किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा! | Farm laws for corporate or farmers? - instathreads

किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा! | Farm laws for corporate or farmers?

नमस्कार

जब भी गौतम अदानी
से जुड़ी खबर आई है सरकार चुप हो जाति है
और गोदी मीडिया भी चुप हो जाता है अगर आप
इस जहां से में हैं की चुप्पी ही सच है तो
आप गलत हो सकते हैं अशोक यूनिवर्सिटी के

मामले में ही देख लीजिए अशोक यूनिवर्सिटी
के कितने ही डिपार्मेंट के प्रोफेसर ने
सामूहिक रूप से बोला है और सब्यसचिवदास और
पुलापुरे बालाकृष्णन को वापस बुलाने की
मांग की है आज के वीडियो में आदरणीय और

कृषि कानून पर आगे बढ़ाने से पहले बता डन
की भारत के 80 से अधिक संस्थाओं के करीब
300 अर्थशास्त्रियों ने बयान जारी किया
हैं और अशोक यूनिवर्सिटी में सेंसरशिप का
विरोध किया है आईआईएम कोलकाता आईआईएम
बेंगलुरु आईआईटी दिल्ली से लेकर श्री राम

कॉलेज और कॉमर्स सेंट जेवियर कॉलेज
कोलकाता से लेकर जवाहर लाल नेहरू
विश्वविद्यालय पुणे के गोखले इंस्टिट्यूट
ऑफ पॉलिटिक्स सैनिकों मिक्स दिल्ली स्कूल
ऑफ इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर

ने आवाज बुलंद की है यही नहीं दूसरी
प्राइवेट यूनिवर्सिटी से भी प्रोफेसर
बोलने लगे हैं आप जिंदल और अजीम प्रेमजी
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी इसमें शामिल
हैं हम आज किसान आंदोलन की समझदारी पर बात
करेंगे लेकिन अर्थशास्त्रियों का इस तरह

से सामूहिक रूप में बोलना किसान आंदोलन की
याद दिल रहा है इसी तरह धीरे-धीरे किसान
बोलने लगे थे और उनका आंदोलन बड़ा होता
चला गया अशोक यूनिवर्सिटी किस डर से अब
चुप है अब उसे बोल देना चाहिए और दोनों

प्रोफेसर को कम पर वापस बुला लेना चाहिए
अपने पत्र में इन अर्थशास्त्रियों ने लिखा
है की भारत भर में कम करने वाले हम
अर्थशास्त्री मजबूती से इसमें यकीन करते
हैं की किसी भी शैक्षणिक और रिसर्च समुदाय
के लिए एकेडमिक स्वतंत्रता बहुत जरूरी है

हर किसी को अपना रिसर्च करने उसे सजा करने
और खुलकर बातचीत करने का अवसर मिलन चाहिए
किसी प्रकार कब है सेंसरशिप नहीं हनी
चाहिए हम प्रोफेसर सब्यसाची दास के साथ
हैं और अशोक यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र

विभाग की मांग का समर्थन करते हैं हम
यूनिवर्सिटी के गवर्निंग बॉडी से मांग
करते हैं की प्रोफेसर दास को तुरंत बहस
किया जाए शायद भारत के इतिहास में ऐसा कभी

नहीं हुआ होगा की किसने की तरह 81
संस्थाओं के अर्थशास्त्री एक आवाज में
बोलने लगे हैं अर्थशास्त्रियों की इस आवाज
को आप भी सुनिए गोदी मीडिया चुप है इसका

मतलब यह नहीं की सर देश डर के मारे चुप हो
गया है अब हम आते हैं रिपोर्टर्स कलेक्टिव
की दो रिपोर्ट पर जिससे पता चला है की
किसने के साथ कितना बड़ा धोखा होने जा रहा

था भारत के किसान सड़क पर उतार गए सैकड़ो
शाहिद हो गए लेकिन वे इन कृषि कानून के
पीछे के इरादे को समय से पहले समझ गए थे
उन्हें पता तो नहीं था की इसके पीछे
कौन-कौन चेहरे हैं इनके नाम क्या है

मगर उन्होंने पकड़ लिया की इस बार उनकी
जमीन और उपज पर हमला होने वाला है अगर अब
भी वे सड़क पर नहीं उतारे तो उनकी आखिरी
पूंजी यानी जमीन हाथ से चली जाएगी
रिपोर्टर्स कलेक्टिव के श्री गिरीश जलील

की दोनों रिपोर्ट से साफ पता चला है की
तीनों कृषि कानून किसके लिए ले गए थे बनाए
गए थे किसने के नाम पर मगर ये कानून ले गए
थे कॉरपोरेट के लिए आज का यह वीडियो
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की शानदार रिपोर्ट पर

आधारित है हमें लगता है की यह रिपोर्ट
हिंदी के दर्शकों और किसने के बीच ज्यादा
से ज्यादा पहुंचनी चाहिए ताकि उन्हें पता
चले की उनके भविष्य के नाम पर किस तरह से
कृषि कानून की भूमिका बनाई गई कैसे चुपचाप

