पूरा सच केंद्र का विधान क्यों घोषित हुआ असंवैधानिक पूरा सच - instathreads

पूरा सच केंद्र का विधान क्यों घोषित हुआ असंवैधानिक पूरा सच

नमस्ते सदा वसले मातृभूमि आज न सुप्रीम
कोर्ट ने एक केंद्र सरकार के फाइनेंशियल
अमेंडमेंट एक्ट
2017 को अवैधानिक घोषित कर दिया है

अवैधानिक घोषित करने का आधार उन्होंने
आर्टिकल 191 ए लिया है और आर्टिकल 191 ए
यह कहता है कि स्पीच एंड एक्सप्रेशन का
राइट फंडामेंटल राइट होगा स्पीच एंड
एक्सप्रेशन के राइट में समय समय पर

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि इसमें राइट टू
इंफॉर्मेशन शामिल है आपको मालूम है कि यह
जो अ राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट है यह राइट
टू इंफॉर्मेशन एक्ट 2005 में यूपीए सरकार
के टाइम पर आया है राइट टू इंफॉर्मेशन

एक्ट 2005 से पहले यह फ्रीडम ऑफ
इंफॉर्मेशन एक्ट 2002 था और फ्रीडम ऑफ
इंफॉर्मेशन एक्ट
2002 अटल बेहरी वाजपेई की सरकार के द्वारा
पास किया गया था वो उस समय पायलट

प्रोजेक्ट की तरह था बाद में यूपीए की
गवर्नमेंट बैठी तो उनको लगा कि इसमें
संशोधन करने की बजाय इसको खत्म कर देते
हैं और अपने नाम से चिपका देते हैं
उन्होंने राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट 2005

अपने नाम से चिपका दिया 2002 में जो
वाजपेई सरकार के द्वारा फ्रीडम ऑफ
इंफॉर्मेशन एक्ट पास किया गया था उस वह भी
सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय पर किया गया
था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था
आर्टिकल 191 ए में राइट टू इंफॉर्मेशन

शामिल है राइट टू इंफॉर्मेशन शामिल होने
का मतलब उन्होंने बताया था कि कोई भी
व्यक्ति भारत में जो चुनाव लड़ता है यह
उसके लिए वह इंपार्शियल होना चाहिए उसकी

पूरी इंफॉर्मेशन लोगों को होना चाहिए
पॉलिटिकल पार्टी की पूरी इंफॉर्मेशन होना
चाहिए कैंडिडेट की पूरी इंफॉर्मेशन होना
चाहिए वहीं से यह पॉलिटिकल पार्टी में जो

कैंडिडेट खड़ा होता है उसको अपनी संपत्ति
घोषित करना उसकी अपने आय के स्रोत घोषित
करना उसके अपने अपने पास धन घोषित करना
एलआईसी वगैरह है उसके पास तो वो सब घोषित

करना यह सब उस समय से चल रहा है यानी कि
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कहा था तो राइट टू
इंफॉर्मेशन एकट हो चाहे फ्रीडम ऑफ
इंफॉर्मेशन एक्ट हो दोनों ही सुप्रीम

कोर्ट के आ आर्टिकल 191 ए के डिसीजन के
बाद आया था इसमें तमाम प्रकार के
न्यूजपेपर्स भी शामिल किए जाते हैं
न्यूजपेपर्स का मतलब यह है कि ऑनेबल

सुप्रीम कोर्ट ने कई एक केसेस में इंडियन
एक्सप्रेस का केस था बहुत सारे केसेस थे
जिनमें यह कहा था राइट टू इंफॉर्मेशन इज अ

फंडामेंटल राइट ऑफ एवरीवन एंड इट इज कवर्ड
इन आर्टिकल 191 ए इसी में आपको याद होगा
कि सीएबी मतलब कोलकाता कोलकाता क्रिकेट
एसोसिएशन या क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल

बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का केस आया था डीडी
न्यूज़ का केस आया था जिसमें देश के
खिलाड़ी कहीं खेल रहे थे और देश के
खिलाड़ियों का जो मैच था वह भारत में तमाम
चैनलों को बेचा जाता था बाद में सुप्रीम

