किसानों पर अश्रु गैस, MSP पर सरकार के दावे | Farmer's continue march towards Delhi - instathreads

किसानों पर अश्रु गैस, MSP पर सरकार के दावे | Farmer’s continue march towards Delhi

नमस्कार   यह भारत के किसान
हैं क्रिमिनल नहीं है सम्मान और पुरस्कार
देकर सत्ता खरीद लेने के इस दौर में यह
आवाज उनकी तरफ से आई है जिनके पिता एम एस
स्वामीनाथन को भारत रत्न दिया गया है

चौधरी चरण सिंह को भी भारत रत्न दिया गया
है मगर उनके पोते जयंत चौधरी अपने दादा की
विरासत समझ नहीं सके एमएस स्वामीनाथन की
बेटी मधुरा स्वामीनाथन ने अपने पिता के
काम और सम्मान का फर्ज अदा कर दिया मधुरा

स्वामीनाथन एमएस स्वामीनाथन रिसर्च
फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं अर्थशास्त्र के
एक्सपर्ट हैं और कृषि पर कई साल से काम कर
रही हैं मधुरा स्वामीनाथन ने उस सभा में
यह बात कह दी जो भारत रत्न के जश्न के लिए
बुलाई गई

थी भारत भर के वैज्ञानिकों के बीच मधुरा
स्वामीनाथन ने कह दिया कि यह भारत के
किसान हैं क्रिमिनल नहीं हैं उन्होंने कहा
कि अखबारों में खबरें छपी हैं कि किसानों
के लिए जेल बनाए जा रहे हैं बैरिकेड लगाए

जा रहे हैं उन्हें रोकने के लिए सारा कुछ
किया जा रहा है यह किसान है अपराधी नहीं
है मैं भारत के वैज्ञानिकों से अपील करती
हूं कि आप अन्नदाता से बात करें हम उनके
साथ क्रिमिनल की तरफ बर्ताव नहीं कर सकते
हमें समाधान निकालना है यह मेरी आपसे

गुजारिश है अगर हमें एम एस स्वामीनाथन का
सम्मान करना है तो हमें अपने साथ किसानों
को लेकर चलना
होगा द फार्मर्स ऑफ पंजाब टुडे आ मार्चिंग
टू
दिल्ली आई बिलीव अकॉर्डिंग टू द न्यूजपेपर

रिपोर्ट्स
देर आर जेल्स बीइंग प्रिपर फॉर देम इन
हरियाना देर आर बैरिकेड देर आर ल काइंड ऑ
थिंग्स बीइंग डन टू
प्रिवेंट आर फार्मर्स दे आर नॉट
क्रिमिनल आई रिक्वेस्ट ल ऑफ यू द लीडिंग
साइंटिस्ट ऑफ
इंडिया टक टू अ वी कैनन ट्रीट देम

क्रिमिनल वी हैव टू फाइंड
सलूशन प्लीज दिस इ माय रिक्वेस्ट आई थिंक
इफ वी हैव टू
कंटिन्यू एंड ऑनर एमस
स्वामीनाथन वी हैव टू टेक द फार्मर्स विथ
अस इन वट एवर स्ट्रेटेजी ट वी आर प्लानिंग
फॉर द फ्यूचर थैंक

यू मधुरा स्वामीनाथन ने इतना भर कहकर ना
सिर्फ अपने पिता को दिए जा रहे भारत रत्न
का सम्मान बढ़ाया है बल्कि उन किसानों के
जख्म पर मरहम भी लगाया है जो एमएस
स्वामीनाथन के सुझाए फार्मूले के साथ

एमएसपी की मांग कर रहे हैं और एमएसपी की
गारंटी की मांग कर रहे हैं किसानों के साथ
अपराधी की तरह हो रहे सलूक की बात उठाकर
एमएस स्वामीनाथन की बेटी ने पुरस्कारों और
सम्मान के साथ जमीन खरीद लिए जाने के

रिवाज को तोड़ दिया है जयंत चौधरी से इस
की उम्मीद नहीं करनी चाहिए भारत रत्न देकर
प्रधानमंत्री ने उनका दिल ही जीत लिया
क्या जयंत चौधरी बीजेपी के साथ जाते ही

