कांग्रेस के खाते हुए बंद; कौन है असंवैधानिक कानून के पीछे? | - instathreads

कांग्रेस के खाते हुए बंद; कौन है असंवैधानिक कानून के पीछे? |

नमस्कार

सुप्रीम कोर्ट के
फैसले के बाद सरकार का बयान क्यों नहीं
आया सरकार सन्नाटे में है इलेक्टोरल बंड
को रद्द करने के बाद उसका अगला कदम क्या
होगा किसी को पता नहीं आज इसी से जुड़े
सवालों पर बात करने का दिन है और हम

करेंगे भी क्योंकि अभी भी काफी कुछ इसके
बारे में बात करने के लिए बचा है लेकिन
इसी बीच कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन
प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी देते हैं कि
कांग्रेस पार्टी के सारे बैंक खाते कर दिए

गए हैं कांग्रेस जो चेक जारी कर रही थी
बैंक उसे कैश नहीं कर रहे थे फिर पता चला
कि उसके खाते फ्रीज हो गए हैं कांग्रेस
पार्टी किसी को पैसा नहीं दे पा रही
कांग्रेस का दावा है कि

201819 के मामले में आयकर विभाग ने यह कदम
उठाया हम खर्च कर ही नहीं स कांग्रेस
पार्टी एक भी पैसा हम लोग हमारा इलेक्शन
कैंपेन हमारी बिजली के बिल हमारी तनखा एं

कुछ भी हम लोग नहीं खर्च कर पाएंगे अब हम
लोगों ने आज गुहार लगाई है एले ट्रिबल में
हम और ऊपर भी जाएंगे और हम अब जुडिशरी के
ऊपर हम जैसे मैंने कहा भरोसा हमारा
जुडिशरी के ऊपर ही है कि वो इसके ऊपर देख

कर के एक्शन ले नो वी कांट मतलब अब अब जो
है हम लोग बैंक में पैसा जमा नहीं करा
सकते बैंक से हम पैसा ले नहीं सकते हम कैश
रख नहीं सकते हम लोगों को
परसों यह जानकारी मिली कि जो चेक हम लोग

इशू कर रहे हैं
वह बैंक्स उस चेक को ऑनर नहीं कर
रहे उसके ऊपर जब हम लोगों ने आगे छानबीन
करी तो हमें बताया
गया कि देश
की मुख्य अपोजिशन पार्टी के सारे अकाउंट

फ्रीज कर दिए गए
हैं कांग्रेस पार्टी के अकाउंट्स
पर ताला बंद बंदी हो गई
है कांग्रेस पार्टी के अकाउंट फ्रीज कर
दिए गए हैं हमारे देश में लोकतंत्र पर

तालाबंदी हो गई
है और यह कांग्रेस पार्टी के अकाउंट फ्रीज
नहीं हुए हैं हमारे देश में डेमोक्रेसी
फ्रीज हुई है जिस समय कांग्रेस पार्टी
प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही थी उसी समय
कांग्रेस के वकील और राज्यसभा सांसद विवेक

तनखा आयकर विभाग ट्रिब्यूनल में इसके
खिलाफ अपनी दलील पेश कर रहे थे विवेक तनखा
ने बताया कि बु वार को अब अगली सुनवाई
होगी फिलहाल खातों से रोक हटा दी गई है
मार्च 2023 तक कांग्रेस के खाते में 122

5425 करोड़ कोई मुकाबला नहीं दोनों में
कांग्रेस आर्थिक रूप से बीजेपी के सामने
कुछ भी नहीं कमजोर हो चुकी है इस पैसे से
वह चुनाव में बीजेपी का मुकाबला नहीं कर
सकती इसके बाद भी विपक्ष पर हमला जारी है