कॉरपोरेट और बीजेपी से जुड़े लोग इसे
तैयार करते रहे और किसने को भटक नहीं लगे
दी हम इस रिपोर्ट में बताएंगे की अमेरिका
का एक एनआरआई जिसका खेती से कोई लेना देना
नहीं है खेती और जमीन को कार्पो के हवाले
कर देने का आइडिया लेकर आता है जिसे

बिजनेस की सुंदर भाषा में कॉरपोरेटाइजेशन
ऑफ एग्रीकल्चर कहते हैं इसके अलावा हम आज
के वीडियो में गौतम अदानी के कारोबारी
समूह से जुड़ी कुछ अन्य खबरे को भी शामिल
करेंगे पहले याद दिलाना जरूरी है की 19
नवंबर 2021 के दिन प्रधानमंत्री ने तीनों

कृषि कानून को वापस लेते समय क्या कहा था
हम प्रधानमंत्री मोदी के उसे भाषण को खुद
ही पढ़ रहे हैं मगर शब्द उन्हें के हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर
2022 को कहा था मैं आज देशवासियों से

क्षमा मांगते हुए सच्चे मां से और पवित्र
हृदय से कहना चाहता हूं की शायद हमारी
तपस्या में ही कोई कमी रही होगी जिसके करण
दिए के प्रकाश जैसा सत्य खुद किसान भाइयों
को हम समझा नहीं पे 19 नवंबर 2021 के दिन
गुरु नानक जयंती के पवन अवसर पर

प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं की दिए के
प्रकाश जैसा सत्य यानी इन कानून की
खूबियां के बड़े में किसान भाइयों को हम
समझा नहीं पे शायद हमारी तपस्या में ही
कोई कमी रही होगी

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के श्री गिरीश जलहाल
ने इस तपस्या की पाल खोल दी है बता दिया
है की वह दिया किसका था जिसके प्रकाश की
तरह कानून बनाने का दवा किया जा रहा था हम
जी रिपोर्ट की चर्चा करने जा रहे हैं उससे

तो बिल्कुल नहीं लगता की किसने के लिए
तपस्या हो रही थी और वो तपस्या
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे थे अब
पता चल रहा है की भारत के किसने के लिए
कॉरपोरेट के लोग चुपचाप तपस्या कर रहे थे

हम फिर से बता दें की ये रिपोर्ट हमारी
नहीं श्री गिरीश जलील की है जो रिपोर्टर्स
कलेक्टिव के हैं उन्हें का रिपोर्ट का
हिस्सा पढ़ रहा हूं इस रिपोर्ट के आने के

48 घंटे से भी ज्यादा समय बीट चुके हैं
मगर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं
की है तो अब आते हैं तपस्वी जी पर सबसे
पहले आप तपस्वी का चेहरा देख लीजिए शरद

मरते नाम है इनका भारत के सभी किसान शरद
मरते को ठीक से पहचान लेने यही वो तपस्वी
जब है जो उनकी आई डबल करने के लिए तपस्या
कर रहे थे लिंकडइन एक वेबसाइट है इस पर

उन्होंने अपने परिचय में लिखा है की वे 5
1/2 साल से भारत सरकार के आयुष मंत्रालय
के टास्क फोर्स के अध्यक्ष हैं यहां पर
इन्होंने या नहीं लिखा है की खेती को
कारोबारी बनाने के लिए जो टास्क फोर्स बना

था उसके सदस्य यही थे बनाने का सुझाव भी
इनका था अध्यक्ष थे उसके अशोक डलवाई जो सब
यह नहीं बताते हैं श्री गिरीश जल अपने
रिपोर्ट में उनका पर्दाफाश कर देते हैं
शरद मराठी अमेरिका में सॉफ्टवेयर कंपनी

चलते हैं एक कंपनी अमेरिका में और एक भारत
में
पराठे ने अमेरिका से बिजनेस
एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री पी
है खेती से कभी नता नहीं रहा इनकी
राजनीतिक तपस्या के बड़े में जलील लिखने

हैं की मरते भाजपा की ओवरसीज फ्रेंड्स
इकाई के अध्यक्ष के साथ अपनी दोस्ती का
बखान करते पे गए हैं वाजपेई के समय से
बीजेपी के करीबी रहे हैं इस रिपोर्ट में
दस्तावेजों के साथ दवा किया गया है की शरद

मरते के प्रस्ताव के बाद ही नीति आयोग ने
टास्क फोर्स का गठन किया जिसने सुझाव दिया
की किसने की आई डबल करनी है तो खेती को
व्यवसायिक बनाने की जरूर है मंडी को बाजार

के लिए खोल देना होगा किसने की जमीन को
लेज पर देने का रास्ता बनाना होगा टास्क
फोर्स के 11 सदस्यों के नाम भी शरद मरते
ने सुझाए और स्वीकार हो गए और खुद भी उसके
सदस्य बन गए इसमें अदानी समूह आईटीसी
महिंद्रा पतंजलि बिगबास्केट जैसे चुनिंदा

