी से डबल कर
दिया गया है कनाडा भेजने के लिए मां-बाप
पहले से ज्यादा खर्चा करेंगे इस होड़ का

किसानों पर बुरा असर पड़ेगा जमीन बेचकर और
कर्ज उठाकर कनाडा भेजना पड़ेगा कई बार
छात्रों को कोर्स के बारे में सही जानकारी
नहीं होती यूनिवर्सिटी और वहां पढ़ाए जाने

वाले विषय और उससे जुड़े रोजगार के बारे
में पता नहीं होता जो डिग्री किसी काम की
नहीं होती उसके लिए भी लाखों फूंक देते
हैं क्योंकि डिग्री बस बहाना है या जरिया

है वहां बस जाने का 19 जुलाई 2023 के द
ट्रिब्यून अखबार में आप सुखम भसीन की
रिपोर्ट पढ़िए सुखमीत लिखते हैं कि बठिंडा
के गांव मेहमा सरकारी की आबादी 1200 है

में जाकर बस चुके हैं गांव में कई बुजुर्ग
मां-बाप अकेले रह गए हैं यहां के हर तीसरे
घर से एक बच्चा उच्च शिक्षा के लिए विदेश
गया है भसीन लिखते हैं कि यहां के किसान
मवेशी सोना बेचकर खेत जमीन बैंकों में

गिरवी रखकर विदेशी संस्थानों में अपने
बच्चों के लिए सीट सुरक्षित करवाना चाहते
हैं यहां पर आभूषणों के बदले ऋण देने वाले
निजी फाइनेंशियर्स की तादाद भी बढ़ने लगी
है मेहमा सरकारी गांव के निवासी मनोज

शर्मा ने कहा है जो ट्रिब्यून में छपा है
कि एक समय हमारा गांव बड़ी संख्या में
सरकारी नौकरियों वाले लोगों के लिए जाना
जाता था लेकिन अब लगभग 100 युवा अध्ययन
वीजा पर कनाडा ऑस्ट्रेलिया यूके और

साइप्रस चले
गए यह कनाडा के मटियाल का वीडियो है लेकिन
कहानी मैं उत्तरी कनाडा की बता रहा हूं
जिस वक्त मटियाल में यह वीडियो लिया गया
उस वक्त वहां का तापमान 4 डिग्री सेल्सियस
कनाडा सरकार इस साल 9 लाख छात्र विदेशों

से लाना चाहती है 40 फीसद छात्र भारत के
होंगे और इनकी फीस कनाडा के छात्र जितनी
फीस देते हैं उससे साढ़े गुनी अधिक फीस
होगी भारतीय साढ़े गुनी अधिक फीस देते हैं
कनाडा ने जब से यूनिवर्सिटी का बजट कम
किया यूनिवर्सिटी ने अपना खर्चा पूरा करने

के लिए गुजरात और पंजाब में अपना बाजार
खोज लिया है यहां से छात्र इसलिए आते हैं
क्योंकि पढ़ाई के बाद कनाडा में बसने का
रास्ता खुल जाता है यहां के कॉलेज नहीं
चाहते कि अकेले भारत पर निर्भर रहे इसलिए
दक्षिण अफ्रीका में भी अभियान चलाया जा

रहा
है यह
ओंटेरिगा ने रिपोर्ट छपी है नरी मित्सु और
निशी की रिपोर्ट में बताया गया है कि
टोरंटो से कार से ठ घंटे लगते हैं यहां
पहुंचने में नटरियम

भारतीय छात्रों की भरमार है नॉर्दर्न
कॉलेज में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में
भारतीय छात्रों की संख्या 96 फीसद से अधिक
हो गई है इस कॉलेज में ग्रामीण ऑंट से
कहीं ज्यादा छात्र गुजरात और पंजाब के हैं

2014 में यहां मात्र 40 अंतरराष्ट्रीय
छात्र थे इस साल 6000 से अधिक हो गए
न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि एकदम से दूर
दराज के इस कॉलेज में भारत के छात्र

पहुंचे हैं जहां कनाडा के ही ज्यादातर लोग
नहीं जाते यहां इतनी ठंड पड़ती है कि
कुल्फी जम जाए फिर भी भारत के छात्र यहां
भीड़ लगाकर पहुंच रहे हैं कनाडा में बसने

के अलावा एक कारण यह भी है कि इन छात्रों
का इनके माता-पिता का भारत की यूनिवर्सिटी
में भरोसा नहीं रहा मिडिल क्लास
whatsapp2 माहौल बनाता है कि भारत सुपर
पावर हो गया और चुपके से अपने बच्चों को

