किसानों के रास्ते में कीलें, तारें, बैरिकेड की फ़सल | Farmers' protest faces uphill battle - instathreads

किसानों के रास्ते में कीलें, तारें, बैरिकेड की फ़सल | Farmers’ protest faces uphill battle

नमस्कार

दो सवाल किसान
आंदोलन दिल्ली पहुंच सकेगा या नहीं कब तक
सड़कों पर कांटों के तार रहेंगे और कीले
रहेंगी कब तक पुलिस आंसू गैस के गोले

छोड़ेगी आज सारा एक्शन पंजाब हरियाणा के
बीच शंभू बॉर्डर पर रहा किसानों को 13
फरवरी के दिन दिल्ली आना था दिल्ली की
सीमाएं चारों तरफ से ऐसे बंद रही कि
किसानों का पहुंचना संभव नहीं हो

सका एक तरफ किसान हैं उन्हें आगे बढ़ने से
रोकने के लिए सड़कों पर इस तरह की कीले
लगा दी गई हैं अगर कोई इसे पार भी कर ले
तो भी थोड़ी दूरी पर और किले मिल जाएंगे

किसान लॉन्ग जमप तो कर लेंगे मगर इन किलों
के ऊपर से उनके ट्रैक्टर नहीं जा सकते
न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसानों और
सरकार की दूरी में लगता है बहुत सारी

कीलें लग चुकी हैं दोनों इन कीलों के कारण
एक दूसरे से दूर होते जा रहे कांटों कीलों
और आंसू गैस से रोक कर क्या एमएसपी के
सवाल का हल निकल आए

जितनी ऊर्जा किसानों को रोकने में लगाई जा
रही है उतनी ताकत से एमएसपी की गारंटी
देने पर फैसला क्यों नहीं हो पा
रहा पूरा साल आंदोलन चला उसके बाद 2 साल

नहीं चला इस साल फिर यह सवाल सामने है यही
सरकार कितनी बातों में कहती है कि एक देश
एक कानून होना चाहिए तो एक एमएसपी की
गारंटी क्यों नहीं हो सकती क्यों बीजेपी

ने छत्तीसगढ़ के चुनाव में वादे किए कि
धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य
₹1000000 पर खरीदा जाएगा जबकि पूरे देश
में धान के लिए एमएसपी ₹1 183 है 3100 का

रेट बीजेपी सारे देश में क्यों नहीं दे
सकती और इसकी गारंटी क्यों नहीं कर सकती
आज जिस तरह से हरियाणा और पंजाब के शंभू
बॉर्डर पर आंसू गैस के गोले दागे गए हैं

उससे यही लग रहा है कि किसानों के लिए
दिल्ली तक पहुंचना अब मुश्किल हो जाएगा य
यह आंदोलन अगर लंबा खींचेगा तो पंजाब की
जमीन पर ही रह

जाएगा शंभू बॉर्डर पर आंसू गैस के गोले
छोड़ने के बाद कुछ समय के लिए अफरातफरी मच
गई वहां पर हमारी मौजूदगी नहीं है इसलिए
किसकी तरफ से क्या हुआ इसकी सटीक जानकारी

भी नहीं है इसके बाद भी किसान नेता कहते
रहे कि अलग-अलग हिस्सों से सात से 8000
ट्रैक्टर शंभू बॉर्डर पहुंचने वाले हैं
रुक-रुक कर आंसू गैस छोड़ने की खबरें आती

नहीं लेकिन पंजाब भर से शंभू बॉर्डर पर
किसानों का पहुंचना भी जारी
रहा किसान इसी शंभू बॉर्डर को पार कर
हरियाणा में प्रवेश करना चाहते हैं मगर

क्या वे जोखिम लेंगे क्या प्रशासन एक सीमा
के आगे जाकर टकराव मोल लेगा बैरिकेड
तोड़ने की कोशिश हिंसक रूप ले सकती है
किसानों को भी और प्रशासन को भी संयम से

काम लेना चाहिए शंभू बॉर्डर पर आंसू गैस
और लाठी चार्ज की घटना पर एक न्यूज़ चैनल
ने लिखा कि किसानों पर आंसू गैस के गोले
चली लाठी जबरदस्त एक्शन में पुलिस ऐसा लग