कॉरपोरेट को रखा गया था टास्क फोर्स पहले
मीटिंग के रिकॉर्ड से पता चला है की मरते
ने कहा था की यह एग्रीकल्चर से एग्री
बिजनेस की और जान का सही समय है सही समय
याद रखिएगा आगे बताऊंगा यानी खेती को
बिजनेस बनाने का सही समय है टास्क फोर्स

की रिपोर्ट कभी सामने नहीं आई लेकिन अचानक
तीन कृषि कानून थोप दिए गए रिपोर्टर्स
कलेक्टिव ने दवा किया है की इन सभी के
दस्तावेज हैं जो उसके पास हैं और वेबसाइट
पर मौजूद हैं 2016 में अप की एक चुनावी

रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था की
किसने की आई 2022 तक डबल हो जाएगी 2022 का
साल आया चला भी गया आज तक नहीं बता पे की
आमदनी डबल हुई या नहीं लेकिन 2016 के बाद
से खेल पर्दे के पीछे शुरू होता है किसने

के लिए नहीं किसी और की आमदनी डबल करने के
लिए जो अब सामने ए गया है यह रिपोर्ट
बताती है की 2020 में तीनों कृषि कानून के
पास होने के पहले
तीन-चार साल तक क्या-क्या होता रहा हमारा

सवाल है की मराठी के खाने पर जनवरी 2018
में जो टास्क फोर्स बना उसके पास किसने से
बात करने के लिए तो काफी समय था फिर क्यों
नहीं किसने को शामिल किया गया उनसे बात की
गई केवल कॉरपोरेट को लेकर कमेटी क्यों
बनाई गई क्या केवल किसने को लेकर कोई

टास्क फोर्स बना था बताइए क्या इसी तरह
प्रधानमंत्री मोदी किसने के लिए तपस्या कर
रहे थे या ये तपस्या कॉरपोरेट के लिए की
जा रही थी पूजा किसने के नाम पर हो रही थी
मगर ध्यान कॉरपोरेट का लगाया जा रहा था डू

यू गेट मी पॉइंट हमने पाया की तीन कृषि
कानून आने से 2 साल पहले सरकार ने टास्क
फोर्स बनाई जिसका मूल उद्देश्य प्राइवेट
कंपनी को कृषि में एंट्री देने का था इस

टास्क फोर्स के रिकॉर्ड पब्लिक से अब तक
छुपाई गए थे पासपोर्ट बनी थी किसने की आई
दुगनी करने के लिए लेकिन डी रिपोर्टर्स
कलेक्टिव को मिले मिले सरकारी कागजों से
पता चला की उसने प्राइवेट कंपनियां से

बिजनेस मॉडल से सलाह ली टास्क फोर्स इस कम
में लगा हुआ था जबकि इस समय एक इंटरमीडिएट
कमेटी भी किसने की आई दुगनी करने के विषय
पर कम कर रहा था दोनों में सबसे बड़ा फर्क
था की टास्क फोर्स सिर्फ और सिर्फ बिजनेस

मॉडल पर चर्चा कर रहा था एक तरफ कमेटी के
रिकॉर्ड्स पब्लिक में ए गए लेकिन टास्क
फोर्स की बात को सरकार ने पब्लिक से छुपा
दिया इस टास्क फोर्स में एसपी और क्रॉप

इंश्योरेंस जैसे विषयों की चर्चा नहीं की
गई इनका पूरा फॉक्स था की कैसे कृषि को
प्राइवेट बिजनेस के लिए खोल दिया जाए
किसने की आई दुगनी करने के लिए तास फोर्स
ने अदानी ग्रुप पतंजलि महिंद्रा और
महिंद्रा और बिग बास्केट जैसे कंपनियां से

सलाह ली टास्क फोर्स में एसपी की चर्चा
कभी हुई ही नहीं जो कृषि कानून ले गए
उन्होंने इंटरनेशनल कमेटी की सलाह को
नकारते हुए एसपी के कंडीशन को कानून में
इंक्लूड नहीं किया
इस टास्क फोर्स के रिकॉर्ड से यह बात पता

चलती है की सरकार कृषि कानून लाने से पहले
किस तरह की मीटिंग्स कर रही थी कैसे बड़े
उद्योगपतियों को किसान की आई दुगनी करने
की आड में एक ऑफिशल प्लेटफॉर्म मिल गया
अपने धंधे के फायदे की बात करने के लिए और

कैसे सरकार ने इन्हीं उद्योगपतियों के
फायदे के लिए कृषि कानून बनाए थे जब
आंदोलन करने वाले किसने ने सरकार से पूछ
दिया की कृषि कानून को लाने से पहले किस
किसान या किसान संगठन से पूछा गया तो जवाब
देते नहीं बना बाद में अजीब अजीब तरह के

संगठन के किसान खड़े कर दिए गए जो कानून
का समर्थन करने ए गए तब सरकार ने क्यों
नहीं स्टार भारत के बड़े में जानकारी दी
क्यों नहीं तब शरद मराठी का नाम बताया गया

