क्या होगा अगर रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो ? | What Happen If The Rupee Continues To Fall Like This ? - instathreads

क्या होगा अगर रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो ? | What Happen If The Rupee Continues To Fall Like This ?

दोस्तों एक वक्त था जब डॉलर के मुकाबले
रुपए में गिरावट और पीएम की एज का
कंपैरिजन किया गया आज भी इसकी नरमी को
लेकर सवाल उठ रहे हैं विपक्ष का कहना है
कि भाई सरकार इकॉनमी और संभाल नहीं पा रही

साल की शुरुआत में ही डॉलर के मुकाबले
रुपया % से ज्यादा गिर चुका है 19 जनवरी
को यह
83.119990 द 26 तक पहुंच गई थी यह इसका अब
तक का सबसे निचला लेवल था तब वित्त मंत्री

निर्मला सीतारमण का कहना यह था कि रुपया
दूसरी कई करेंसीज के कंपैरिजन में बेहतर
कंडीशन में है रुपया कमजोर नहीं हो रहा है
बल्कि डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है लेकिन

क्या सच में डॉलर मजबूत हो रहा है या
रुपया कमजोर या फिर दोनों एक ही बात है
जिसे घुमा फिरा कर कहा जा रहा है चलिए
देखते हैं कि रुपए से जुड़ी यह पूरी

तस्वीर कैसी है इससे भारत पर क्या असर पड़
सकता है अगर ऐसे ही रुपया कमजोर होता रहा
तो क्या होगा और हम रुपए को कैसे संभाल
सकते हैं आइए पहले देख लेते हैं डॉलर के

मुकाबले बाकी करेंसीज की क्या हालत है
सबसे पहले डॉलर वर्सेस करेंसी देखिए
करेंसी की वैल्यू से किसी भी देश की
इकोनॉमिक स्ट्रेंथ का पता चलता है अभी

दुनिया में 80 प्र से ज्यादा ट्रेड डॉलर
में हो रहा है तमाम देशों के सेंट्रल बैंक
जो फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स रखते हैं उसका
करीब 65 प्र हिस्सा डॉलर में है और यही है

डॉलर की ताकत और इस डॉलर के सामने रुपया
ही नहीं लगभग हर करेंसी कमजोर हो रही है
रुपया अगर इस साल अब तक 1 प्र से ज्यादा

गिरा है तो जापानी येन पिछले 20 दिनों में
148 के नीचे जा चुका है डॉलर के मुकाबले
इंडोनेशिया का रुपया लगभग
15597 सिंगापुर डॉलर 1.34 और हांगकांग

डॉलर 7.82 तक चला गया है साउथ कोरियन वॉन
38.8 7 और ब्रिटिश पंड 0.1 प्र तक गिरे
हैं यूरो भी इस साल अब तक 0.2 प्र तक गिर
चुका है चाइनीज रेन मेंबी की वैल्यू भी %
घट चुकी है हालांकि कई करेंसीज में काफी

कम गिरावट दिख रही है खैर यह तो थी डॉलर
के मुकाबले बाकी करेंसीज की नरमी की बात
लेकिन सवाल तो यह है कि भाई भारतीय रुपए
के कंपैरिजन में डॉलर के मजबूत होने के

पीछे बेसिक रीजन क्या है व्हाई डॉलर इज
राइिंग देखिए यूक्रेन युद्ध के चलते पूरा
यूरोप बेहाल है रूस से सप्लाई रुकने के
बाद नेचुरल गैस के दाम उछल गए हैं जर्मनी

से लेकर फ्रांस ब्रिटेन और तुर्की में
महंगाई आसमान छू रही है और जैसा कि हम बता
भी चुके हैं कि ज्यादातर ट्रेड डॉलर में
होता है तो महंगाई की वजह से डॉलर की

डिमांड बढ़ रही है डिमांड बढ़ने की वजह से
उसकी कीमत इसलिए डॉलर को खरीदने के लिए
ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं ऐसे
में रुपए की कीमत कम हो रही है या रुपया

कमजोर हो रहा है इसका एक और फैक्टर है
अमेरिका में ब्याज दरों में इजाफे का
अमेरिका में महंगाई आसमान पर है उस पर
काबू पाने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व
ब्याज दर को बढ़ा रहा है 2023 में पॉलिसी

रेट कई प्रतिशत तक बढ़ गए थे इसका असर यह
हुआ कि भाई उन प्रोडक्ट से कमाई बढ़ गई जो
डॉलर का यूज करते हैं इसका एक एग्जांपल है
अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बॉन्ड सरकार और
कंपनियों के लिए पैसे उधार लेने का एक