रहा है चैनल मारे खुशी के झूम रहा है क्या
इसे पुलिस का जबरदस्त एक्शन कहा जाएगा
आंसू गैस की घटना के बाद किसान नेता रणजीत
सिंह राजू ने कहा है कि हरियाणा के किसान

भी दिल्ली कूछ करेंगे सरकार को लगता था कि
इन सब तैयारियों से किसानों की ताकत कम हो
जाएगी लेकिन यह उसका मुगालता निकला इस बार
किसान के साथ-साथ मजदूर भी हमारे साथ हैं

जो पिछली बार नहीं थे सरकार अपनी तैयारी
कर रही है और हम अपनी तैयारी यह किसान
नेता के बयान आज पंजाब के फतेहगढ़ साहिब
से किसानों का काफिला निकल पड़ा शंभू

बॉर्डर पर आकर रुक गया यहां जिस तरह से
मोर्चे बंदी है इसके आगे जाना संभव नहीं
लगता यहां की हालत बता रही है कि शंभू
बॉर्डर पर लंबे समय तक तनाव की स्थिति बनी

रहेगी शंभू बॉर्डर की यह हालत कह रही है
कि सरकार ने किसानों को उनके हाल पर छोड़
देने का म मन बना लिया है सारी ऊर्जा
किसानों को रोकने में लगी है उनकी मांगों

को पूरी करने में नहीं अगर किसानों ने
यहीं पर डेरा डाल दिया तो इसका असर दिल्ली
पंजाब की आवाजाही पर फिर भी पड़ेगा
किसानों को दिल्ली की सीमा से दूर रोककर

भी कुछ खास हासिल होता नहीं दिखता किसान
मजदूर मोर्चा के संयोजक ने सुबह की प्रेस
कॉन्फ्रेंस में कहा कि वे सरकार से कोई
टकराव मोल नहीं लेंगे सरकार को जो करना है

करें मगर पुलिस हो या फौज हो सभी में
किसान ही हैं हम शांति आंदोलन करेंगे शंभू
बॉर्डर पर बड़ी संख्या में किसान हैं यहां
पर नौजवानों से अपील की जा रही है एक

वीडियो में कि इस आंदोलन को मजबूत करने का
जिम्मा उनके कंधों पर है बुजुर्गों का
टाइम तो कट गया अब आर्थिक लड़ाई नौजवानों
को लड़नी है नौजवानों जो आंदोलन ही आप लोग

बुजुर्गों ने अपनी जिंदगी पास कर ली लेकिन
आने वाले समय के अंदर जो आर्थिक लड़ाई का
आंदोलन अप लड़ रहे हैं जो आप लोग के केपर
मेरी अपील हैर आप ले की लीडरशिप व लीडरशिप
जो कोई बैरिकेड

तोरती जान स जान की बाजी लाने से डरने
वाली लीडरशिप नहीं है आप लोगों ने पिछले
आंदोलन में भी देख आज भी देखने मिलेगा
लेकिन मेरी बेनती है खाम खा के अंदर

एनर्जी 202021 के साल में संयुक्त किसान
मोर्चा का आंदोलन चला था उसमें शामिल कई
प्रमुख संगठन इस बार नहीं आए हैं और कई
प्रमुख नेता और उनके चेहरे दिखाई नहीं दे
रहे वे भी नहीं आए हैं जो चुनाव से दूर

रहे भारतीय किसान यूनियन उग्रह इससे दूर
है इस बार के मोर्चे का नाम संयुक्त किसान
मोर्चा गैर राजनीतिक रखा गया है उनसे अलग
होकर भी किसानों की मौजूदगी में बहुत फर्क

तो नहीं दिखता सरकार शुरू से ही गैर
राजनीतिक संयुक्त किसान मोर्चा से बात कर
रही है तो इसका मतलब यही है कि उसने अपना
होमवर्क ठीक से पूरा किया होगा इस बीच

हरियाणा में प्र प्रवेश करने के रास्ते
करीब-करीब सील कर दिए गए हैं दिल्ली से
लेकर हरियाणा में धारा 144 लागू है
रास्तों पर लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम है

हरियाणा पुलिस ने कहा है कि इस बार पुलिस
बहुत तरीके से तैयार है किसान संगठनों
द्वारा दिल्ली कूच के आहवान के चलते
हरियाणा पुलिस द्वारा प्रदेश में कानून