कौन है ये आदमी जिसके खाने पर नीति आयोग
तीन महीने में टास्क फोर्स खड़ा कर देता
है योगेंद्र यादव 2017 के साल में देश की
मंदिरों का दौरा कर रहे थे उन्होंने दिखाए
की प्रधानमंत्री की नीति के अनुसार

मंदिरों में अनाज की खरीद नहीं हो रही है
तब योगेंद्र यादव कोई शरद मरते से टकरा गए
नीति आयोग के दफ्तर में कैसे योगेंद्र खुद
बता रहे हैं आप सुनिए योगेंद्र यादव किसान

आंदोलन में भी सक्रिय थे हमने उनसे पूछा
की क्या कभी किसी स्टार पर इस शरद मरते का
नाम आया था उसे बातचीत के दौरान टास्क
फोर्स का जिक्र हुआ था
रिपोटिक्स कलेक्टिव के इस महत्वपूर्ण

कुलसी नहीं जो परतदार परत सच बाढ़ रहा है
उसमें बहुत महत्वपूर्ण आयाम जो होती है
किसान आंदोलन के दौरान हमें शक तो था की
मामले का अदानी से कोई संबंध है क्योंकि

उससे ही पहले और लॉक डॉ के दौरान अदानी जी
ने हरियाणा में बड़े-बड़े शेरों खरीद दिए
थे तो हमें शक तो था की उन्हें पहले से
पता था की ये होने वाला है और हो ना हो

इसमें कहानी ना कहानी जुड़ाव है लेकिन कोई
प्रमाण नहीं था हमारे पास और नीति आयोग ने
ऐसी कोई खुफिया
कमेटी बनाई हुई है इसका कोई गुमान नहीं था
मैं नीति आयोग में गया था राजीव को मारते
नीचे आयोग की उपाध्यक्ष से मिलने हमारा एक

किसान आंदोलन का प्रतिनिधिमंडल गया था जो
की सरकार ने उनको जिम्मेवारी दी थी
प्रोक्योरमेंट सुनिश्चित करने हैं और हम
देशभर के मंदिरों का दौरा करने के बाद ही
शिकायत लेक गए थे की टोकनमेंट तो हो नहीं

रहा है तमाम तरीके से और किसान को एसपी
नहीं मिल रहा है उसे मीटिंग में यह सज्जन
वहां पे बैठे हुए थे एनआरआई जिनका आपसे
पूछा
रहा है मेरे मां से तो इनका शरद मराठी जी

का नाम भी उतार गया था लेकिन अब
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की बात सुनकर ध्यान
आया उसे मीटिंग में इन्हें बैठाया गया था
और ये इसी तरह की बात कर रहे थे कॉरपोरेट
ये कर सकते हैं सॉल्यूशन प्राइवेट सेक्टर

में है इत्यादि और मीटिंग के बाद इन्होंने
मुझे कहा आपसे एक अलग मीटिंग करनी है मुझे
नीति आयोग के कमरे में लेक गए मेरे साथ
आधे घंटे उन्होंने बात की और मुझे बात
करके पता ग गया की भैया इनको भारतीय से और

इसके समाधान से कोई लेना देना नहीं है तो
मैंने नमस्ते कर ली वो कहते हैं की आपको
हम आगे संपर्क रखना चाहते हैं लेकिन मुझे
लगा की जाहिर है इसका कोई संबंध नहीं है

इसका कोई महत्व था और वो कुछ नीति आयोग
में खेल कर रहे थे
तो मां भी नहीं था लेकिन सच निकाल रहा है
और सच ये है की भारत की कृषि को कॉरपोरेट
सेक्टर के हवाले करने का षड्यंत्र था जिसे
किसान आयोग ने बच्चा लिया किसान आंदोलन

जिससे इस देश को बच्चा ऐसे लोग सत्ता के
गलियारे में अक्सर मिल जाते हैं बहुत बाद
में पता चला है की किसी बड़े प्रोजेक्ट
में लगे हुए हैं रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने
अपनी रिपोर्ट में इस बात का पता लगाने का
दवा किया है की कृषि कानून की शुरुआत किस

तरह से होती है तभी तो पता चलेगा की किसने
के साथ धोखा हो रहा है किसान अपनी आंखों
से होते हुए देख रहे थे समझ गए सरकार
बार-बार दवा करती रही की किसने को बका
दिया गया है लेकिन किसान अपनी मांग को

लेकर स्पष्ट थे इन्हें वापस लिया जाए तो
फिर सरकार और नीति आयोग को रिपोर्टर्स
कलेक्टिव की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देने
में डेरी क्यों हो रही है क्योंकि भेद
खुला जाएगा और ये बात फिर से किसने के बीच
पहुंच जाएगी प्रधानमंत्री मोदी को तो फिर