कनाडा फॉरवर्ड कर देता है हिंदी प्रदेश के
युवाओं को यही खेल समझ जाना है और खुद
इससे निकलने की तैयारी करनी क्योंकि विदेश
जाना वहां पढ़ना और वहां बस जाना अब इसे
कोई भी गलत नहीं कहता बस सावधान रहना है
कि कोई एजेंट आपको ठग ना ले फर्जी

सर्टिफिकेट लेकर भेजेगा तो फिर वहां से
वापस आना पड़े
पंजाब और गुजरात के युवा लगे हुए हैं
अंग्रेजी की परीक्षा निकालने में इन्हें
पता है कि कनाडा में वीजा की वेटिंग लंबी

है तो चलो इंग्लैंड की तरफ ब्रिटिश उच्चा
आयोग के अनुसार जून 2022 तक यूके द्वारा
एक वर्ष में लगभग 1 हज प्रायोजित अध्ययन
वीजा भारतीय छात्रों को जारी किया गया और

इनमें से 40 प्र पंजाबी छात्र हैं इससे
पहले कनाडा पढ़ाई के लिए सबसे बड़ा ठिकाना
था 18 नवंबर 2022 के ट्रिब्यून में सुकमित
भसीन ने लिखा है कि एक वीजा सलाहकार ने
उनसे कहा कि कनाडा के लिए देरी और बढ़ती
अस्वीकृति दर ने छात्रों को निराश किया है

जो आजकल इंग्लैंड का विकल्प चुन रहे हैं
क्योंकि इसकी सफलता दर 100% है और छात्रों
को आईईएलटीएस परीक्षा के प्रत्येक घटक में
केवल छह बैंड स्कोर की आवश्यकता होती है

वीजा रिजेक्ट होने पर फीस भी जब्त हो जाती
है इसलिए छात्र चाहते हैं कि वहां ट्राई
मारा जाए जहां जजा का मिलना पक्का हो यूके
में विश्वविद्यालय छात्रों को तरह-तरह की

छात्र वृत्तियां भी प्रदान कर रहे हैं
भारत से आ रही इस भीड़ को देखते हुए
इंग्लैंड ने वीजा मानकों में कुछ बदलाव
किए हैं वहां पर पढ़ाई के बाद 2 साल तक

काम करने की अनुमति दी जा रही है ताकि काम
कर लोन का खर्चा निकल आए और ज्यादा संख्या
में भारतीय छात्र वहां पहुंचे वो कौन-कौन
अफोर्ड कर सकते हैं मैं दसना चाहना कि जो
स्टूडेंट्स बाहर जाे ने उन्ना दे विच

ज्यादा वो स्टूडेंट्स ज मिडल क्लास तो
बिलंग करने या पुअर फैमिली तो बिलंग कर सो
उन्ना ली एक बहुत वडा सेट बैक है रिच जड़
हैगे ने व अफोर्ड कर सकद ने स्टडीज उली आज
भी स्टडी जया ने बाहर इंटरनेशनल कोई इया

कॉस्ट नहीं कर दिया लेकिन जो एक एवरेज
पुअर स्टूडेंट है जो जिन आप कह सा इथे दो
तरह रूलर एंड अर्बन सो रूलर दे विच ज आ जा
छोटी किसानी आ जांदी है जिन्ना को जमीना

घटने जो मेजर बाहर जाे सो उन्ना दे ल एक
बहुत वडा सेट बैक है क्यों उ एक बजट डबल
हो गया जि आप अर्बन गल कर र अर्बन ना बहुत
ज्यादा फेक्ट होए ने एंड उ द रेशो भी बहुत
कट गई रेशो कट की जो अर्बन स्टूडेंट जा

ज्यादातर लोन लेके जा सो ज लोन तकरीबन 15
तो 20 लाख चाहिदा सी व 25 तो 30 लाख हो
गया सो इंटरनेशनल एजुकेशन इनी कॉस्टिंग
नाल जो पुर स्टूडेंट्स ने उ अफोर्डेबल ज
नहीं उ बहुत सेट बैक है गुजरात से लेकर

पंजाब में पुलिस का प्रशासन का एक काम
बोगस आईईएलटीएस सेंटरों पर छापे मारना और
उन पर नजर रखना भी है इनके लाइसेंस रद्द
होते हैं और नए सेंटर खुलते हैं आखिर

