ड्रग्स के जाल में कैसे फंसा कश्मीर | Drug menace in Kashmir - instathreads

ड्रग्स के जाल में कैसे फंसा कश्मीर | Drug menace in Kashmir

नमस्कार

आपका स्वागत है क्या सुप्रीम कोर्ट को
यह बताया जा सकता है की उसके फैसला का
पालनपुर नहीं होगा तो वो अफसर को कोर्ट
में सम्मान कर सकता है या नहीं उन्हें नाम
लेकर फटकार जा सकता है या नहीं पांच

पन्नों का एक ड्राफ्ट कोर्ट को सोप गया है
जिसे लेकर थोड़ी चर्चा हनी चाहिए की इससे
कोर्ट के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा और
अफसर की मनमानिया कितनी बाढ़ जाएगी आज के
वीडियो में इस पर फॉक्स रहेगा लेकिन

इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर नजर दाल लीजिए
हमें तो यही बताया जा रहा है और आपको भी
की कश्मीर में आतंकवादी खत्म कर दिया गया
है खत्म नहीं तो बहुत हद तक कमजोर कर दिया

गया है जनता तो इसका यही मतलब निकलते है
की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया व्यवस्था
वहां एकदम टॉप क्लास है लेकिन इंडियन
एक्सप्रेस की खबर को देख लीजिए एक्सप्रेस
के नाभिक बाल ने लिखा है की हालात यह हो

गई है की श्रीनगर के
एसएमएचएस अस्पताल में हर 15 मिनट में नसे
की लट का शिकार एक व्यक्ति आता है मार्च
2022 से लेकर मार्च 2023 के बीच नसे की लट

वाले 40 हजार से अधिक लोग नशा मुक्ति
केंद्र पर आए हैं इसकी जिम्मेदारी कौन लगा
ग्रह मंत्री अमित शाह बताएंगे की मोदी
सरकार के दूर में कश्मीर में ड्रग्स का

दाल कैसे फेल गया जम्मू कश्मीर के पुलिस
प्रमुख का बयान है और छाप है की राज्य में
आतंकवाद से बड़ा खतरा ड्रग्स हो गया है अब
बताइए जहां पर केवल केंद्र सरकार की तमाम

एजेंसियां कम करती हूं फिर भी उसे कश्मीर
में ड्रग्स का दाल इतना कैसे फेल गया और
लोग इतनी बड़ी संख्या में इसकी चपेट में
कैसे ए गए होता यह है की अब ये सवाल कोई

पूछता नहीं है 15 अगस्त का मौका हो या जब
श्रीनगर में जी-20 की बैठक होने वाली हो
तब गोदी मीडिया के पत्रकार अपना कैमरा
लेकर वहां गए कश्मीर की वीडियो और दाल झील
सुंदरता दिखाकर ए गया की कश्मीर स्वर्ग बन

गया है क्या आपको उन पत्रकारों की रिपोर्ट
से पता भी चला की कश्मीर में ड्रग्स का
इतना गहरा दाल बीच चुका है एक जमाना था जब
सरकार के करीब रहने वाले पत्रकार सरकार के
भीतर की खबरें सबसे पहले लेट थे करीब होने

का मतलब यही होता था की सरकार के भीतर
उसके सूत्र बहुत मजबूत हैं लेकिन अब गोदी
मीडिया सरकार के भीतर से ऐसी खबरें नहीं
लता है आपको पता ही नहीं चलेगा की कश्मीर
में ये आतंकवाद मिटाने का दवा कर रहे थे

और अब उससे भी ज्यादा बड़ा खतरा ड्रग्स का
पैदा हो गया है और ये खबर उन्हें मिली ही
नहीं केंद्र सरकार की यह कितनी बड़ी
नाकामी है की उसकी नाक के नीचे कश्मीर

ड्रग्स की चपेट में ए गया इन सब खबरे को
गोदी मीडिया दफन कर देता है अब आते हैं
उसे ड्राफ्ट पर जो सरकार की तरफ से कोर्ट
को सोप गया है क्या मानक भीम के नाम पर अब
कोर्ट अधिकार क्षेत्र कम किया जा रहे हैं

