क्या सच में अंडमान निकोबार भारत के हिस्से में आते थे? | How Andman And Nicobar Became Part Of India? - instathreads

क्या सच में अंडमान निकोबार भारत के हिस्से में आते थे? | How Andman And Nicobar Became Part Of India?

दोस्तों भारत में आजादी के बाद रियासतों
के विलय की तो खूब कहानियां सुनाई जाती है
लेकिन भारत में आज कुछ ऐसे समुद्री द्वीप
भी हैं जिनकी आज अपनी इंपॉर्टेंस है और
उनके भारत में शामिल होने के लिए भी कई

तरह के प्रयास किए गए हैं दोस्तों आज हम
बात कर रहे हैं ऐसे ही द्वीप अंडमान
निकोबार की जो आज के समय भारत का एक बड़ा
टूरिस्ट पॉइंट बन गया है लेकिन एक समय था
जब अंडमान को लेकर भारत और ब्रिटेन की तय

नहीं कर का रहे द किसे कैसे बनते क्योंकि
यहां पर अपनी कोई रियासत तो थी नहीं जिसके
राजा यह तय करते की उन्हें किसके साथ जाना
है लेकिन अंडमान निकोबार के भारत में
शामिल होने की कहानी अपने आप में बहुत कुछ
आजादी के समय के टेंशन के बारे में बताती

है भाई जानते हैं इसकी पुरी कहानी
बात करें अगर अंडमान निकोबार के इतिहास की
तो वहां चोल साम्राज्य के महाराजा
राजेंद्र चोल द्वितीया पहले शासक हुए द
जिन्होंने अंडमान निकोबार को एक लेवल बेस
की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया उनके समय

में इन आइलैंड्स को मैन nakabram के नाम
से जाना जाता था उसके बाद 17वीं शताब्दी
में मराठा साम्राज्य के सेनापति कनोजी
अंग्रे ने अंडमान में अपना लेवल बेस बनाया

और 1755 आते-आते इस द्वीप पर यूरोपियन
लोगों का आगमन होने लगा इस कड़ी में अगर
सबसे पहले की बात करें तो दिसंबर 1755 में
डेनिस ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी इस

द्वीप पर आने वाले पहले यूरोपियन द और
उन्होंने इसे नाम दिया न्यू डेनमार्क
लेकिन लोग तो आते रहे लेकिन यहां रह पाना
बहुत मुश्किल होता रहा जाता है की 18वीं
सदी में कई दशक ऐसे रहे जिन्हें अंडमान

निकोबार को इंडिया के फैलाव की वजह से
छोड़ना पड़ा था जिसके चलते एक बार तो यूं
हुआ की ऑस्ट्रिया को गलतफहमी हो गई उन्हें
लगा डेनमार्क ने द्वीप खाली कर दिया है और
उन्होंने इस द्वीप का नाम थरेश आइलैंड्स

रख दिया लेकिन अंडमान में असली कहानी शुरू
होती है अंग्रेजों से जो
1858 में पहली बार भारत के अंडमान पहुंचे
और ब्रिटिशर्स ने पहली बार अंडमान ने अपनी
कॉलोनी बनाई लेकिन इस कॉलोनी की फेमस होने

की सबसे बड़ी वजह थी यहां की जेल जिसके
बारे में सबको पता ही होगा की अंग्रेज
यहां सेलुलर जेल बनाकर अपराधियों और
विरोधियों को सजा के लिए भेजने लगे द जिसे
कला पानी की सजा का नाम दिया गया और ये
चलता रहा लेकिन 40 के दशक में भारत जब

आजादी के कगार पर पहुंच गया था तो दुनिया
में दूसरा विश्व युद्ध छेड़ा जा रहा था
इसी युद्ध के दौरान 1943 में युवा की
जापान ने अंडमान निकोबार पर हमला कर दिया
और इस हमले के बाद यहीं पर जापान की मदद
से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद

की इंटीरियर गवर्नमेंट बना डाली लेकिन
सबको पता है की सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद
जापान का क्या हुआ वो जंग में बुरी तरह हर

गया ऐसे में 1945 में जापान की हर के बाद
अंडमान निकोबार दोबारा ब्रिटिशर्स का
कब्जे में ए गए लेकिन अब माहौल पहले जैसा
नहीं रहा क्योंकि जल्द ही ये उनके गले की
हड्डी बनने वाले द अब आया टाइम आजादी का

यानी बंटवारे का यानी रियासतों के भारत और
पाकिस्तान में विलय का और ऐसे में सारी
रियासतों की तरह अंडमान निकोबार पर भी
सवाल उठा की ये किसके पास जाएगा लेकिन

यहां पर अंग्रेजों का लालच था की वो इसे
अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते द
उनके लिए यह दीप स्ट्रैटेजिक इंपॉर्टेंस
का था क्योंकि यहां से न्यूजीलैंड और
ऑस्ट्रेलिया की कॉलोनी को डायरेक्ट सपोर्ट