व्यवस्था बनाए रखने के लिए तथा आम जन की
सुरक्षा के लिए व्यापक स्तर पर प्रबंध किए
गए हैं इसके चलते 114 कंपनियां दंगा
प्रतिरोधी उपकरणों के साथ सीमावर्ती तथा

अन्य संवेदनशील जिलों में तैनात की गई है
इसमें से 64 कंपनियां अर्ध सैनिक पुलिस
बलों की है तथा 50 कंपनियां हरियाणा पुलिस
की भी शामिल है इसके अतिरिक्त शरारती

तत्वों तथा उपद्रवियों पर नजर रखने के लिए
सीसीटीवी ड्रोन इत्यादि की भी मदद ली जा
रही है हरियाणा पुलिस आम जन की सुरक्षा के
लिए प्रतिबद्ध है और प्रदेश में होने वाले
किसी भी अप्रिय परिस्थिति से निपटने में

पूर्ण रूप से सक्षम है किसान नेताओं का
कहना है कि वे नहीं चाहते कि आंदोलन लंबा
चले उन्होंने 40-45 दिन पहले ही ऐलान कर
दिया था सरकार के पास काफी वक्त था इसका
हल निकालने के लिए लेकिन मांगों पर विचार

करने के बजाय आंदोलन में शामिल होने आ रहे
किसानों को रोका जा रहा है मध्य प्रदेश
महाराष्ट्र ओड़ीशा में किसानों को रोका
गया इसके बाद भी हम चाहते थे कि सरकार के
साथ बातचीत हो और इसका हल निकले और हम इसी

इरादे से बातचीत में शामिल भी हुए जो असफल
रही किसान नेताओं का यह भी कहना है कि उन
पर यह आरोप गलत है कि सड़कों को जाम किया
है हमने सड़कों को जाम करने का कोई ऐलान

आज भी नहीं किया है पंजाब हरियाणा किसी
भारत के दो राज्य नहीं ऐसे लगता है य
इंटरनेशनल बॉर्डर बन गए हैं जो हमें जो
नजर आ रहा है अब हमें मीडिया बोलता था आप

रोड रोकते हैं इससे लोगों को तकलीफ होती
है हम हम तो आज भी नहीं कह रहे रोड ब्लॉक
करेंगे आज भी नहीं कह रहे हैं हम कहा रोड
रोकेंगे अब तो सरकार ने स्वयं रोड रोक रखी
है पिछले दो-तीन दिन से और जो वो दिखा रहे

हैं कंक्रीट की 1010 फुट ऊंची लंबी
जो दीवार बनाई गई है रोड्स में मुझे बोता
हम तो इसको देश के लिए अन्न उगाते हैं
उसको देश का पेट भरते हैं और इन्होंने

हमारे लिए जो है किलों की जो फसल है वो
हमारे लिए उगा रखी है हमारे सामने हमने तो
मंत्री महोदय से कहा आपने महाराष्ट्र में
जुल्म किया आप मध्य प्रदेश में 300 लोगों

को डिटेन कर लिए आप ये बेंगलोर से आ रहे
थे यह हमारे लोग उनकी एक और थी आग उसको
बालों से जैसे खींचा गया उसके सर पर चोट
लगी हम फिर आपसे वार्ता करने गए आपने
उड़ीसा में 100 किसान आर से टिकट ली हुई

थी उनको रेस्ट कर लिया आप इतना कुछ कर रहे
हैं फिर भी हम आपसे वार्ता करने पहुंचे
क्यों पहुंचे कि हम चाहते से मिल बैठ के
इस मसले का कोई ना कोई हल हो जाए पर हमें
ना तो यह लगा हम मंत्री महोदय पियूष गोल

जी ऊपर कहे मैं बात करूंगा पर कुछ लगा
नहीं उसके बाद कुछ हुआ देखिए वहां मीटिंग
में बैठे-बैठे हमारे ट्विटर हैंडल बंद हो
ग हम वार्ता कर रहे हैं फिर भी हमारे
ट्वीटर ंडर फिर भी हमने कहा हम हम दरवाजा

बातचीत का खुला रखेंगे हम आज भी कहते हैं
सरकार कोई भी अनाउंसमेंट कर सकती है अ जो
लगता उन्हें कि हम कुछ देना चाहते हैं तो
वह दे दे लेकिन सरकार जो कुछ कह रही है वह