कोर्ट ने कहा था राइट टू इंफॉर्मेशन एक
फंडामेंटल राइट है और यह फंडामेंटल राइट
आर्टिकल 111a में कवर होता है जब देश के
खिलाड़ी कहीं खेल रहे हो तो देश को उनको
देखने का अधिकार है उनको समझने का उसकी

इंफॉर्मेशन लेने का अधिकार है इसी के लिए
कहा गया था कि डीडी को यानी कि दूरदर्शन
जो सरकारी चैनल है इसको फ्री में सारे
राइट देने होंगे भारत में कोई राइट आप

किसी को बेच लेकिन आपको डीडी को फ्री में
राइट देने होंगे वो चल ही रहा था मतलब कुल
मिलाकर यह है कि यह सब आर्टिकल 191 ए में
था अब सरकार ने अभी कानून पास कर दिया था

कानून यह था कि जो भी व्यक्ति जो भी
पार्टी सॉरी जो भी पार्टी की फंडिंग होती
थी उस फंडिंग में एक 20000 का क्राइटेरिया
था एक 10000 का क्राइटेरिया था एक 2000 का

क्राइटेरिया था अलग-अलग कानूनों में
अलग-अलग क्राइटेरिया थे कि आपको जो जो जो
पॉलिटिकल पार्टी है उसको 20000 से ऊपर अगर
वह लेती है किसी से तो फिर उसको सिस्टम से

लेना होगा चेक से लेना होगा कैश नहीं ले
सकते और फिर उसको डिस्क्लोज भी करना होगा
कि किसने पैसा दिया 00 से नीचे का आप पैसा

ले सकते हैं डिस्क्लोज करने की जरूरत नहीं
है 2000 के नीचे कैश ले सकते हैं 2000 से
ऊपर भाई आप चेक लेंगे यह सब कुछ कानून
हमारे पास पहले से थे अब इसमें सरकार ने

एक संशोधन कर दिया सरकार का अपना प पक्ष
है सुप्रीम कोर्ट में जब ये चैलेंज हुआ था
तो सरकार का अपना पक्ष था और सरकार का
अपना पक्ष यह था इसमें कि साहब जी

इलेक्ट्रोनिक इलेक्ट्रॉन मतलब जो पैसा
फंडिंग होती है पॉलिटिकल पार्टी को एक
पॉलिटिकल पार्टी को फंड हो जाता है दूसरी
पॉलिटिकल पार्टी को पता लग जाता है और

जैसे ही दूसरी पॉलिटिकल पार्टी को पता
लगता है तो वो सामने वाले को हड़का लगता
है हड़का के बाद उससे वो भी पैसा लेकर आता
है और धीरे-धीरे सभी पॉलिटिकल पार्टियां
उस व्यक्ति से चंदा लेती हैं यह कहते हुए

लेती हैं कि तुमने फलानी पॉलिटिकल पार्टी
को दिया है की जानकारी हमको है यानी कि
अगर कोई भी स्वक्षा से किसी पॉलिटिकल

पार्टी को फंड करना चाहता है तो वह कर
नहीं सकता था क्यों क्योंकि वह डिस्क्लोज
होगा और डिस्क्लोज होगा तो सभी पॉलिटिकल
पार्टी दूसरा यह भी है कि अगर आपने सत्ता

रूड पार्टी को ज्यादा क्लेम कर दिया
ज्यादा दे दिया या फिर विपक्षियों को
ज्यादा दे दिया तो सत्तारूढ पार्टी उसको
परेशान कर सकती है और अगर सत्तारूढ को

ज्यादा दे दिया और सत्ता बदल गई तो सामने
जब आएगा तो वह परेशान कर सकता है यानी कि
कंपनियों के लिए व्यक्तियों के लिए रहा
आसान नहीं है यह एक मेजर प्रॉब्लम फेस की
इसके बाद पॉलिटिकल पार्टियों को चंदा

कंपनियां दे सके पॉलिटिकल पार्टियों को
चंदा खुले हृदय से लोग दे सके और उनके ऊपर
कोई कंपल्शन ना हो व अपनी सुरक्षा से पैसा
दें उनको जो लगे कि देश का विकास कर रहा
है देश में काम कर रहा है देश में

