कैसे Britishers ने किया Arab World का बंटवारा ? | Why Middle East Will Remain A Conflict Zone? - instathreads

कैसे Britishers ने किया Arab World का बंटवारा ? | Why Middle East Will Remain A Conflict Zone?

दोस्तों मिडिल ईस्ट पिछले कई दशकों से एक
कॉन्फ्लेट जन रहा है और यहां पर एक नहीं
बल्कि कई तरह के कॉन्फ्लेट्स हैं भाई जी
हां चाहे आप इजराइल पलेस्टाइन की बात करें
या फिर यमन में चल रहे गृह युद्ध की इन

सभी कॉन्फ्लेट्स की जड़ें एक ही हैं और वह
है यहां के बॉर्डर्स यही बॉर्डर सऊदी
अरेबिया के ईरान से लड़ाते हैं और इन्हीं
के कारण अलकायदा और आईएसआईएस जैसे
टेररिस्ट ग्रुप्स भी पैदा हुए हैं पर कैसे
आखिर इन बॉर्डर्स में ऐसा क्या है जो

मिडिल ईस्ट में कभी शांति नहीं आ सकती आइए
जानने की कोशिश करते हैं हमारी आज के इस
वीडियो में देखिए मिडिल ईस्ट को समझने के
लिए हमें 19वीं सदी में जाना होगा जब यह
रीजन अलग-अलग देशों में डिवाइडेड नहीं था

बल्कि ज्यादातर इलाके पर एक ऑटोमन एंपायर
या फिर यूं कह लीजिए कि उस्मानिया सल्तनत
का राज था ऑटोमन एंपायर के अंदर नेशनलिज्म
की कोई जगह ही नहीं थी इसलिए अलग-अलग
लैंग्वेजेस और अलग-अलग कल्चर्सल यूनाइट

होकर कभी अपने हक के लिए नहीं लड़ पाए
ऑटोमन एंपायर 20वीं सदी की शुरुआत में
अपने डिक्लाइन पर था और ब्रिटिश एंपायर
तेजी से इस रीजन में फैल रहा था
ब्रिटिशर्स की हमेशा से इच्छा थी कि
इंग्लैंड और भारत के बीच के ट्रेड को तेज

करने के लिए मिडिल ईस्ट की तरफ से एक
रास्ता निकाला जाए लेकिन क्योंकि यहां पर
एक दूसरे एंपायर का राज था इसलिए इसमें
बहुत रिस्क था धीरे-धीरे ब्रिटिश एंपायर
ने मिडिल ईस्ट में अपनी प्रोटेक्टर

स्टेट्स बनाने शुरू कर दिए 1820 में
उन्होंने यूएई बनाया और फिर साउदर्न यमन
बहरीन और इजिप्ट को भी आखिरकार उन्होंने
अपने अधीन कर लिया इसके बाद यहां पर स्विस
कैनाल बनाई गई जो एक ब्रिटिश और फ्रेंच

कंपनी द्वारा कंट्रोल की जाती थी स्विस
कैनाल के साथ ही अंग्रेजों का सपना पूरा
हो गया भाई क्योंकि अब स्विस कैनाल के
थ्रू वो भारत और एशिया की तरफ एक शॉर्टकट
ले सकते थे और उन्हें साउथ अफ्रीका की तरफ

से घूमकर नहीं जाना पड़ता था जी हां और
इसके अलावा ब्रिटिशर्स ने ओमान और कुवैत
नाम से भी दो और प्रोटेक्टरेट स्टेट्स
बनाए अब अपने रीजन में ब्रिटिशर्स की

बढ़ती हुई पावर को देखते हुए 1914 में
ऑटोमन एंपायर ने पहले विश्व युद्ध में
जर्मनी का साथ देने का फैसला किया जो उनकी
आखिरी गलती साबित हुई विश्व युद्ध में
ऑटोमन एंपायर की हार हुई और वह हमेशा के
लिए तबाह हो गया उस समय का ऑटोमन एंपायर

ही आज का तुर्की है जो कभी पूरे अरब
वर्ल्ड पर राज किया करता था लेकिन ऑटोमन
एंपायर पर जीत पाने के बाद यूरोपिय के
सामने एक बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी जो
जमीन उन्होंने जीती थी अब उन्हें उनका
बंटवारा जो करना था साथ ही ब्रिटिशर्स ने