तरीका होता है जिसके तहत फ्यूचर में एक
इंटरेस्ट के साथ पैसे वापस करने का वादा
किया जाता है सरकारी बॉन्ड आमतौर पर सेफ

माने जाते हैं हाल के दिनों में निवेशक
लाखों डॉलर खर्च कर अमेरिकी बॉन्ड खरीद
रहे हैं उन्हें इन बॉन्ड्स को खरीदने के
लिए डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं और बढ़ती

हुई डिमांड के कारण डॉलर की कीमत बढ़ी है
अब जब इन्वेस्टर डॉलर खरीदने के लिए दूसरी
करेंसीज का इस्तेमाल करते हैं तो उन
करेंसीज की कीमत गिर जाती है अमेरिका में

महंगाई दर में बढ़ोतरी से मार्च 2024 तक
ब्याज दरें घटने की कोई उम्मीद नहीं है
इसके अलावा अमेरिका में कर्ज महंगा होने
से वहां की ग्रोथ सुस्त हो गई है और इसका

असर बड़ी टेक कंपनियों पर पड़ रहा है
क्योंकि भारतीय टेक कंपनियों की करीब 40
फीदी कमाई अमेरिका से ही तो होती है
लिहाजा इसका असर इन कंपनियों के ग्रोथ पर

भी होगा अब भारतीय टेक कंपनियों की कमाई
घटने से जॉब पर रिस्क पैदा होगा और छटनी
की आशंका बढ़ जाएगी वैसे ही आईटी सेक्टर
अभी चुनौतियों से जूझ रहा है इतना ही नहीं

शेयर बाजार में लिस्टेड फॉरेन कंपनीज के
अलावा भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनीज के शेरों
में भी गिरावट आई है जिसकी वजह से विदेशी
इन्वेस्टर दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स और

भारत से पैसा निकालने लगे हैं पिछले साल
अक्टूबर से यह सिलसिला चल रहा है क्योंकि
अमेरिका में उन्हें रिस्क फ्री बेहतर रिटन
जो दिख रहा है इस निकासी से भी रुपए पर
दबाव पड़ा है क्योंकि वे रुपए के बदले

डॉलर खरीद रहे हैं यानी डॉलर की डिमांड इस
तरह भी बढ़ रही है इकॉनमी से जुड़ा रिस्क
जब भी बढ़ता है इन्वेस्टर्स सेफ माने जाने
वाले डॉलर की ओर ही भागते हैं नाउ व्हाट
इज द रोल इंपोर्ट एंड एक्सपोर्ट इन रुपीज

वीकनेस देखिए रुपए की कमजोरी और डॉलर की
मजबूती में इंपोर्ट एंड एक्सपोर्ट को भी
बड़ा रोल माना जाता है इसके पीछे भी एक
फैक्टर है यह फैक्टर है भारत का बढ़ता

करंट अकाउंट डेफिसिट आरबीआई के डाटा के
मुताबिक 2022 से 23 में 67 बिलियन डॉलर का
करंट अकाउंट डेफिसिट रहा जो भारत की
जीडीपी का 2.1 प्र था जबकि 2021 से 22 में

चालू खाता घाटा 8.7 बिलियन डॉलर का था
हालांकि वित्त वर्ष 2023 से 24 की दूसरी
तिमाही में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट
कम होकर 9.2 बिलियन डॉलर का रहा जो कि
जीडीपी का 1 फ है अब इसकी वजह है सर्विसेस

एक्सपोर्ट में उछाल आरबीआई ने बताया कि
साल दर साल सर्विस सॉफ्टवेयर बिजनेस और
ट्रैवल एक्सपोर्ट में 4.2 पर की ग्रोथ हुई
है इसके चलते नेट सर्विस रिसी भी बढ़ा है

इसका मतलब गुड्स और सर्विस सेक्टर में
जितना पैसा बाहर से आया उसकी तुलना में कम
पैसा देश के बाहर गया है यह किसी देश के
टोटल इंटरनेशनल व्यापार का रिकॉर्ड रखने

वाले कंपोनेंट बैलेंस ऑफ पेमेंट का एक
पार्ट है इसके जरिए देश यह पता लगाते हैं
कि उनके देश से विदेशों में बेचे गए गुड
से कितनी आमदनी हुई है और विदेशों से सा

सामान इंपोर्ट करने में उन्हें कितना खर्च
करना पड़ा है अगर एक्सपोर्ट से कमाई गई
आमदनी इंपोर्ट के लिए किए गए खर्च के