चुनाव की घोषणा में ज्यादा समय नहीं ऐसे
में मुख्य विपक्षी दल का खाता फ्रीज कर
दिया जाता है कांग्रेस सांसद राहुल गांधी
ने ट्वीट किया कि डरो मत मोदी जी कांग्रेस
धन की ताकत का नहीं जन की ताकत का नाम है
हम तानाशाही के सामने ना कभी झुके हैं ना

झुकेंगे भारत के लोकतंत्र की रक्षा के लिए
हर कांग्रेस कार्यकर्ता जी जान से लड़ेगा
क्या यह सब संकेत है कि विपक्ष को इसी तरह
उलझा कर रखा जाए उसे चुनावी मैदान में
पहुंचने ही ना दिया जाए खाली मैदान में

अपनी जीत का ऐलान आप ही कर दिया जाए कभी
ईडी तो कभी आयकर के छापे तीन महीने से
दावा किया जा रहा है कि बीजेपी को लोकसभा
चुनाव में 400 सीटें पक्की आ रही हैं फिर
भी यह सब किया जा रहा है 2024 का चुनाव

इन्हीं सब उतार चढ़ाव से गुजरता रहेगा
विपक्ष का नेता कब कौन जेल में डाल दिया
जाएगा पता नहीं इलेक्टोरल बंड पर अभी जनता
के बीच ठीक से बहस भी पूरी नहीं हुई और ना
हो पाएगी लेकिन नई-नई हेडलाइन इन छापों के

जरिए पैदा कर दी जा रही है कहां तो मनी
लॉन्ड्रिंग के मामले में बीजेपी के खातों
की जांच होनी चाहिए जिसके खातों में 6000
करोड़ रुपए से अधिक के इलेक्टोरल बंड जमा
हुए हैं और यह आंकड़ा एडीआर का है सुप्रीम

कोर्ट के फैसले के पेज नंबर 37 पर साफ-साफ
लिखा है कि कंपनियों का नाम गुप्त रखकर यह
पॉलिसी सुनिश्चित करती है कि मदद के बदले
मनी लरिंग की जा सके कोर्ट ने लिखा है कि
कई तरीके से मनी लरिंग की जाती है किसी

काम के बदले राजनीतिक चंदा भी मनी लरिंग
हो सकता है बल्कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लरिंग
एक्ट 2002 में साफ-साफ लिखा भी है
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने लिखा है
कि दस्तखत करने वाले देशों को मनी लरिंग

पकड़ने के लिए राजनीतिक दलों के खातों की
जांच करनी चाहिए भारत ने भी संयुक्त
राष्ट्र के इस प्रस्ताव पर दस् किया है कि
राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता
लाई जाएगी लाई गई गोपनीयता कही जा रही है

पारदर्शिता इलेक्टोरल बंड के जरिए मनी
लरिंग हो सकती है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है
इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए सबसे अधिक धन
बीजेपी को ही मिला है तो मनी लरिंग के शक
में सबसे पहले किसका खाता जब्त होना चाहिए

इस खाते की जांच कौन करेगा कौन नैतिक
जिम्मेदारी लेगा असंवैधानिक कानून बनाने
की अभी तक कोई सामने नहीं आया हम लोग यह
मांग करते हैं कि अगर अकाउंट फ्रीज होने
चाहिए तो जो अनकंस्टीट्यूशनल कॉर्पोरेट
बंड्स जो बीजेपी

ने अपने खाते में डाले हुए हैं वह बीजेपी
के अकाउंट सील होने चाहिए वह फ्रीज होने
चाहिए जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने
कहा है कि अनकंस्टीट्यूशनल है सोचिए जब

इलेक्टोरल बंड को चुनौती देने वाली याचिका
सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई तब से लेकर
फैसला आने के बीच चार-चार चीफ जस्टिस बदल
गए कितने चुनाव हो गए लोकसभा चुनाव और कई
विधानसभा चुनाव असंवैधानिक तरीके से पैसे