 

इस बीच इस रीजन के कई लोगों को बहुत सारे
प्रॉमिस भी कर दिए थे जिन्हें निभाया जाना
भी जरूरी था अब ऑटोमन एंपायर को डिवाइड
करने की जिम्मेदारी मार्क साइकस और फ्रांस

पिकोर नाम के दो ब्रिटिश और फ्रेंच
डिप्लोमेट्स को दी जिन्होंने यहां के
कल्चर या लैंग्वेजेस के आधार पर नहीं
बल्कि भैया फ्रांस और ब्रिटेन के हित के
आधार पर इस जगह को डिवाइड करना शुरू कर

दिया ब्रिटिश कंट्रोल जोन के अंदर बगदाद
बसरा डस्क जैसे इलाके आए जबकि फ्रेंच जोन
के अंदर मसूल बेरूट और लेबनोल जैसे इलाके
आ आए पलेस्टाइन को उसके रिलीजियस
सिग्निफिकेंट के कारण एक इंटरनेशनल जोन

रखा गया इसके साथ-साथ 1917 में ब्रिटिशर्स
ने बेलफोर डिक्लेरेशन पर भी साइन किया था
जो कि जूस को मिडिल ईस्ट में एक देश बनाकर
देने की बात करता है मिडिल ईस्ट ऑलरेडी
काफी कन्फ्यूजिंग रीजन था लेकिन यह

कंफ्यूजन और भी ज्यादा तब बढ़ गई जब भैया
यहां पर ऑयल की डिस्कवरी हुई जी हां मिडिल
ईस्ट में सबसे पहले ऑयल 1908 में ईरान में
मिला था जिसे एंग्लो पर्शियन ऑयल कंपनी
कंट्रोल करती थी यही कंपनी आगे चलकर

ब्रिटिश पेट्रोलियम या बी बीपी बनी पहले
विश्व युद्ध ने दिखा दिया था कि ऑयल आने
वाले समय में कितना जरूरी होने वाला है
यार लेकिन परेशानी यह थी कि इस समय दुनिया

का ज्यादातर ऑयल अमेरिका से आया करता था
अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्ते इस वक्त
बहुत अच्छे तो थे नहीं क्योंकि अमेरिकंस
इसके खिलाफ थे इसलिए इन्हें ऑयल के लिए एक
रिलायबल सोर्स नहीं माना जाता था इसी वजह

से ब्रिटिश एंपायर की ऑयल नीड्स पूरी करने
के लिए अरब वर्ल्ड में ऑयल की खोज शुरू हो
गई जब 1919 में पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ
तो सभी विजेता देश वरसाई में मिले जहां पर
उन्होंने आपस में इन टेरिटरीज को डिवाइड

करना शुरू किया महसूल को फ्रेंच जन से
हटाकर ब्रिटिश जोन का पार्ट बना दिया गया
ऑटोमन एंपायर के साथ-साथ रशियन एंपायर भी
कोलैक्स कर गया था इसलिए यहां पर रशियन
कंट्रोल में जो जोन था वहां पर आर्मेनिया

नाम का एक अलग देश बना दिया गया इसके
अलावा यहां पर कर्दश लोगों की भी एक बड़ी
पॉपुलेशन थी और कर्दन नाम का एक देश बनाने
का भी प्लान किया गया लेकिन इन नेगोशिएशन
से टर्की खुश नहीं था क्योंकि बहुत से
इलाके जो टर्की को चाहिए थे भाई वहां पर

अब ग्रीस और इटली जैसे देशों का राज्य हो
गया था साथ ही जिस जमीन पर कदि स्तान
बनाया जाना था उसका भी एक बहुत बड़ा
हिस्सा टर्की को चाहिए था जिस वजह से

टर्किश गवर्नमेंट ने इस पूरे प्लान को ही
मानने से इंकार कर दिया और वह अगले दो
हफ्तों तक लड़ते रहे अब आखिर में इस लड़ाई
को बढ़ता देख दोबारा सभी को नेगोशिएशन
टेबल पर आना पड़ा और तब 1923 में ट्रीटी