मुकाबले कम होती है तो इसे करंट अकाउंट
डेफिसिट यानी चालू खाता घाटा कहते हैं
वहीं अगर इंपोर्ट के लिए किया गया खर्च
एक्सपोर्ट से हुई आमदनी की तुलना में

ज्यादा है तो इसे करंट अकाउंट सरप्लस कहा
जाता है इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स के अकॉर्डिंग
बिगड़ते ट्रेड बैलेंस तेल की बढ़ती कीमतों
और इंपोर्ट में बढ़ोतरी की वजह से करंट

अकाउंट डेफिसिट फिर से बढ़ने की आशंका है
यह घाटा जितना बढ़ेगा उसका मतलब यह होगा
कि भाई भारत को अपने इंपोर्ट पर खर्च के

लिए और ज्यादातर डॉलर की जरूरत पड़ेगी
भारत की ऑयल कंपनियां पहले ही बड़े पर
डॉलर खरीद रही हैं यह जरूरत जितनी ज्यादा

बढ़ेगी रुपए पर दबाव उतना ही बढ़ेगा अब
आते हैं इस सवाल पर कि भाई रुपए के मामले
में भारत क्या कर सकता है हम रुपए को 83
से नीचे कैसे संभाल सकते हैं व्हाट इज

इंडिया प्लान ऑन रुपीज फॉलिंग एक रास्ता
तो फिस्कल पॉलिसी की ओर से निकलता है
लेकिन उधर कुछ खास करने की गुंजाइश दिख
नहीं रही इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने अनुमान
लगाया कि अमेरिका और यूरोप की ग्रोथ सुस्त

पड़ी है अमेरिका में एक महीने पहले की
तुलना में कोर इंफ्लेशन में 0.3 पर का उछल
आया है विकसित देशों में महंगाई चार दशकों
के ऊंचे स्तर पर है वहां मंदी आने का खतरा

बढ़ गया है लिहाजा वहां भारत की गुड्स और
सर्विसेस की डिमांड घटी है देश में डिमांड
बढ़ाकर इसकी भरपाई हो सकती है लेकिन कुछ
हद तक ही ऊंची महंगाई के बीच देश में

चीजों और सेवाओं की डिमांड बढ़ाने के लिए
टैक्स घटाना होगा इससे चीजों और सेवाओं की
डिमांड बढ़ेगी इकॉनमी सटेल होगी अब ऐसा
होने पर भारत के बारे में विदेशी
इन्वेस्टर्स का भरोसा भी मजबूत होगा लेकिन

टैक्स घटने से सरकार के रेवेन्यू पर असर
पड़ेगा वैसे भी आम बजट के मुताबिक वित्त
वर्ष 2023 से 24 में राजकोषीय घाटा जीडीपी
के 5.9 प्र के आसपास रहेगा अभी कर्ज का

स्तर भी बहुत बढ़ गया है सरकारी कर्ज और
जीडीपी का रेशियो लगभग 90 प्रति हो चुका
है 2022 से 23 में सरकारों का कुल कर्ज
सकल घरेलू उत्पाद का 86.5 पर था जो पिछले

40 सालों में सबसे ज्यादा में से एक है इन
हालात को देखते हुए सरकार के पास राजकोषीय
मदद देने की गुंजाइश बहुत कम रह गई है एक
और रास्ता है विदेशी मुद्रा भंडार के
इस्तेमाल का डॉलर की बढ़ती डिमांड का दबाव

घटाने के लिए आरबीआई डॉलर बेचे आरबीआई ने
ऐसा किया भी है लेकिन इससे बात तो नहीं
बनी उल्टे साल भर में विदेशी मुद्रा भंडार
करीब 110 अरब डॉलर घट गया अब जाकर आरबीआई

ने डॉलर बेचने से कुछ परहेज शुरू किया है
दरअसल मौजूदा हालत में विदेशी मुद्रा
भंडार के इस्तेमाल से कुछ होने वाला भी
नहीं है देखिए करंट अकाउंट डेफिसिट अगर
मामूली होता तो डॉलर बेचने से कुछ मदद मिल

सकती थी लेकिन मामला ऐसा है नहीं भाई खैर
एक रास्ता और है अमेरिका में ब्याज दरें
बढ़ रही हैं तो विदेशी इन्वेस्टर्स यहां
से पैसे निकाल रहे हैं इन्वेस्टर्स को
अट्रैक्ट करने के लिए आरबीआई भी ब्याज तरह

