दुर्गा अमृतवाणी सम्पूर्ण । Durga amritvani full #tranding #hindibhajan #90shindisongs - instathreads

दुर्गा अमृतवाणी सम्पूर्ण । Durga amritvani full #tranding #hindibhajan #90shindisongs

[संगीत]

[प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा]

[संगीत] मंगलमय भय मोचनी दुर्गा सुख की

खान जिसके चरणों की सुधा स्वयं पिए

भगवान दुख ना शक संजीवनी नव दुर्गा का

पाठ जिससे बनता भिक्षुक भी दुनिया का

सम्राट अंबा दिव्य स्वरूपिणी काए सो

प्रकाश पृथ्वी जिससे ज्योतिर्मय उज्जवल है

आकाश दुर्गा परम सना तनी जग के सिरजनहार

आदि भवानी महादेवी सृष्टि का

आधार जय जय दुर्गे मा जय जय दुर्गे

मा सद मार्ग प्रदर्शनी ज्ञान का ये

उपदेश मन से करता जो मनन उसके कटे

कनेश जो भी विपत्ति काल में करेरे दुर्गा

जाप पूर्ण हो मनोकामना भागे दुख

संता उत्पन्न करता विश्व की शक्ति

अपरंपार इसका अर्चन जो करें भव से से उतरे

पार दुर्गा शोक विनाशिनी ममता पा है

रूप सती साधवी सतवंती सुख की कला

नूप जय जय दुर्गे मा जय जय दुर्गे

मां विष्णु ब्रह्मा रुद्र भी दुर्गा के है

बुद्धि विद्या वरदानी सर्व सिद्धि

प्रवी लाख चौरासी ओनिया से ये मुक्ति

दे महामाया जगदंब के जब भी दया

करे दुर्गा दुर्गति नाशिनी शिव वाहिनी सुख का

वेद माता ये गायत्री सबकी

पालनहार सदा सुरक्षित वो जन है जिस पर मां

का हाथ बिकट डगरिया पे उसकी कभी ना बिगड़े

बा जय जय दुर्गे मा जय जय दुर्गे

मा महागौरी वरदायनी मैया दुख

निदान शिव दूति ब्रह्मचारिणी करती जग

कल्याण संकट हर भगवती की तो माला

फेर चिंता सकल मिटाए गी घड़ी लगे ना

देर पारस चरणन दुर्गा के झुक झुक माथा

टेक सोना लोहे को करे अद्भुत कौत

देख भव तारक परमेश्वरी लीला करे

अनंत इसके वंदन भजन से पापों का हो

अंत जय जय दुर्गे मा जय जय दुर्द

मा जय जय दुर्गे मा जय जय दुर्द

मां जय जय दुर्गे मां जय जय दुर्गे

मां जय जय दुर्गे मां जय जय दुर्गे

मां [संगीत]

