क्यों Indian Air Force ने अपने ही लोगों पर बरसाए थे बम ? | Why Indira Gandhi Airstriked In Mizoram ? - instathreads

क्यों Indian Air Force ने अपने ही लोगों पर बरसाए थे बम ? | Why Indira Gandhi Airstriked In Mizoram ?

देखिए बात है 10 अगस्त 2023 की जब
प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के अविश्वास
प्रस्ताव पर संसद में बोल रहे थे तब
विपक्ष जो है लगातार उन्हें मणिपुर हिंसा
को लेकर घेर रही थी जिसके जवाब में

उन्होंने मिजोरम की एक घटना का जिक्र किया
और जिसके बाद पूरा सदन तालियों की
गड़गड़ाहट से गूंज उठा एक्चुअली पीएम मोदी
ने अपने जवाब में कांग्रेस को ही लपेटे
में ले लिया उन्होंने कहा कि 5 मार
1966 वायु सेना से हमला करवाया क्या

मिजोरम के लोग मेरे देश के नागरिक नहीं थे
क्या निर्दोष नागरिकों पर हमला
करवाए 5 मार्च को आज भी पूरा मिजोरम शोक
मनाता है और कांग्रेस ने इस सच को देश के
सामने छुपाया है दोस्तो कभी इन्होंने महम
लगाने की कोशिश नहीं की अब पीएम मोदी ने
मिजोरम की जिस घटना का जिक्र किया है वो
तब की थी जब सत्ता में कांग्रेस थी थी और
प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी लेकिन सवाल

यहां पर यह है साहब कि आखिर इंदिरा गांधी
ने ऐसा किया क्यों था ऐसी क्या नौबत आन
पड़ी थी कि भैया भारतीय वायु सेना ने अपने
ही देश में निर्दोष नागरिकों पर हमला कर
दिया और क्या वाकई ऐसा हुआ था आखिर पूरा

मामला है क्या इसे समझने के लिए हमें
इतिहास में झांकना पड़ेगा तारीख थी 5
मार्च 1966 की जब इंडियन एयरफोर्स के
फाइटर जेट्स मिजोरम के सबसे मेन शहर आइजोल
में मंडरा रहे थे अचानक से उन जेट्स ने

मशीन गन से गोलियां बरसाने लगी और पूरे
शहर में अफरातफरी मच गई यह सिलसिला यहीं
नहीं रुका अगले दिन फिर से वे विमान आकाश
में दिखे जिससे लोगों में दहशत फैल गई
लेकिन वे कुछ करते उससे पहले ही एयरफोर्स

के विमानों से बम बरसने लगे कईयों की तो
मौत हो गई शहर के चार मेन इलाके रिपब्लिक
विंग हमे वंग डव पई वंग और छिंगा वंग पूरी
तरह से इस बमबारी में तबाह हो गए कुछ
रिपोर्ट्स के अकॉर्डिंग पूरे आइजोल शहर

में आग लग गई थी इस घटना में 13 आम नागरिक
मारे गए आजादी के बाद का यह पहला और आखिरी
मामला है जब अपने ही देश की वायु सेना ने
अपने ही देश के नागरिकों पर बमबारी की हो
और यह इंदिरा गांधी के आदेश से ही हुआ था
देश में अलगाववाद के आंदोलन तो बहुत हुए

हैं बहुत सी लाशें गिरी हैं दंगे भी हुए
हैं लेकिन वायुसेना के विमानों ने कभी
बमबारी की हो ऐसा केवल इंदिरा गांधी की ही
सरकार में हुआ उससे भी ज्यादा आप हैरान तब
हो जाएंगे जब यह जानेंगे कि इस बमबारी की
खबर सालों तक सरकार ने बाकी देश को जनता

को पता नहीं चलने दी और जब पता चली तब भी
सरकार ने उसकी कन्फर्मेशन नहीं की अब जब
सरकार को घेरा जाने लगा तो मार्च 1966 में
कलकाता के अखबार हिंदुस्तान स्टैंडर्ड में
इंदिरा गांधी का एक बयान छापा जिसमें
उन्होंने कहा था कि विमान केवल जवानों और

उनके राशन को एयर ड्रॉप करने के लिए भेजे
गए थे तब सवाल यह भी उठा कि भैया राशन
पहुंचाने के लिए चार-चार जेट फाइटर्स की
क्या जरूरत थी भला अब दिलचस्प बात यह भी
है कि यह फाइटर जेट्स उसी फ्रांसीसी कंपनी
दि सॉल्ट के एयरक्राफ्ट थे जिनके फाइटर