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को पांच पैन का एक
ड्राफ्ट सोप है जिसमें बताया गया है की
कोर्ट में अधिकारियों को बुलाने उनका नाम
लेने कमेटी बनाने की मानक भीम क्या हनी
चाहिए इस ड्राफ्ट को लेकर बहस हनी चाहिए

की क्या इससे कोर्ट को बताया जा रहा है की
आप सरकार को लेकर सरकार के अधिकारियों को
लेकर किस तरह से बर्ट करेंगे एक सवाल ये
भी है की इस मानक भीम से कोर्ट से न्याय
मांगने गए व्यक्ति की समस्या किस तरह कम

हो जाति है या पहले से ज्यादा बाढ़ जाति
है इस ड्राफ्ट को सुनकर ज्यादा घबराने की
जरूर नहीं है इसमें बिल्कुल नहीं लिखा है
की फैसला कैसे लिखना है और फैसला में

क्या-क्या लिखना है मगर इतिहास में ऐसा हो
भी चुका है फिलहाल जो मानक भीम सोप गई है
ड्राफ्ट के रूप में उसे पर नजर डालनी
चाहिए की इससे आम आदमी का हिट बेहतर होता
है या नहीं अखबारों में आपको ऐसी कई खबरें

मिलेगी की कोर्ट ने बीमारी को बुलाया
फटकार लगे आदेश के पालनपुर नहीं होने पर
अवमानना की चेतावनी दी इस ड्राफ्ट में
अवमानना के संबंध में सुझाव दिए गए हैं की
न्यायाधीश को अपने आदेशों से संबंधित

अवमानना कार्यवाही पर निर्णय नहीं देना
चाहिए जी जज के आदेश की अवमानना होगी तो
वे निर्णय क्यों नहीं दे सकते हैं क्या
मैं ठीक समझ रहा हूं आप प्रदूषण से जुड़े
मामले में अदालत की टिप्पणियों को सुनिए

नमामि गैंग अभियान में इलाहाबाद हाईकोर्ट
ने अफसर को कितना फटकार है कैसे कैसे सवाल
पूछे हैं और यह भी कहा है की सवालों के
जवाब अफसर की तरफ से नहीं दिए जाते ऐसी
स्थिति में क्या मानक भीम हनी चाहिए क्या

ये सब अब सरकार के हिसाब से होगा की नाम
मत लीजिए कोर्ट में मत बुली फिर कोर्ट के
सामने क्या मंत्री जी हाजिर होने वाले हैं
कई बार कोर्ट अधिकारियों को बुलट है पूछता

है हलफनामा मांगता है इससे पता चला है की
कोर्ट है अदालत है अधिकारियों में भी
संदेश जाता है की कोर्ट की नजर है मगर
सरकार चाहती है की कोर्ट ऐसा ना करें किसी

अधिकारी को तब तक ना बुलाए जब तक असाधारण
स्थिति ना हो या असाधारण स्थिति कौन ते
करेगा कोर्ट या सरकार क्या किसी अवसर को
बुलाने के पहले असाधारण स्थिति को भी
स्पष्ट करना पड़ेगा मानक भीम के ड्राफ्ट

में लिखा है की अगर किसी अवसर को बुलाना
है तो पहले बताना होगा ताकि उसे आने का
समय मिले क्या बात है और वीडियो
कॉन्फ्रेंसिंग का विकल्प दिया जाए वैसे भी

अदालत अभी की अभी तो नहीं बुलाती है समय
देती ही है अधिकारियों के कपड़ों पर टीका
टिप्पणी ना हो यह कहा गया है सरकार की
दलीलें गजब की हैं ये अफसर ऐसा कौन सा कम

करने वाले हैं और करते हैं की कोर्ट के
सामने जान से इन्हें बचाया जा रहा है
ड्राफ्ट के अनुसार सरकार चाहती है की
न्यायपालिका और उसके बीच अनुकूल वातावरण
बने सरकार को क्यों लगता है की ऐसे अवसरों
का नाम लेने से प्रतिकूल वातावरण बन जाता

है
की भाई कोर्ट में फैसला सुनाया हम उसके
कोमल में लाने में कोशिश कर रहे हैं फिर
भी कोर्ट हमें संबंध कर रही है और कोर्ट
बाद में
हमें