से राष्ट्र के नाम संबोधन करना चाहिए और
बताना चाहिए की किसकी तपस्या थी किसके लिए
थी जिसमें कमी र गई राहुल गांधी ने उसे
वक्त भी कहा था की यह कानून प्रधानमंत्री
के दोस्तों के लिए लाया गया है कॉरपोरेट

दोस्तों के लिए लाया गया है जब कृषि कानून
को लाया गया तब हमने अदानी पूर्व एनडीटीवी
में किसान आंदोलन पर 60 70 एपिसोड से भी
ज्यादा कार्यक्रम किया होंगे हम भी खोज
रहे थे की तीनों कानून अचानक कैसे अवतरित
हुए कभी तो सरकार ने बोला होगा सरकार की

किसी संस्था ने बोला होगा तब हमें अमिताभ
कांत का एक लेख मिला था अमिताभ कांत उसे
समय नीति आयोग के सीईओ थे 11 मैं 2020 को
अमिताभ कांत टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख
लिखने हैं और इसका शीर्षक है अभी नहीं तो

कभी नहीं हमने पहले भी बताया की शरद मरते
का एक बयान है की अभी ही समय है उसे समय
भारत में कोरोना के करण तालाबंदी थी
किताब कंठ लिखने हैं की अभी नहीं तो कभी
नहीं आगे लिखने हैं की सरकार साहसिक सुधार

कर रही है ऐसा मौका फिर कभी नहीं आएगा उसे
कम बड़ा देना चाहिए इसलिए मैं अमिताभ कांत
कृषि क्षेत्र में उन सुधरो की बात करते
हैं जिसे लेकर कुछ दोनों के बाद 5 जून
2020 को सरकार अध्यादेश ले आई है अमिताभ
कांत ने अपने लेख में कॉन्ट्रैक्ट

फार्मिंग से लेकर मंडी से बाहर उपज के
बेचे पर लगी पाबंदियां को हटा देने की
वकालत की थी यानी माहौल बनाया जा रहा था
वह भी अंग्रेजी में आप इन कुड़ियां को
मिलकर देखिए तो पता चलेगा की इन बयानों से
बीच-बीच में टेस्टिंग चल रही थी और पर्दे

के पीछे गंभीरता से उसे पर कम चल रहा था
अगर 2017 में नीति आयोग अगले 3 साल के लिए
एक एक्शन प्लेन लॉन्च करता है जिसके
पांचवें अध्याय में लिखा जाता है की मंडी
से जुड़े एपीएमसी एक्ट में तैयार होने
चाहिए किसने से खरीदने का अधिकार मंडी के

अलावा मंडी के व्यापारियों के अलावा
दूसरों को भी दिया जाए यानी कॉरपोरेट को
मंडी के अलावा एक और मार्केट बनाया जाए
अनिवार्य वास्तु अधिनियम में भी बदलाव हो

और स्टॉक लिमिट हटा दी जाए अब देखिए की
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी रिपोर्ट में
क्या लिखा है और कैसे कड़ियां जुड़नी हैं
लिखा है की इसकी शुरुआत अक्टूबर 2017 में
हुई जब शरद मराठा ने नीति आयोग के
तत्कालीन उपाध्यक्ष राजीव कुमार को एक

पत्र लिखा इस पत्र में भारतीय कृषि में
बदलाव कर उसे लेकर एक उज्जवल और शानदार
भविष्य का खड़ा खींच गया था जलियां ने
अपने रिपोर्ट में नीति आयोग के 16 अक्टूबर
2017 के एक मेमोरेंडम की फोटो भी लगा दी

है जिसमें लिखा गया है की मरते साहब
द्वारा प्राप्त कॉन्सेप्ट नोट पर खास तोर
पर हाय लेवल ग्रुप की मीटिंग में चर्चा की
जानी है मराठी ने ट्रांसपोर्ट के लिए ऐसे
11 लोगों की सूची बनाकर दी और खुद भी
शामिल हो गए एक अन्य नाम जो मरते ने

सुकाया वो था संजय मारिवाला का जो कृषि
उत्पादों से जुड़ी 18 कंपनियां चलते हैं
मरते और मदीवाला ने आगे चलकर एक साथ मिलकर
एक नॉन प्रॉफिट कंपनी भी शुरू की थी
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने दवा किया है तो

अक्टूबर 2017 में शरद मराठी सक्रिय हो गए
थे नवंबर 2018 में अमिताभ कांत नीति आयोग
की एक रिपोर्ट जारी करते हैं और कहते हैं
की न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त कर देना
चाहिए जो संस्था न्यूनतम समर्थन मूल्य ते
करती है कृषि लागत और मूल्य आयोग अंग्रेजी

में कमीशन ऑन एग्रीकल्चर कॉस्ट और
प्राइसेस केसीपी उसे खत्म कर देना चाहिए
नवंबर 2019 में वित्त मंत्री निर्मला
सीतारमण का एक बयान है कृषि बिलों के पेस
होने से चंद महीने पहले देखिए कैसे