प्लेन राफेल को लेकर मोदी के जमाने में
इंदिरा गांधी के नाती राहुल गांधी ने काफी
बबाल किया था डि सॉल्ट का मीनिंग होता है
हमले के लिए वहीं इन रेगन फाइटर जेट्स का
निकनेम तूफानी रखा गया था ऐसे चार फाइटर्स

जेट ने 13 मार्च तक आइजोल पर ऐसा कहर
बरसाया कि शहर के सारे लोगों को घर छोड़कर
पहाड़ों और जंगलों में भागना पड़ा मिजोरम
में वैसे भी 90 फीसद से ज्यादा जंगल है अब
सोचिए छोटे बच्चे और बुजुर्गों का क्या

हाल हुआ होगा सोचिए जिनके घरों पर बम गिरे
होंगे लाशें गिरी होंगी वे किससे मदद
मांगेंगे जब सरकार ही बम बरसा रही हो अब
आपके दिमाग में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि
आखिर ऐसा क्या मामला था कि इंदिरा गांधी
को ऐसा स्टेप उठाना पड़ा एक्चुअली यह

विवाद तो आजादी से पहले का ही है देखिए जब
18954 आदिवासियों के साथ हुई कई लड़ाइयां
के बाद अंग्रेजों ने इस इलाके पर कब्जा कर
लिया था उसके बाद वहां पर ईसाई मिशनरियों
पहुंची और लगभग सारी जनता का धर्मांतरण
करा दिया गया अंग्रेजी फौज के आगे उनकी
क्या ही चलती वैसे भी ईसाई बनने के बाद

उन्हें कई सुविधाएं मिल रही थी अब ऐसे में
वहां के ज्यादातर लोगों ने धर्मांतरण तो
कर लिया वहां आज भी 87 फीदी से ज्यादा
जनता जो है ईसाई है खैर आजादी के बाद
अंग्रेज तो चले गए लेकिन अपनी मिशनरियों

यहां छोड़ गए अब मिजोरम को उस समय मिजो
हिल्स के नाम से जाना जाता था जिसका
ज्यादातर हिस्सा असम में हुआ करता था मिजो
यूनियन के बैनर तले मिजो नेता असम के
नेताओं पर आरोप लगा रहे थे कि वे लोग
मिजोरम क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार कर

रहे हैं इसलिए हमें जो है भैया अलग राज्य
चाहिए अब हो सकता है अगर उन्हें तभी अलग
मिल जाता तो बात इतनी आगे ना बढ़ती और बात
महज अलग राज्य की नहीं थी उनकी एक्चुअल
प्रॉब्लम असमय लैंग्वेज जो 1960 में असम
सरकार ने बिना मिजो नेताओं से पूछे राज्य
की आधिकारिक लैंग्वेज डिक्लेयर कर दी थी

सीधे-सीधे कहें तो जिसे असमय भाषा नहीं
आती उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी
अब इधर नेहरू जी ने एक एक और बड़ी गलती कर
दी व यह थी कि 1959 से 60 में जब मोटम
अकाल पड़ा तो सरकार ने मिजो आदिवासियों को
अकेले मरने के लिए छोड़ दिया था उन्हें

दावा आज भी मिजो नेता करते आए हैं तब इस
प्रॉब्लम से निकलने के लिए 28 फरवरी 1961
को मिजो नेताओं ने मिलकर एक संगठन बनाया
मिजो नेशनल फे माइन फ्रंट यानी कि एमएनएफ
जिसके नेता थे लाल डेंगा इस संगठन ने

गांव-गांव पहाड़ी पहाड़ी जाकर लोगों की
अकाल से उभरने में मदद की जिसकी वजह से
लोग इस संगठन की काफी इज्जत करने लगे वहीं
भारतीय सरकार के खिलाफ अलगा बाद की भावना
भी भड़कने लगी अब शुरुआत में तो इस संगठन
ने शांतिपूर्ण तरीके से धरने के जरिए अपनी
बात रखनी शुरू की लेकिन इस बीच 1964 में

असमय भाषा लागू होने की वजह से असम
रेजीमेंट ने अपनी सेकंड बटालियन को
बर्खास्त कर दिया अब इसमें अधिकतर जो लोग
थे वोह मिजो थे जिससे मिजो हेल्स के लोगों
में नाराजगी और ज्यादा बढ़ गई थी और

शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने वाला
एमएनएफ हिंसा पर उतर आया वहीं इस दौरान जो
मिजो वासी बटालियन से निकाले गए थे वे
एमएनएफ में शामिल हो गए इन्हीं लोगों ने
मिलकर मिजो नेशनल आर्मी बनाई और अगले 5
सालों में इस संगठन ने भारत के विरोधी

