कैसे एक गलती की वजह से लाहौर भारत से छिन गया ? | How India Lost Lahore To Pakistan? - instathreads

कैसे एक गलती की वजह से लाहौर भारत से छिन गया ? | How India Lost Lahore To Pakistan?

पंजाबी भाषा में एक कहावत कही जाती है कि
जिनने लाहौर नहीं व्याख्या वो जन्म आई
नहीं यानी जिसने लाहौर नहीं देखा वह पैदा
ही नहीं हुआ पुराने जमाने से ही लाहौर शहर
को हिंदुस्तान का दरवाजा कहा जाता है

क्योंकि मिडिल एशिया और अरब से आने वाले
यात्रियों के लिए लाहौर एक बहुत ही
इंपॉर्टेंट सिटी हुआ करती थी और बताया
जाता है कि दिल्ली तक पहुंचने के लिए
लाहौर से ही गुजरना होता था लेकिन बंटवारे

के बाद लाहौर पाकिस्तान के हिस्से में चला
गया और आज तक यह बात कही जाती है कि लाहौर
की ज्यादातर आबादी सिख और हिंदू ही थी इस
लिहाज से यह शहर हिंदुस्तान के हिस्से में
आना चाहिए था ना कि पाकिस्तान के तो आज
अपनी इस वीडियो में हम इसी दावे की पड़ताल

करने जा रहे हैं कि कैसे लाहौर पाकिस्तान
के पास गया जानना चाहते हैं और चलिए हमारे
साथ
लाहौर दोस्तों यह है पाकिस्तान का लाहौर
जहां की ऐतिहासिक और पुरानी हवेलियां आज

भी पार्टीशन का दर्द अपने अंदर समेटे हुए
हैं 2017 के आंकड़ों के अनुसार आज यहां पर
94.7 पर आबादी मुस्लिम की है तो वहीं महज
0.2 पर आबादी हिंदुओं की जो ना के बराबर
ही है लाहौर को पाकिस्तान का दिल कहा जाता

है और कहा भी क्यों ना जाए पाकिस्तान की
रेवेन्यू का 11.5 पर हिस्सा अकेले लाहौर
से जो आता है इसके अलावा यह प्रोविंशियल
इकॉनमी में भी 19 पर का योगदान देता है
लाहौर पाकिस्तान का एक इंपॉर्टेंट हिस्सा
है लेकिन ऐसा कहा जाता है कि पार्टीशन के

वक्त लाहौर पाकिस्तान का नहीं बल्कि
हिंदुस्तान का हिस्सा होने वाला था भारत
ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में रहने वाले
कुछ लोगों का भी यही मानना है लेकिन आखिर
में ऐसा नहीं हो पाया अब इन लोगों की
बातें सुनकर बार-बार दिमाग में एक ही सवाल

आ रहा है कि आखिर लोगों को ऐसा क्यों लगता
था कि लाहौर पाकिस्तान के नहीं बल्कि भारत
के हिस्से में जाना चाहिए था और बाद में
ऐसा क्या हुआ कि लाहौर को पाकिस्तान का
हिस्सा बना दिया गया अब इसको जानने के लिए
हमें जाना पड़ेगा दोस्तों इतिहास में पूरे

76 साल पीछे शुड लाहौर हैव बीन अ पार्ट ऑफ
इंडिया देखिए बड़े बूढ़े बताते हैं कि
लाहौर को भारत का हिस्सा मानने के पीछे कई
वचना थी दरअसल उस वक्त रिलीजन के बेसिस पर

शहरों का बंटवारा हुआ था जिस शहर में
मुस्लिमों की पॉपुलेशन ज्यादा थी वो
पाकिस्तान के हिस्से चला गया और जिस शहर
में हिंदुओं की पॉपुलेशन ज्यादा थी वो
हिंदुस्तान के हिस्से में आ गई था लेकिन