किसानों के मुद्दों को भी छोड़ देंगे क्या
जयंत ने जनता की राजनीति छोड़ दी क्या
उन्हें नहीं दिख रहा कि किसानों के साथ
क्या हो रहा है ड्रोन से आंसू गैस के गोले

छोड़े जा रहे हैं इसकी निंदा तो कर सकते
थे क्या एनडीए के साथ जाते ही एमएसपी की
मांग अब खराब हो गई कर्ज माफी की मांग अब
बेकार हो गई अगर एमएस स्वामी नाथन और
चौधरी चरण सिंह के काम में उनके काम के

पीछे किसान नहीं होते तो भारत रत्न का
क्या मोल रह जाता शायद यही वजह रही होगी
कि एमएस स्वामीनाथन की बेटी मधुरा
स्वामीनाथन ने अपने पिता के काम का फर्ज
अदा कर दिया ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री
ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर जयंत

चौधरी पर कर्ज लात दिया है इस कर्ज से
माफी का एक ही रास्ता है कि जयंत चौधरी भी
मधुरा स्वामीनाथन की तरह भारत रत्न
स्वीकार करें मगर किसानों के साथ हो रही
जाति के खिलाफ बोले भी लेकिन बोलना अब
उनके बस की बात नहीं वे भारत रत्न के लिए

अपनी राजनीति सजाने में लगे हुए हैं
संयुक्त किसान मोर्चा इस बार अलग है फिर
भी उसका बयान है कि किसानों के साथ ऐसा
व्यवहार नहीं होना चाहिए 16 फरवरी को
संयुक्त किसान मोर्चा का प्रदर्शन है
मधुरा स्वामीनाथन के इस बयान के बाद क्या
प्रधानमंत्री मोदी एमएस स्वामीनाथन की

बेटियों मधुरा स्वामीनाथन सौम्या
स्वामीनाथन के साथ बुलाकर परिवार के साथ
तस्वीर खिंचा चाहेंगे मधुरा स्वामीनाथन के
उस बयान का वे कैसे सामना करेंगे कि यह
किसान है क्रिमिनल नहीं है विदेश यात्रा

पर निकलने से पहले प्रधानमंत्री ने एक
तस्वीर ट्वीट की इस तस्वीर में कपूरी
ठाकुर के परिवार की आज की पीढ़ी के
सदस्यों को बुलाया गया है ऐसा तो नहीं कि
अब मधुरा स्वामीनाथन से बचने के लिए

स्वामीनाथन के परिवार को बुलाया ना जाए
मथुरा स्वामीनाथन ने बयान देकर
प्रधानमंत्री को मुश्किल में डाला है
सम्मान के वक्त उनकी मौजूदगी किसानों की
गरिमा बढ़ा रही होगी कि कोई तो है जिसने

सम्मान के बदले किसानों का सौदा नहीं किया
सत्ता का सौदा नहीं किया जब चौधरी चरण
सिंह और एमएस स्वामीनाथन को सम्मान मिला
तब अखबारों में कुछ लेख आए जिसमें बताया
गया कि प्रधानमंत्री ने भारत रत्न देकर

चार प्रकार के एम साध लिए मार्केट मंदिर
मंडल और मंडी लेकिन चार दिनों के भीतर
उन्हीं मंडियों में जाने वाले किसान सड़क
पर आ गए और मंडी में जो फसल बिकेगी उसकी

कीमत की गारंटी मांगने लगे और कीमत क्या
हो कहने लगे कि एमएस स्वामीनाथन के
फार्मूले के आधार पर तय हो साफ है कि
किसानों में इतनी समझ तो है कि वे फर्क कर
पा रहे हैं कि सम्मान किसे मिला है और

उनकी समस्या का समाधान क्या है उनकी
समस्या का समाधान भारत रत्न नहीं है
अखबारों में तरह-तरह के स्लोगन गढ़ दिए
जाते हैं लेकिन किसानों का यह आंदोलन बता
रहा है कि किसान नेताओं और किसानों के लिए