मिलता था इसलिए मुकेश मिलिट्री इन द्वीपों
को ब्रिटेन के कब्जे में रखना चाहती थी
लेकिन उनके चाहने से कुछ नहीं होने वाला
था क्योंकि फैसला इंडिया इंडिपेंडेंस

कमेटी को करना था वहीं वॉइस से राय लड़
माउंटबेटन चाहते द की बंटवारे का मसाला
niptakar जल्दी से जल्दी यहां से निकाला
जाए इंडिया इंडिपेंडेंस बिल के ड्राफ्ट के
16 आर्टिकल में अंडमान निकोबार का मुद्दा

था लेकिन ये बात भारतीय राजनेताओं को
मालूम नहीं थी की अंग्रेज अंडमान निकोबार
को लेकर क्या सोच रहे हैं इस मामले में
माउंटबेटन और independeness कमेटी के बीच

कई सीक्रेट बातचीत हुई जिसमें माउंटबेटन
का कहना था की अंडमान निकोबार के लिए बीच
का रास्ता निकलना चाहिए उन्होंने शुरुआत
में प्रस्ताव दिया की भारत और ब्रिटेन
अंडमान निकोबार को जॉइंट कंट्रोल में ले

ले या ब्रिटेन इन द्वीपों को लीड पर मांग
ले लेकिन तभी यह खबर मीडिया में लीक हो गई
और ये खबर छपी की नए समझते के तहत अंडमान
निकोबार ब्रिटेन दिए जाने वाले हैं अब यह
सीक्रेट बातचीत का मुद्दा बाहर ए चुका था
माउंटबेटन चाहते द की अंडमान निकोबार के

मुद्दे पर भारत में एक और विद्रोह खड़ा हो
सकता है और तब उनका शांतिपूर्वक यहां से
निकलना मुश्किल हो जाएगा जबकि इंडिपेंडेंस

 

कमेटी आखिरी वक्त तक अंडमान निकोबार को
अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहती थी इस
तरह ये सीन था की भारत इन द्वीपों को नहीं
छोड़ना चाहता था और भारत के लोगों में

इसके खिलाफ विद्रोह था जिसे लेकर
माउंटबेटन को यहां से जाने में दर लगने
लगा और ब्रिटिश आर्मी अंडमान पर अपना
कब्जा जा रही थी अब इस सिचुएशन में आर्मी
के ऑफ स्टाफ ने ब्रिटिश कैबिनेट को नया

रास्ता सुखाया सुझाव यह था की अंडमान
निकोबार के लिए एक अलग कमिश्नर नियुक्त
किया जाए जो सीधे गवर्नर जनरल के अंडर कम
करेगा जब तक अंडमान निकोबार की सिचुएशन
साफ नहीं हो जाती और ऐसे में भारत
पाकिस्तान को कॉन्फिडेंस में लेकर

परिस्थिति मेंटेन राखी जाए दूसरी तरफ
माउंटबेटन ने इससे अलग सलाह दी उनका कहना
था की अभी के लिए अंडमान निकोबार को
स्वायत्त तय कर दी जाए और आगे जाकर जरूरत
के हिसाब से भारत से समझौता कर लिया जाएगा
माउंटबेटन ने इस मुद्दे पर नेहरू से बात

की नेहरू भी इसके लिए तैयार हो गए की ऐसे
किसी प्रस्ताव को भारत जरूर देखेगा
हालांकि उन्होंने इस बात की कोई गारंटी
नहीं दी की ऐसा कोई समझौता हो गई होगा

नेहरू और माउंट पैटर्न के बीच यह बात चली
रही थी की तभी एक तीसरे प्लेयर की एंट्री
हुई यानी जिन्ना यानी की muslimli यानी की
पाकिस्तान जिस पर जिन्होंने दवा किया की
बाकी भारत की तरह अंडमान निकोबार का भी
बंटवारा होना चाहिए बेसिकली वो भी अंडमान

पर अपना दवा पेश करने के लिए आए द
इन्होंने अंडमान निकोबार पर पाकिस्तान का
दवा पेश करते हुए कुछ तर्क दिए जिसमें
जिन्ना का कहना था की पाकिस्तान एक होकर
भी दूर है जिसके दो हसन के बीच में भारत
पड़ता है संभव है की अगर किसी लेकिन भारत

ने रास्ता देना बंद कर दिया तो पूर्वी और
पश्चिमी पाकिस्तान के बीच सिर्फ समुद्र से
रास्ता बचेगा और ऐसे में उनके लिए अंडमान
निकोबार की इंपॉर्टेंस बहुत बढ़ जाती है
जिन्ना का दूसरा तर्क ये था की अंडमान