जुटाकर इस देश में चुनाव हुए हैं मोदी
सरकार ने एक कानून बनाया यह काम किया जो
असंवैधानिक निकला इस पर कोई बात नहीं हो
रही आपको कैसे पता चलेगा कि किस कंपनी ने
किस उद्योगपति ने बीजेपी को कितना चंदा

दिया उसे बीजेपी की सरकारों में केंद्र से
लेकर राज्यों में क्या-क्या मिला है क्या
आपको पता है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च
अदालत के सामने क्या दलील दी है यह कहा है
कि जनता के पास आप जनता के पास जानने का
आम अधिकार ही नहीं है कि वह राजनीतिक दलों

की फंडिंग के बारे में जाने वह सरकार
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्यों बोलेगी
वह केवल अपनी जीत पर बोलती है जब उसकी हार
होती है यह घपले पकड़े जाते हैं सन्नाटे
में चली जाती है हेडलाइन बदलने के इंतजाम

नज नजर आने लगते हैं इलेक्टोरल बंड का
मामला वित्त मंत्रालय से भी जुड़ा है क्या
वित्त मंत्री का बयान आया कानून मंत्रालय
से भी जुड़ा है कानून मंत्रालय का बयान

आया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा
है क्या मोदी जी का बयान आया पूरी की पूरी
मोदी सरकार चुप नजर आती है आधिकारिक बयान
नजर नहीं आ रहे कोर्ट में सरकार का यह
कहना कि जनता को राजनीतिक दलों की फंडिंग

के बारे में जानने का आम अधिकार नहीं है
सूचना का अधिकार जनता का आम अधिकार नहीं
है सरकार कह रही है कि जनता को जानने का
अधिकार नहीं पता चलता है कि सरकार की नजर
में जनता की क्या हैसियत रह गई है गनीमत

है कि अदालत में केंद्र सरकार की यह दलील
नहीं टिकी और जनता को क्यों नहीं जानना
चाहिए कि बीजेपी को कौन सी कंपनी चंदा दे
रही है उसका मालिक किसका दोष कहा जाता है
उस कंपनी को मोदी सरकार ने अपनी नीतियों
से क्या-क्या दिया अगर जनता को यही नहीं

मालूम है तब फिर उसे क्या मालूम है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किस उद्योगपति
के हवाई जहाज में बैठकर चुनावी रैलियां
करते रहे राहुल गांधी ने जब वह तस्वीर
दिखा दी अदानी के साथ वाली तस्वीर तो

लोकसभा की कार्रवाई से उसे निकाल दिया गया
पता चलता है कि सरकार सूचना को जनता तक
नहीं पहुंचने देने के लिए कितनी मेहनत
करती है आपने ऐसी तस्वीर रें पिछले 10 साल
में कितनी देखी होंगी प्रधानमंत्री पर

कितने आरोप लगे कि उद्योगपतियों के साथ
गहरे रिश्ते रहे हैं कुछ के साथ और भी
गहरे रहे हैं क्या इन उद्योगपतियों ने कभी
इसकी परवाह की इससे इनका क्या बिगड़ गया
क्या इन्होंने तब अपनी निजता की चिंता की

तो अगर जनता को यह पता चल जाए कि जो
उद्योगपति प्रधानमंत्री के साथ फोटो
खींचातानी के साथ फोटो खींचा आता है वह
उनकी पार्टी को कितना चंदा देता है है तो
क्या हो जाएगा और यह क्यों नहीं पता चलना

चाहिए जब फोटो नजर आता है तो फोटो के पीछे
का लेनदेन क्यों नहीं नजर आना चाहिए 2014
के पहले उद्योगपति सरकार की नीतियों को
लेकर बोला करते थे बजट के पहले अपनी
जरूरतों को लेकर चिल्लाया करते थे बजट के

बाद 10 में से आठ सात नौ नंबर दिया करते
थे लेकिन अब तो चुप हो गए हैं उनकी आवाज
सुनाई नहीं देती तभी सुनाई देती है जब
उन्हें सरकार का समर्थन करना होता है कई
उद्योगपति तो दिन भर सरकार के पक्ष में
ट्वीट करते रहते हैं उससे उन्हें दिक्कत

