कैसे मुखर्जी नगर के मकड़जाल में फंस रहे UPSC Aspirants? | Reality Of UPSC Coaching Centers - instathreads

कैसे मुखर्जी नगर के मकड़जाल में फंस रहे UPSC Aspirants? | Reality Of UPSC Coaching Centers

देखिए यूपीएससी मनमोहन सरकार में यह टॉपिक
काफी चर्चा में रहा और चर्चा का मेन इशू
था यूपीएससी में एज लिमिट को कम करना जैसे
आईआईटी और मेडिकल में होता है ताकि इनके
पास इनफ टाइम हो कि भैया अपनी लाइफ के लिए

यह सही समय पर सही डिसीजन ले सकें क्योंकि
जब स्टूडेंट्स 32 साल के बाद क्विट करते
हैं तो वह पूरी तरह टूट चुके होते हैं तब
यूपीएससी की तैयारी करने वालों से डी
ग्रुप तक का पेपर क्लियर नहीं हो पाता अगर
यही चीज वह 25 साल की उम्र में करते हैं
तो उनके पास ऑप्शंस होते हैं कुछ बेहतर

करने के लिए अफसोस यह सलाह चर्चा तक ही
सिमट कर रह गई यही वजह है कि आज वह लोग 15
से 20 साल महज एक एग्जाम के पीछे गवा देते
हैं और इसके बाद उन पर टैक लग जाता है
अनसक्सेसफुल का लोग दूर से ही कहते हैं लो
आ गए कलेक्टर साहब और यकीन मानिए साहब यह
यूपीएससी की दुनिया का हाई प्रोफाइल ताना
है जो एस्परेंस की बची कुची लाइफ को दीमक

की तरह खा जाता है लेकिन यहां पर गलत
किसकी है स्टूडेंट्स की सरकार की कोचिंग
सेंटर्स की या मुखर्जी नगर की जो यूपीएससी
के नाम पर एक धोखा है एक ऐसे मकड़े का जाल
जिसमें यूपीएससी एस्परेंस फंसता चला जाता
है लेकिन कैसे चलिए आज यूपीएससी एस्पें की
अंधेर नगरी में झांक कर देखते हैं देखिए

दोस्तों यह है एजुकेशन की मंडी यानी
दिल्ली का मुखर्जी नगर भैया यहां देश के
हर कोने-कोने से लोग सिविल सर्विस खरीदने
आते हैं जी हां सही सुना आपने यहां पर
दीवारें खिड़की दरवाजों से ज्यादा कलरफुल
और बड़े-बड़े बैनर से भरी हुई हैं जिस पर
मोल भाव लिखा होता है सीधे-सीधे कहें तो

दुकान के दाम और आईएएस बनाने की 100%
गारंटी यानी एजुकेशन में थोड़ी भी मिलावट
नहीं मिलेगी आईएएस नहीं तो यह आपको दिमागी
मरीज तो बनाकर ही मानेंगे वो भी 100% इस
मंडी में एंट्री का दरवाजा तो है लेकिन
एग्जिट का नहीं है जैसे ही आप यहां पर

एंटर करोगे आपका स्वागत पेंपलेट से होगा
जिसके जरिए एजुकेशन की बोली लगाई जाएगी
यहां जिस दुकान का जितना ऊंचा दाम होगा
उसके सामने उतनी ही भीड़ मिलेगी हालांकि
दाम थोड़े बहुत ऊपर नीचे जरूर हो सकते हैं
लेकिन लेन जितना आप इसके अंदर जाते जाओगे

आपको कई चीजें दिखेंगी जो हर दिन कॉमन
रहती हैं पहला कंधे पर दृष्टि या अनअकैडमी
जैसी तमाम दुकानों के नाम का बैग टांगे 20
से 40 साल के युवा चाय की टपली पर डिस्कशन
करती स्टूडेंट्स जिनमें से कोई मां के

गहने गिरवी रखकर यहां तक पहुंचा है तो कोई
पुरखों की जमीने मुखर्जी नगर ऐसे एस्परेंस
से भरा पड़ा है दोस्त हां देश के अलग-अलग
राज्यों से हर साल 10000 से ज्यादा
स्टूडेंट्स आते हैं आईएएस बनने के लिए वो