[प्रशंसा] [संगीत] दुर्गा मां दुख हरने वाली मंगल अमंगल करने

वाली भय के सर्प को मारने वाली भव निधि से

जग तारने वाली अत्याचार पाखंड की दमनी वेद

पुराणों की ये जननी दैत्य यही अभिमान के

मारे दीन हीन के काज सवारे सर्व कलाओं की

ये मालिक शरणागत धनहीन के पालक इच्छित वर

प्रदान है करती हर मुश्किल आसान है करती

भ्रामरी हो हर भ्रम मिटा कण कण भीतर कला

दिखावे करे असम संभव कोय संभव धन्य धन्य

और देती वैभव महा सधी महायोग नि माता

महिषासुर की मर्द नि माता पूर करे हर वन

की आशा जग है इसका खेल तमाशा जय दुर्गा जय

जय दमयंती जीवन दानी यही जयंती यही

सावित्री ये कौ हारी विद्या ये

परोपकारी सिद्ध मनोरथ सबके करती भक्त जनों

के संकट हरति विष को अमृत करती फल में यही

राती पत्थर जल में इसकी करुणा जब है होती

माटी का कण बनता मोती पत छड़ में ये फूल

खिलावे अंधियारे में ज्योत जलावे वेदों

में वर्णित महिमा इसकी ऐसी शोभा और है

किसकी ये नारायण यही ज्वाला जपि इसके नाम

की माला यही है सुखेश्वर माता इसका वंदन

करे विधाता पग पंकज की धूली चंदन इसका देव

करे अभिनंदन जगदंबा जगदीश्वरी

दुर्गा दया निधान इसके करुणा से बने निर्धन भी

नवान छिन मस्ता जब रंग दिखावे भाग्यहीन के

भाग्य जगावे सिद्धि दात्र आदि भवानी जिसको

सेवत है ब्रह्म ज्ञानी शैल सुता मा शक्तिशाली

इसका हर एक खेल निराला जिस पर होवे

अनुग्रह इसका कभी अमंगल होना उसका इसकी

दया के पंख लगाकर अंबर छूते है कई जाकर

राय को यही पर्वत करती बाबर में है सागर

भरती इसके कब्जे जग का सब है शक्ति के बिन

शिव भी शव है शक्ति ही है शिव की माया

शक्ति ने ब्रह्मांड रचाया इस शक्ति का साधक बनना निष्ठावान उपासक बनना कुष्मांडा

भी नाम इसका कण कण में है धाम इसका दुर्गा

मा प्रकाश स्वरूपा जप तप ज्ञान तपस्या

रूपा मन में ज्योत जला लो इसकी साची लगन

गालो इसकी काल रात्रि ये महामाया श्रीधर के सिर इसकी छाया इसकी

ममता पावन ूरा जिसको ध्यानु भक्त न भूला

इसका चिंतन चिंता हरता भक्तों के भंडार है

भरता सांसों का सुर मंडल छेड़ो नव दुर्गा

से मुह ना मोड़ो चंद्रक टा कात्यायनी महा दयालु मा शिवानी इसके भक्ति

कष्ट निवारे भव सिंधु से पारम उतारे अगम

अनंत अगोचर मैया शीतल मधुकर इसकी छैया

सृष्टि का है मूल भवानी इसे कभी ना भूलो

प्राणी दुर्गा मा प्रकाश स्वरूपा जप तप ज्ञानी तपस्या रूपा मन में ज्योत जला लो

इसकी सांची लगन लगा लो इसकी दुर्गा की कर

साधना मन में रख विश्वास जो मांगोगे

पाओगे क्या नहीं मां के पास खड़ग धारणी हो जब आई काल रूप महाकाल

कहाई शुभन शुंभ को मार गिराया देवों को भय

मुक्त बनाया अग्नि शिखा स हुई सुशोभित

सूरज की भाति प्रकाशित युद्ध भूमि में कला

दिखाई मानव बोले ही ही करे जो इसका जाप

निरंतर चले ना उन पर टोना मंतर शुभ अशुभ

सब इसकी माया ने इसका पारन पाया इसकी

भक्ति जाए ना निर्भर मुश्किल को ये डाले

मुश्किल कष्टों को हर लेने वाली अरदान भर

देने वाली धन लक्ष्मी हो जब आती कंगाली है

मुह छुपाती चारों ओर जाए खुशहाली नजर ना

आए फिर बदहाली कल्पतरू है महिमा इसकी कैसे करूं

मैं उपमा इसकी फल दयनी है भक्ति इसकी सबसे

न्यारी शक्ति इसकी अन पूर्णन धन को देती