काम करने वाले वैज्ञानिकों का सम्मान केवल
भारत रत्न नहीं है उनकी चिंताओं का समाधान
भी है उनके बताए रास्ते पर चलने का भी है
जम्मूकश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल

मलिक ने कहा है कि अगर चौधरी चरण सिंह
जिंदा होते तो वे भारत रत्न सम्मान
स्वीकार नहीं
करते मधुरा स्वामीनाथन ने किसानों के साथ
हो रहे जुल्म की बात कर एक बड़ी लकीर खींच
दी है कम से कम सम्मान से किसी को भी खरीद
लेने का भरम चुप करा देने का भरम उन्होंने

तोड़ दिया मधुरा स्वामीनाथन ने अपने पिता
का एक पुराना बयान भी ट्वीट किया है यह
बयान उस वक्त का है जब प्रधानमंत्री ने
तीन कृषि कानूनों को वापस लिया इस बयान
में स्वामीनाथन ने कृषि कानून वापस लिए

जाने पर खुशी जताई थी यानी उन्हें अच्छी
तरह मालूम था कि यह कानून किसानों की भलाई
के लिए नहीं है 19 नवंबर 2021 का ही यह
बयान है जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने कृषि कानून वापस लिए जाने का ऐलान
किया स्वामीनाथन ने लिखा है कि खेती में

संपूर्ण लागत के ऊपर 50 फीदी जोड़कर ही
न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जा सकता है
स्वामीनाथन ने अपने बयान में लिखा है कि
राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट का मूल
भी यही है भारतीय किसान आयोग मनमोहन सिंह
की सरकार के समय बना था जिसके अध्यक्ष एम

एस स्वामीनाथन थे 2004 से 6 के बीच इस
आयोग की तरफ से पांच रिपोर्ट टाई
स्वामीनाथन का कहना है कि अगर खेती का
भविष्य सुधारना है तो हमें उत्पादन खरीद

और कीमतों के मोर्चे पर ध्यान देना होगा
तीनों पर एक साथ ध्यान देना होगा किसान
इसी फार्मूले के तहत एमएसपी और एमएसपी दिए
जाने की गारंटी की मांग कर रहे हैं बहुत
से अर्थशास्त्री स्वामीनाथन के इस

फार्मूले से सहमत नहीं वे हमेशा एमएसपी
छोड़कर दाएं बाएं की बात करते रहे हैं कि
किसानों को अलग से पैसे दिए जाएं जैसे
प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के तहत

000 दिए जाते हैं लेकिन क्या यह पैसा
किसानों की जो लागत होती है प्रति एकड़ के
हिसाब से उसकी भरपाई कर सकता है जाहिर है
नहीं कर सकता है किसानों का भला तभी होगा
जब उनके हाथ में उपज की लागत के बदले उससे
ज्यादा सही दाम मिले और उपज की खरीद

सुनिश्चित की जाए मनमोहन सिंह की सरकार
स्वामीनाथन आयोग के अनुसार एमएसपी नहीं दे
पाई 10 साल से नरेंद्र मोदी केंद्र में है
कई बड़े फैसले लेने का दावा करते हैं उनकी
सरकार में दर्जनों सहयोगी दलों के दबाव का

झंझट भी नहीं है फिर नरेंद्र मोदी
स्वामीनाथन आयोग के फैसले के अनुसार
एमएसपी क्यों नहीं दे सके क्यों नहीं दे
पा रहे हैं 2010 में उपभोक्ता मामलों पर
एक वर्किंग ग्रुप का गठन हुआ था जिसकी

अध्यक्षता उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री
नरेंद्र मोदी कर कर रहे थे इस ग्रुप ने
अपनी रिपोर्ट 2011 में प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह को सौंपी रिपोर्ट में कहा गया

कि एमएसपी को लागू किया जाना चाहिए सभी
आवश्यक वस्तुओं के संबंध में कानूनी
प्रावधान तैयार किए जाएं कि जहां भी यह तय
कर दिया गया है वहां एमएसपी से नीचे किसान
से कोई लेनदेन ना हो या एक तरह से गारंटी