इसके साथ ही इसमें कई और फैक्टर्स भी
शामिल थे समुदाय की पॉपुलेशन के अलावा यह
भी देखा जा रहा था कि प्रॉपर्टी ओनरशिप
किस रिलीजन के पास ज्यादा है बता दें कि
1941 के पॉपुलेशन सेंसस के अनुसार लाहौर

में 40 फीसद नॉन मुस्लिम लोग रहते थे वहीं
80 पर प्रॉपर्टी ओनरशिप भी नॉन मुस्लिम्स
के पास थी इस वजह से लाहौर की इकॉनमी में
गैर मुस्लिम का बहुत ज्यादा प्रभाव था यह
सबसे मेन कारण था कि जिसकी वजह से लग रहा
था कि लाहौर भारत का हिस्सा हो स सकता है
इसके साथ ही लाहौर में नॉन मुस्लिम का

अधिकार बिल्डिंग्स मॉन्यूमेंट्स बिजनेस
इंस्टीट्यूशंस और हॉस्पिटल पर भी बहुत
ज्यादा था जैसे एग्जांपल के तौर पर ले
लीजिए कि वहां का श्री गंगाराम हॉस्पिटल
गुलाब देवी हॉस्पिटल जानकी देवी हॉस्पिटल

दयाल सिंह कॉलेज जैसे हॉस्पिटल थे जो सिख
और हिंदू ही चलाते थे इसके अलावा यह
महाराजा रणजीत सिंह की रियासत की कैपिटल
भी थी वहीं तब के लाहौर को और बेहतर समझने
के लिए चलिए सबसे पहले आपको यहां की
सांस्कृतिक विरासन के बारे में बता देते

हैं देखिए आर्य समाज मंदिर महादेव मंदिर
शीतला माता मंदिर भैरव मंदिर रावर रोड पर
श्री कृष्ण मंदिर दूध वाली माता मंदिर
महाराजा रणजीत सिंह समाधि डेरा साहिब
प्रकाश स्थान श्री गुरु रामदास जी भाभिया

जैन दिगंबर मंदिर जैन श्वेतांबर मंदिर
यहां के कुछ मशहूर धार्मिक स्थल है वहीं
लाहौर के पंजाब यूनिवर्सिटी में तो 8671
संस्कृति और हिंदी की पांडु लिपियां आज भी
रखी हुई हैं लाहौर में उस समय बड़े
व्यापारी हिंदू ही थे अब यहीं से आता है

दोस्तों हमारा अगला सवाल कि जब इतनी
ज्यादा पॉपुलेशन नॉन मुस्लिम्स की थी
प्रॉपर्टी ओनरशिप का फैक्टर भी हिंदुओं के
खेमे में था तो फिर कैसे यह पाकिस्तान में
चला
गया हाउ डिड द पार्टीशन

हैपन दरअसल जब भारत और पाकिस्तान का
पार्टीशन होना था तब ब्रिटेन से एक शख्स
को बुलाया गया था जिसका नाम था सिरल
रेडक्लिफ उन्हें आदेश दिए गए थे कि भारत
और पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांटना है

रेडक्लिफ ना कभी पहले भारत आए थे और ना
उन्हें यहां के कल्चर की समझ थी बस अंधे
मुंह उन्हें भारत को बांटने का जिम्मा
सौंप दिया गया था उनकी लीडरशिप में एक
रेडक्लिफ कमीशन बनाया गया और इसी कमीशन ने
बंटवारे के लिए बॉर्डर लाइन बना दी

उन्होंने जो बॉर्डर बनाया बाद में उसे ही
तो रेडक्लिफ लाइन का नाम दिया गया था
उन्होंने ही डिसाइड किया था कि भारत और
पाकिस्तान में कौन सा शहर कहां पर रहेगा
वहीं लाहौर का फैसला भी रेडक्लिफ ले चुके

थे थे कि उसे किस खेमे में डालना है और
इसी ऐतिहासिक फैसले के बाद आती है 12
अगस्त 1947 की वो तारीख जहां से शुरू हुई
एक बहुत बड़ी पॉलिटिकल और रिलीजस उठापटक
लाहौर में बटवारे की बात को सुनकर दंगे