सुख के लाखों साधन देती प्रजा पालक इसे दि

आते हरि नारायण भी गुण गाते चंपा कलीसी

छवि मनोहर इसकी दया से धर्म धरोहर त्रिभुवन की स्वामिनी ये है योक माया गज

दामिनी ये है रक्त दंता भी इसे कहते चोर

निशाचर दानव डरते जब ये अमृत रस बरसा वे

मृत्यु लोक का भय ना आवे काल के बंधन तोड़े पल में सांस की डोरी जोड़े पल में श

कुंभर मा सुखदाई जहां पुकारो वहां सहाई

विंध वासिनी नाम से करे जो निस दिन

याद उसके गृह में गजता हर्ष क सुरमय

नाद ये चामुंडा चंड मुंड घाती निर्धन के

सिर ताज सजाती करण शरण में जो कोई जाए

उसके निकट ना आए चिंत पुर्नी चिंता है हर्ती अनधन दे भंडार भरती आदि अनादि विधि

विधाना इसकी मुट्ठी में है जमाना रोली

कुमकुम चंदन टीका जिसके सम्मुख सूरज फीका

थराज भी इसका चाकर करे आराधन पुष्प चढ़ाकर

देवता भवन धुला वे नारद वीणा यहां बजावे

तीन लोक में इसकी पूजा मां के समना कोई भी

दूजा यही वैष्णव आदि कुमारी भक्तन की पत

रखन हारी भैरव का वध करने वाली खंडला हाथ

पकड़ने वाली ये करुणा का न्यारा मोती रूप

को एक है ज्योति मां बजरेश्वरी कांगड़ा वाली खाली जाए ना कोई सवाली ये नर सिंही

ये वाराही नेमत देती है मनचाही सुख

समृद्धि दान है करती सबका ये कल्याण है

करती मयुर कही है वाहन इसका करते ऋषिया

वाहन इसका ठी य सुगंध पवन में इसकी मूरत

राखो मन में नैना देवी रंग इसी का पतित

पावन अंग इसी का भक्तों के दुख लेती ये है

नैनों को सुख देती ये है नैनन में जो इसे

बसाती बिन मांगे ही सब कुछ पाते शक्ति का

ये सागर गहरा बजरंगी ार पहरा इसके रूप

अनूप की समता करे ना कोई पूजे चरण सरोज जो तन मन शीतल

होय काली का रूप में लीला करती सभी बलाई

किससे डरती कहीं पे है ये शांत स्वरूपा अनुपम देवी अति अनूपा अर्चन करनाय का ग्र

मन से रोग हरे धनवंतरी बन के चरण पादुका

मस्तक धर लो निष्ठा लगन से सेवा कर लो मनन

करे जो मन सामा का गौरव उत्तम पाए जहां का

मन से मन सा मनसा जपना पूरा होगा हर एक

सपना ज्वालामुखी का दर्शन की जो भय से मुक्ति का वली जो ज्योति यहा अखंड है चलती

जो है अमावस पूम करती श्रद्धा भाव को कम

ना करना दुख में हसना गमना करना घट घट के

मां जानन हारी भर लेगी सब पीड़ा तुम्हारी

बगुला मुखी के द्वारे जाना मनवांछित ही वैभव पाना उसी की माया हसना रोना उससे बे

मुख कभी ना होना शीतल शीतल रस की धारा कर

देगी कल्याण तुम्हारा धनि वहां फरमाए रखना

मन से अलख जगाए रखना भजन करो कामाख्या जी

का धाम है जो मां पार्वती का सिद्ध माता

सिद्धेश्वरी है राजरानी राजेश्वरी है धूप दीप से उसे मनाना श्यामा

गौरी रटते जाना खनी देवी जिसने आराधा दूर

हुई हर पथ की बाधा नंदा देवी मा जोधा होगे

सच्चा आनंद ही पाओगे कौशिक माता जी का

द्वारा देगा तुझ को सदा सहारा हर सिद्ध के

ध्यान में जाओ ग जब खो सिद्ध मनोरथ सब तुमरे पल में जाएंगे

हो महालक्ष्मी को पूजत रहियो धन संपत्ति

पाते ही रहियो घर में सच्चा सुख बरसेगा

भोजन को ना कोई तरसेगा जीवदानी का की जो

चिंतन टूट जाएंगे यम के बंधन महाविद्या की

करना सेवा ज्ञान ध्यान का पाओगे मेवा अरबुदा मा का द्वार निराला पल में खोले

भाग्य का ताला सुमिरन उसका है फलदायक कठिन

समय में होए सहायक त्रिपुर मालिनी नाम है