नहीं है लेकिन चंदा कितना दे रहे हैं यह
किसी को पता ना चले इससे दिक्कत है जनता
को तो नहीं ही पता चल रहा था कंपनी के
शेयर धारकों को भी पता नहीं चल रहा था
क्योंकि पहले का कानून था कि कंपनी किसे

चंदा दे रही है उसका हिसाब बताती थी
इलेक्टोरल बंड ने कंपनियों के लिए चंदा
देना आसान किया या सरकार के लिए कंपनियों
की गर्दन दबाना आसान हो गया सवाल यही है
2017 के फाइनेंस एक्ट में कितना कुछ बदल
दिया गया पहले नियम था कि 3 साल तक कंपनी

 

मुनाफा करेगी तभी उस मुनाफे का 75 प्र तक
चंदा दे सकती है अब यह सीमा हटा दी गई
कंपनियां अब कितना भी चंदा दे सकती हैं यह
तो भयानक है कर्मचारी को वेतन मत दो जान
ले लेकर खटाते रहो और नेताजी को खुश करने

के लिए रा मुनाफा चंदे के नाम पर दे आओ
क्या यह किसी भी कंपनी के लिए बेहतर है
यही नहीं जो कंपनी घाटे में है वो क्यों
चंदा देगी उसे क्यों छूट दी गई उसके पास

पैसा कहां से आ रहा है बैंक का लोन नहीं
चुकाए गी दिवालिया हो जाएगी कि घाटे में
है मगर राजनीतिक दल को चंदा देगी यह दलील
थी सरकार की यह पारदर्शिता है क्या हमें
पता चलेगा कि घाटे की किस कंपनी ने

इलेक्टोरल बॉन्ड बीजेपी के लिए खरीदा और
बदले में सरकार ने बैंक का कर्जा उसका माफ
किया या नहीं हर स्तर पर पारदर्शिता खत्म
कर दी गई फिर भी तर्क दिया जा रहा है कि

यह कानून पारदर्शी है आपको दिखाई नहीं
देता गजब है सामने से आप सभी की आंखें
निकाल ली जा रही हैं पहले सिस्टम था कि जो
भी चंदा देगा कंपनी के बही खाते में
बताएगा कि किस पार्टी को कितना दिया 2017
में इस सिस्टम को हटा दिया गया अब केवल

बताना रह गया कि कुल कितना पैसा चंदा दिया
गया
किस पार्टी को कितना दिया गया यह बताने की
जरूरत नहीं रही क्या यह पारदर्शिता है
जनता को भी अंधेरे में रखो शेयर होल्डर को

भी अंधेरे में रखो और फिर अपने नेता को
प्रेस कॉन्फ्रेंस में भेज दीजिए कि
इलेक्टोरल बंड बहुत पारदर्शी था वह भी उस
दिन जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि य
कहीं से पारदर्शी नहीं है पारदर्शी भी

नहीं है और यह संवैधानिक भी नहीं है
असंवैधानिक है आज जब मैं पार्टी के
राष्ट्रीय मंच पर बैठा हूं तो कुछ बातें
हम कहना चाहते
हैं यह निर्णय एक बहुत ही प्रामाणिक

उद्देश्य के लिए लाया गया था दिस डिसीजन
वास अंडरटेकन फॉर वेरी लबल ऑब्जेक्टिव टू
ब्रिंग इन ट्रांसपेरेंसी इन इलेक्टोरल
फंडिंग चुनाव में पारदर्शिता हो फंडिंग
में इसके लिए लाया गया
था चुनाव में कैश का प्रभाव कम हो उसके

लिए भी लाया गया
था इस बात को समझना बहुत जरूरी
है
और हमारे
जितने चंदा देने वाले लोग
हैं उनकी अपेक्षा
थी कि अगर उचित होगा कि हमारे हमारे लिए