लोग यहां बेहद कम सुविधाओं में रहकर देश
की सबसे टफ एग्जाम की प्रिपरेशन करते हैं
और इस सपने को पूरा करने के लिए छात्रों
का जुनून मजबूरी के आगे घुटने टेक की
कहानियां और गरीबी में यूपीएससी की पढ़ाई
एवरेस्ट की चोटी चढ़ने से कम नहीं है इस
दौरान एक स्टूडेंट अपने टाइम मेहनत और

पैसों के साथ-साथ अपनी जवानी को भी खपा
देता है और इन सबका असर पड़ता है उसके
दिमाग पर इंटरनेशनल जर्नल फॉर रिसर्च इन
अप्लाइड साइंस एंड इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी
में छपे सर्वे पर बेस्ड एक रिसर्च पेपर के
मुताबिक पता चलता है कि देश में यूपीएससी

की तैयारी करने वाले कई कैंडिडेट्स मेंटल
हेल्थ से रिलेटेड प्रॉब्लम से जूझ रहे हैं
एक्चुअली जिन स्टूडेंट्स को कामयाबी नहीं
मिल पाती उनके लिए यह किसी ट्रामा से कम
नहीं होता खासकर ऐसे लोग जिनके पास इनकम

का कोई दूसरा सोर्स नहीं है एक रिसर्च के
दौरान साल 2022 से लेकर 2023 तक करीब 203
यूपीएससी कैंडिडेट्स का सर्वे किया गया और
इस रिसर्च में एग्जाम्स कोचिंग फिजिकल और
मेंटल हेल्थ की सिचुएशन इमोशनल प्रॉब्लम्स
और नींद के घंटों जैसे सवालों के जरिए
मेंटल स्टेट को परखा गया सर्वे में 19 साल

से लेकर 33 साल तक की ऐज के लोगों ने अपनी
जिंदगी को लेकर खुलकर जवाब दिया इस दौरान
53.3 प्र लोगों ने इस बात को माना कि कुछ
हद तक उनकी मेंटल हेल्थ खराब है और इस
प्रॉब्लम की सबसे बड़ी वजह है उनके कमजोर

आर्थिक हालात हालांकि कई कोशिश करने के
बाद पॉजिटिव रिजल्ट ना मिलना भी कैंडिडेट
की निराशा की बड़ी वजह है और इस रिसर्च
में चार बार या उससे ज्यादा अटेंप्ट करने
वाले स्टूडेंट्स ने अपनी मेंटल हेल्थ को

उन स्टूडेंट के मुकाबले बहुत खराब बताया
है जिन्होंने एक या दो बार ही अटेम्प्ट्स
दिए हैं अब आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें
से 90 प्र छात्र छह बार कोशिश कर चुके हैं
और हर बार की नाकामी उनके मेंटल हेल्थ पर
असर डालती है इसी सर्वे में 16 प्र

छात्रों ने अपनी मेंटल हेल्थ को बहुत
अच्छा 29 प्र ने अच्छा 38 प्र ने खराब और
25 प्र छात्रों ने बहुत खराब बताया है
वहीं 2 प्र छात्र ऐसे भी हैं जो अपनी
मेंटल हेल्थ को लेकर कुछ कहने की सिचुएशन
में नहीं थे वहीं 87.6 प्र कैंडिडेट्स ऐसे
भी हैं जिनके मेंटल हेल्थ का इलाज कभी

नहीं हो सका और इन सबके बावजूद भी ये लोग
वापस नहीं जाना चाहते क्योंकि मुखर्जी नगर
में एक बार आना तो आसान है भाई लेकिन यहां
से लौटना बहुत मुश्किल वापस जाने के नाम
पर तो इनके मुंह से एक ही बात निकलती है

गांव लौटे तो लौटे कैसे लोग कलेक्टर साहब
कहकर मार डालेंगे अब जैसे एक सन्यासी से
गंगा तट नहीं छूटता है वैसे ही यूपीएससी
की तैयारी करने वालों से तमाम फेलियर के
बाद भी मुखर्जी नगर छूट नहीं पाता
यूपीएससी का अटेंप्ट खत्म हो जाता है तो
लोग पीसीएस की तैयारियों में लग जाते हैं
और एक बार आईएएस पीसीएस बनने का सपना
देखने वाले पूरी दुनिया को भूलकर अपने
सपने को साकार करने में लग जाते हैं ऐसे