देशों से मेलजोल करके अपनी ताकत काफी बढ़ा
ली जिसने आठ मिजो हीरोज के नाम पर आर्म्ड
बटालियंस खड़ी कर दी बॉर्डर से सटे होने
की वजह से तब के पूर्व पाकिस्तान यानी आज
के बांग्लादेश से मिजो नेशनल आर्मी को

सीधे सैन्य मदद मिलने लगी बॉर्डर पार से
हथियार भी खूब आए धीरे-धीरे चीन भी इस
साजिश में शामिल हो गया और गुपचुप तरीके
से एमएनएफ को सपोर्ट करने लगा जिसके चलते
एमएनएफ ने सीधे-सीधे भारत से अलग होकर नया

देश बनाने की मांग शुरू कर दी अब इस दौरान
मिजो नेता लाल डेंगा ने पूर्वी पाकिस्तान
की यात्रा की जहां उसने हथियारों ट्रेनिंग
को लेकर एग्रीमेंट भी साइन किया जब
सुरक्षा बलों ने शक्ति दिखाई तो मिजो

उग्रवादी म्यानमार और पूर्वी पाकिस्तान
में जाकर छिप गए हालांकि साल 1963 में
राजद्रोह के आरोप में लाल डेंगा को
गिरफ्तार कर के उस पर मुकदमा भी चलाया गया
था लेकिन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया अब
इसी बीच साल 1965 में पाकिस्तान ने भारत

पर हमला कर दिया था और ऐसे में भारत का
सारा ध्यान मिजोरम से हटकर पाकिस्तान के
साथ युद्ध पर चला गया लेकिन एमएनएफ इस
मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकी उस समय
देश के दरअसल प्रधानमंत्री लाल बहादुर

शास्त्री थे एमएनएफ ने तत्कालीन
प्रधानमंत्री के नाम एक मेमोरेंडम भेजा
जिसमें लिखा था मिजो देश भारत के साथ
लॉन्ग परमानेंट और पीसफुल रिलेशंस रखेगा
या दुश्मनी मोल लेगा इसका फैसला भारत के
हाथ में है इसी बीच 11 जनवरी 1966 को देश

के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की
ताशकंद में मौत हो जाती है शास्त्री जी की
मौत को अभी एक महीने भी नहीं हुआ था कि
मिजो नेशनल फ्रंट यानी एमएनएफ के नेता लाल
डेंगा दूसरे देशों से खुद को इंडिपेंडेंट

देश बताकर कांटेक्ट करने लगे लाल बहादुर
शास्त्री की मौत के 13 दिनों बाद इंदिरा
गांधी देश की प्रधानमंत्री बनती हैं उधर
मिजोरम में उनके प्रधानमंत्री बनने के
सिर्फ चार दिनों बाद ही यानी 28 फरवरी
1966 को मिजो नेशनल फ्रंट के उग्रवादियों

ने भारतीय सुरक्षा बलों को मिजोरम से बाहर
निकालने के लिए ऑपरेशन जेरी को शुरू कर
दिया सबसे पहले आइजोल और लंगला में असम
राइफल्स की छावनी पर हमला किया गया और
अगले ही दिन यानी 29 फरवरी को एमएनएफ ने

भारत से आजाद होने की घोषणा कर दी अब
अचानक हुए इस ऑपरेशन जेरिको के लिए मिजो
हिल्स में तैनात सुरक्षा बल तैयार तो नहीं
थे जिसका एमएनएफ ने खूब फायदा उठाया
उग्रवादियों ने देखते ही देखते आइजोल में
सरकारी खजाने के साथ-साथ इंपॉर्टेंट जगहों

और सेना के ठिकानों पर कब्जा कर लिया
बताया तो यह भी जाता है कि 10000 मिजो
लड़ाकों की फौज ने नफाई में वन असम राइफल
के ठिकाने पर आधी रात को हमला कर दिया था
वो भी इतनी तेजी से कि जवानों को अपने

हथियार लोड करने तक का समय नहीं मिला
उग्रवादियों ने सभी हथियार लूट लिए थे
इनमें छह लाइट मशीन गन 70 राइफल 16 स्टेन
गन और ग्रेन नेट फायर करने वाली छह राइफल
भी थी वहीं एक जूनियर कमिशन ऑफिसर के साथ
85 जवानों को बंधक बना लिया गया था इसके

अलावा एक जत्थे ने सरकारी खजाने पर धावा
बोलकर ₹1 लाख लूट लिए इसी बीच टेलीफोन
एक्सचेंज को निशाना बनाया गया ताकि मिजोरम
की राजधानी आइजोल से भारत के साथ सारे
कनेक्शन ही टूट जाए इंडियन आर्मी वहां पर