न्यारा चमकाए तकदीर कतारा देवी तालाब में

जाकर देखो स्वर्ण धाम को माथा टेको पाप मा

सारे धोती पल में काया कुंदन होती पल में

सिंह चढ़ी मां अंबा देखो शारद मा जगदंबा

देखो लक्ष्मी का वहां पे वासा पूरी होती

सबकी आशा चंडी मां की ज्योत जलाना श्रद्धा

से नित महिमा गाना तुलजा भवानी के दर जा

के आस्था से एक चुनर चढ़ा के जग की खुशियां पा जाओगे शहंशा बनकर आ जाओगे वहां

पे कोई फेर नहीं है देर तो है अंधेर नहीं

है कैला देवी करौली वाली जिसने सबकी चिंता

टाली लीला मां की अपरंपार परखे गी विश्वास तुम्हा रा करनी

मां की अद्भुत करनी महिमा उसकी जाए ना वरनी भूलो ना कभी चौथ की माता जहां पे

कारज सिद्ध हो जाता भूखों को जहां भोजन मिलता हाल हो जाने सबके दिल का सप्त

श्रृंगी मैया की साधना कर दिन रे कोश भरेंगे रत्नों से पुलकित होंगे

न मंगलमय सुख धाम है दुर्गा कष्ट निवारण

नाम है दुर्गा सुखद रूप भव तरणी मैया लाज

भय हरनी मैया रमा उ मामा शक्ति शलादर को भई ब कराला अंत करण में इसे बसा

लो मन को मंदिर रूप बना लो रोग जोग महर है

लेती आजच कभी ना आने देती रत्न जड़त ये

भूषण धारी देवता इसके सदा आभारी धरती से

ये अंबर तक है महिमा सात समंदर तक है चीटी

हाथी सबको पाले चमत्कार है बड़े निराले

मृत संजीवनी विद्यावादी महायोगिनी

महाकाली साधक की है साधना यही कवियों की

आराधना यही करुणा की जब नजर घुमावे कीर्ति

वान धनवान बनावे तारा मा जग तारने वाली ला

चारों की कर रखवाली कहीं बनी ये आशा पुरनी

आश्रय दाती मां जग जननी यही है विंधेश्वरी

मैया भय मोचन भुवनेश्वरी मैया इसे ही कहते

देवी स्वाहा साधक को दे फल मन चाहा कमल

नयन सुर सुंदरी माता जिसको करता नमन विधाता वृषभ पर भी करे सवारी रुद्राणी मा

महा गुणकारी सर्व संकटों को हर लेती विजय

का विजया व है देती योग कला जप तप की दाती

परम पदों की मावर दती गंगा में है अमृत

इसका आत्म बल है जागृत इसका अंतर मन में

अंबिके रखे जो हर ठार उसको जग में

देवता भावे ना कोई और पद्मावती मुक्तेश्वर मैया शरण मिले

शरणे शवरी मैया पात काल रटे जो अंबा में

हाथ न करत विलंबा मंगल मूर्ति महा सुख कारी संत जनों की है रखवारी धूमावती के

पकड़े पग जो बस में कर ले सारे जग को दुर्गा भजन महा फलदाई प्रलय काल में होत

सहाई भक्ति कवच हो जिसने पहना पार पड़े ना

दुख का सहना मोक्ष दयनी मा जो सुमिरे जन्म

मरण के भव से उभरे रक्षक हो जो क्षीर भवानी चले काल की ना मन मानी जिस गृह मा

की ज्योति जागे तिम्र वहां से भय का भागे

दुख सागर में सुखी जो रहना दुर्गा नाम जपो

दिन रहना अष्ट सिद्धि नव निधियों वाली महा

दयालु भद्र काली सपने सब साकार करेगी

दुखियों का उद्धार करेगी मंगला मां का चिंतन कीजो हर सिथ से हर सुख लीजो थाम रहो

विश्वास की डोरी पतला केगी अंबा गौरी

भक्तों के जो मन के अंदर रहती है कण कण के

अंदर सूरज चांद करोड़ों तारे ज्योति से ज्योति लेते सारे वो ज्योति है प्राण

स्वरूपा तेज वही भगवान स्वरूपा जिस ज्योति

से आए ज्योति अंत उसी में जाए ज्योति

ज्योति है निर्दोष निराली ज्योति सर्व कलाओं वाली ज्योति ही अं

मिटाती ज्योति साचा राह दिखाती अंबा मां

की ज्योत में तू ब्रह्मांड को दे ज्योति ही तो

खींचती हर मस्तक की

[संगीत]