भी गोपनीयता रखी
जाए और यह बहुत अस्वाभाविक नहीं
है मैं आपको एक अपने राजनीतिक अनुभव से
बात कहना चाहता हूं कहीं
पर कोई सरकार है तो उनको सहयोग करते हैं
अब मान लीजिए वो सरकार हार गई और उनके
विरोधी दूसरी जगह आए तो वो उनके खिलाफ हो

जाते हैं
इसलिए कोई ईमानदारी से बिजनेस कर रहे हैं
तो उनको अपना काम करें ऐसा विचार था बताइए
तो इलेक्टोरल बंड किसके लिए पारदर्शी था
यह कैसे पारदर्शी था चुनाव आयोग ने आपत्ति
दर्ज कराई रिजर्व बैंक ने दर्ज आई मनी
लरिंग की आशंका जताई गई फिर भी रविशंकर

प्रसाद कह रहे हैं पारदर्शिता के उद्देश्य
से इलेक्टोरल बंड लाया गया सुप्रीम कोर्ट
का फैसला आए कितने घंटे हो गए वित्त
मंत्री कानून मंत्री का कोई बयान नहीं आया
कैसे पारदर्शी है यह कोई नहीं बताता जनता

को पता नहीं शेयर धारक को पता नहीं केवल
मोदी सरकार को पता है तो इससे यह पारदर्शी
हो गया हम नहीं जानते कि जो कंपनी विपक्ष
के दलों को चंदा दे रही है उस उसके साथ
क्या होता है चंदे के जरिए आजाद भारत का

यह बड़ा या छोटा घोटाला नहीं है बल्कि
खतरनाक घोटाला है इसके जरिए लोकतंत्र को
जनमत को मतदाता को अंधेरे में रखने की
कोशिश की गई है जनता को पता ही नहीं चला
कि वह किसे वोट दे रही है राजनीतिक दल को

वोट दे रही है या राजनीतिक दल को इफरात
पैसा देने वाली कंपनी को प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी को अब चुप्पी तोड़नी चाहिए
कबूल करना चाहिए कि इस खेल के पीछे का
मकसद क्या था और खेल सामने आ गया है

उन्हें बताना चाहिए कि कोर्ट के आदेश का
पालन होगा और ठीक चार हफ्ते के बाद सारी
जानकारियां सार्वजनिक कर दी जाएंगी
राजनीतिक दल भी सहयोग करें और बैंक भी तीन
हफ्ते के भीतर ही जानकारी दें
प्रधानमंत्री को यह आश्वासन देना चाहिए

बैंक बहाना ना बनाएं कि तीन हफ्ते में यह
काम नहीं हो सकता तभी तो जनता चुनाव से
पहले देख पाएगी कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने
वाली कंपनियां कौन सी थी शेल कंपनियां थी
या घाटे में चलने वाली कंपनियां थी किस
कंपनी ने अपने मुनाफे से भी ज्यादा का

इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदा क्या इनमें वे लोग
भी हैं जिसे विपक्ष प्रधानमंत्री का मित्र
बताता है क्या इन कंपनियों में वे भी हैं
जिनके यहां ईडी के छापे पड़ते हैं और वे

बाद में डर के मारे इलेक्टोरल बंड खरीद
लेती हैं कितना कुछ है जानने के लिए इसकी
सच्चाई सामने लाने के लिए प्रधानमंत्री को
उसी तरह सुप्रीम कोर्ट के आ देश का पालन
करना चाहिए अपना ध्यान तोड़ना चाहिए जिस
तरह से राम मंदिर के मामले में उन्होंने

पालन किया और कोर्ट का मंदिर के उद्घाटन
के समय धन्यवाद किया मैं आभार व्यक्त
करूंगा भारत की न्यायपालिका
का
जिसने न्याय की लाज रख
ली न्याय के
पर्याय प्रभु राम का मंदिर