सिर्फ हमारे आंदोलन का टाइम पास करना
चाहती है जो हमने देखा इस बार किसानों के
लिए दिल्ली बहुत दूर नजर आ रही है पुलिस
की तैयारी कहीं ज्यादा मजबूत और व्यापक

नजर आती है पिछली बार नवंबर 2020 में
किसान भरी सर्दी में पुलिस के नाकों का
सामना करते हुए पानी की बौछार का सामना
करते हुए आगे बढ़ते रहे और दिल्ली के पास
सिंघु बॉर्डर तक आ गए लेकिन इस बार मुमकिन

नहीं लगता हरियाणा में अस्थाई जेल बनाए गए
हैं ताकि उन्हें गिरफ्तार कर वहां रखा जा
सके दिल्ली के गृहमंत्री कैलाश गहलोत ने
बवाना में अस्थाई जेल बनाने से इंकार कर
दिया दिल्ली सरकार ने कहा है कि उनके

मुताबिक किसानों की मांगे जायज हैं और
शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान में हर
नागरिक का हक है किसान इस देश के अन्नदाता
है और अन्नदाता को जेल में डालना गलत है
आम आदमी पार्टी ने किसान आंदोलन की मांगों

का समर्थन किया है किसान केवल न्यूनतम
समर्थन मूल्य की मांग नहीं कर रहे उनकी
मांग है कि किसान और मजदूरों के भी कर्ज
माफ कर दिए जाए

आज किसान दिल्ली के ओर चल जा
रहे पैदल जा रहे
हैं उनको रोका जा रहा है उन परे टियर गैस
चला जा रही है उनको जेल में भरा जा रहा है
और वह क्या कह रहे

हैं सिर्फ यह कह रहे हैं कि हमारी
मेहनत का फल हमें मिलना
चाहिए स्वामीनाथन जी
को बीजेपी की सरकार
ने भारत रत

दिया मगर जिस चीज के लिए स्वामीनाथन जी ने
अपनी जिंदगी दी हिंदुस्तान के किसानों के
लिए जो उन्होने मेहनत
की जो स्वामीनाथन जी ने
कहा उसको करने के लिए तैयार नहीं है इसका

क्या मतलब
है स्वामीनाथन जी ने अपनी रिपोर्ट में साफ
कहा
है कि किसानों
को लीगल
राइट एमएस की एमएसपी की मिलनी
चाहिए वह भी एजेपी की सरकार नहीं कर रही

है तो मैं आपको यहां जो खरगे जी ने कहा
उसको दोहराना चाहता
हूं कि इंडिया की सरकार आएगी
तो हम एमएसपी की
गारंटी हिंदुस्तान के किसानों को देंगे जो
स्वामीनाथन रिपोर्ट में लिखा है वह हम

पूरा करके आपको दे देंगे बीजेपी भी अपने
twitter4j की लाल किले वाली घटना के बाद
कई नेताओं और आंदोलन के समर्थकों के
ट्वीटर बंद कर दिए गए थे इस बार पहले से
ही चारों तरफ इंटरनेट बंद कर दिया गया और
किसान नेताओं के

पंजाब के अकाउंट भी आज बंद कर दिए गए इन
सब बातों से यही लगता है कि आंदोलन के
भीतर और आंदोलन के साथ क्या हो रहा है
इसकी संपूर्ण सूचना मुश्किल से ही मिल
पाएगी किसान भी खुद से वीडियो बनाकर नहीं

भेज पा रहे हैं यहां वहां से किसी तरह
वीडियो हमने भी हासिल किए उसी के आधार पर
हम यह सब कुछ दिखा पा रहे हैं किसानों को
रोकने की जितनी कोशिशें इस बार की गई हैं
पिछली बार की तमाम कोशिशें अब हल्की और

कमजोर नजर आ रही हैं चप्पे चप्पे पर केवल
कांटे और कीले नहीं बिछाई गई हैं सीमेंट
की दीवारें ही खड़ी नहीं की गई हैं किसान
आंदोलन से जुड़ी खबरों को रोकने के भी

उतने ही कड़े बंदोबस्त किए गए हैं आंसू
गैस छोड़ने इसकी तैयारी के वीडियो रास्ते
में कील कांटों का बिछा देना यह सब देखकर
लग रहा है कि किसान दूसरे देश से भारत में
प्रवेश कर रहे हैं अपने ही देश की सीमा