[प्रशंसा] रेख [संगीत]

जगदंबा जगतारिणी जगदाती जगपाल

इसके चरणन जो छुए उन पर होए

दया मां की शीतल छाव में स्वर्ग स सुख

हो जिसकी रक्षा मां करे मार सके सेना

को करुणामई कपालिनी दुर्गा दया

निधान जैसी जिसकी भावना वैसा दे

वरदान मात्र श्री महा शारदे नमता देत

अपार हानि बदले लाभ में जब ये हिलावे ता

जय जय अंबे मां जय जगदंबे

मां नश्वर हम खिलौनों की चाबी मां के

हाथ जैसे इशारा मां करे नाचे हम दिन

रात भाग्य लिखे भागेश्वरी लेकर कलम

दवार कठपुतली के बस में क्या सब कुछ मां के

हाथ पत छड़ दे या दे हमें खुशियों का मथ

मास मां की मर्ज है जो दे हर सुख उसके

पास मां करुणा की नाव पर होंगे जो भी

सवार बाल भी बा का होए ना वैरी जो

संसार जय जय अंबे मां जय जगदंबे

मां मंगला मां के भक्त के गृह में

मंगलाचार कभी अमंगल हो नहीं पवन चले सुख

का शक्तिहीन को शक्ति मिलती इसके

धाम कामधेनु के तुल्य है शिव शक्ति का

नाम चंदन वृक्ष है एक भला बुरे है लाख

बबूल बदी के कांटे छोड़ के चुनने की के

फूल मां के चरण सरोज की कलियो जैसी

सुगंध स्वर्ग में भीना होगा जो है य

आनंद जय जय अंबे मा जय जगदंबे

मा पाप के काले खेल में सुख ना पावे

को कोयल की खान में सब कुछ का

हो निकट ना आने दो कभी दुष्कर्म के

नाग मानव चोले पर नहीं लगने दीजो

दाग नव दुर्गा के नाम का मनन करो सुख

का बिना मोल बिन दाम ही करेगी मां

उपकार भव से पार लगाएगी मां की एक

आशीष तभी तो मा को पूजते श्री हरि

जगदीश जय जय अंबे मां जय जगदंबे

मां जय जय अंबे मां जय जगदंबे

मां जय जय ज अंबे मां जय जगदंबे

मां जय जय अंबे मा जय जगदंबे

[संगीत]