ऑफ लोजन साइन हुई इस ट्रीटी के मुताबिक ही
आज के मॉडर्न मिडिल ईस्ट ने अपनी असली शेप
ली है ट्रीटी ऑफ लोजन की वजह से
कुर्दिस्तान कभी नहीं बन पाया जिस जमीन पर
कदि स्तान बनाया जाना था आज वो इराक

तुर्की ईरान और सीरिया जैसे देशों के बीच
में डिवाइडेड है लेकिन यहां पर रहने वाले
कद लोग अभी भी अपने देश के लिए लड़ रहे
हैं जी हां इस समय इस इलाके में 4 करोड़
से ज्यादा लोग हैं जो खुद को कर्ज कहते

हैं इतनी बड़ी पॉपुलेशन क्योंकि चार देशों
के बीच डिवाइडेड है इसलिए हर देश में यह
माइनॉरिटी है क्योंकि हम यहां पर मिडिल
ईस्ट के कॉन्फ्लेट्स को ट्रेस कर रहे हैं

तो बहुत से कॉन्फ्लेट्स में एक कॉन्फ्लेट
की वजह कर्दश नेशनलिज्म भी है देखिए
कर्ड्स ने बहुत सारे मलेशिया ग्रुप बनाए
हैं जो सीरिया और टर्की में ऑपरेट करते
हैं और इंडिपेंडेंट कर्दन बनाना चाहते हैं

टर्की और इन कर्ड मलेशियंस के बीच में
लगातार एक जंग चल रही है जिससे कभी-कभी
टर्की के एयर प्लेंस सीरिया और इराक जैसे
देशों के अंदर जाकर भी एयर स्ट्राइक्स
करने से नहीं घबराते इसके अलावा दूसरे
डिवाइड्स की बात की जाए तो बगदाद एक

सुन्नी मुस्लिम मेजॉरिटी प्रोविंस था और
बसरा एक शिया मुस्लिम प्रोविंस इन दोनों
को ही जोड़कर इराक नाम का एक देश बना दिया
गया था सिर्फ इतना ही नहीं बसरा प्रोविंस
में से कुवैत नाम का एक नया देश भी निकाला

गया जिस वजह से आज भी इराक कुवैत पर अपना
क्लेम करता है इराक ने 1932 में अंग्रेजों
से आजादी ले ली और तब से वह एक
इंडिपेंडेंट नेशन की तरह एजिस्ट करता है
अब इराक भी मिडिल ईस्ट में कई कॉन्फ्लेट्स

की वजह बना है और इसका एक बड़ा कारण है कि
भैया यह देश मुख्य तौर पर दो नदियों पर
डिपेंडेंट है जिनका नाम टाइग्रेस और यूरो
फैटीज है और दोनों ही नदियों की शुरुआत
टर्की से होती है यह ज्योग्राफिकल डिवाइड

टर्की को इतना पावर देता है कि वह डम्स
बनाकर उनकी वाटर सप्लाई को अफेक्ट कर सकते
हैं इसलिए टर्की और इराक में पानी को लेकर
भी आज तक विवाद है इसके अलावा अगर हम उन
इलाकों की बात करें जो फ्रेंच कंट्रोल में
थे तो वहां भी बॉर्डर्स अच्छे से डिवाइड

नहीं किए गए थे सबसे पहले तो उन्होंने
लेबेन प्रोविंस को अलग करके एक अलग देश
बना दिया क्योंकि यहां पर क्रिश्चियंस
मेजॉरिटी में थे इसके बाद बेरूट डमक और
अलेप जैसे प्रोविंस को जोड़कर सिरिया नाम

का एक नया देश बना दिया गया जिसमें सुन्नी
शियाज कर्ड्स और अलग-अलग एथनिक और कल्चरल
बैकग्राउंड्स के लोग एक साथ आ गए अब इसके
बाद 1930 के दशक में टर्की ने फ्रांस पर
प्रेशर बनाना शुरू कर दिया क्योंकि सीरिया
के इलाके में आने वाले प्रोविंस
एलेक्जेंड्रा को व क्लेम करना चाहते थे