में उन्हें रोकने के लिए इस तरह के
बंदोबस्त किए गए हैं जैसे युद्ध का कोई
मोर्चा बांध दिया गया हो ट्रैक्टर के
सहारे दिल्ली आने से दिक्कत है तो फिर
ट्रेन से आ रहे किसानों को भी भोपाल में

उतारा गया है यह किसान कर्नाटका से दिल्ली
आ रहे थे कर्नाटका के मुख्यमंत्री
सिद्धारमैया ने ट्वीट किया कि उनके राज्य
के किसानों को छोड़ दिया जाए और दिल्ली

जाने दिया जाए सिद्धारमैया ने तो यह भी
लिखा है कि यह आपराधिक दिमाग का काम है
जिसके पीछे प्रधानमंत्री मोदी की भाजपा
सरकार है कर्नाटका के मुख्यमंत्री ने कहा
है कि किसानों की आवाज दबाने की जगह उनकी

मांगों को सुना जाना चाहिए और पूरी करनी
चाहिए सिद्धारमैया ने यह भी याद दिलाया कि
पहली बार जब बीजेपी की सरकार कर्नाटका में
आई थी तब किसान खाद की मांग को लेकर

आंदोलन में उतरे उन पर गोलियां चल गई
किसानों के साथ जो भी हो रहा है उससे यही
लग रहा है कि उन्हें डराने धमकाने की
कोशिश हो रही है किसानों को केवल रोका
नहीं जा रहा बल्कि उनके खिलाफ माहौल बनाया

जा रहा है ताकि लोगों में किसानों को लेकर
गुस्सा भड़क जाए इस खेल में गोदी मीडिया
सोशल मीडिया और
के अंदर हम मीडिया से अपील करना चाहेंगे

कि हमारे अक्ष को बिगाड़ा ना
जाए ठीक है वह हमारे अक्ष को स् देश के
किसान मजदूर है किसी जो बोला जा रहा है
मीडिया में
कोई कांग्रेस को नहीं कोई कांग्रेस हमें

सपोर्ट नहीं करती हम कांग्रेस को भी उतना
दोषी मानते जितना भाजपा दोषी है ये
नीतियां तो कांग्रेस लेकर आई है हम कोई
लेफ्ट नहीं है हम जो सीपीआई सीपीएम ने जो
बंगाल में राज किया उन्होंने 20 गलतियां

की वहां से पश्चिमी बंगाल में कौन सा
इंकलाब आ गया हम किसी के पक्ष वाले नहीं
है हम किसान मजदूर की आवाज उठाने वाले
उनके आदमी है

तो बाकी हम फिर अपने लोगों से अपील करेंगे
चाहे पंजाब और देश के गायक हैं बुद्धिजीवी
हैं एनआरआई भाई हैं चाहे और सिविल सोसाइटी
है सभी सिविल सोसाइटी उसमें पत्रकार
भाईचारा भी आता है वो जरूर बड़े आंदोलन

में यह हमारा सवाल नहीं हम नहीं कहते 140
करोड़ देशवासियों की मांग है उसमें से 60
करोड़ से अधिक किसान है जिस देश में खेत
मजदूर अलग हैं तो 70 75 पर आबादी की मांग

है सब हम मिलके करेंगे इस देश को हम आगे
लेकर जाना चाहते हैं अगर कृषि बच गई तो
देश बच जाएगा अब सवाल उठता है कि इतना
वक्त गुजर गया किसानों की मांगे क्यों
नहीं मानी गई नवंबर 20221 में

प्रधानमंत्री ने वादा कर दिया था फिर 2024
आ गया अभी तक क्यों कुछ नहीं हुआ अभी तक
कृषि मंत्री कमेटी बनाने की बात क्यों कर
रहे हैं पिछली बार प्रधानमंत्री ने किसान
आंदोलन को संसद में आंदोलन जीवी ना जाने

क्या-क्या कह दिया लेकिन 700 किसानों की
जाने चली जाने के बाद भी किसान दिल्ली की
सीमाओं पर हर मौसम में टिके रहे तब जाकर
प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि कृषि कानून
वापस लिए जाते हैं इस बार अभी तक

प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं
आया प्रधानमंत्री के पास भी एक मौका था कि
किसानों से पहले मिलने का वे नहीं मिले
लेकिन एक अंतर तो है कि पिछली बार की तरह