में वह कैसे इस बीच में छोड़कर जा सकते
हैं आप ही बताइए और ऐसा कैसे हो सकता है
कि भैया वह अपनी सारी किताबों को एक
कबाड़ी को बेचकर लौट जाएं वो किताबें
जिसके पन्ने पन्ने में उनके हाथों का टच
है वो मां-बाप की ढेरों उम्मीदें और

आंसुओं के निशान हैं ऐसे में खुद को अचानक
उन किताबों से अलग कर देना इंटेलेक्चुअल
सुसाइड करने जैसा ही है ऐसे में मनमोहन
सरकार का यूपीएससी में एज लिमिट तय करने

का फैसला गलत नहीं था क्योंकि अनसक्सेसफुल
होने के बाद भी उनका बहुत समय बच जाता
अपनी लाइफ में कुछ और बेहतर करने के लिए
जैसे बच्चे मान लीजिए 12थ से पहले ही
मेडिकल की तैयारी शुरू कर देते हैं वैसे

ही अगर यूपीएससी की एक एज लिमिट कम होती
वो लोग साथ के साथ तैयारी करते रहते जिससे
उनका टाइम वेस्ट नहीं होता लेकिन अफसोस
उनका यह फैसला हंगामे की भेट चढ़ गया और
कानून बनाना तो दूर यह चर्चा तक ही सिमट
के रह गया भैया एक्चुअली यूपीएससी सांप

सीढ़ी का खेल है जिन लोगों को 99 नंबर पर
पहुंचने के बाद सांप काटता है वह दोबारा
नीचे पहुंच जाते हैं अब ऐसे ही हजारों
युवा मुखर्जी नगर इलाके में आज भी पड़े
हैं कई लोग इंटरव्यूज तक पहुंच कर भी
सिलेक्ट नहीं हो पाते जब कॉन्फिडेंस टूटता

है तो उन्हीं लोगों के लिए प्रीता क्लियर
करना भारी हो जाता है अगर सब कुछ छोड़कर
स्टूडेंट्स एक बार फिर से अपने गांव लौट
भी जाए मान लीजिए तो उनके लिए गांव के
लोगों को फेस करना रोज तिल तिल कर मरना

बराबर होगा क्योंकि जिस दिन आप तैयारी
करने के लिए आते हैं गांव वाले उसी दिन से
डीएम साहब कहना शुरू कर देते हैं लेकिन
डीएम बनना इतना आसान कहां है भैया इसके
लिए तो समझौते करने पड़ते हैं दरअसल बात
2019 की है जब मथुरा के रहने वाले विशाल
सारस्वत ने यूपी पीसीएस टॉप किया उसी साल

वो यूपीएससी में भी 699 रैंक लेकर आता है
उसने यहां ऐसे हालातों में रहकर तैयारी की
जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते कभी किसी
से दो महीने रूम पर रहने के लिए रिक्वेस्ट
तो किसी से तीन महीने कहता था कि मुझे बस
सोने तक की जगह दे दीजिए आपका खाना बना
दिया करेंगे मथुरा से कोई आता था तो उसके

पिताजी 2000 से 00 भेज देते इतने पैसे से
भला दिल्ली में होता क्या है यह तो उनकी
दिक्कतों का सिनोप्सिस है लेकिन उसके डीप
में जाएंगे तो पता चलेगा कि उसने अंडरवेयर
खरीदने तक के लिए दो दो तीन-तीन महीने तक
कंप्रोमाइज किया है अब वहीं 2005 बैज के

महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस मनोज शर्मा को
तो आप जानते ही होंगे उन पर 2023 में एक
मूवी भी बनी थी जिसका नाम था 12वीं फेल
दरअसल मनोज शर्मा 12वीं में हिंदी को
छोड़कर सभी सब्जेक्ट्स में फेल हो गए थे

और आज आईपीएस है इस दौरान उन्होंने कई
प्रॉब्लम्स को फेस किया इकोनॉमिक कंडीशन
खराब होने की वजह से उन्होंने बहुत कुछ
झेला फिर चाहे टेंपो चलाना हो या फिर
भिखारियों के साथ सोना इतना ही नहीं एक