ही है नवंबर 2021 में कहा गया कि एमएसपी
के लिए कमेटी बनेगी आज भी यही कहा जा रहा
है कि कमेटी बनेगी प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी जिस कमेटी के अध्यक्ष थे 2010 में
उसकी रिपोर्ट में गारंटी की बात है तब
2023 में 2020 में 21 में 22 में 24 में

गारंटी क्यों नहीं दी जा रही है नवंबर
2021 में उन्होंने कमेटी बनाने की बात कही
1819 महीनों में सरकार फैसले पर क्यों
नहीं पहुंची अगर उसे एमएस स्वामीनाथन को
भारत रत्न देना अच्छा लगता है सही लगता है

जरूरी लगता है तो उनके फार्मूले के अनुसार
एमएसपी देने में दिक्कत क्या है गारंटी की
मांग क्या मनमोहन सिंह के समय थी यह मांग
कहां से आई जब कृषि कानून लाए गए अध्यादेश
के जरिए तब किसानों को शक हुआ कि मंडियां

खत्म की जा रही है मंडी खत्म होगी तो
एमएसपी खत्म हो जाएगी इस कारण से एमएसपी
की गारंटी की मांग पहले नंबर पर आ जाती है
नवंबर 2020 में जब किसान दिल्ली आए तब से

एमएसपी की गारंटी की मांग प्रमुख रूप से
मुखर होती है अब राहुल गांधी ने कहा है कि
अगर उनकी सरकार आई तो एमएसपी की गारंटी
देगी अतीत में कांग्रेस ने स्वामीनाथन
फार्मूले के हिसाब से एमएसपी नहीं दी ना
गारंटी दी अब देने की बात कर रही है

स्वामीनाथन जी
को बीजेपी की सरकार
ने भारत रत्न
दिया मगर जिस चीज के लिए स्वामीनाथन जी ने
अपनी जिंदगी
दी हिंदुस्तान के किसानों के लिए जो
उन्होने मेहनत

की जो स्वामीनाथन जी ने
कहा उसको करने के लिए तैयार नहीं है इसका
क्या मतलब
है स्वामीनाथन जी ने अपनी रिपोर्ट में साफ
कहा
है कि किसानों
को

लीगल
राइट एमएस की एमएसपी की मिलनी
चाहिए वह बीजेपी की सरकार नहीं कर
रही तो मैं आपको यहां जो खरगे जी ने कहा
उसको दोहराना चाहता
हूं कि इंडिया की सरकार आएगी

तो हम एमएसपी की गारंटी हिंदुस्तान के
किसानों को देंगे जो स्वामीनाथन रिपोर्ट
में लिखा है वो हम पूरा करके आपको दे
देंगे जून 2016 में जब एमएसपी की घोषणा की
गई तब भी सवाल उठे कि स्वामीनाथन कमेटी के

फार्मूले के हिसाब से नहीं दिए गए सरकार
ने एमएसपी बढ़ाई थी लेकिन आलोचना इस बात
को लेकर होने लगी कि स्वामीनाथन कमेटी के
अनुसार होनी चाहिए अगर उस फार्मूले का
पालन किया गया होता एमएसपी और अधिक हो
जाती जिससे किसानों का फायदा हुआ होता

किसान जब भी आंदोलन करते हैं लोग लेक्चर
देने आ जाते हैं कि खुले बाजार में जो दाम
तय हो उसी के आधार पर आप खरीद बिक्री
कीजिए यह बहुत ही फ्रॉड तर्क है सभी को

पता है कि उपज के दाम को लेकर बड़ी-बड़ी
कंपनियां क्या करती हैं पहले एकाधिकार
बनाती हैं फिर दाम गिरा देती हैं और यहां
से लेकर अमेरिका का किसान गरीब होने लग
जाता है ऐसे तर्क देने वाले लोगों से
सावधान रहें उनकी बातों को गौर से सुने

अपने तर्कों का भी इस्तेमाल करें जब प्याज
के दाम बढ़ते हैं तब निर्यात पर क्यों रोक
लगाई जाती है क्या तब किसान को नुकसान
नहीं होता है यह किसके फायदे के लिए होता
है क्या यह राजनीतिक फैसला नहीं सवाल है