[प्रशंसा] मा विधि पूर्वक ही ज्योत जलाकर मां चरणन

में ध्यान लगाकर जो जन मन से पूजा करेंगे

जीवन सिंधु सहज करेंगे कन्या रूप में जब

दे दर्शन श्रद्धा सुमन कर दीजो अर्पण सर्व

शक्ति वो आदि कोमारी जाइए चरणन पे बलिहारी

त्रिपुर रूपिणी ज्ञान महिमा भगवती वो वरदान महिमा ंड मुंड नाशक दिव्य स्वरूपा

मूल धारिणी शंकर रूपा कर कामाक्षी कामना

पूरी देती स्वधा मा सब रस पूरी चंडिका

देवी का करो अर्चन साफ रहेगा मन का दर्पण

सर्व भूतम सर्वव्यापक मां की दया के देवता याचक

स्वर्णमई है जिसकी आवा चाद नहीं है कोई

दिखावा कही वो रोहिणी कही सुभद्रा दूर करत

अज्ञान के नेत्रा छल कपट अभिमान की दमनी

सुख सौभाग्य हरष की जननी आश्रय दती मां

जगदंबे खप्पर वाली महा बलि अंबे मुंडन की

जब बहने माला दानव दल पर बरसे ज्वाला जो

जन उसकी महिमा गाते दुर्गम काज सुगम हो

जाते जय विजया अपराजिता माई जिसकी तपस्या

महा फलदाई चेतना बुद्धि श्रद्धा मा है दया

शांति लज्जा मां है साधन सिद्धि वर है मां

का भक्ति वो घर है मां का सप्तशती में

दुर्गा दर्शन शतचंडी है उसका चिंतन पूजा

ये सर्वाथ साधक भव सिंधु की प्यारी नाव

देवी कुंड के अमृत से तन मन निर्मल

हो पावन ममता के रस में पाप जन्म के

धो देवी कुंड के अमृत से तन मन निर्मल

हो पावन ममता के रस में पाप जन्म के

थो अष्टभुजा जग मंगल करणी योग माया मा

धीरज धरणी जब कोई इसकी स्तुति करता आगा मन

भी हंस है बनता महिष मर्दिनी नाम है न्यारा देवों को जिस दिया सहारा रक्त बीज

सहारा जिसने मन टब को मारा जिसने

धूम्रलोचन का वध कीना अभयदान देवन को देना

जग में कहा विश्राम इसको बार बार प्रणाम

है इसको यज्ञ हवन कर जो बुलाते भ्रम राम

भा की शरण में जा उनके रखते दुर्गा ला बन जाते हैं बिगड़े

का सुख पदार्थ उनको है मिलते पांचों चोर

ना उनको चलते भाव से जो गुण गाते

चक्रवर्ती है वो कहलाते दुर्गा है हर जन

की माता कर्महीन निर्धन की माता इसके लिए

कोई गैर नहीं है इससे किसी से वैर नहीं है

रक्षक सदा भलाई की मैया शत्रु सिर्फ बुराई

की मैया अनहद ये स्नेहा का सागर कोई नहीं

है इसके बराबर दधि मति भी नाम है इसका

पतित पावन धाम है इसका तारा मा जब कला

दिखाती भाग के तारे है चमती कौशिक देवी

पूजते रहिए हर संकट से जूझते रहिए नैया

पार लगाएगी माता हय हरने को आएगी माता

अंबिका नाम धरा वाली सूखे वृक्ष खिलाने

वाली पारस मनिया जिसकी माला दया की देवी

मां कृपाला मोक्ष दयनी के द्वारे भक्त

खड़े कर जोड़ यम दूतों के चाल को घड़ी में दे जो

तोड़ भैरवी देवी का करो वंदन ग्वाल बाल से

खिलेगा आंगन झोलिया खाली ये भर देती शक्ति

भक्ति कावर देती विमला मैया ना बिसरा भावन

का साद चढ़ाओ माटी को कर देगी चंदन साची

माले असुर निकंदन तोड़ेगी जंजाल ये सारे

सुख देती तत्काल ये सारे पग पंकज की धूली

पा लो माथे उसका तिलक लगा लो हर एक बाधा

टल जाएगी भय की डाइन जल जाएगी भक्तों से

ये दूर नहीं है ख है मजबूर नहीं है उग्र

रूप मा उग्र तारा जिसकी रचना ये जग सारा

अपनी शक्ति जब दिखलाती कुंडली पर संसार न

चाती जल थल नील गगन के मालिक अग्नि और पवन

की मालिक शशो दिशाओं में ये रहती ओ में ये रहती इसके रंग में ईश्वर

रंगा यही है आकाश की गंगा इंद्र धनुष है