भी न्याय बद्ध तरीके से ही बना और
लोकतंत्र के मंदिर में इलेक्टोरल बंड के
जरिए जो धांधली चल रही थी जिसे सुप्रीम
कोर्ट ने असंवैधानिक बता दिया है क्या
प्रधानमंत्री उसके लिए न्यायपालिका का

आभार व्यक्त करना चाहेंगे पारदर्शिता नहीं
आई इलेक्टोरल बॉन्ड के बाद भी नगद चंदे की
राशि में गिरावट नहीं आई है बल्कि कैश
डोनेशन बढ़ा है चुनाव आयोग ने कानून
मंत्रालय को लिखा भी है कि कैश डोनेशन पर

रोक लगनी चाहिए सितंबर 2022 में मुख्य
चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने तत्कालीन
कानून मंत्री किरण रिजीजू को पत्र लिखा
नियम के मुताबिक ₹2000000 से ऊपर जो भी
चंदा होगा राजनीतिक दलों को सारा ब्यौरा

देना होगा चुनाव आयोग का सुझाव है कि 2000
से ऊपर के सभी चंदों का सारा डिटेल दिया
जाए तभी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी इसका
मतलब इलेक्टोरल बंड के बाद भी पारदर्शिता
आई नहीं अभी आ रही है आयोग ने यह भी कह

दिया कि कैश डोनेशन कुल चंदे का 20 प्र ही
हो और अधिकतम 20 करोड़ हो उससे ज्यादा
नहीं जस्टिस संजीव खन्ना ने भी लिखा है कि
इलेक्टोरल बंड के आने के बाद भी कैश
डोनेशन और अज्ञात गुमनाम डोनेशन में कोई
कमी नहीं आई है बल्कि बढ़ गया है यह

डोनेशन जस्टिस खन्ना ने अपने फैसले में
लिखा है कि 2019 से 2022 के बीच राष्ट्रीय
दलों के कुल अज्ञात आय में बंड से मिल ने
वाली आय 81 प्र थी 20000 से कम के रूप में

आने वाली राशि कम नहीं हुई 201415 से
20161 के बीच
2250 करोड़ रुपए का चंदा कैश डोनेशन से
आया राष्ट्रीय दलों को 201819 से 202122
के बीच यह राशि
8489 करोड़ हो गई इन वर्षों में अज्ञात

सूत्रों से आने वाली आय का प्रतिशत 66 प्र
से बढ़कर 72 प्र हो गया सभी पार्टियों की
कुला आय में इलेक्टोरल बंड की हिस्सेदारी
58 प्र ही बढ़ती है यानी अन्य स्त्रोतों
का 42 प्र का हिस्सा रह जाता है जाहिर है
पारदर्शिता की दलील खोखली नजर आती है यही

नहीं एडीआर और कोर्ट में दाखिल आंकड़ों से
पता चलता है कि इलेक्टोरल बंड से बीजेपी
को सबसे अधिक चंदा मिला है 55 फी चंदा उसे
ही मिला है कांग्रेस को 9 फीदी तो इतना
अंतर है दो राष्ट्रीय दलों में कहीं से इस

बॉन्ड के जरिए बराबरी का मैदान नहीं बनता
है इससे जुड़ा हर डाटा बता रहा है कि
एकमात्र बीजेपी को फायदा हुआ है गोदी
मीडिया से विपक्ष की खबरों को रोककर

विपक्ष चुनाव ना लड़ सके उसकी आर्थिक
क्षमता को कमजोर कर बराबरी का मैदान तैयार
नहीं किया जाता है लेकिन जो लेवल प्लेइंग
फील्ड की बात करते हैं उसके बारे में मुझे
एक ही बात कहनी
है फील्ड लेवल का है