एलेक्जेंड्रा में रहने वाले ज्यादातर लोग
टर्किश कम्युनिटी से थे और क्योंकि फ्रांस
नहीं चाहता था कि टर्की नाजी जर्मनी को
दूसरे विश्व युद्ध में जवाइन कर ले इसलिए
इस इलाके को सिरिया से अलग कर दिया गया अब

1938 में एलेक्जेंड्रा को सिरिया से अलग
करके इंडिपेंडेंट स्टेट ऑफ हताई बना दिया
गया 1939 में यहां पर टर्की ने एक
कंट्रोवर्शियल रेफरेंडम करवाया और इस
इलाके को टर्की में शामिल कर लिया गया

इसके बाद से आज तक टर्की और सीरिया इस
इलाके के लिए आपस में लड़ रहे हैं और
सीरिया ने यहां पर अपना क्लेम नहीं छोड़ा
है लेबेन और सीरिया को 1940 के दशक में
फ्रांस से आजादी मिल गई थी लेकिन सीरिया

द्वारा पूरे के पूरे लेबेन को भी सीरियन
स्टेट का हिस्सा क्लेम किया जाता है
क्योंकि फ्रेंच एंपायर ने इन्हें
आर्टिफिशियल अलग किया था अब सोचिए इस अरब
वर्ल्ड में हर देश दूसरे देश के इलाके को

क्लेम कर रहा है अब इन
क्लेम्मफिक्स
ही हुआ 1972 में जब इराक में ऑयल डिस्कवर
हुआ लेकिन यह ऑयल इराक के बसरा प्रोविंस
में डिस्कवर हुआ जहां पर उनकी शिया
माइनॉरिटी रहा करती थी जबकि इराक को बगदाद

के सुन्नीस द्वारा ही कंट्रोल किया जाता
था सिर्फ इतना ही नहीं जितना ऑयल इराक में
डिस्कवर हुआ उतना ही ऑयल कुवैत में भी
डिस्कवर हुआ जो टेक्निकली कभी बसरा
प्रोविंस का पार्ट हुआ करता था और जिसे
इराक अपने हिस्से के रूप में क्लेम करता

था इसके बाद 1938 में सऊदी अरब में भी ऑयल
डिस्कवर हुआ था इसके करीब 20 साल बाद 1956
और 1958 में सिरिया और यूएई के इलाकों में
भी ऑयल पाया गया सिरिया और महसूल के
इलाकों में ऑयल मिलना शुरू हुआ जहां पर

कदीश लोग रहा करते थे ईरान के साथ भी ऐसा
ही था ईरान का 90 पर ऑयल जगरोस माउंटेंस
की तरफ के इलाके से आता था जहां पर रहने
वाले लोग शिया तो थे लेकिन वह खुद को

पर्शियन नहीं बल्कि अरब कहते हैं इसलिए
यहां पर भी एक एथनिक डिवाइड है सऊदी अरब
का भी ज्यादातर ऑयल उनके शिया माइनॉरिटी
के इलाकों से ही आता है जिस वजह से उन्हें
हमेशा से यह डर बना रहता है कि भाई कहीं

ईरान के इन्फ्लुएंस में आकर वहां के लोग
भी कोई विद्रोह ना छेड़ दें अब ऑयल के
अलावा जिओ पॉलिटिक्स ने भी मिडिल ईस्ट की
कॉन्फ्लेट को हवा देने की काम की कोशिश की
है सबसे पहले तो यहां पर 1948 में इजराइल
का बनना एक बहुत ही बड़ी बात थी क्योंकि

ब्रिटिशर्स ने बेलफोर्ड डिक्लेरेशन में
जूज को एक होमलैंड देने का वादा किया था
इसलिए पलेस्टाइन के इलाके में अब इजराइल
और पलेस्टाइन नाम से दो दिया बनाए जाने थे

लेकिन अरब्स को यह डील मंजूर नहीं थी इसकी
सबसे बड़ी वजह यही थी कि 1917 से ही यहां
पर जूज ने आकर सेटल होना शुरू कर दिया था
लेकिन इसके बावजूद भी पलेस्टाइन की आबादी
जूज से दो गुनी थी आबादी में इतना फर्क