माया इसकी नजर ना आती काया इसकी जड़ भी

यही चेतन यही साधक यही साधन यही ये

महादेवी ये महामाया किसी ने इसका पार न

पाया ये है णा ये श्री सुंदर चंद्र भागा

ये सावित्री नारायण का रूप यही है नंदिनी

मा का स्वरूप यही है जप लो इसके नाम की माला कृपा करेगी ये कृपाला ध्यान में जब

तुम खो जाओगे मा के प्यारे हो जाओगे इसका

साधक काटो पे फूल समझ के सोए दुख भी हस के छेल द कभी ना विचलित

होए सुख सरिता देवी शरवानी मंगल चंडी शिवा

शिवानी आक दीप जलाने वाली प्रेम सुधा

बरसाने वाली मुंबा देवी की करो पूजा ऐसा

मंदिर और ना दूजा मनमोहिनी है मूरत मां की

दिव्य ज्योत है सूरत मां की ललिता ललित कला की मालिक विकला और लाचार की पालक अमृत

वर्षा जहां भी करती नों से भंडार है भरती

ममता की मां मीठी लोरी था में बैठी जग की

डोरी दुश्मन सब गुण ज्ञानी सुनते मा

अमृतवाणी सर्व समर्थ सर्वज्ञ भवानी कालवा

देवी मां कल्याणी जय दुर्गा जय नर्मदा माता मुरलीधर गुण तेरे गाता यही उमा

मिथिलेश्वर है भय हरणी बक्रेश्वर है देवत

झुकते द्वार पे इसके कौन गिने उपकार इसके

माला धारी ये मगवा सरस्वती माय वाराही अजर

अमर है ये अनंता सकल विश्व की इसको चिंता

कन्याकुमारी धाम निराला धन पदारथ देने

वाला देती ये संतान किसी को जीविता के

वरदान किसी को जो श्रद्धा विश्वास से आता

कोई कलेश न उसे दाता जहां ये वर्षा सुख की

करती वहां प्र सिद्धियां पानी भरती विधी विधाता दास ही इसके करुणा का धन पास ही

इसके ये जो मानव हसता रोता मां की इच्छा

से ही होता श्रद्धा दीप जलाए की जो भी करे

अरदास उसके मां के द्वार पे पूर्ण हो हर

आस कोई कहे इसे महाबली माता जो भी सुमिरे

वो फल पाता निर्बल को बल यही पे मिलता घड़ियों में ही भाग्य बदलता अछरू मां के

गुण जो गावे पूजा ना उसकी निष्फल जावे अछरू सब कुछ अच्छा करती चिंता संकट भय को

हरति करुणा का यहां अमृत बहता मानव देख

चकित है रहता क्या क्या पावन नाम है मां के मुक्ति दायक धाम है मां के कहीं पे मां

जागेश्वरी है करुणामई करुणेश्वर है जो जन

इसके भजन में जागे उसके घर से दरिद्र भागे

नाम कही है आरासुर अंबा पापनाशिनी मां

जगदंबा की जो यहां आराधन मन से झोली भरेगी

भक्ति धन से भूत पिशाच का डर ना रहेगा सुख

का झरना सदा बहेगा हर शत्रु पर विजय

मिलेगी दुख की काली रात लेगी कनकावती

करेड़ी माई संत जनों की सदा सहाई सच्चे

दिल से करे जो पूजन पाए गुना से मुक्ति दुर्जन हर सिद्धि का जाप जो करता किसी बला

से वो नहीं डरता चिंतन में जब मन खो जाता

हर मनोरथ सिद्ध हो जाता कहीं है मां का नाम खलारी शांति मन को देती न्यारी इच्छा

पूरण करती पल में शहद ला है यहां के जल

में सबको यहां सहारा मिलता रोगों से

छुटकारा मिलता भला ही जिसने करते रहना ऐसी

मां का क्या ही कहना शीर जांबा अंबिके दुख हरण सुख

धाम जन्म जन्म के बिगड़े हुए यहां प सत हो

पा झंडे वाली मां सुख दाती कांटों को भी

फूल बनाती यहां भिकारी भी जो आता नवीर वो

है बन जाता बांझ को यहां बालक मिलते किसकी

दया से लंगड़े चलते श्रद्धा भाव प्यार की भूकी ये लगली सत्कार की भूके यहां कभी

अभिमान ना करना कंज कों का अपमान ना करना

घट घट की ये जानन हारी इसको सेवत दुनिया

सारी भय हरणी भट्ट का देवी जिसे चाया