बढ़ा रहे लेकिन दिक्कत यह है कि भाई
अमेरिका फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर और 125
बेसिस पाउंड बढ़ाने का इंडिकेशन दिया है
भारत में इस तरह के इजाफे की गुंजाइश नहीं
है क्योंकि इससे इकोनॉमिक रिकवरी को बड़ा

झटका लग सकता है अब ऐसे में ठीक यही लग
रहा है कि रुपए को सहारा देने के लिए
विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल ना किया
जाए आरबीआई रुपए की चाल में तब तक कोई दखल

ना दे जब तक कि इसमें अचानक बहुत तेज
गिरावट ना आए बाजार के हिसाब से यह जहां
तक गिरता है गिरने दे इस रणनीति के फायदे
भी हैं एक फायदा तो यही है कि विदेशी

मुद्रा भंडार के इतने बड़े इस्तेमाल की
जरूरत नहीं रहेगी फॉरेन एक्सचेंज बचा
रहेगा तो अचानक लगने वाले किसी भी बाहरी
झटके से इकॉनमी को बचाने में काम आएगा एक

फायदा यह हो सकता है कि रुपया नरम रहेगा
तो इंडियन एक्सपोर्ट्स को फायदा मिलेगा
ट्रेड डेफिसिट और करंट अकाउंट डेफिसिट
घटाने के लिए इंपोर्ट घटाने के साथ-साथ

एक्सपोर्ट्स बढ़ाना भी जरूरी है ग्लोबल
मार्केट में चीन का दबदबा कुछ घटता दिख
रहा है उस जगह को भरने के लिए सरकार को
एक्सपोर्ट्स पर सब्सिडी देने जैसे कदम
उठाने होंगे लेकिन रुपए में कमजोरी इस

मामले में कहीं ज्यादा कारगर साबित हो
सकती है हालांकि रुपए में कमजोरी बढ़ने से
महंगाई को और हवा मिल सकती है क्योंकि
रुपया जितना कमजोर होगा ना भाई इंपोर्ट की
जाने वाली चीजों की लागत उतनी ज्यादा होती

जाएगी लेकिन महंगाई के मामले में इस पहलू
का बड़ा असर तब तक नहीं पड़ेगा जब तक कि
आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी सख्त बनी रहेगी
कुल मिलाकर इस स्ट्रेटेजी में फायदा

ज्यादा है नुकसान कम और अच्छी बात तो यह
है कि भाई आरबीआई अब ऐसी राह पर आ चुका है
अब यहां से आके अमेरिकी फेडरल रिजर्व जब
तक रेट बढ़ा तो रहेगा तब तक रुपए पर दबाव
बना रहेगा आरबीआई को इसमें दखल नहीं देना

चाहिए और मार्केट के हिसाब से रुपए को
एडजस्ट होने देना चाहिए ध्यान केवल इतना
रखना होगा कि रुपया इतना कमजोर ना हो जाए
कि इंपोर्ट बिल बहुत ज्यादा बढ़ जाए लेकिन
जरा सोचो अगर रुपए की कीमत कम होने की

बजाय बढ़ जाए और एक रुप यूएस के $ लर के
बराबर हो जाए तो क्या होगा इफ ₹1 बिकम
इक्वल टू $ देखिए दोस्तों जिस दिन इंडियन
रुपए की कीमत यूएस डॉलर के बराबर हो जाएगी

ना तो भारत को सबसे ज्यादा प्रॉफिट उन
चीजों पर होगा जिन्हें भारत इंपोर्ट करता
है क्योंकि इंटरनेशनल मार्केट में सामान
को खरीदना बहुत सस्ता हो जाएगा इसे एक

एग्जांपल से समझिए जैसे एक
iphone7 है वहीं इसकी कीमत अमेरिका में
मुश्किल से $950 है मतलब अगर रुपए और डॉलर
की कीमत बराबर हो जाएगी तो हम केवल ₹ में
iphone’s सॉफ्टवेयर और वो सभी सामान

जिन्हें भारत दूसरे देशों से खरीदता है
उनकी प्राइसेस में कमी आएगी क्योंकि फिर
इंडिया को यह सामान खरीदने के लिए जो है
83 गुना ज्यादा कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी

लेकिन ऐसा नहीं है इसके केवल प्रॉफिट्स ही
होंगे बल्कि डॉलर और रुपए की कीमत सामान
होने पर इंडिया को कई नुकसान भी झेलने
पड़ेंगे जैसे इंडिया में जितनी भी आईटी