हमारी शिक्षा इतनी रद्दी कैसे हो गई कि
अंग्रेजी सीखने के लिए भारतीय लाखों रुपए
खर्च कर रहे हैं आई एलटीएस कोचिंग सेंटर
भारत के शहरी स्कूलों में भाषा की पढ़ाई
के स्तर पर एक बहुत बड़ा सवाल है एलकेजी
से 12वीं कक्षा तक अंग्रेजी पढ़ाने वाले

हमारे स्कूल छात्रों को अंग्रेजी के एक
सर्टिफिकेट टेस्ट के लिए भी तैयार नहीं कर
पाते विदेश जाने की होड़ में उन्हें होश
नहीं रहता छात्रों को कि सर्टिफिकेट असली

है या फर्जी हाल के दिनों में कई छात्रों
को लौटाया गया जब सांसद जयदेव गल्ला ने
सरकार से पूछा कि पिछले तीन वर्षों में
कितने भारतीय लोग विदेशों से डिपोर्ट किए
गए उस मंत्री ने कहा आंकड़े नहीं हैं मगर

इसके आंकड़े कि डेढ़ करोड़ भारतीय कुशल
अकुशल मजदूर और पेशेवर के रूप में विदेशों
में काम कर रहे हैं यह वह लोग हैं जो अपने
स्तर पर विदेश गए काम की तलाश में अब भारत

सरकार अलग-अलग कौशल के मजदूरों को विदेशों
में काम दिलाने के लिए करार कर रही है
यानी सरकार भी एक तरह से एजेंट बनने जा
रही है आपको याद नहीं होगा मोदी सरकार ने

बहुत पहले ही ब्रेन ड्रेन के आईडिया को
पुरातन करार दे दिया ब्रेन ड क्रेन और
पलायन का आईडिया भी बीजेपी और संघ की तरफ
से खूब चलाया गया 2015 में इंडियन

एक्सप्रेस में यह खबर छपी है प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि अब ब्रेन
ड्रेन अब ब्रेन गेन बन गया है भारत को
सर्विस हब बनाना है और दूसरे देशों की
जरूरत के हिसाब से सप्लाई करनी है 2015

में प्रधानमंत्री ने ग्लोबल सर्विसेस
एग्जिबिशन का उद्घाटन किया था आप ही बताइए
उत्तराखंड बिहार में बीजेपी पलायन को
मुद्दा बना देती है जब बिहार के लोग दूसरे
राज्यों में काम करते हैं तो वह ब्रेन गेन

नहीं है विदेश में काम करने के लिए पलायन
भी स्टैंडर्ड का आइटम हो जाता है कई दशक
से भारत के अलग-अलग हिस्सों से लोग दुनिया
के अलग-अलग देशों में काम की तलाश में
जाते रहे हैं शायद यह पहली बार होगा कि

भारत सरकार भी आधिकारिक तौर पर पलायन
करवाएगी नरसिंग से लेकर तमाम काम के लिए
भारतीय खुद से जा तो रहे थे अब सरकार
भेजेगी राज्यों में पलायन रोकने का वादा
करने वाली बीजेपी भी अपने स्तर पर पलायन

करवाएगी यह भी अजीब मोड़ है 27 दिसंबर के
बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने संपादकीय में
इसका स्वागत किया है कि भारत सरकार दूसरे
देशों में कुशल कारीगर सप्लाई करने का
करार कर रही है लेकिन यह भी चेतावनी दी है

कि नीतिगत हिसाब से देखिए तो इससे
बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होगा
इसे इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए कि
भारत की अर्थव्यवस्था अच्छी सैलरी का
रोजगार पैदा नहीं कर पा रही है तो इसका
समाधान कुछ मजदूरों को विदेश भेजकर निकाला
जाए बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि ग्रीस

ने भारत से खेती के लिए 10000 मजदूर मांगे
हैं इटली ने अपनी नगरपालिका
औरंध ने 40000 मजदूरों को इजराइल भेजने का
करार कर दिया क्योंकि वहां चल रहे युद्ध

के कारण 90 हज फलस्तीनी अपने देश लौट गए
हाल ही में आपने खबर देखी होगी कि हरियाणा
सरकार भी 10000 कंस्ट्रक्शन मजदूरों को
इसराइल भेजना चाहती है कांग्रेस नेता

देशों ने अपने लोग निकाल लिए भारत वहां
भेज रहा है जहां युद्ध चल रहा है राज्य
सरकार ने कहा कि वह युवाओं को घर में और
विदेश में नौकरी दिलाने में मदद कर रही है
सेंट्रल ट्रेड यूनियन ने 1 लाख मजदूरों को