टेस्टिंग की जाति है ब्लूमबर्ग प्रिंट के
कार्यक्रम में उन्होंने का दिया की पीएमसी
खत्म कर देनी चाहिए यानी मंडी खत्म कर
देनी चाहिए इसलिए जब सरकार कहे की मंडी

खत्म कर देनी चाहिए तो सभी के कान खड़े हो
जान चाहिए थे मगर सब उसे वक्त सो रहे थे
किसी ने इस बयान को गंभीरता से नहीं लिया
और कृषि कानून सामने ए गया सरकार कहती रही
की किसने ने इसकी मांग की है तब यह कानून

आया किसान पूछते र गए की कौन से किसान ने
आपसे ये मांग की है
की कृषि नीति यानी इतने आ बड़े पापुलेशन
50% देश की आबादी खेती से जुड़ी है उसकी
कृषि नीति बनाने के लिए हमें एक किसी
अमेरिकन का जो सुझाव था उसके ऊपर नीति

आयोग ने एक टास्क फोर्स बनाया और उसे
स्टार भारत का जो रोल था बेसिकली ये था की
कॉरपोरेट्स तो हो गया
टेक्निकल चेक की लेकिन यह नीति आयोग ने एक
टास्क फोर्स का जो गठन किया और वो भी उसे
बिजनेसमैन की रिकमेंडेशन पर किसने कितने

लोग होने चाहिए यह भी उन्होंने सजेस्ट
किया और उसके बाद हमने देखा की भी किस
तरीके से देश की पॉलिसी को देश की कृषि
नीति को नीति आयोग ने अपने हल्के में लेक
एक सोचा की जो एक बिजनेसमैन का आइडिया है

उसको हम क्यों ना प्रमोट करें लेकिन दूसरी
बात ये है की जो देश के अंदर जो हमारे में
लाइन इकोनामी थे वो भी जान अनजाने में ये
नहीं समझ सके की ये एग्री बिजनेस को या ये

कॉरपोरेशन एग्रीकल्चर जो की हो रही है
उसको डेन की कोशिश हो रही है जब वो नहीं
समझ सके तो सबसे अच्छी बात यह है की वो जो
एक्सपर्ट ने समझ सके जो हमारे देश के
कांग्रेस नहीं समझ सके वो हमारे किसान समझ
गए और किसने को जब ये समझ ए गया तो
उन्होंने

20 साल से लंबा जो प्रोटेस्ट किया था
वो बिल्कुल साफ और मां राहत हुआ नजर ए रहा
था की उनका भविष्य जो है वो एक गांव पर ग
जाएगा कॉरपोरेट एग्रीकल्चरल दुनिया में
हमने देखा है कहानी भी

उससे खेती के जो किसान या मजदूर जो उसमें
अवार्ड हैं उनकी कहानी पर भी दुनिया में
इनकम नहीं बधाई है अगर मार्केट से इतना
अच्छी होती या अच्छा होता दुनिया भर में
तो हम ये जानते हैं की जो हमें बताया जाता

है अक्सर की मार्केट से आएंगे तो
एग्रीकल्चर में किसने को फायदा होगा
क्योंकि मार्केट में प्रोवाइड भी राइट किड
ऑफ प्राइस वो दुनिया में कहानी नहीं हो
पाया अगर आज किसान जीवित है डेवलप कंट्रीज
में जो जो हम जानते हैं की जो तीन कर पांच

जो कंट्रीज को हम लेकर चलते हैं एस दी एस
दी प्रॉमिनेंट डेवलपमेंट कंट्रीज वो
कंट्रीज में वो बेसिकली एग्रीकल्चर
सब्सिडीज के ऊपर किसान जो है टीके हुए हैं
किसान वाकई समझ गए कोरोना के बावजूद सड़क
पर ए गए उन्होंने अपने वजूद को बचाने के

लिए कितनी बड़ी लड़ाई लड़ी गोदी मीडिया ने
उन्हें आतंकवादी का दिया किसने ने गोदी
मीडिया को अपने आंदोलन से बाहर कर दिया
अपना अखबार निकाल लिया सरकार ने किसने को
रोकने के लिए बड़े-बड़े बैरिकेड बनाए और
उसके नीचे कीलेंट तोक दी ताकि किसान चलकर

या कूद कर पी बैरिकेड पर ना कर सके एक साल
तक किसने ने हर मौसम और पुलिस की कुर्ता
का सामना करते हुए दिखा दिया की वन कृषि
कानून के लोगों को पहचान गए हैं पीछे नहीं
हटेंगे किसान कहते र गए की उनसे नहीं पूछा

गया एसडीम को ऐसे अधिकार दे दिए गए इन
कानून के तहत के कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की
जमीन को लेकर विवाद हो गया तो कोर्ट का
दखल नहीं होगा इस तरह का कानून बना था इस
आंदोलन के दौरान अलग-अलग मौसमों की मार

सते झेलते हुए 600 से अधिक किसने की मौत
हो गई सरकार ने कहा की उसके पास करने वाले
किसने का कोई आंकड़ा नहीं है जबकि किसान
संगठनों के अनुसार करीब 670 किसने की मौत