कंपनीज हैं ज्यादातर यूएसए यूके और कनाडा
द्वारा इंडिया में ओपन की गई हैं वह सभी
बंद हो जाएंगी दरअसल रुपए की कीमत कम होने
की वजह से इन्हें अभी लो प्राइस पर काम
करने के लिए वर्कर्स मिल जाते हैं लेकिन

रुपए की कीमत यूएस डॉलर के बराबर हो जाने
पर इस लो प्राइस पर कोई काम नहीं करेगा
जिससे इंडिया में यह सभी कंपनीज बंद हो
जाएंगी परिणाम स्वरूप इंडिया में
अनइंप्लॉयमेंट बढ़ जाएगा फॉरेन

इन्वेस्टमेंट कम हो जाने के कारण विदेशों
से भारत में आने वाला पैसा एकदम बंद हो
जाएगा इसका प्रॉफिट पाकिस्तान को मिल सकता
है हो सकता है सभी कंपनीज इंडिया से
पाकिस्तान ही चली जाए ₹1 एक यूएस डॉलर के

बराबर होने से जो चीजें अभी हम सस्ते में
एक्सपोर्ट कर रहे थे वह सभी महंगी हो
जाएंगी जिससे कोई भी भारत की अपेक्षा किसी
और देश से सामान खरीदना चाहेगा जहां से
उसे सस्ता माल मिलेगा विदेशों से आने वाले

टूरिस्ट में रिडक्शंस होगा क्योंकि अभी
जिनको इंडिया सस्ता लगता है उन्हें इंडिया
कॉस्टली लगने लगेगा $ लर एक ₹1 के बराबर
होने पर इंडियन गवर्नमेंट को मिलने वाले

टैक्सेस पर एक बुरा असर भी पड़ेगा क्योंकि
अनइंप्लॉयमेंट बढ़ने और बाहर की कंपनीज का
इन्वेस्टमेंट घटने की वजह से प्रोडक्शन
में कमी आएगी और प्रोडक्शन नहीं होगा तो

भाई गवर्नमेंट को उतना टैक्स भी नहीं
मिलेगा जिसका इफेक्ट गवर्नमेंट रेवेन्यू
पर पड़ेगा नाउ व्हाट डज द स्ट्रेंथ ऑफ
करेंसी डिपेंड ऑन हालांकि डॉलर की

हिस्ट्री को देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता
कि ₹1 की कीमत अमेरिका के $ डॉलर के बराबर
होगी किसी भी कंट्री की करेंसी की स्ट्र
दो चीजों पर डिपेंड करती है एक तो

प्रोडक्टिविटी ऑफ द पीपल पर मतलब किसी
कंट्री के लोग अदर कंट्री के लोगों की
तुलना में कितना अधिक प्रोडक्शन करते हैं
और दूसरा इंफ्लेशन पर अगर प्रोडक्शन कम है
तो इंफ्लेशन बढ़ेगी जिससे करेंसी की

डिमांड और वैल्यू बढ़ेगी वहीं प्रोडक्शन
ज्यादा है तो लो इंफ्लेशन यानी मंदी आएगी
जिससे करेंसी की डिमांड और वैल्यू कम होगी
अगर अमेरिका की करेंसी इंडिया की करेंसी
की तुलना में लगातार लो इंफ्लेशन से होकर

गुजरती है और लगातार कई सालों तक ऐसी
सिचुएशन बनी रही तो अमेरिका की करेंसी की
वैल्यू बहुत नीचे गिर जाएगी जिससे होगा यह
कि भाई जहां इंडिया में तो एक व्यक्ति की

सैलरी 50000 ही रहेगी वहीं अमेरिका में भी
लो इंफ्लेशन की वजह से वहां के एक व्यक्ति
की सैलरी $50000 होगी तो ऐसी सिचुएशन में
इंडिया का ₹1 अमेरिका के एक डॉलर के बराबर
हो सकता है हालांकि अमेरिका एक डेवलप्ड

कंट्री है जबकि इंडिया अभी डेवलपिंग
कंट्री है तो ₹1 इज इक्वल टू एक अमेरिकी
डॉलर की सिचुएशन इंडिया के लिए अच्छी नहीं
है इंडियन रुपए की वैल्यू बढ़नी चाहिए
लेकिन एकदम से चेंज नहीं होने चाहिए बल्कि

प्रोडक्टिविटी और डिमांड को बढ़ाकर भारत
को इंडियन रुपए की वैल्यू को मजबूत करने
की जरूरत है खैर उम्मीद करते हैं आपको
वीडियो समझ आई होगी अगर आप ऐसे ही टॉपिक्स
पर और भी वीडियोस चाहते हैं तो कमेंट जरूर करें

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