पॉलिटिकल पार्टी को आवश्यकता है करप्शन
मुक्त हो रहा है पॉलिटिकल पार्टी के खर्चे
हम उठाएंगे या पॉलिटिकल पार्टी को हम फंड
करेंगे और पॉलिटिकल पार्टी करप्शन ना करें
कम से कम करप्शन मुक्त देश हो जाए क्योंकि

पॉलिटिकल पार्टियां करप्शन तभी करेंगी जब
उनको चुनाव लड़ने के लिए आवश्यकता पड़ती
है तो आप केजरीवाल को देख रहे हैं कि
केजरीवाल चुनाव लड़ने के लिए केजरीवाल
अपनी जेब में थोड़ा बहुत रख रहे होंगे तो

रख रहे होंगे लेकिन केजरीवाल पूरा पैसा जो
लेते रहे उसका तो तात्पर्य यही है कि उनको
चुनाव लड़ना है यह बात सुप्रीम कोर्ट में
भी आ गई कि उनको चुनाव लड़ना था इसलिए
उन्होंने पैसा

लिया यह शराब घोटाले का पैसा 330 करोड़ की
एंट्री सामने आ गई और वो 330 करोड़ की
एंट्री के आधार पर वो सामने वाले ने मतलब
सुप्रीम कोर्ट ने उनको पार्टी बनाने के
लिए सहमति जता दी ईडी ने उनको पार्टी बना

लिया तो कुल मिलाकर यह जो बात आती है
केजरीवाल का जो इतना सारा करप्शन वो
महत्वाकांक्षा हैं कि वो नेशनल पार्टी
बनना चाहते हैं उनकी महत्वाकांक्षा हैं कि

वह पूरे देश में नेटवर्क खड़ा करना चाहते
हैं उनकी महत्वाकांक्षा एं हैं कि वह शासन
करना चाहते हैं राज करना चाहते हैं और

इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पड़ेगा एक
एक एक कैडर बनाना पड़ता है वो कैडर बनाने
के लिए बहुत सारे पैसे की आवश्यकता पड़ती
है अब किसी की महत्वाकांक्षा एकदम जाग
जाएं और आप फंडिंग की भी व्यवस्था ना हो
तो क्या करेगा तो फिर वह करप्शन करता है

या फिर भारतीय जनता पार्टी जो 1951 में
बनी उसको पहली बार सत्ता में पार्टिसिपेट
करने में 27 साल लगे दूसरी बार सत्ता में
पार्टिसिपेट करने के लिए उसको 18 साल लगे

और तीसरी बार फिर उनको 10 साल लगे यानी कि
टोटल फुल फ्रेश सरकार आने के लिए उनको 60
वर्ष 64 वर्ष लग गए आप सोचिए कि 64 वर्ष
जिस पार्टी को लगे हो करप्शन ना करने वाली

पार्टी को धीरे-धीरे बेस बढ़ाएगी लोगों को
जोड़े गी और तब अपने आप एस्टेब्लिश कर
पाएगी कांग्रेस को भी 60 वर्ष लगे थे

हालांकि कांग्रेस को अंग्रेजी उस समय की
अंग्रेजी सरकार ने एस्टेब्लिश किया था
उनकी ही फंडिंग हुआ करती थी इस बात को
लेकर यह भी सामने आया था कि वह सेफ्टी

वॉल्व है अंग्रेज सरकार का और इस बात को
लेकर कांग्रेस के दो धड़े भी हो गए थे
उसमें जब दो धड़े हो गए तो लला लाजपत राय
ने कहा कि तुम सेफ्टी वाल्व का काम करते

हो हम देश में जो आंदोलन खड़ा करते हैं वो
कांग्रेस उसको डि कांग्रेस के माध्यम से
अंग्रेज उसको डिफ्यूज कर देता है और
कांग्रेस स्वयं पिछ लग्गू बनकर चल देती

इसलिए गर्म दल और नरम दल हो गया था फिर भी
जो नरम दल था वही हावी हुआ और 1947 में उस
नरम दल ने सरकार बनाई अंग्रेज उनको ही
सरकार दे गए सत्ता दे गए थे तो कांग्रेस
का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना पड़ा या