हेलीकॉप्टर से सैनिक और हथियार पहुंचाने
की कोशिश कर रही थी लेकिन एमएनएफ की ओर से
हो रही गोलीबारी की वजह से उन तक मदद नहीं
पहुंच पा रही थी देखते देख देखते एमएनएफ
ने असम राइफल के हेड क्वार्टर से तिरंगा

उतार कर अपना झंडा फहरा दिया महज कुछ
दिनों पहले देश की प्रधानमंत्री बनने वाली
इंदिरा गांधी इन घटनाओं से हिल उठी और
उन्होंने सेना को जवाबी कार्रवाई करने का
आदेश दे दिया वायुसेना के लड़ाकू विमानों
ने आइजोल और दूसरे क्षेत्रों में 13 मार्च

तक बमबारी की बमबारी से घबराए स्थानीय
लोगों ने पहाड़ियों में शरण लेना शुरू कर
दिया वहीं एमएनएफ के उग्रवादी म्यानमार और
पूर्वी पाकिस्तान के के जंगलों में छिप गए
विद्रोहियों को तीतर बितर करने के बाद
सेना ने मिजोरम का कंट्रोल अपने हाथ में

ले लिया और बताया जाता है कि इस बमबारी के
बाद पूरा शहर तहस-नहस हो गया था बड़ी बात
यह थी कि इस घटना में आम लोग भी मारे गए
उनके घर तक चल गए हालांकि सरकार और सेना
ने इस बात से हमेशा इंकार किया कि आइजोल

पर बमबारी की गई थी बताया जाता है कि
आजादी के बाद का यह पहला और आखिरी मामला
है जब अपने ही देश की वायुसेना ने अपने ही
देश के नागरिकों पर बमबारी की हो अब जहां

एक तरफ इस मामले पर इंदिरा गांधी के इस
फैसले पर आज तक सवाल उठ रहा है तो वहीं
दूसरी तरफ कुछ लोग इस फैसले को डिफेंड भी
करते हैं डिफेंड में कहा जाता है कि कुछ
समय पहले ही पाकिस्तान से युद्ध हुआ था और
देश के प्रधानमंत्री की कुछ समय पहले ही

मिस्टीरियस सिचुएशन में मौत हुई थी देश
में एक तरह से पॉलिटिकल क्राइसिस था वहीं
नागालैंड और साउथ में भी अल्गावादी ताकतें
विद्रोह का झंडा उठा रही थी इसलिए इंदिरा
गांधी को यह फैसला जो है भैया लेना पड़ा

जो भी हो लेकिन यह सवाल हमेशा रहेगा कि
एयरफोर्स के जरिए अपने ही नागरिकों पर
बमबारी की क्या जरूरत थी इसका कोई और
रास्ता भी निकाला जा सकता था खैर 5 मार्च

1966 के काले दिन को मिजोरम के लोग आज भी
भूल नहीं पाए हैं पिछले 57 सालों से वे
इसे लगातार जोरम दिवस के तौर पर मना रहे
हैं इस साल भी मिजोरम की राजधानी आइजोल
में इसे मनाया गया सरकार के इस एक्शन की

वजह से वहां के लोगों में अगले 20 साल तक
आक्रोश और अशांति फैली रही जंगलों में
छुपकर म्यानमार और पूर्वी पाकिस्तान में
उनका सशस्त्र संघर्ष चलता रहा इधर भारत
सरकार ने भी वहां कई बटालियन तैनात कर दी
थी साथ ही विद्रोह दबाने के लिए केंद्र

सरकार ने एक बड़ा फैसला किया था विलेज
रिग्रुपिंग का एक्चुअली जनरल सैम मानिक शॉ
की अगुवाई में एक नया प्लान बनाया गया था
जिसे साल 1967 में सरकार की तरफ से फिर से
लागू किया गया जिसके जरिए गांव को फिर से
बसाया जाता है अब इसके तहत पहाड़ों पर

रहने वाले हजारों मिजो लोगों को उनके गांव
से हटाकर मेन रोड के दोनों ओर बसाया गया
ताकि भारतीय प्रशासन उन पर नजर सर भी रख
सके जो लोग दूर दराज की पहाड़ियों पर बने
गांव में रहते थे उनको कहा गया कि एक ही

रोड के किनारे आपको बसाया जाना है सो जो
सामान साथ ले सकते हैं ले लीजिए और बाकी
जला दीजिए आपको जलाने में दिक्कत हो तो यह
काम इंडियन आर्मी कर देगी और उसने किया भी
सरकार एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप्स की ताकत को
समझ रही थी जो पहाड़ियों पर बसे इन गांवों