इस बार सरकार किसानों को खारिज करने में
नहीं लगी है कि ये कौन लोग हैं विश्वसनीय
है या नहीं असली बनाम नकली किसान का मामला
इस बार खड़ा नहीं किया गया बल्कि सरकार के
मंत्री चंडीगढ़ पहुंच गए बात करने लगे

लेकिन 2 साल बाद क्या उनके पास एमएस
एमएसपी को लेकर कुछ भी नया और ठोस नहीं था
जैसा कि किसान आंदोलन के नेता ने बताया
उससे तो यही लगता है कुछ भी नहीं था

एमएएसपी खरीद की गारंटी का कानून वो कह
रहे हैं इसमें मंत्री महोदय कमेटी बना
देते हैं हमने सीधी सी बात सीएसीपी एक ऐसा
अधारा है जो किसान के फसल के दाम के रेट
के बारे में सिफारिश करता है वो सारी

डिटेल्स ले लेता है वो 23 फसलों पर पिछले
लंबे समय से भारत सरकार करती आ रही है हर
छ महीने बाद गेहूं हो धान हो और चीजें हो
उनके ऊपर वो एमएसपी का अनाउंस करते हैं

कुछ कुछ कुछ फसलें तो खरीदी जाती है कुछ
नहीं खरीद हमने कहा आपने कुछ नहीं करना य
जो 23 फसलों का आप अनाउंसमेंट कर रहे हैं
पूरी कैलकुलेट करके उसके ऊपर लीगल शयो कर
दें कि आपकी मंडी में एमएसपी से नीचे

बिकेगी नहीं अब फिर बोल रहे इस पे कमेटी
बनाए हमने बोला इस पे तर्क दीजिए इस पे
कमेटी बनाने की जरूरत नहीं है ही नहीं तो
इससे वह बिल्कुल उसका जवाब उनके पास नहीं
था आप कमेटी बना के हमारे मुद्दे को डिलीट

करना चाहते हैं हमने यह भी भला मान जोग
प्रधानमंत्री जब 2012 में कंज्यूम और
अफेयर कमेटी के चेयर पर्सन थे तो उन्होंने
कहा था एमएसबी गारंटी कानून देंगे उनकी
सिफारिश है और 2018 में तत्कालीन

खेतीबाड़ी मंत्री सचिव की चिठी है
जिन्होंने कहा सा सीटू प्लस % के अनुसार
आपको फसलों के दाम देंगे उन्होंने पूरी
बात की हुई है उसमें और इस तरह से जबलपुर
हाई कोर्ट में जब किसानों ने जब केस डाला

था तो उन्होंने दोनों दोनों पक्षों को
सुनकर सरकार का पक्ष भी सुना जो जो पीएल
डालने वाले थे उसका पक्ष भी सुना और
निर्णय किया कि एमएसपी से नीचे किसान की
फसल खरीदी नहीं जाएगी हमने तीन तर्क उनके

सामने रख दिए और मंत्री महोदय अकेले हमारे
से और दूसरा हमने कहा आपने दो साल पहले
चिट्ठी लिखी हमें उसमें बोला था एमएसपी
खरीद की गारंटी का कानून बनाएंगे तो 2 साल
तो निकल गए समय तो आपको दिया 40 45 दिन

पहले हमने आंदोलन का ऐलान किया तब कर लेते
तो उनका आंदोलन को टलने का मुद्दा था
जाहिर है किसान अपनी मांग को लेकर स्पष्ट
है सरकार पहले से ही एमएसपी दे रही है जिन
फसलों की एमएसपी दे रही है किसान यही

चाहते हैं कि वह गारंटी दे दे कि इससे कम
पर फसल नहीं बिकेगी तो क्या सरकार इसके
लिए भी तैयार नहीं फिर उसने क्या सोचा है
सरकार को जनता के बीच अपनी बात रखनी चाहिए
हर बात में एक देश एक कानून की बात करने

वाली सरकार सभी मंडियों में एक एमएएसपी की
गारंटी क्यों नहीं दे सकती किसानों के साथ
बातचीत फेल होने के बाद भी सरकार ने कहा
उससे उम्मीद है आने वाले दिनों में बात