फैल चुके थे उधर बताया जाता है कि लाहौर
ने आज से पहले कभी ऐसी सुभाह नहीं देखी है
सड़कों पर हर तरफ लाशें पड़ी हुई थी
अंग्रेजों का कहना था कि किसी ने लाहौर के
भारत में शामिल होने की अफ बाहर उड़ा दी
थी और इसी के विरोध में हिंदुओं और सिखों

का कत्लेआम शुरू हो गया था महज 24 घंटे के
अंदर ही लाहौर में हालात इतने बिगड़ गए थे
कि गवर्नर जेनकिंस ने लॉर्ड माउंट बेटन को
टेलीग्राम भेजकर फौज को बुलाने का डिमांड
कर दी उन्होंने लिखा था कि लाहौर और

अमृतसर की पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा
सकता क्योंकि कत्लेआम करते हुए कई पुलिस
वालों को भी देखा गया है इसके साथ ही एक
बड़े मुस्लिम नेता लियाकत अली ने एक नारा
भी दिया था कि हंस के लिया पाकिस्तान लड़
के लेंगे हिंदुस्तान लाहौर की हर गली हर

मोहल्ले में यही नारा गूंज रहा था लोग
बताते हैं दोस्तों कि लाहौर के इस कत्लेआम
की असल वजह सीरियल रेडक्लिफ ही थे उनके
ऑफिस से ही यह इंफॉर्मेशन लीक हुई थी

लाहौर पहले भारत के हिस्से में ही आना था
लेकिन 12 अगस्त को इतने लोगों का खून बहा
कि लाहौर को भारत में मिलाने का फैसला
गुपचुप तरीके से बदलना पड़ा कहते हैं कि
रेडक्लिफ का एक एसोसिएट पाकिस्तान को कोई
भी बड़ा शहर ना दिए जाने से नाखुश था

लाहौर भी जब हाथ से निकलने लगा तो उसने यह
इंफॉर्मेशन लियाकत अली को भेज दी थी
कुलदीप नैयर नाम के एक पत्रकार ने एक
रेडियो चैनल को बता दिया था कि उसकी
रेडक्लिफ से मुलाकात हुई थी इस दौरान
रेडक्लिफ ने नैयर से कहा था कि बॉर्डर

लाइन खींचने के लिए उसे सिर्फ 10 से 12
दिन मिले थे उन्होंने बस एक बार हवाई जहाज
से ही भारत को देखा था और उसे बताया गया
था कि लाहौर हिंदुओं का शहर है उनकी
प्रॉपर्टी मुसलमानों से ज्यादा है लाहौर
तब बहुत बड़े शहरों में गिना जाता था

दोस्तों इस लिहाज से उसे हिंदुस्तान का
हिस्सा होना था लेकिन पाकिस्तान को अब तक
कोई बड़ा शहर मिला था नहीं नहीं तो
रेडक्लिफ का कहना है कि बंटवारे के बाद
मुझसे नाराज रहने वाले पाकिस्तान को खुश

होना चाहिए कि मैंने भारत से लेकर उन्हें
लाहौर दिया है इसके साथ ही उस समय सीरियल
रेडक्लिफ ने जो बॉर्डर डिसाइड किया उसके
हिसाब से पंजाब के दो शहर फिरोजपुर और
गुरदासपुर भी पाकिस्तान के हिस्से में चले

गए थे और कुछ दिन बाद लॉर्ड माउंट बेटन ने
रेडक्लिफ से दोनों शहरों को वापस भारत में
शामिल करने का आदेश दिया था तो माउंट बेटन
के इस आदेश से उन दोनों शहरों में भी बहुत
मार काट हुई थी इसके दूसरे तरफ भारत और
पाकिस्तान दोनों के ही लीडर्स फौज के
बंटवारे का भी दबाव बना रहे थे फील्ड