कि 2 साल में एमएसपी को लेकर केंद्र सरकार
ने क्या किया जिस समय किसान एमएसपी की
मांग कर रहे थे और कर रहे हैं उसकी गारंटी
की मांग कर रहे हैं उसी समय उनसे बात करने
गए चंडीगढ़ गए मंत्री पीयूष गोयल एमएसपी
के पोस्टर ट्वीट कर देते हैं अब आप इन

पोस्टरों को ध्यान से देखिए इसमें दावा
किया गया है कि मसूर गेहूं जौ और चना की
एमएसपी यूपीए के कार्यकाल से ज्यादा हो गई
है कोई भी इन पोस्टरों को देखकर यही
समझेगा कि एनडीए ने ज्यादा दाम दिया एक

चीज आपको समझनी चाहिए किसान यह नहीं जानना
चाहते कि यूपीए की तुलना में एनडीए में
कितना मिल रहा है बल्कि यह जानना चाहते
हैं कि एमएस स्वामीनाथन कमेटी के फार्मूले
के हिसाब से मिल रहा है या नहीं पियूष

गोयल के इस पोस्टर में इसकी जानकारी नहीं
है कि एमएसपी तय करने का आधार क्या है तब
भी हम चाहते हैं कि आप इन पोस्टरों के
नीचे वाले हिस्से को देखिए अब यहां पर
यूपीए के 4 साल के बीच कितने दाम बढ़े

एमएसपी बढ़ी इसकी जानकारी दी गई है 2010
11 से 201314 के बीच की अगर आप यूपीए के 4
साल ले रहे हैं तो एनडीए के भी 4 साल लेने
चाहिए लेकिन यहां तो यूपीए के 4 साल की
तुलना एनडीए के 10 साल से की जा रही है अब

हम गेहूं का उदाहरण लेना चाहते हैं इसमें
लिखा है कि 2010 11 में गेहूं की एमएसपी
11120 प्रति क्विंटल थी 201314 में बढ़कर
00 हो गई यानी 4 साल में ₹ बढ़ती है साथ
में यह बताया गया है कि इस समय गेहूं की

एमएसपी
2275 प्रति क्विंटल है इससे पता चलता है
कि यूपीए के 1400 से बढ़ाकर एमएसपी 2275
प्रति क्विंटल एनडीए के समय कर दी गई तब
फिर आपको देखना चाहिए कि यूपीए के 10 साल
में कितनी वृद्धि हुई 20034 में गेहूं की
एमएसपी ₹10 थी 201314 में ₹1 400 प्रति

क्विंटल हो गई 10 साल में यूपीए के दौरान
गेहूं की एमएएसपी 122 प्र बढ़ती है दुगने
से भी अधिक जबकि एनडीए के 10 साल में
गेहूं की एमएसपी 1400 प्रति क्विंटल से

बढ़कर ₹ 275 प्रति क्विंटल हो जाती है
यानी 63 प्र की वृद्धि होती है तो आपने
देखा कि गेहूं की एमएसपी यूपीए के समय 122
प्र बढ़ती है और एनडीए के समय 63 प्र
कांग्रेस भी अपनी तरफ से अक्टूबर 2023 में

यही बात कह चुकी है कि मनमोहन सिंह के
कार्यकाल के दौरान गेहूं पर एमएसपी 119
प्र बढ़ी और मोदी कार्यकाल में 57 प्र
क्या टीवी चैनलों और अखबारों ने आप तक यह
खबरें पहुंचाई क्या इसलिए पीयूष गोयल ने

इस पोस्टर में एनडीए के 10 साल के सामने
यूपीए के 10 साल का आंकड़ा नहीं लिया ताकि
यह किसी को ना दिखे कि यूपीए के 10 साल
में गेहूं की एमएएसपी में दुगने से ज्यादा
की वृद्धि हुई जो कि एनडीए के मुकाबले की

वृद्धि से कहीं ज्यादा है एक और बात है
मोदी सरकार के मंत्री ने जिन पोस्टरों को
जारी किया है एमएसपी के बढ़ने का दावा
किया है उनसे यह नहीं पता पता चलता कि
लागत में कितनी वृद्धि हुई यानी यूपीए के
समय बीज और डीजल के दाम कितने बढ़े और