इसराइल भेजने की डील का विरोध किया है
हरियाणा में बेरोजगारी की दर 9 प्र से
अधिक है बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने
संपादकीय में लिखा है कि पीरियोडिक लेबर
फोर्स सर्वे पीएलएफएस के ताजा आंकड़ों के
हिसाब से 57 लोग स्वरोजगार में लगे हैं
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे कारोबारी

हो गए इनमें से 18 प्र से अधिक लोग घरेलू
उद्यम में लगे हैं 21 प्र दिहाड़ी मजदूर
हैं यह सच्चाई है भारत में नौकरी और पढ़ाई
की यहां जब तक किसी का सपना सकरी गली से
बाहर निकलता है चौराहे पर भयंकर जाम और

हॉर्न की आवाज में युवाओं का सपना अटक
जाता है आज की ही रिपोर्ट है ईपीएफओ के
आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले साल की तुलना
नाम में इस साल संगठित क्षेत्र में नए काम
का सृजन 10 प्र घटा है बिजनेस स्टैंडर्ड

ने लिखा है कि जनवरी से अक्टूबर 2023 के
बीच 90 लाख कर्मचारी ईपीएफओ से जुड़े हैं
उसके पहले के साल में 1 करोड़ कर्मचारी

जुड़े थे संगठित क्षेत्र में काम नहीं
मिलने का एक मतलब यह भी है कि काम करने
वालों को किसी भी प्रकार की सामाजिक
सुरक्षा नहीं मिलेगी यही नहीं ईपीएफओ से

जुड़ने वाले 18 से 28 साल के युवाओं की
संख्या भी घटी है इसका मतलब हुआ युवाओं को
अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है पहली बार काम
पाने वालों को काम नहीं मिल रहा भारत में
नौकरी की हालत खराब है कम सैलरी की नौकरी
में ही संतोष करना होगा और शहरी जीवन की

अपनी मुश्किलें भी हैं दिहाड़ी काम का ही
चलन बढ़ रहा है 26 दिसंबर के हिंदू अखबार
में एक विश्लेषण छपा है जिंदल ग्लोबल
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राहुल मेनन ने
लिखा है कि आंकड़ों के हिसाब से भले ही

बेरोजगारी कम बताई जाती है लेकिन असली
पहलू यह है कि जिनके पास अच्छी डिग्री है
जिन्होंने अच्छी पढ़ाई की है उनके बीच
बेरोजगारी की दर बहुत ज्यादा है इससे
संकेत मिलता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में

अभी भी अकुशल मजदूरों और असंगठित सेक्टर
का बोलबाला है यही नहीं पढ़े लिखे लोगों
को रोजगार मिलने का इंतजार भी लंबे समय तक
करना पड़ता है भारत की शिक्षा अगर बची है
तो कोचिंग के चलते बची है हर परिवार

बच्चों का एडमिशन दो जगह करा रहा है स्कूल
में और उसके बाद कोचिंग में हर विषय की
कोचिंग होने लगी इसका मूल्यांकन होना
चाहिए कि यूनिवर्सिटी और स्कूलों का स्तर
कितना गिरा है कि बिना कोचिंग के किसी का

काम नहीं चलता इस बीच युवाओं को निराश
होने की बिल्कुल जरूरत नहीं स्कूल से लेकर
कॉलेज और अन्य जगहों पर प्रधानमंत्री के
कटआउट लगा दिए गए हैं आप चाहे तो

प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ले सकते हैं
भले आपकी डिग्री किसी काम की नहीं मगर
क्या पता यह सेल्फी काम आ जाए तभी भारत
सरकार जगह-जगह सेल्फी कटआउट लगा रही है
आखिर मोदी जी ने किया है कुछ सोच कर ही

किया होगा यही नहीं अब सफल होने का मतलब
यह नहीं कि आप युवा कितने सफल हैं एक तरफ
मना रही है पंजाब और गुजरात के छात्रों को
शायद पता चल गया है कि यह अब कभी ठीक नहीं
होगा तो निकलो यहां से हिंदी प्रदेश के
युवाओं को तय करना है कि गुजरात और पंजाब

के युवाओं की तरह अमेरिका और कनाडा के लिए
निकलना है या यहीं पड़े पड़े हिंदू सुख
में डूबे रहना है तया आप कर लीजिए    नमस्कार

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