या लेवल का नहीं है यह तो उन्हीं के बारे
में तय होगा जो फील्ड के अंदर है जो फील्ड
के बाहर है वह लेवल में है या नहीं है
कैसे तय होगा आप फील्ड में है या नहीं कौन
तय करता है जनता तय करती है तो देश की

जनता ने बहुतों को फील्ड से बाहर कर दिया
है वह लेवल प्लेंग फील्ड की बात करते हैं
और हम क्या बताए आप समझते हैं मेरा इशारा
किसकी ओर है बहुत से लोग को चुनाव में एक
सीट भी नहीं मिलती है आप अपने पुराने
बड़े-बड़े

प्रभाव के क्षेत्रों में इसलिए वो बात अलग
है छोड़ दीजिए रविशंकर प्रसाद बात को कहीं
और ले गए उनकी इस बात का जवाब सुप्रीम
कोर्ट ने अपने फैसले में दे दिया है कोर्ट

ने कहा है कि लोकतंत्र की शुरुआत और उसका
अंत चुनाव से नहीं होता है चुनाव की
प्रक्रिया की अखंडता महत्त्वपूर्ण है यानी
प्रक्रिया में बराबरी नहीं है उसमें दोष
है उसमें भेदभाव है रविशंकर प्रसाद एक और

तथ्य भूल गए
चुनावी फंड जरूरी है लेकिन इसी दौर में
सीपीएम अकेली पार्टी रही जिसने ना सिर्फ
इसे असंवैधानिक अवैध और अनैतिक माना बल्कि
इलेक्टोरल बंड से कोई चंदा नहीं लिया क्या

यह बड़ी बात नहीं है नैतिकता यह होती है
सीपीएम ने सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर
याचिका दायर की थी उसकी याचिका की जीत हुई
है यह अकेली पार्टी है जिसने इलेक्टोरल
बंड से चंदा नहीं लिया बीजेपी राष्ट्रवाद

की बात करती
कम से कम उसे ऐसा साहस दिखाना चाहिए था द
सुप्रीम कोर्ट वर्डिक्ट ऑन द इलेक्टरल बन
इज वेलकम एंड इट इ इन सेंस आल्सो
हिस्टोरिक वर्डिक्ट द सीपी वन ऑ पेटीशन च

आ फॉर द स्कैपिंग ऑफ द इलेक्टरल बनस बिकॉज
दिस स्कीम इज द लीगलाइजेशन ऑफ पॉलिटिकल
करप्शन द सुप्रीम कोर्ट बेंच यूम टर्म दिस
स्कीम ए बीइंग अनकट शल एंड वायलेट ऑफ द
वेरियस कॉन्स्टिट्यूशन प्रोविजन एंड आल्सो
स्ट्रक डाउन द अमेंडमेंट टू द कंपनी एक्ट

दैट परमिटेड दिस लीगलाइजेशन ऑफ पॉलिटिकल
करप्शन एंड नाउ दिस लिस्ट विल आल्सो बी
मेड पब्लिक ट इज गुड फॉर डेमोक्रेसी हर
सवाल को वोट से सही गलत आप साबित नहीं कर
सकते सुप्रीम कोर्ट ने यही कहा है जनता ने

इलेक्टोरल बंड पर वोट नहीं दिया है उसे तो
कुछ पता नहीं कि कौन कितना चंदा दे रहा है
यही सवाल तो इलेक्टोरल बंड के समय उठा कि
चुनावी मैदान में बराबरी इससे नहीं बनती
है जनता को सूचना ही नहीं है कि बीजेपी के

लिए इलेक्टोरल बॉन्ड कौन खरीद रहा है कौन
है जो बीजेपी को ज्यादा चंदा दे रहा है
दूसरे दलों को चंदा देने वाली कौन सी
कंपनियां हैं क्या पता कई सारे न्यूज़
चैनल निकल आए कपिल सिब्बल ने सुप्रीम