अदालत में कुछ बड़ा भला का देती है हमारे
नाम अखबारों में ए जाता है मीडिया में ए
जाता है और हमारी बेइज्जती होती है
आ शायद इसी वजह से उन्होंने अभी एक सुझाव
दिया है कोर्ट को की भाई जब भी आप सरकारी
अफसर को बुलाया तो आप

ऐसे इस स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के
तहत ही चले और यह जो स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग
प्रोसीजर का एक 5 पेज का नोट उन्होंने जो
पेस किया है
वो मेरे ख्याल में पूरे जो न्याय व्यवस्था

और कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट का जो
मेकैनिज्म है उसको पुरी तरीके से ध्वस्त
कर देता है
यह स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यही कहता

है की अगर आप समाज करें तो कृपया हमें
वीडियो कॉन्फ्रेंस से
आने की अनुमति दें और तब तक
आपको
मामला किसी दूसरे अदालत में नहीं गया है

यानी हाय कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट नहीं गया
है या
किसी निकले अदालत से हाय कोर्ट तक अपील
में नहीं पड़ा है और बहुत सारे
ऑपरेटिंग प्रोसीजर में
जिसके तहत

अगर कोर्ट कोई फैसला भी दे
उसकी
फैसला अगर नजर अंदाज भी करें फिर
कोर्ट किसी गवर्नमेंट ऑफिशल को समाज
बिल्कुल ही बिल्कुल इमरजेंसी में ही
पर्सनल अपीरियंस के लिए समाज कर सकता है
उससे पहले इतने सारे

रीति रिवाज सब चलने पढ़ेंगे जिसके तहत यह
जो कोर्ट का जो पावर है बिल्कुल खत्म हो
जाता है
कोर्ट के
कोर्ट की मजबूती पर सवाल ए जाता है और
मेरे मानना है की अगर
कोट्स
में
लोग आने ही बैंड कर लेंगे सुप्रीम कोर्ट

से
गवर्नमेंट से और यहां पर गवर्नमेंट की खुद
की जिम्मेदारी बंटी है की वो खुद आगे चलकर
सारे जवाब दे कोट्स को और कोर्ट में रोज
खड़े रहे अगर ऐसे केसेस ए रहे हैं क्योंकि
यहां पर

गवर्नमेंट दोनों की रिस्पांसिबिलिटी है की
कैसे करके एक आम नागरिक की समस्याओं को कम
किया जाए तो अगर हम यहां पर जवाब दही से
दूर भागने लगेंगे अगर हम कहेंगे की हम
कोर्ट में नहीं जाएंगे नागरिक अपना कैसे

फाइल करके लड़ता रहे तो ऐसे में यह जो
सुझाव है यह इन डी इंटरेस्ट ऑफ जस्टिस
मुझे नहीं लगता है
ये सर बहुत होने लगा है और सारे कोर्स
अब इन ऑन अपीरियंस का
अपीरियंस पर सम रीजन विच इस नोट साउंड और

ऑफ दें एडेक्वेट
एक्शन शुड बी टेकन एवं ऑन पीसीएस गॉड से
उम्मीद की जाति है की किसी अधिकारी का नाम
मत लीजिए बाद में आपसे यह पत्रकारों से भी
कहा जाएगा की जब कोर्ट ने नाम लेना बैंड

कर दिया है तो आप भी अखबारों में नाम मत
लीजिए की इस विभाग का प्रमुख कौन है सचिन
कौन है आखिर इन पड़ा पर बैठे लोग क्यों
अपना नाम छिपाना चाहते हैं क्या वे जवाब
दही से भाग रहे हैं अधिकारी का नाम लिया

ही जाना चाहिए कई बार अधिकारी को तालाब
करना बहुत जरूरी हो जाता है सुप्रीम कोर्ट
ने मणिपुर के मामले में सनी के दौरान जब
यह सब देखा की हजारों की संख्या में फिर

हुई है और करवाई के नाम पर कुछ भी नहीं
हुआ है कुछ ही कैसे में गिरफ्तारी हुई है
तब अदालत ने कहा की ऐसा तो लगता ही नहीं
की राज्य में कानून व्यवस्था नाम की कोई
चीज बच्ची है इसके बाद कोर्ट ने मणिपुर के