एनडीए के समय कितने बढ़े हमें देखना चाहिए
कि इस आधार पर यूपीए में ज्यादा एमएसपी
बढ़ी या एनडीए में बढ़ी जैसे यूपीए के समय
सितंबर 2013 में डीजल ₹1 प्रति लीटर था

एनडीए के समय में लंबे समय से डीजल 90
लीटर के आसपास है 10 साल पहले गेहूं के
बीज का सरकारी रेट 1800 से 21
प्रति क्विंटल था आज 00 प्रति क्विंटल है
बिजली का बिल भी बढ़ा है अन्य उपकरणों के

दाम बढ़े हैं उर्वर को कीटनाशकों दवाओं के
दाम भी बढ़े हैं तो जिस तरह से लागत बढ़ी
हैं क्या उसके अनुपात में एनडीए में फसलों
की एमएसपी बढ़ी है अगर एमएसपी लागत से
ज्यादा मिल रही होती तो किसानों की आर्थिक
हालत इतनी खराब क्यों होती कल शाम से

सरकार की ओर से बेहद भ्रमित करने वाला और
पूरा झूठ फैलाया जा रहा है और हमेशा की
तरह से मीडिया के बहुत सारे साथी जो सरकार
के इशारों पर कुछ भी करने को तैयार है
इसको खूब हवा दे रहे हैं और इसको चीख चीख

कर टीवी चैनलों पर बोल रहे हैं बोला जा
रहा है कि अगर एमएसपी का कानून आ गया तो
11 लाख करोड़ की आवश्यकता पड़ेगी बिल्कुल
नहीं यह पूरी तरह से असत्य है और जब राहुल
गांधी जी ने इसका ऐलान किया तो सोच समझ कर

किया समझिए कि ये झूठ क्यों फैलाया जा रहा
है और ये झूठ क्यों है ये झूठ इसलिए है
क्योंकि जो एग्रीकल्चर मार्केट है हमारा
वो इंपरफेक्ट है वो एसिमिट्रिकल होता है
मार्केट के फोर्सेस में स्टेबलाइजेशन लाने

के लिए मार्केट में मूल्यों में स्थिरता
लाने के लिए हस्तक्षेप जरूरी होता है और
वही हस्तक्षेप एमएसपी करता है एमएसपी
न्यूनतम समर्थन मूल्य है मतलब कोई भी खरीद
इसके नीचे नहीं हो सकती इसके ऊपर ही होगी

पहली बात सरकार पूरा पैदा किया हुआ अनाज
तो खरीदती नहीं है थोड़ा उसका अंशी खरीदती
है अपने बफर स्टॉक के लिए लेकिन एमएसपी
सुनिश्चित करता है कि बाजार का जो मूल्य
है वो एमएसपी के ऊपर हो वो न्यूनतम समर्थन

मूल्य के ऊपर हो इससे किसान की सुरक्षा
होती है अगर बहुत ज्यादा उपज हो गई और
एकदम से दाम गिर गया तो एमएसपी ये
सुरक्षित करता है कि बाजार के फोर्सेस
उसको कम दाम पे खरीद कर स्टॉक ना कर ले और

फिर बाजार में बेचकर बड़ा मुनाफा ना कमाए
सुनिश्चित करता है कि एमएसपी के चलते
किसानों की सुरक्षा होती रहे तो एमएसपी एक
फ्लोर प्राइस सुनिश्चित करता है इसका एक
छोटा सा उदाहरण ये है कि 2005 से 2011 के

बीच में मनरेगा में जो राशि यूज होती थी
इस्तेमाल होती थी उसमें भारी गिरावट आई
ऐसा क्यों हुआ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि
मनरेगा ने रूरल क्षेत्रों में ग्रामीण
क्षेत्रों में एक फ्लोर प्राइस दिया