उसको मेहनत करनी पड़ी हो ऐसा नहीं है वो
एक आंदोलन था जो अंग्रेज ने खड़ा किया था
जनता उसमें बेवकूफ बनी हुई थी जनता
कांग्रेस के लिए काम कर रही थी व अलग बात

है हालांकि बहुत सारे ग्रुप काम कर रहे थे
तो कांग्रेस का गर्म दल खैर कर भी रहा था
ये सब कुछ चल रहा था तो उस कांग्रेस का जो
स्ट्रक्चर खड़ा हुआ या कैडर खड़ा हुआ

उसमें कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं है
लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने जो रके जो जो
अपना स्ट्रक्चर खड़ा किया उसको 64 वर्ष
लगे और अभी भी दक्षिण भारत में पूरा

स्ट्रक्चर नहीं है कुछ राज्य ऐसे हैं जहां
पर अभी खाते भी खुलने में समय लग रहा है
वहां सही से खाते भी नहीं खुल पाए तो आप
सोच लीजिए कि कितना काम करना पड़ता है

लेकिन अगर फंडिंग की व्यवस्था पारदर्शी ना
हो पारदर्शी फंडिंग की व्यवस्था ना हो तो
ऐसी सिचुएशन में केजरीवाल अगर बढ़ना
चाहेंगे तो करप्शन करेंगे करप्शन करते हैं

तो जेल में चले जाते हैं अब पॉलिटिकल
पार्टियां करप्शन ना करें सबसे पहला
उद्देश्य अगर कुछ देश को सुधारना है तो यह
करना पड़ेगा कि पॉलिटिकल पार्टियां करप्शन
मुक्त हो जाए अब करप्शन मुक्त अगर
पॉलिटिकल पार्टी नहीं होगी तो सिस्टम भी

नहीं होगा अगर पॉलिटिकल पार्टी
000 गलत तरीके से कमाए गी तो आप समझ लीजिए
0000 सिस्टम कमाता है सिस्टम जो वसूली
करता है यानी कि जो एडमिनिस्ट्रेटिव
मशीनरी वसूली करती है उसका केवल 10 से 15

पर ही जो जो जो जो पॉलिटिकल पार्टी है
उसके पास जाता है आप समझ लीजिए तो करप्शन
आप कभी खत्म नहीं कर पाएंगे करप्शन खत्म
करने के लिए यूएस मॉडल पर जाना पड़ेगा
यूएस मॉडल में सरकारी खर्चे से चुनाव होता

है सरकारी खर्चे से वहां स्टेज सजाए जाते
हैं दोनों पॉलिटिकल पार्टियों के लोग आपस
में खड़े होते हैं पब्लिक क्वेश्चन बनाती
है उन क्वेश्चंस के उनको आंसर देने पड़ते

चुनाव करना पड़ता है और पॉलिटिकल पार्टी
अपना लीडर चुनती है वो लीडर फिर राष्ट्र
में देश में दोनों पार्टियां आमने-सामने
खड़े होकर करती हैं इसका पूरा खर्चा सरकार

उठाती है अब आप समझ लीजिए सरकार अगर खर्चा
उठाती है तो वहां अगर जो जो राष्ट्रपति वो
चला गया घर आप आराम से रहता है और जो नया
है उसके पास पैसे नहीं है तो भी वह चुनाव

लड़ सकता है जनता में अगर उसके लिए
विश्वास है तो वह चुनाव लड़ सकता है
क्योंकि सारा सिस्टम फेयर है हालांकि वो
भी सिस्टम पूर्ण रूप से फेयर नहीं कहा जा
सकता क्योंकि पॉलिटिकल पार्टी सरकारी

खर्चे के अलावा इन्फ्लुएंस में तो लेती ही
होंगी लेकिन फिर भी पकड़ने के चांस ज्यादा
होते हैं इसलिए कोई भी पॉलिटिकल पार्टी
उसमें वह खुलकर खेल नहीं खेल पाती लेकिन
हमारे देश में ऐसा नहीं है

हमारे हमारे देश में हर एक व्यक्ति को
चुनाव लड़ने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती
है पॉलिटिकल पार्टी भी जो कैंडिडेट टिकट
मांगना चाहता है उससे पैसे लेने के लिए आ