समय पर वह कुत्तों को घुमाने का भी काम कर
चुके हैं देखिए सक्सेसफुल और अनसक्सेसफुल
लोगों की यहां ऐसी ी तमाम कहानियां हैं कि
अगर लिखने बैठेंगे तो सैकड़ों उपन्यास बन
जाएंगे वो लोग यहां बड़ी सक्सेस के लिए

आते हैं लेकिन सक्सेसफुल ना होने पर
उन्हें उसकी उतनी ही बड़ी कीमत भी चुकानी
पड़ती है उनके एफर्ट्स तो 100% होते हैं
लेकिन रिजल्ट जीरो यहां ज्यादातर हिंदी
मीडियम के स्टूडेंट्स हैं जो ज्यादातर

उत्तर प्रदेश उत्तराखंड बिहार हरियाणा
मध्य प्रदेश से होते हैं इसके अलावा यहां
पर कर्नाटक उड़ीसा नॉर्थ ईस्टर्न स्टेट्स
के स्टूडेंट्स भी आते हैं जिनकी
फाइनेंशियल कंडीशन इतनी अच्छी तो नहीं
होती अगर पैसे वाले घर से होते तो भैया
मुखर्जी नगर की बजाय राजेंद्र नगर में

होते और इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई करते
हालांकि यहां रहना भी इतना आसान नहीं है
आज हम इसी मायावी नगरी का या यूं कहें कि
हिंदुस्तान को कलेक्टर देने वाली फैक्ट्री
की पड़ताल करेंगे जहां लोग ना तो किसी को

उसके नाम से जानते हैं और ना ही उसके
प्रांत से बल्कि वह उसे उसके सब्जेक्ट से
जानते हैं यहां पर लोग ऑक्सीजन से ज्यादा
फैक्ट ग्रहण करते हैं एक जमाना था जब यूपी
और बिहार से से काफी आबादी रेल पर लद करर

दिल्ली आती थी कलेक्टर बनने के लिए लेकिन
अब यहां पर बिकता हुआ मोमोज बताता है कि
अब मुखर्जी नगर ग्लोबल हो चुका है लोग
यहां दूर-दूर से रोजगार की तलाश में भी
आते हैं जिसमें से सबसे बड़ा रोजगार है

कोचिंग सेंटर्स जो महंगी फीस लेते हैं
आईएएस बनाने के लिए एक्चुअली तैयारी में
महज एनसीआरटी की किताबें ही नहीं होती
यहां रहने खाने पढ़ने से लेकर हर सवाल पर
अलग तरह का स्ट्रगल है भाई यहां रहकर
तैयारी करने के लिए सालाना कम से कम 4 से

₹ लाख का खर्चा तो आता ही है एक स्टूडेंट
की कोचिंग की फीस ढा से ₹ लाख है इसके बाद
10 से 000 महीने का कमरा अब कहने के लिए
उसे आप कमरा कह सकते हैं जो शुरू होने से
पहले ही खत्म हो जाता है और इसी मौके पर

क्या किसी ने खूब कहा है कि जिंदगी तूने
मुझे कब्र से कम दी है जमी पांव फैलाओ तो
दीवार में सर लगता है यानी आप इस कमरे में
ठीक से पांव तक नहीं फैला सकते बाहर की

हवा और रोशनी आने के लिए तो यहां कोई
गुंजाइश तक नहीं 21 फुट के एरिया में लोग
पांच-पांच मंजिल बनाकर रखते हैं एक
स्टूडेंट को हर महीने कम से कम 18 से 00
खर्च करने पड़ते हैं यूपीएससी कोई गुड्डे

गुड़िया का खेल नहीं है दोस्तों प्रिपरेशन
और सक्सेस में काफी लंबा वक्त लगता है इसे
एक पंचवर्षीय योजना मान लीजिए जी हां 5
साल बाद भी जिसके पूरे होने की उम्मीद
नहीं होती ऐसे में सबसे मुश्किल टास्क
होता है कि हर महीने सरवाइव करने के लिए

पेरेंट से पैसे मांगना हर साल यहां पर
रहने के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते
हैं घर पर बहने कहती हैं कि भैया का महीने
के आखिर में फोन आएगा और मम्मी को नमस्ते
करेंगे इसका मतलब है कि उनके पास पैसे