में छुप जाते थे तब उसने वही रास्ता
अपनाया जो ब्रिटिश सरकार ने दक्षिण
अफ्रीका के बोअर युद्ध के दौरान केनिया
में मौ विद्रोह को दबाने के लिए किया था

यानी गांव से निकालकर स्पेशल कैंप में
रखना लेकिन ना इंदिरा गांधी और ना आर्मी
के अफसर यह समझ पाए कि जो उन्होंने
अंग्रेजी आर्मी की रूल बुक में से यह
आईडिया कॉपी किया है भैया वो सब अंग्रेजों

ने दूसरे देश की जनता के साथ किया था मिजो
आदिवासी तो भारतीय ही थे कुल 764 गांवों
में से 516 को पूरी तरह खाली करवा लिया
गया और उनको 110 कैंपों में रख दिया गया

जबकि 138 गांव को ऐसे ही छोड़ दिया गया
यानी कुल 95 फीदी जनता इन 110 कैंपों में
ूस दी गई ऐसे में मिजो आदिवासियों को काफी
दिक्कतों का सामना करना पड़ा इन कैंपों
में काफी कम जमीन थी वह झूम खेती किया
करते थे कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह अब

वे एक तरह से कैद में थी सेना उन्हें राशन
आदि भी नहीं दे रही थी हजारों आदमी इन
कैंपों से बने गांव में रह रहे थे केवल
इसलिए क्योंकि वे विरोधियों की मदद ना कर
सके लेकिन वे लोग एक तरह से दूसरे किस्म
की भुखमरी चेल रहे थे इसका विरोध होना

शुरू हुआ तो इन कैंपों को तोड़ दिया जाता
है आखिर 8 साल बाद यानी 1971 में इंदिरा
गांधी थोड़ा झुकी और मिजोरम को यूनियन
टेरिटरी डिक्लेयर्ड कर दिया गया लेकिन
मिजो नेशनल फ्रंट लगातार एक्टिव रहा और

विदेशी धरती से ही अपना अभियान चलाता रहा
वह इंदिरा गांधी से नाराज थे इसलिए 1984
में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फिर से
शांति के प्रयास शुरू किए गए आखिरकार जब

 

30 जून 1986 को मिजोरम और पूरे देश के लिए
अच्छी खबर आई और केंद्र सरकार और एमएनएफ
के बीच ऐतिहासिक मिजो शांति समझौते पर
हस्ताक्षर हुए इसे उस समस्या की राजीव
गांधी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में

से एक माना जाता है 1987 में मिजोरम अलग
राज्य बनाया गया और इसी साल मिजोरम में
पहली बार चुनाव हुए और एमएनएफ बनाने वाले
लाल डेंगा मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री बने

मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री के बारे में
बात करें तो वे इंडियन आर्मी में वह पहले
हवालदार थे बाद में असम सरकार के साथ
अकाउंट्स क्लर्क के तौर पर काम किया लेकिन
मिजो डिस्ट्रिक्ट में अकाल के समय असम

सरकार का रवैया देखकर वह विद्रोही हो गए
अब जैसे हम बता चुके कि 1959 से 60 में
मिजो आदिवासी इलाकों में अकाल के दौरान
सरकार उनकी मदद करने में फेल हो गई थी
जिसकी वजह से सैकड़ों आदिवासियों की मौत

हो गई यही कारण था कि लाल डेंगा ने विरोध
में मिजी नेशनल फ्रंट नाम से एक संगठन
बनाया लाल डेंगा मॉडर्न म्यानमार के फादर
ऑफ नेशन कहे जाने वाले आंग सान सूकी के
पिता और पूर्व प्रधानमंत्री आंग सान के आम

स्ट्रगल की स्ट्रेटेजी से काफी इंप्रेस्ड
थे आंग सान कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े
हुए थे और राष्ट्र के विचारों को नहीं
मानते थे वैसे ही लाल डेंगा भी विदेशी मदद
के लिए मिजोरम को भारत से अलग करके नया

देश बनाना चाहते थे लेकिन भारत सरकार के
प्रयासों के चलते उसमें इन्हें सफलता नहीं
मिल पाई और आखिरकार भारत सरकार से उन्हें
समझौता ही करना पड़ा तो दोस्तों यह थी
मिजोरम में एयर स्ट्राइक की कहानी अब आप
क्या सोचते हैं कि इंदिरा गांधी ने उस समय
मिजोरम में एयर स्ट्राइक करके ठीक किया था
या फिर गलत अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर
रखिएगा

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