कोर्ट में यही तो कहा कि अगर सूचना सही
नहीं है मुक्त नहीं है तो वोट दे ने की
स्वतंत्रता प्रभावित होती है इस सूचना में
यह भी शामिल है कि राजनीतिक दलों को पैसा
कौन-कौन दे रहा है जनता को पता नहीं कि

कौन चंदा दे रहा है मगर सरकार को पता है
कि कौन चंदा दे रहा है इससे तो चंदे का
झुकाव सरकार की तरफ ही रहेगा और आंकड़े भी
यही बताते हैं तो चुनाव में मतदाताओं से
ज्यादा कंपनियों का प्रभाव हो जाएगा सिबल

ने कहा भापा सरकार भाजपा की सरकार
राष्ट्रीय पार्टी को बड़ी कंपनियां चंदा
दें लेटरल बंड खरीदें और उनकी पहचान गुप्त
रखी जाएगी उसमें मनी लरिंग नहीं है लेकिन
जब गैर मान्यता प्राप्त दलों को कोई कंपनी

चंदा दे दे तो उसे आयकर विभाग का नोटिस जा
रहा है मनी लरिंग की जांच हो रही है इससे
पता चलता है कि सरकार की दलीलों में कितना
अंतर विरोध है इकोनॉमिक टाइम्स की अनुराधा
शुक्ला की यह रिपोर्ट 5 फरवरी की है आयकर

विभाग ने गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक
पार्टी को चंदा देने वाली कंपनियों और
करदाताओं को नोटिस भेजा है इन्होंने उन
दलों को चंदा दिया है जो चुनाव आयोग में
रजिस्टर्ड हैं लेकिन मान्यता प्राप्त नहीं

है आयकर विभाग ने बताया है इस खबर में कि
ऐसे 5000 नोटिस भेजे गए हैं सूत्रों के
हवाले से रिपोर्ट हुआ है कि यह जानने के
लिए नोटिस भेजे गए हैं कि क्या छोटी
पार्टियों को चंदा देकर टैक्स से बचने और

मनी लरिंग की कोशिश की गई थी तो क्या यही
कोशिश बड़ी पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड
देकर नहीं हुई होगी या नहीं हो सकती है
इसकी जांच तो होनी चाहिए मगर कब होगी
जस्टिस खन्ना ने अपने फैसले में लिखा तो

है और जो आंकड़े भी बताते हैं उनका अध्ययन
बताता है कि राजनीतिक दलों को कौन चंदा
देता है इसे गुप्त रखकर मतदाता के अधिकार
का उल्लंघन किया जा रहा है जस्टिस खन्ना
लिखते हैं कि मेरा निष्कर्ष है कि ये

योजना राजनीति में असंतुलन पैदा करती है
चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी कहा है
कि राजनीतिक चंदे में नीतियों के निर्माण
को प्रभावित करने की क्षमता होती है जब
जानकारी होगी तो मतदाता जान जाएगा कि जो

नीति बन रही है उसका चंदा देने वाली कंपनी
से संबंध है या नहीं तो हर बात का जवाब
कोर्ट ने दे दिया है सरकार की हर दलील
ध्वस्त हो गई है इलेक्टोरल बंड के जरिए
किस कंपनी ने बीजेपी को कितना चंदा दिया

इंतजार उस जानकारी का है क्या समय पर
जानकारी आएगी या अदालतों में याचिका डालकर
इसे चुनाव तक तलवा दिया जाएगा बड़ा सवाल
यही है अगर चुनाव से पहले इले रल बॉन्ड की

ये जानकारियां सामने नहीं आती तब इस फैसले
का कोई महत्व नहीं रह जाएगा इस फैसले का
महत्व तभी तक है जब मार्च के महीने में
चार हफ्ते का समय पूरा होते ही चुनाव आयोग
की वेबसाइट पर इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने
वाली एक-एक कंपनियों और व्यक्तियों की

जानकारी प्रकाशित कर दी जाए जनता देखे
पत्रकार देखें और इस पर बहस हो ….

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