खत्म हो चुके हैं मम्मी इस बात को पापा तक
पहुंचा देंगी लेकिन उन्हें पैसे चाहिए यह
बात सीधे तौर पर कहना आसान नहीं होता
क्योंकि वह लोग अपने घर की हाल तों से
वाकिफ होते हैं मुखर्जी नगर इलाके में आने

वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स रूरल बैकग्राउंड
और स्मॉल टाउन से होते हैं उन्हें यह पता
होता है कि हमें यूपीएससी की तैयारी करनी
है और आईएएस पीसीएस बनना है लेकिन वह यह
नहीं जान जानते कि इसके लिए उन्हें करना
क्या है फिर उन्हें बताया जाता है कि

दिल्ली में मुखर्जी नगर एक ऐसी जगह है
जहां हिंदी मीडियम के स्टूडेंट्स तैयारी
करने के लिए जाते हैं अब बच्चे यहां पर
आकर कोचिंग जॉइन तो कर लेते हैं जब यह
कोचिंग के डेमो क्लास में बैठते हैं तो
उन्हें इस तरह से मोटिवेट किया जाता है कि

बाहर निकलते ही सभी स्टूडेंट्स को ऐसा
लगता है कि अगर मैं आईएएस नहीं बन सकता तो
पूरी दुनिया में कोई नहीं यानी मैं नहीं
तो कौन बे इसके बाद तो दो ढाई साल कोचिंग
लेने के बाद भैया फिर अपना अटम देना शुरू
करते हैं तब उन्हें पता चलता है कि मैं तो

कहीं हूं ही नहीं फिर दो-चार साल और
तैयारी करते हैं जब जाकर गिने-चुने
स्टूडेंट्स का सिलेक्शन हो पाता है जब कोई
स्टूडेंट यूपीएससी जैसे एग्जाम की तैयारी
करने का डिसीजन लेता है तो उसमें

कॉन्फिडेंस तो कूटकूट कर भरा होता है
लेकिन यूपीएससी के सिलेबस के हिसाब से
नॉलेज ना के बराबर होती है हालांकि
धीरे-धीरे हार्ड वर्क के बाद नॉलेज बढ़ती

है लेकिन इसमें एक लंबा वक्त लगने की वजह
से नॉलेज होते हुए भी कॉन्फिडेंस डगमगाने
लगता है और कॉन्फिडेंस अगर डक मगाने लगे
तो नॉलेज भी बिखर जाती है यही वजह है कि
छात्रों की कड़ी मेहनत के बाद भी सफलता

उनके हाथ नहीं लगती वहीं आ के कोचिंग
सेंटर्स में जो स्टूडेंट्स पढ़ रहे होते
हैं उनमें से हिंदी मीडियम का करंट बैच का
कोई भी स्टूडेंट पास नहीं होता जो
स्टूडेंट पास होता है वह तैयारी करने के
बाद चार से 5 साल सेल्फ स्टडी करता है फिर

जाकर लॉन्ग स्ट्रगल के बाद उसका सिलेक्शन
हो पाता है लेकिन कोचिंग वाले डेमो क्लास
में यह नहीं बताते हैं कि जो भी हमारे
रिजल्ट हैं उसमें करंट बैच का कोई भी
स्टूडेंट है ही नहीं जो बच्चे पास होते

हैं उनमें कोचिंग का रूल ना के बराबर होता
है सिलेबस के नाम पर स्टूडेंट्स को
सिनोप्सिस पढ़ाया जाता है असल में कोचिंग
सेंटर्स पढ़ाने की बजाय उन्हें गुमराह

करते हैं क्योंकि सक्सेसफुल पीपल बताते
हैं कि अखबार पढ़ो और एनसीईआरटी पढ़ो
कोचिंग वाले कहते हैं कि हमारे नोट्स पढ़ो
अब यूपीएससी जिस हिसाब से खुद को बदल रहा
है कोचिंग वाले उस हिसाब से खुद को बदल

 

नहीं पा रहे ऐसे में यह कहना गलत नहीं
होगा कि भैया मुखर्जी नगर यूपीएससी के नाम
पर एक धोखा है लेकिन इस वक्त दोस्तों इस
पर आपका क्या कहना है हमें जरूर कमेंट
करके बताएं

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