होते हुए भी पलेस्टाइन की 62 पर जमीन
इजराइल को दे दी गई और पलेस्टाइन के हाथ
सिर्फ और सिर्फ 38 पर जमीन आई अब इसी वजह
से अरब वर्ल्ड और इजराइल के बीच में पहली
जंग हुई जो इजराइल जीत गया और उसने लगभग
सारी जमीन पर ही कब्जा कर लिया अब सिर्फ

यहां पर दो इलाके बचे थे जिनमें से एक था
वेस्ट बैंक जिसे जॉर्डन ने कंट्रोल करना
शुरू कर दिया था और दूसरी तरफ था गाज
स्ट्रीम जिसे इजिप्ट ने कंट्रोल करना शुरू
कर दिया था बहुत से पहले स्टाइंस को इस
दौरान भागकर लेबेन में शरण लेनी पड़ गई

जिस वजह से लेबेन के अंदर भी जो
क्रिश्चियंस थी उनके मुकाबले धीरे-धीरे एक
मुस्लिम पॉपुलेशन भी वहां पर खड़ी हो गई
इसके बाद 50 के दशक में इजिप्ट में कमाल
अब्दुल नासिर जैसे लीडर्स ने राइज करना

शुरू किया जो कि एक सेकुलर अरब नेशनलिज्म
को प्रमोट कर रहे थी नासिर का मानना था कि
भाई सभी अरब देशों को एक पावरफुल देश बना
लेना चाहिए जो ऑयल के दम पर खुद को
स्ट्रांग बनाए जहां एक तरफ नासिर के

मुताबिक अरब देशों के दुश्मन इजराइल और
यूएसए जैसे देश थे वहीं दूसरी तरफ वह सऊदी
अरब और कुवैत जैसी मोनकी को भी अरब वर्ल्ड
का दुश्मन मानता था अब नासिर से इंस्पायर
होकर 1958 में सीरिया में भी कुछ मिलिट्री

ऑफिसर्स ने अपनी सरकार का तख्ता पलट कर
दिया और कुछ वक्त के लिए सीरिया और इजिप्ट
दोनों एक होकर यूनाइटेड अरब रिपब्लिक नाम
का एक नया देश बन गए थे लेकिन इसके 3 साल

में ही यह एग्रीमेंट बिखर गई और सीरिया
में एक ऑफिसर के दूसरे ग्रुप ने फिर से
तख्ता पलट कर दिया अब इसके अलावा यमन में
भी नासिर के आइडिया से इंस्पायर्ड लोगों

ने अपनी मोनकी के खिलाफ एक युद्ध छेड़
दिया दूसरी तरफ सऊदी कुवैत और जॉर्डन और
ईरान जैसे देशों को यह डर लगने लगा कि
कहीं उनके देश में भी राजा की सत्ता
उखाड़ने की बात ना फैल जाए भैया इसलिए

उन्होंने यमन में इन विद्रोहियों को दबाने
के लिए अपनी फोर्सेस भेजना शुरू कर दिया
अब य यहां से ही यमन के गृह युद्ध की
शुरुआत हुई जो आज तक जारी है दूसरी तरफ से
नासिर ने भी इजिप्ट की फोर्सेस को यमन में

उतार दिया जिसने इजिप्ट पर बहुत बड़ा
फाइनेंशियल बर्डन डाल दिया था 1967 में
नासिर एक बार फिर इजराइल के साथ जंग की
तैयारी करने लगा लेकिन इस बार इजराइल ने
पहले अटैक करते हुए इजिप्ट के सिनाई

पेनिनसुला को कब्जे में ले लिया इस युद्ध
को सिक्स डे वॉर कहा जाता है जिसमें
इजराइल ने इजिप्ट के अलावा जॉर्डन से भी
वेस्ट बैंक और कोलन हाइड्स का इलाका का
छीन लिया सिक्स डे वॉर के बाद स्विस कैनाल

ही इजिप्ट और इजराइल के बीच का बॉर्डर बन
गई थी इसलिए अगले 8 सालों तक यह बंद रही
और ग्लोबल ट्रेड का काफी नुकसान हुआ 1970
का साल आते-आते अरब वर्ल्ड में फिर से कई
बदलाव आए 52 साल के नासिर की हार्ट अटैक
से मौत हो गई एजेपी अमन से बाहर आ गया और