निकोबार ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा
नहीं रहे वहां के अधिकतर जनसंख्या आदिवासी
है और उनके भारत से ना तो धार्मिक ना ही
सांस्कृतिक रूप से संबंध रहे हैं जिन्ना
की कोशिश थी की हिंदू मुस्लिम वाला एंगल

इस्तेमाल में लाया जाए क्योंकि अभी तक ये
तय हुआ था की हिंदू बहुल इलाके भारत में
आएंगे और मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में
जिन्होंने इसी वास्ते ब्रिटेन के
प्रधानमंत्री क्लेमेंट अटली और विपक्ष के
नेता विंस्टन चर्चिल को हक भी लिखा

 

charchel जिन्ना के अच्छे दोस्त द
माउंटबेटन को खत लिखकर उनसे राय पूछी
माउंटबेटन ने नेहरू से उनकी राय पूछी और
नेहरू 1947 की जनगणना लेकर ए गए जिसके
हिसाब नमन निकोबार की जनसंख्या 34000 के

आसपास थी इनवाइट हजार मुसलमान 12000 हिंदू
सिख ईसाई मिलाकर और बाकी आदिवासी द जिन्ना
ने जवाब में कहा की इससे ये साबित होता है
की हिंदू यहां बहुत संकेत नहीं है तब
नेहरू ने यहां पर एक और गेंद खेला है और

कहा की वहां मेजॉरिटी पापुलेशन नॉन
मुस्लिम है इसलिए इसे पाकिस्तान में नहीं
दिया जा सकता साथ ही उन्होंने भारत और
अंडमान के ऐतिहासिक रिश्तों को भी याद
दिलाते हुए बताया की अंडमान में काफी
संख्या में लोग मद्रास केरल और बंगाल से

आकर बस है और यहां की ज्यूडिशरी भी
कोलकाता हाई कोर्ट के अधीन आता है इसलिए
भारत का अंडमान निकोबार पर हक श्रापित
होता है अब सिर्फ एक सवाल बाकी था क्या वो

अगर भारत किसी दिन पाकिस्तान को अपने
एयरप्रेस का इस्तेमाल करने से रोक दे दो
जो की जिन्ना के सबसे बड़ा लॉजिक था लेकिन
नेहरू उसके लिए भी तैयार द और इस पर नेहरू
ने समुद्री रास्ते का मैप मंगवाया और इस
साबित कर दिया की कराची से चटगांव पश्चिमी
पाकिस्तान से बांग्लादेश के रास्ते में

अंडमान यानी के बाहर जाने की जरूरत ही
नहीं है तो ऐसे में अगर भारत अपना रास्ता
बंद भी करता है तो उन्हें समुद्री रास्ते
के लिए अंडमान निकोबार की जरूरत नहीं

पड़ेगी बस फिर क्या था जिन्ना शांत हो गए
और माउंटबेटन ने यही जवाब रिटर्न पीएम
atlav भेज दिया अटल इतने पर भी तैयार ना
हुए उन्होंने एक नया प्रस्ताव देते हुए

कहा की जब तक अंडमान निकोबार का हाल ना हो
इस इंडिपेंडेंस बिल से अलग रखा जाए अब
आखिरी बॉल माउंटबेटन के पार्ले में थी
इन्होंने इंडिपेंडेंस कमेटी को राय देते

हुए कहा की बंटवारे की अंतिम घड़ी में
अंडमान निकोबार को लेकर बात बिगड़ सकती है
इसलिए इस मुद्दे पर ब्रिटेन बाद में अलग
से भारत से चर्चा करें आखिरकार माउंट
ब्रिटेन की बात मैन ली गई और अंडमान

निकोबार भारत के हिस्से में दे दिया गया
इसका एक बड़ा कारण यह भी रहा की अटली को
उम्मीद थी की नेहरू और माउंटबेटन की
दोस्ती के चलते आगे जाकर उन्हें अंडमान
में पोस्ट बनाने की इजाजत मिल जाएगी

हालांकि ऐसा हुआ नहीं नेहरू ने ब्रिटेन से
ऐसा कोई समझौता करने से इनकार कर दिया जिस
भारत की जमीन को विदेशी मिलिट्री पोस्ट के
तौर पर इस्तेमाल किया जा सके इस तरह से
नेहरू की समझदारी से भारत ने अंडमान को

भारत का हिस्सा बना लिया दोस्तों आपको
क्या लगता है क्या नेहरू ने अगर सही टाइम
पर अंग्रेजों और जिन्ना से अंडमान निकोबार
के लिए जरूरी जानकारियां और लॉजिक नहीं

पेश किए होते तो क्या आज यह दूरी भारत का
हिस्सा हो पता आप अपनी राय हमें कमेंट
करके बताइए साथ ही वीडियो पसंद आए तो इस
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