हुई फिर भी किसान अपनी मांग को लेकर टीके
रहे लड़ते रहे इस दौरान एक बार भी शरद
मरते सामने नहीं आता है की उसकी सोच थी
उसने टास्क फोर्स का सुझाव दिया उसकी सोच
के हिसाब से खेती का भला होने वाला है

जहीर है तपस्या कॉरपोरेट के लिए की जा रही
थी किसने ने नहीं समझा होता तो
प्रधानमंत्री तीनों कानून वापस नहीं लेते
और उनसे किसने से माफी भी नहीं मांगते
गोदी मीडिया
इन बटन की अब हड़ताल नहीं करता इस तरह से

खोजी पत्रकारिता नहीं करता वरना तभी यह
बात सामने ए जाति भेद खुला जाता जब
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने खोलना का दवा किया
है रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी दूसरी

रिपोर्ट में इन कानून के पीछे गौतम अदानी
के समूह की भूमिका पर भी सवाल उठाएं हैं
दिखाए है की नीति आयोग के टास्क फोर्स के
गठन के पहले अदानी समूह ने आवश्यक वास्तु
अधिनियम में बदलाव की लॉबिंग की थी आपको

याद होगा की किसान आंदोलन के समय अदानी के
सैलो यानी अन्य भंडारो की तस्वीर खूब
वायरल हुआ करती थी किसान आप लगाते थे की
इन्हीं साइलस एन भंडारो को भरने के लिए
आवश्यक वास्तु अधिनियम को बदला गया है और
जमाखोरी की पुरी छठ दी गई है किसान इस बात

से भड़क गए उन्हें दिखे गया की कटाई के
सीजन में बड़े कॉरपोरेट दम गिरा देंगे और
सर अनाज खरीद लेंगे जमाखोरी करेंगे और बाद
में ऊंचे डेमन पर बेचेंगे
मेहनत किसान की मुनाफा कॉरपोरेट का किसने

ने इसीलिए बार-बार कहा की आंदोलन सिर्फ
उनका नहीं लेकिन हर घर जिसमें अनाज
पहुंचता है उनका भी है किसान आंदोलन में
अदानी समूह के खिलाफ खूब नारे लगा करते थे

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने दस्तावेजों की
जांच की है दवा किया है की अदानी समूह ने
अप्रैल 2018 में सरकार के साथ जमावर
जमाखोरी वाले कानून में पाबंदियां को हटाए
जान को लेकर लॉबी की थी उसके 2 साल बाद

पांच जून 2020 को कृषि अध्यादेश ले गए
किसी को पता चला था और बाद में कानून बादल
दिया गया केंद्र सरकार ने राज्यों के
जमाखोरी को नियंत्रण में रखना के इस
अधिकार को खत्म कर दिया केवल केंद्र सरकार

स्टॉक लिमिट अब ते कर शक्ति थी वो भी काल
जैसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में नीति
आयोग के टास्क फोर्स की बैठक में हिस्सा
लेते हुए अदानी समूह के प्रतिनिधि ने कठिन
तोर पर कहा था की जमाखोरी रोकने का कानून

उद्योग जगत और कारोबारी के लिए बड़ा है
रुकावट है श्री गिरीश जलील की रिपोर्ट में
दवा किया गया है की इस मामले में अदानी
समूह की भागीदारी का पहले प्रमाण मिलता है
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अदानी समूह नीति

आयोग को अपने सवाल भेजें हैं जवाब नहीं
आया है इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट आई है
हमारे सामने उसमें यह भी खुलासा हुआ है की
भाई वह चिट्ठी किस कौन सी आई थी जिसमें
नीति आयोग ने एक्ट किया और उसके बाद यह भी
बताया गया की कैसे कॉरपोरेशन ने यह प्रेशर

डाला सरकार के ऊपर की भाई ये जो एक
एसेंशियल कमोडिटी एक्ट के तहत एक प्रोविजन
होता है की स्टॉक होल्डिंग कितनी हो उससे
ज्यादा नाप को स्टॉक कर सके इन सबको हटाने
की बात अदानी ने की थी और उसको सरकार ने

माना और इस के कुछ महीने बाद आपने देखा की
जो तीन लॉस आए थे देश में वो इस तरीके से
फ्रेम किया गए थे की सारे का सर जो
एग्रीकल्चर था वो कॉरपोरेट्स के कंट्रोल

में ए जाता है और यही बात तो थी जो जिसके
खिलाफ किसने ने प्रदर्शन किया और किसने ने
देश को सचेत भी किया और कहानी ना कहानी
मुझे लगता था की हमारे जो इकोनॉमिस्ट बात

को समझेंगे ये बात समझेंगे की इस देश में
जरूरी नहीं है की हमने अमेरिका और यूरोप
से कर्टन पेस्ट करके अपनी पॉलिसीज को लाना
है हम क्यों नहीं अपने देश की रिटायरमेंट
को देखकर एक ऐसा कानून बनाएं या ऐसे और
कानून बनाए जिसमें हम अपने किसने का भला