मार्शल सर क्लाउड अचले एक भी रेडक्लिफ के
पास आ चुके थे जियोग्राफिक पॉपुलेशन के
हिसाब के साथ फौज के बंटवारे का प्लान बना
इसके अलावा एयरफोर्स के भी 10 स्क्वाड्रन
थे इनमें से आठ भारत और दो पाकिस्तान को
दिए गए इसी तरह नेवी के दो यूनिट भारत को

और एक पाकिस्तान के हिस्से में चली गई तय
यह हुआ था कि अप्रैल 1948 तक दोनों देशों
की सेनाओं के सुप्रीम कमांडर फील्ड मार्शल
अचले की रहेंगे दोनों देशों की सेनाएं
बेलगाम ना हो इसके लिए जॉइंट डिफेंस

काउंसिल बनाया गया था जिसके चेयरमैन लॉर्ड
माउंट पेटन खुद बने बताया जाता है दोस्तों
कि 3 अगस्त को गांधी की कश्मीर के महाराजा
हरि सिंह से मुलाकात हुई नेहरू के कहने पर
गांधी ने हरि सिंह से सिर्फ इतना कहा था
कि रामचंद्र काक को निकाल दीजिए दरअसल

रामचंद्र काक हरि सिंह के प्रधानमंत्री थे
12 अगस्त को महाराजा ने काक को बर्खास्त
कर दिया था कुछ लोगों का तो यहां तक कहना
है कि उस गांधी ने अगर हरि सिंह से भारत
में मर्ज होने की गुजारिश की होती तो

 

कश्मीर की जो आज समस्या है वह होती नहीं
लेकिन गांधी सिर्फ काक और नेशनल
कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्लाह तक ही
बात करके वापस आ गए इसकी एक बड़ी वजह जून
में माउंट बेटन का कश्मीर दौरा था जून के
तीसरे सप्ताह में माउंट बेटन कश्मीर में

महाराजा हरि सिंह से मिलने पहुंचे माउंट
बेटन ने कहा कि यहां की ज्यादा आबादी
मुस्लिम है ऐसे में पाकिस्तान में जाना ही
सही होगा महाराजा ने माउंट बेटन की बात
खारिज करके उनकी सलाह ठुकरा दी महाराजा का
झुकाव जिन्ना से ज्यादा नेहरू की तरफ था

तभी उन्होंने अपने सबसे विश्वास वाले आदमी
काक को भी हटाने में देर नहीं की इसके साथ
ही देखा जा रहा था दोस्तों कि आजादी की
तैयारियां सिर्फ अपने देश में ही नहीं चल
रही बल्कि लंदन में भी वैसा ही मंजर देखने
को मिल रहा था यहां भारतीयों का सबसे बड़ा

अड्डा इंडिया हाउस हुआ करता था लंदन में
तब कृष्ण मेनन हाई कमिश्नर होते थे तय हुआ
था कि कृष्ण मेनन की लीडरशिप में आजादी से
जुड़ा एक कार्यक्रम आयोजित होगा ब्रिटिश
पीएम इटली और उनके कैबिनेट को भी इस में
शामिल होने का न्योता भेजा गया इसके अलावा

कृष्ण मेनन 1957 में देश के रक्षा मंत्री
भी बने अब इन सब चीजों के बीच अगर मोटे
तौर पर देखा जाए तो रेडक्लिफ की इन
गलतियों का खामियाजा सीधे तौर पर लाहौर की
जनता ने तो भुगता जो लाहौर शायद भारत के
हिस्से में होना था वह पाकिस्तान में चला

गया और लाहौर से बड़े-बड़े हिंदुओं और सिख
जमींदारों को अपनी शर्ती छोड़कर भारत की
तरफ आना पड़ गया तो दोस्तों आज की वीडियो
में फिलहाल बस इतना ही उम्मीद है आपको आज
के इस वीडियो में काफी कुछ सीखने को मिला
होगा अगर यह वीडियो आपको पसंद आया है तो
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