मजदूरी का और उसके बाद जो सेमी स्किल्ड और
अनस्किल्ड लेबर था उसने अलग-अलग तरीके के
काम किए वहां पर और उसमें ज्यादा मजदूरी
मिली क्योंकि मनरेगा ने एक फ्लोर प्राइस
एक न्यूनतम प्राइस तय कर दिया था तो

एमएसपी इसी तरह से एक हस्तक्षेप का टूल है
हस्तक्षेप का कारण है जिससे कि प्राइसेस
में स्थिरता आ सके जिससे कि किसान भारी
नुकसान से अपनी फसल ना बेचे और उसका बहुत
बड़ा नुकसान ना हो तो असलियत यह है कि

सरकार के इशारों पर
whatsapp2 लाख करोड़ की ऋण माफी हो रही थी
सूट बूट वालों की तब च चिंता नहीं जताई जब
45 लाख करोड़ कॉर्पोरेट टैक्स को 32 प्र
से घटा के 22 प्र में किया गया और राजकोष
को घाटा हुआ तब चिंता नहीं जताई किसानों

की बात पर सरकार के भ्रम और झूठ को फैलाने
के बजाय थोड़ी सी विवेक और थोड़ी सी
बुद्धि का खुद भी इस्तेमाल
कीजिए न्यू इंडियन एक्सप्रेस में जितेंद्र
चौबे की रिपोर्ट छपी है इसमें बताया गया

है कि पिछले न साल से कृषि क्षेत्र से
जुड़े निर्यात में गिरावट आई है इस कारण
किसानों की आमदनी पर भी असर पड़ा है
202021 में कृषि निर्यात का ग्रोथ रेट 17
प्र था जो 20222 में घटकर 6 प्र हो गया 17

से 6 प्र पर आने का मतलब है कृषि निर्यात
में कितनी तेजी से गिरावट आई है
आत्मनिर्भर भारत की बात होती है मगर पहले
जहां 102 देशों से ताजे फलों का आयात होता
था अब 112 देशों से हो रहा है आए दिन

रिपोर्ट छपती रहती है कि गांव में मांग
नहीं है ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी घटती
जा रही है लोगों के पास पैसे नहीं अगर
किसानों के हाथ में पैसे होते तो जाहिर है

ऐसी स्थिति नहीं
होती सरकार चाहे जितने पोस्टर बना ले
सच्चाई यही है कि गांव की हालत अच्छी नहीं
है इसका मतलब यह नहीं कि गांव में बीजेपी

का राजनीतिक समर्थन घटा है ऐसा भी नहीं है
इन्हीं ग्रामीण वर्ग में उसका राजनीतिक
समर्थन बढ़ा है और बरकरार है लेकिन यह

खेती में आमदनी के बढ़ने दोगुनी होने से
नहीं हुआ बीजेपी जानती है कि जब मतदान
होगा तब इन बातों से जुड़े मुद्दे हवा हो
जाएंगे अगर किसानों के मुद्दों के कारण
राजनीतिक नुकसान जरा भी होता तो टीवी पर

कहां मंदिर बना है कहां पर मंदिर बनने
वाला है कहां मंदिर बनना चाहिए इस पर
डिबेट नहीं हो रहा होता इन सबके बाद भी
किसान बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे हैं

आप इसे भी नजरअंदाज नहीं कर सकते चारों
तरफ से रास्तों को बंद कर यह नहीं कहा जा
सकता कि आंदोलन को किसानों का व्यापक
समर्थन नहीं है जिस तरह से लोगों को

आंदोलन में आने से रोका जा रहा है उससे
कभी इसकी व्यापकता का पता नहीं चलेगा
सरकार भले आंदोलनों को तोड़ दे लेकिन
मांगे ना माने जाने के कारण कहीं के भी
किसानों की कमर टूटती रहेगी किसानों को

गरीब कौन रखना चाहता है वही जिस की नजर
उनकी जमीन पर है जमीन बिकेगी तो कौन
खरीदेगा वही जो ट्रैफिक जाम में फंसने के
नाम पर किसानों को गाली दे रहा है मूल बात

वही है जो मधुरा स्वामीनाथन ने कहा है यह
किसान है क्रिमिनल नहीं है और यही याद
रखने की जरूरत है नमस्कार मैं रवीश कुमार

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