देखें जिसको प्रधानमंत्री ने हर बार कहा
है की सबका साथ सबका विकास उसका रास्ता
हमारे देश के किसान संपन्न होंगे तो आप
देखिए की कितना डिमांड क्रिएट होगी और जब
डिमांड क्रिएट होगी तो जो इकोनामी की गति
है वो आप जानते हैं की वो दौड़ती है और भी

कॉरपोरेट थे जिनके प्रतिनिधि इस टास्क
फोर्स के हिसाब से थे जिसके अध्यक्ष थे
अशोक डलवाई इनकी अध्यक्षता में किसने की
आमदनी डबल करने के उपाय सुसान के लिए एक
और कमेटी बनी थी जिसने 3000 पन्नों की 14
करो में रिपोर्ट तैयार की आज तक आमदनी डबल

नहीं हुई रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने लिखा है
की डलवाई ने उनके सवालों के जवाब नहीं दिए
अदानी समूह ने अपनी जमीन पर किसने के लिए
शेष बनाने के सुझाव दिए थे जिसका 60%

सरकार को उठाना था रिपोर्टर्स कलेक्टिव की
रिपोर्ट में एक आंकड़ा दिया गया है
2014 से 18 के बीच
13000 किसान आंदोलन हुए थे 13000 न्यूनतम
समर्थन मूल्य की मांग को लेकर मगर यहां तो
इस पर हमला कर दिया गया ऐसा लगता है की
किसने के आंदोलन के जज्बे से छुटकारा अपने

का रास्ता निकाला जा रहा था तो यह सब खेल
चल रहा था अब आते हैं आदरणीय समूह से
जुड़ी बाकी खबरे पर जो पिछले हफ्ते से चल
रही हैं खबर यह है की ऑडिट करने वाली

कंपनी डेलोइट ने अदानी पोर्ट्स और स्पेशल
इकोनामिक जॉन के खातों पर गंभीर सवाल खड़े
कर दिए हैं जिसके बाद डेलोइट ने अदानी
समूह से अलग होने का फैसला कर लिया बिजनेस
स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में लिखा है की

डेलोइट हॉकिंस और सेल्स ने वित्त वर्ष
2022 23 की चौथी तिमाही और पूरे वित्त
वर्ष के ऑडिट के बड़े में अपनी रिपोर्ट
में तीन इकाइयों के साथ साड को रेखांकित
किया है इसके बड़े में कंपनी का कहना है

की इन इकाइयों का अदानी समूह की कंपनियां
से कोई देना नहीं है ऑडिटर ने कहा है की
वह कंपनी के बयान को सत्यापित नहीं कर
शक्ति क्योंकि इसके सत्यापन को लेकर कोई
स्वतंत्र जांच नहीं हुई है अमेरिकी फर्म

हिडेनबर्ग रिसर्च ने 24 जनवरी को अपने
रिपोर्ट में आदरणीय समूह पर धोखाधड़ी
शेरों में हीरा फेरी और धन शोध के आप
लगाएं थे हालांकि अदानी समूह ने सभी आरोपी

से इनकार किया था और कहा था की ये सब
आधारहीन हैं डेलोइट ने कहा है की अदानी
समूह ने अपने आकलन और भारतीय प्रतिभूति
विनिमय बोर्ड सेबी द्वारा चल रही जांच के
करण इन आरोपी की स्वतंत्र रूप से बाहरी

जांच करना आवश्यक नहीं समझा हिंडौन बर की
रिपोर्ट के बाद अदानी समूह को लेकर कई
गंभीर सवाल थे सेबी इसकी जांच कर रही है
14 अगस्त को सेबी ने जांच पुरी करने और

अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए
सुप्रीम कोर्ट से 15 दिन का और समय मांगा
है
गोदी मीडिया के दूर में इस तरह की खबरे पर
पर्दा दाल दिया जाता है जिसके उठ जान से
सरकार का खेल उजागर हो सकता है और उन खबरे
में आज लगा दी जाति है जिनके जलने से शोर

मत जाता है और जनता इस में उलझकर र जाति
है की आपको पता है की सीएजी की रिपोर्ट है

की आयुष्मान योजना के तहत जो लोग पहले से
अमृत घोषित हो चुके थे उनके इलाज पर भी छह
करोड़ 90 लाख खर्च हुए हैं ये मध्य प्रदेश
का आंकड़ा है ना जान पूरे देश से इस योजना
के तहत क्या-क्या निकाल आएगा जो मीडिया

सीएजी की रिपोर्ट पर रिपोर्ट नहीं कर सकता
है उसके बहाने शहर शहर जाकर आयुष्मान
योजना का हाल नहीं लेट है एन जान कहां से
क्या निकाल आए वो मीडिया अदानी समूह के
लिए एक बड़ा कानून बनाया गया बादल दिया

गया उसे पर तो चुप ही रहेगा लेकिन आप
क्यों चुप हैं लोग तो बोल रहे हैं नमस्कार

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