तो रहती है और कहती है भाई राष्ट्रीय
नेताओं का प्रवास लगेगा देश भर में खर्चा
आता है वो कौन उठाएगा आप ही चुनाव लड़ेंगे
अब जो व्यक्ति चुनाव पैसे से लड़कर आएगा

जो अपना खेत बेचकर चुनाव लड़ेगा जो पैसा
उधार लेकर चुनाव लड़ेगा जो मार्केट से
पैसा उठाकर चुनाव लड़ेगा उसको पैसा वापस
भी करना है सैलरी यां बहुत कम होती हैं
कभी पहले तो बहुत बहुत मिनिमम में होता था

तो फिर उसको एलॉटेड फंड में से वो पैसा
कमीशन लेता है व तमाम तरह के काम सरकारी
मशीनरी से करता है उसका पैसा लेता है यानी
कि करप्शन कभी खत्म नहीं किया जा सकता अब
ऐसी परिस्थिति में केंद्र सरकार ने एक

कानून पास किया फाइनेंस एक्ट 2017 उसको
कहा गया उसने चार कानूनों में संशोधन किया
पीपल्स रिप्रेजेंटेटिव एक्ट में संशोधन
किया कंपनीज एक्ट में संशोधन किया इनकम
टैक्स एक्ट में संशोधन किया और उसने

संशोधन किया यह खुद फाइनेंस एक्ट में अब
इतने सारे कानूनों में संशोधन
करके यह एक व्यवस्था दी कि भाई इलेक्टोरल
बंड्स निकाले जाए इलेक्टोरल बंड सीक्रेट
पेपर होगा जिसको जो देना है किसी को भी

देना है वह एक पार्टिकुलर शेड्यूल्ड बैंक
जो केंद्र सरकार नियुक्त कर देगी उसने
एसबीआई बना दिया था एसबीआई के पास जाए
पैसे जमा करे और वह बॉन्ड ले ले पैसे जमा
करने के लिए वह वहां पर चेक से पैसा देगा

कैश कितने तक दे सकता है कितने की
इलेक्ट्रॉनिक बॉन्ड कैश में खरीद सकता है
कितने का चेक में में खरीद सकता है उसका
आधार कार्ड वहां पर लगेगा ये सारी

व्यवस्थाएं उसने कर दी अब वो इलेक्टोरल
बॉन्ड जो वो वहां बैंक से खरीद कर लाएगा
बिल्कुल वैसे ही जैसे आजकल सोवन गो गोल्ड
बंड है वो जो खरीद कर लाएगा वो बेयरर बंड

होगा बेयरर बॉन्ड वो जाए किसी भी पॉलिटिकल
पार्टी को देना चाहता है उस पॉलिटिकल
पार्टी को दे दे उस पॉलिटिकल पार्टी के
पास जब वो जाएगा तो उसका बॉन्ड का एक नंबर

होगा पॉलिटिकल पार्टी को 15 दिन के अंदर
उसको कैश करवाना होगा मतलब अपने अकाउंट
में ट्रांसफर करवाना होगा यानी कि
पॉलिटिकल पार्टी का जो फंडिंग है वो नंबर
एक में होगी और इसके अतिरिक्त जब चूंकि जो
बॉन्ड खरीदने जा रहा है वह चेक से बॉन्ड

खरीदेगा जो बॉन्ड खरीदने जा रहा है वो एक
सिस्टम से बॉन्ड खरीदेगा तो ऑटोमेटिक उसके
अकाउंट से पैसा डिडक्ट होगा उसके अकाउंट
से पैसा डिडक्ट होगा तो इनकम टैक्स जिस

समय भर रहा होगा उस इनकम टैक्स के सिस्टम
में आ जाएगा पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट
में पॉलिटिकल पार्टी को फंड लेने का
अधिकार होगा व्यक्ति को नहीं होगा यानी कि
पॉलिटिकल पार्टी जो भी उसके पास फंड आएगा

उसके आधार पर अपने कैंडिडेट फ्री ऑफ कॉस्ट
खड़े करेगा और अच्छे कैंडिड डेटों को
निकाल कर लाएगा इसमें किसी को यह पता नहीं
लग पाएगा कि पैसा किसने दिया कितना दिया
यानी कि जो दान करना चाहता है वह गुप्त