ब्रिटिशर्स ने डिसाइड किया कि अब वह यहां
पर अपनी मिलिट्री प्रेजेंस बरकरार नहीं रख
सकते क्योंकि वो भी यहां से जाने लगे अब
ब्रिटिशर्स के मिडिल ईस्ट से जाने के बाद
यहां पर अमेरिका ने अपना इन्फ्लुएंस

बढ़ाना शुरू कर दिया और यूएई और सऊदी जैसे
देशों से अपने रिश्ते सुधारने लगे इजराइल
और इजिप्ट के बीच में भी 70 के दशक के अंत
तक रिश्ते सुधरने लगे थे जहां एक तरफ
इजराइल ने सिनाई पेनिंस की जमीन को इजिप्ट
को वापस कर दिया तो वहीं इजिप्ट वो पहला

देश बना जिसने इजराइल को एक देश के तौर पर
स्वीकार कर लिया इस समय इजिप्ट को अनवर
सदाथ नाम का एक लीडर लीड कर रहा था जिसे
इजराइल से दोस्ती करने के कारण गोली मार
दी गई वहीं दूसरी ओर कुछ नई पावर्स ने भी

यहां पर इमर्ज करना शुरू कर दिया ईरान के
शाह को आयतुल्लाह खुमैनी के इस्लामिक
रेवोल्यूशन के कारण सत्ता छोड़नी पड़ गई
जो ईरान कभी अमेरिका और सऊदी का दोस्त हुआ
करता था व उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया

दूसरी तरफ सद्दाम हुसैन के नाम से भी इराक
में एक नया लीडर खड़ा हुआ जो आने वाले
सालों में कुवैत को वापस इराक का हिस्सा
बनाने के लिए इवेट कर देता है 80 के दशक

में ईरान और इराक के बीच में एक जंग हुई
जिसका मुख्य कारण यही था कि भैया सद्दाम
को डर था कि ईरान का शिया इस्लामिक
रिवोल्यूशन कहीं इराक में ना फैल जाए इस
जंग में सऊदी अरब द्वारा भी सद्दाम हुसैन
को पैसा सप्लाई किया जा रहा था क्योंकि

सऊदी अरब के सारे ऑयल वेल्स भी शिया
डोमिनेटेड इलाकों में हैं और यहां भी ईरान
का रिवोल्यूशन फैल सकता था इस शिया
रिवोल्यूशन को काउंटर करने के लिए और

मिडिल ईस्ट की अनस्टेबल पॉलिटिक्स को
देखते हुए 90 के दशक में अलकायदा जैसे
ग्रुप्स का भी राइज शुरू हो गया जो पूरे
मुस्लिम वर्ल्ड को एक ही देश बनाना चाहती
थी अब इसी का एक्सट्रीम रूप हमने आईएसआई

के रूप में भी देखा जिन्होंने लंबे समय तक
सीरिया और इराक के इलाकों पर कब्जा करके
रखा और वहां पर अपनी सरकार भी चलाई मिडिल
ईस्ट में आज भी ये सभी कॉन्फ्लेट्स जिंदा
हैं दोस्तों बस कुछ पर अभी दुनिया का
ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं जाता कदु

स्तान की डिमांड आज भी जारी है यमन का गृह
युद्ध आज भी जारी है ईरान और सऊदी के बीच
भी पिछले 2 सालों में ही रिश्ते बेहतर
होते हुए नजर आए हैं और इजराइल और
पलेस्टाइन का झगड़ा तो शायद अभी कई और

दशकों तक चलने वाला है लेकिन दुनिया की हर
कॉन्फ्लेट की तरह अरब वर्ल्ड की कॉन्फ्लेट
के पीछे भी अगर कोई फोर्स रही है तो वो है
यूरोप के कॉलोनियल देशों की फोर्स

जिन्होंने हमेशा अपने फायदे के लिए मैप्स
ड्रॉ किए और बाकी लोगों को इस तरह बांट
दिया आपको क्या लगता है कि क्या मिडिल
ईस्ट में कभी पूरी तरह से शांति स्थापित
की जा सकती है अपनी राय हमें कमेंट्स में

जरूर लिखिए उम्मीद है आपको आज के इस
वीडियो में काफी कुछ नया मिला होगा अगर
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