पुलिस प्रमुख को हाजिर होने का आदेश दिया
और उन्हें हाजिर होने के लिए समय भी दिया
कोर्ट ने यह नहीं कहा की एक घंटे में
मणिपुर से दिल्ली ए जाइए बल्कि कई दोनों
का समय दिया फिर कोर्ट को ये सब बताने की

जरूर क्यों पद रही है मणिपुर के जीपी को
बुलाया गया वे हाजिर भी हुए और उसके बाद
कोर्ट ने ते किया की महाराष्ट्र के पूर्व
पुलिस प्रमुख को पुलिस की जांच पर नजर

रखना का कम सोप दिया जाए तो क्या इसके लिए
सरकार अब बताएगी की कोर्ट कैसे बुलाए कब
बुलाए और किस तरह से बुलाए क्या ये सब
इसलिए है की सरकार अपनी पसंद के
अधिकारियों से खूब मनमानी कर लेने और

कोर्ट उनका नाम लेकर पब्लिक में फटकार भी
ना लगाएं ताकि वे अपने बच्चों के सामने
समाज के सामने और नौकरशाही के बाकी वर्गों
के सामने विलाज जितना हूं उसे अधिकारी का
नाम जनता को पता ना चले और उसकी सामाजिक

बदनामी ना हो आपने देखा की वर्णन गोंजालिस
और अरुण फेयर को बिना ठोस सबूत 5 साल तक
जय में रख दिया गया उसके लिए किसी अवसर को
बुलाकर फटकार लगानी हो नाम लेना हो तो वो
क्यों नहीं करना चाहिए क्या ये सब अब बैंड

हो जाएगा हम ये दवा नहीं करते हैं की पहले
ऐसा होता था या नहीं रूटीन था या अपवाद था
लेकिन मौजूदा हालात में संदेह पैदा होता
है अब सवाल है की क्या सुप्रीम कोर्ट इस

तरह की मानक भीम के ड्राफ्ट को मंजरी देगा
सोप टॉक्स अबाउट इसकी अगर कोई कमेटी बना
रहा है सुप्रीम कोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट
उसका उसे संगठन का दरिया बता दे आ डेरा
बता दे और उसमें कौन-कौन व्यक्ति किस रोल

में होगा वो ना बताए तो मुझे लगता है की
अगर कोई नागरिक सुप्रीम कोर्ट जा रहा है
और का रहा है
सुप्रीम कोर्ट या कोई और भी कोर्ट जो की
कोई कमेटी का गठन करते हैं जा रहा है तो
वो अपनी समस्या का पूरा समाधान मुझे लगता

है सिर्फ और सिर्फ कोर्ट से ही चाहेगा तो
ऐसे में कोर्ट से एक्सपेक्ट करना की वो
सिर्फ कमेटी का संगठन कर दें और उसमें जो
मेंबर्स होगी उनका सॉन्ग उनका
डिस्क्रिप्शन ना दे मुझे लगता है ये आ एक

लिटिकन के इंटरेस्ट के फीवर में नहीं है
मानक भीम को लेकर बहस हनी चाहिए जी तरह से
नौकरशाही के आगे की दीवार ऊंची होती चली
जा रही है पारदर्शिता के नाम पर वेबसाइट
बनाकर नौकरशाही जनता से और भी दूर होती जा

रही है वो अब इन प्रक्रियाओं का सहारा
लेकर कोर्ट के सामने नहीं जाना चाहती है
आखिर जब कोई अधिकारी अदालत के सामने पेस
होने जा रहा है तो उससे उम्मीद क्यों नहीं
की जानी चाहिए की वो ठीक से तैयार होकर

जाए क्या वो अपने दफ्तर में जैसे तैसे
कपड़ों में चला जाएगा तो मंत्री जी उसे पर
टिप्पणी नहीं करेंगे कोट्स की पावर पर
रिस्ट्रिक्शन होगा और पावर चेक्स और

बैलेंस की पावर को भी इफेक्ट करेगा बहुत
इसमें शुरुआत की गई है की कैसे सिविल
सर्विस को कोर्ट में पेस होना चाहिए मेरा
मानना है की अगर कोर्ट में कोई भी पेस हो