देवों ने भी चरण शरण में जो भी आए वो कंकर

हीरा बन जाए बुरे ग्रह का दोष मिटाती

अच्छे दिनों की आस जगाती ऐसा पलटे ये मां

आशा हो जाती है दूर निराशा उन्नति की ये

शिखर चढ़ावे रं को को ये राजा बनावे ममता

इसकी है वरदानी भूल के भी ना भूलो प्राणी

कहीं पे कुंती बन के बिराजे चारों ओर ही डंका बाजे सपने में भी जो नहीं सोचा यहां

पे वो कुछ मिलते देखा कहता कोई सामुद्रिक माता कृपा समुद्र का रस है पाता दागी चोली

यहां पर तुलते बंद नसीबों के दर खुलते दया

समुद्र जब लहराए बिगड़ी कईयों की बन जाए

लहरे समुद्र में है जितनी करुणा की है नेमत उतनी इतने ये उपकार है करती हो नहीं

सकती किसी से गिनती जिसने डोर लगन की बाधी

जग में उत्तम पाय उपाधि सर्व मंगल जग जननी

मंगल करे अपार सबके मंगल

कामना करता इसका द्वार भादवा मैया है अति

प्यारी अनुग्रह करती पातक हारी आपत्तियों

का करे निवारण आप ही करता आप ही कारण रगी

में वो मंदिर में वो बाहर भी वो अंदर में

वो वर्षा वही बसंत वही लीला करे अनंत वही

दान भी वही दानी वही प्यास भी वही पानी

वही दया भी वो दयालु वही कृपा रूप कृपा लू

बोहे एक वीरामा नाम उसी का धर्म कर्म है

काम उसी का एक ज्योत के रूप करोड़ों किसी

रूप से मुह ना मोड़ो जाने वो किस रूप में

आए जाने कैसा खेल रचाए उसकी लीला हो ही

जाने उसको सारी सृष्टि माने जीवन मृत्यु

हाथ में उस उसके जादू है हर बात में उसके वो जाने क्या कब है देना उसम ही तो सब है

देना प्यार से मांगो याचक बनके की जो विनय

उपासक बनके व ही नैया व ही खिवैया वो रचना

है व ही रचैया जिस रंग रखे उस रंग रहिए

बुरा भला ना कुछ भी कहिए खे मारे उसकी

मर्जी दो बे तारे उसकी मर्जी जो भी करती

अच्छा करती काज हमेशा सच्चा करती वो कर मन

की गति को जाने बरा भला वो सब पहचाने दामन

जब है उसका पकड़ा क्या करना तकदीर से झगड़ा मालिक की हर आज्ञा मानो उसम सदा

बनाई जान शांता मा से शांति मांगो बन के

दास खोट खरा क्या सोचना कर लिया जब

विश्वास रेणु का मा का पावन मंदिर करता नमन यहां पर अंबर लाचार की कर रखवाली कोई

सवाली जाए ना खाली ममता चुनरी की गाव में

स्वर्ग से सुंदर ही गांव में बिगड़ी किस्मत बनती देखी दुख की रना ढलती देखी इस

चौखट से लगे जो माता गर्व से ऊंचा हो वो

जाता रसना में रस प्रेम का भर लो मणि देवी

का दर्शन कर लो विष को अमृत करेगी मैया

दुख संताप हरे गी मैया जिन्हे संभाला हो

इस माने मोड़ भी बनते यहां सयाने दुर्गा

नाम की अमृतवाणी नस नस बीच बसाना प्राणी

अंबा की अनुकंपा होगी मन का पंच बनेगा

योगी पतित पावन ज्योति जलेगी जीवन गाड़ी

सहज चलेगी रे नांद यारा घर में वैभव हो

होगा न्यारा घर में भक्ति भाव की बहेगी गंगा होगा आठ पहर सत्संगा फल और कपट ना

कभी चलेगा भक्तों का विश्वास

फलेगांव [संगीत] के काटे जहां पे मां का होए बसेरा हर सुख

वहां लगाएगा डेरा चलोगे तुम निर्दोष डगर

पे दृष्टि होगी मां के घर पे पढ़े सुने जो

अमृतवाणी उसकी रक्षक आप भवानी अमृत में जो

खो जाएगा वो भी अमृत हो जाएगा अमृत अमृत

में जब मिलता अमृत मई है जीवन बनता दुर्गा

अमृतवाणी के अमृत भीगे बोल

अंत करण में तू प्राणी इस अमृत को

खोल

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