रूप से दान कर सकता है और पॉलिटिकल पार्टी
में भी किसी को पता नहीं होगा कि इसमें
कौन लेकर आया लेकिन सिस्टम में पता होगा
सिस्टम का मतलब इनकम टैक् डिपार्टमेंट में
आपको डिस्क्लोज करना पड़ेगा बैंक के सामने

आपको डिस्क्लोज करना पड़ेगा इलेक्टोरल जब
जब रिटर्न आप भरेंगे तो इलेक्शन कमीशन के
सामने आपको डिस्क्लोज करना पड़ेगा इतना
मतलब सिस्टम के अंदर होगा आम आदमी उसको

नहीं जान पाएगा कि इनकी फंडिंग कहां से
होती जा रही है दूसरी पॉलिटिकल पार्टी भी
नहीं समझ पाएगी कि फंडिंग कहां से होती जा
रही है ताकि कोई किसी को परेशान ना करे और

जो जो जो जो धन है कोई भी देना चाहता है
वोह धन अपने सीक्रेट दे ले उसकी इच्छा हो
दे ना इच्छा हो ना दे ये व्यवस्था
उन्होंने करी थी हां इसके साथ पहले भी

पहले से य व्यवस्था थी कंपनियां इसमें
इन्वेस्टमेंट कर मतलब कंपनियां डोनेशन दे
सकती हैं कंपनियां जो गवर्नमेंट कंपनियां
नहीं है या जो कंपनियां 3 साल से जिनकी

आयु ज्यादा नहीं हुई है वह कंपनियां नहीं
दे सकती यानी कि गवर्नमेंट कंपनी नहीं दे
सकती और नई कंपनियां नहीं दे सकती 3 साल
से ऊपर की कंपनियां दे सकती हैं 3 साल से

ऊपर की कंपनी को भी यह कंप्लायंस पहले
किया गया था कि अपने प्रॉफिट का 75 पर से
ज्यादा नहीं दे सकती प्रॉफिट का 75 पर और
पिछले 3 साल का प्रॉफिट यानी कि अगर पिछले
2 साल से कोई फंड नहीं कर रहा है तो इस

साल वह फंड करना चाहता है तो 25 % तक वो
फंडिंग कर सकता है 3 साल के प्रॉफिट के
बराबर यानी कि 75 पर प्रॉफिट के हिसाब से
अब सवाल यहां पर आता है 22.5 पर कह लो या

75 पर ईच के हिसाब से निकाल लो इतना
मैक्सिमम फंड कर सकता है इस उस समय भी
क्लेरिटी नहीं थी कि वह पब्लिक कंपनियां
हो या प्राइवेट कंपनियां हो हालांकि मेरा

मानना यह है पब्लिक कंपनियों को ऐसी छूट
नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि पब्लिक
कंपनियां शेयर्स पर चलती है आम आदमी का
पैसा लगता है आम आदमी का पैसा कोई कोई कोई

कैसे निर्णय ले सकता है लेकिन जो प्राइवेट
कंपनी है जो पार्टनरशिप फर्म की तरह काम
करती है जो प्रोपराइटरी फंड की तरह
प्रोपराइटरी कंपनियों की तरह काम करती हैं
उनको अधिकार दिया जाना चाहिए कि भाई अगर

कोई प्राइवेट कंपनी है वह इन्वेस्टमेंट
करना चाहती है वो खर्च करना चाहती है तो
वो कर सकती है किसी को क्या समस्या है
केंद्र सरकार ने 2017 का जो संशोधन किया

पार्लियामेंट से जो संशोधन हुआ 2017 में
फाइनेंस एक्ट में उसमें यह संशोधन कर दिया
कि कंपनियां 75 पर की रिस्ट्रिक्शन हटा दी

और कंपनियां जितना चाहे वो कर सकती केवल
गवर्नमेंट कंपनी का फंड नहीं हो सकता और 3
साल से कम उम्र की कंपनी का फंड नहीं हो
सकता इतना व्यवस्था केंद्र सरकार ने उसमें

कर दी थी और सीक्रेट इलेक्टोरल बॉन्ड की
व्यवस्था कर दी थी यह कह दिया था उसमें कि
2000 की जो रिस्ट्रिक्शन है जो 10000 की
रिस्ट्रिक्शन है या जो 20000 की