रहा है चाहे एक वकील के तोर पे मैं या कोई
मुकदमे बस के तोर पे या कोई अथॉरिटी पेस
हो रही है कोई अफसर पेस हो रहे हैं सबको
एक डिसेंट यूनिफॉर्म क्लॉथिंग में पेस
होना चाहिए और इससे हमें इस से हम ये दिखा
सकते हैं की हम कोर्ट की इज्जत करते हैं

बिना कुछ कहे
और कपड़े तो एक तरफ है लेकिन उससे ज्यादा
मेरा मानना है इस चीज पे ध्यान देना चाहिए
की
कोट्स की इंसान एक जो सरकारी अफसर कोर्ट

में ए रहा है वो अपने एफिडेविट में वो
अपने जवाब में बोल क्या रहा है
इतने सारे पेंडिंग केसेस हैं मुझे लगता है
की अगर हम सबकी इंडिविजुअल

रिस्पांसिबिलिटी नहीं सेट करते हैं एवं
पब्लिक सर्विस की इंडिविजुअल
रिस्पांसिबिलिटी नहीं सेट करते हैं उसे उन
पे अफॉर्डेबल से आंसर्स नहीं लेते हैं तो

एक नागरिक का कैसे रिले रेस की उसे बेटों
के साथ हो जाएगा जो एक खिलाड़ी के हाथ से
दूसरे खिलाड़ी के पास जा रहा है और उसका
कोई समाधान नहीं होगा
की कोई सरकारी अफसर उसके जो फैसला हैं उसे

पर अमल नहीं कर रहा है या उसे पे कम नहीं
कर रहा है तब कोर्ट के पास यह हक है की
सरकारी अफसर को
कोर्ट में बुलाए कोर्ट में समाज करें और
उनसे जवाब दे ले की यह उनकी आदेश का

पालनपुर क्यों नहीं हुआ और अगर कोर्ट यह
इस फैसला पर पहुंचता है की यह जबरदस्ती
उलझन हुआ है तब कोर्ट उसे अवसर को सजा भी
सुना शक्ति है
अफसर को अदालत से बचाने के लिए मानक भीम

किस प्रस्ताव पर पर्याप्त बहस हनी चाहिए
कई बार सरकारें या विभाग आपस में आप
प्रत्यारोप करने ग जाते हैं पता ही नहीं
चला कौन जिम्मेदार है के जस्टिस ने इंडियन
एक्सप्रेस में लिखा है की जज अगर राजनीतिक

और सामाजिक दबाव से मुक्त होकर तटस्थ रूप
से फैसला लेंगे तो भरोसा
करना उसके अधिकारों की रक्षा करना ते करना
की संस्थाएं अपनी संवैधानिक हदों में रहे

यहां तो कोर्ट के आसपास खड़े थे की जा रही
हैं ऐसा लगता है इस पैमाने पर सुप्रीम
कोर्ट कितना खड़ा उतरता है इस पर जनता की
नजर है की जस्टिस को इन बटन पर जोर देना
पद रहा है इससे भी पता चला है की हालात

क्या है कैसे हैं इस संदर्भ में भी आप
मानक भीम के ड्राफ्ट को देखते रहिए दिल्ली
दंगों के आप में उमर खालिद की जमानत अर्जी
पर सनी नहीं हो साकी उमर खालिद सितंबर
2020 से जय में बैंड है सुप्रीम कोर्ट ने

दो हफ्ते के बाद की तारीख दी है तीसरी बार
सनी स्थगित हुई पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट
ने जमानत देने से इनकार कर दिया तब से ये
मामला सुप्रीम कोर्ट की सनी और फैसला का
इंतजार कर रहा है सीएसबीएस का सर्वे आया

है की 15 से 34 साल के तीन युवाओं में से
एक बेरोजगार 2016 के सर्वे की तुलना में
18% अधिक युवा मानते हैं की बेरोजगारी देश
की सबसे बड़ी समस्या है गोदी मीडिया तो इस
पर चर्चा नहीं करेगा वो एंटी मुस्लिम

चर्चाओं में देश को भट्ट रहेगा खबरे को
दबाकर जनता को दबाया जा रहा है बेरोजगारी
पर कोई बहस नहीं होती महंगाई पर कोई बहस
नहीं है महंगाई कम होने के असर भी नजर

नहीं आते लोग ज्यादातर लोग कम सैलरी पर कम
करने के लिए मजबूर हैं नमस्कार

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