करेंगे किसान एमएसपी की मांग क्यों कर रहे
हैं इसके बारे में इंडियन एक्सप्रेस के
हरीश दामोदरन ने विस्तार से लिखा है हरीश
दामोदरन कृषि मामलों पर काफी गहराई से
लिखते हैं उन्होंने लिखा है कि खेती में

हर जगह फसल एक साथ ही काटी जाती है इस
कारण मार्केट में एकदम से सप्लाई बढ़ जाती
है और कीमतें नीचे आ जाती हैं किसान कीमत
तय नहीं कर पाते जो मिलता है उस पर बेचने
के लिए मजबूर हो जाते हैं जैसे बाजार में

बिकने वाली हर चीज की एमआरपी होती है वै
से किसान के फसल की कोई एमआरपी नहीं होती
एक ही इलाके में कई किसान अलग-अलग दाम पर
अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होते हैं

किसान अपनी फसल तो थोक दरों पर बेचता है
लेकिन खुद हर चीज की रिटेल कीमत अदा करता
है फिर चाहे वह बीज हो कीटनाशक डीजल
ट्रैक्टर सीमेंट दवा साबुन इत्यादि
इत्यादि इसी कारण किसान एमएसपी की मांग कर

रहे हैं अधिकतर अर्थशास्त्री मानते हैं कि
लागत जोड़कर एमएसपी नहीं मिलनी चाहिए वे
मानते हैं कि किसानों को मार्केट की मांग
देखकर फसल उगानी चाहिए लागत जोड़कर कर दी

जाने वाली एमएसपी मार्केट की मांग का
ध्यान नहीं देगी और इस कारण कुछ फसलों की
भरमार हो जाएगी अर्थशास्त्री कहते हैं कि
किसानों को कीमत नहीं आय की सहायता मिलनी
चाहिए जैसे पीएम किसान योजना या तेलंगाना

की रायत बंधु स्कीम ऐसी स्कीम से मार्केट
पर असर नहीं पड़ता और सभी किसानों को
फायदा होता है मगर ऐसी स्कीम में सवाल
उठता है कि वह किसान जो सिर्फ खेती पर ही

आश्रित है और खेत में समय संसाधन पैसे का
ज्यादा निवेश करता है उसका क्या होगा ऐसे
किसानों पर कीमत में उतार चढ़ाव के अलावा
मौसम की मार कीड़ों के हमले फसल की बीमारी

का भी खतरा रहता है इसलिए एमएसपी की मांग
कोई अव्यावहारिक मांग नहीं
है सरकार को बताना चाहिए कि वह एमएसपी की
गारंटी क्यों नहीं दे सकती है गारंटी शब्द
प्रधानमंत्री मोदी ही इस्तेमाल करते हैं

आपके घर में जो अखबार आता है उसके ऊपर
लगातार विज्ञापन आ रहा है मोदी की गारंटी
आप शहर में जाएंगे तो मोदी की गारंटी के
तरह-तरह के पोस्टर और होर्डिंग दिखाई
देंगे यह गारंटी वो गारंटी तो इतनी तरह की

गारंटी में एक एमएसपी की गारंटी क्यों
नहीं हो सकती है क्यों एमएसपी की गारंटी
के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ रहा है
एमएसपी के सिस्टम में भी सुधार की जरूरत

है एक राज्य में ज्यादा कीमत होती है जैसे
छत्तीसगढ़ में और दूसरे में कम जैसे बिहार
में तो इसके कारण किसानों को नुकसान हो
जाता है दलाल उनसे कम कीमत पर खरीद कर ले
जाते हैं और दूसरे राज्य में ज्यादा दाम

पर बेचकर मुनाफा कमाते हैं ऐसे कई मामले
पहले सामने आ चुके हैं किसानों पर आर्थिक
दबाव तो है तमाम आंकड़े आते रहते हैं कि
ग्रामीण क्षेत्रों में कमाई कम है
उपभोक्ता वस्तुओं की मांग कम है तो फिर

इसका असर किसानों पर भी होता ही होगा फिर
चाहे वे जो भी फसल उगाते हो और किसी भी
कीमत पर किसी को भी बेचते हो किसान आंदोलन
फिर से एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां
से आगे का कोई रास्ता नजर नहीं आता नजर

आता है तो केवल बैरिकेट्स कांटे कटीली
तारे और आंसू गैस के गोले नमस्कार मैं
रविश कुमार

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