रिस्ट्रिक्शन है ये रिस्ट्रिक्शन उन पर
लागू नहीं होगी जो इलेक्टोरल बॉन्ड देना
चाहते हैं यानी कि इलेक्टोरल बॉन्ड
अनलिमिटेड अमाउंट का दिया जा सकता है और

कोई भी कंपनी अनलिमिटेड पैसा दे सकती है
ये केंद्र सरकार ने उस समय संशोधन किया जब
यह चैलेंज हुआ तो पहले तीन जजों की बेंच
में गया था उन्होंने उस पर एक इतम ऑर्डर

पास किया था और पाच जजों की बेंच की तरफ
ट्रांसफर कर दिया था नबल जस्टिस रंजन
गोगोई हुआ करते थे उन्होंने इसको फॉरवर्ड
किया था जब यह मामला गया तो इसमें चैलेंज
करने वालों ने यह कहा कि सबब राइट टू
इंफॉर्मेशन एक्ट का उल्लंघन हो रहा है

लोगों को पता होना चाहिए पॉलिटिकल पार्टी
की फंडिंग कौन कर रहा है और कैसे आ रही है
तो यह जो सीक्रेट फंडिंग है जिसको वो कह
रहे हैं कि भाई सीक्रेट फंडिंग इसलिए

क्योंकि सारी पॉलिटिकल पार्टियां कूद करर
उसको ले लेती हैं और बै मानस्था निकालती
हैं तो सीक्रेट फंडिंग नहीं होनी चाहिए
हमको पता होना चाहिए कि सामने वाला को फंड

कौन कर रहा है खास तौर से कांग्रेस गई थी
सीपीआई गई थी और अ दूसरे लोग गए थे
इन्होंने ये कहा था कि साहब रूलिंग पार्टी
को इसका लाभ होगा क्योंकि लोग रूलिंग

पार्टी को देंगे और इनका ये भी कहना था कि
रूलिंग पार्टी इंफॉर्मेशन निकाल लेगी अगर
किसी और को फंडिंग की जाएगी इसलिए रूलिंग
पार्टी मिसयूज कर सकती है लेकिन

साथ में इन्होंने कहा कि साब सीक्रेट नहीं
होना चाहिए ओपन होना चाहिए दूसरी बात मतलब
राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट का उल्लंघन होगा
आर्टिकल 191 ए का उल्लंघन होगा पॉलिटिकल

पार्टी के लिए तमाम तरह की पहले से रूलिंग
है दूसरी बात इन्होंने कहा कि कंपनियों के
अनलिमिटेड जो राइट दे रखे हैं कि भाई वह
कितना भी कर सकते हैं फंडिंग उससे शैल

कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा और और और जो जो
जो जो पॉलिटिकल पार्टी है वो ऐसे मामलों
में शेल कंपनियां खोलेगा दुनिया भर के
करप्शन का पैसा शेल कंपनियों में लगाएगा
शेल कंपनियों के माध्यम से बॉन्ड खरीदेगा

बंड खरीदकर वो पॉलिटिकल पार्टी को दे देगा
और शेल कंपनी बंद कर
देगा इसके लिए चैलेंज किया सुप्रीम कोर्ट
ने यह बात को सुना सुनने के बाद उन्होंने
यह बात स्वीकार की कि आर्टिकल 191 ए का

उल्लंघन है क्योंकि ये सीक्रेट नहीं होना
चाहिए पॉलिटिकल पार्टी की फंडिंग का पता
सबको सबको होना चाहिए और पॉलिटिकल पार्टी
कहां से आ रही है कहां से पैसा दे रहा है
कौन सी कंपनी पैसा दे रही कौन सा व्यक्ति
पैसा दे रहा है कितना पैसा दे रहा है यह

सब कुछ डि क्लोज होना चाहिए ये सब ओपन
होना चाहिए इससे जो इंपार्शियल्टी है वो
उसको बढ़ावा मिलेगा ये इंपार्शियल्टी को

बढ़ावा मिलेगा और
पार्शियलिस बॉन्डिंग है जो इलेक्टोरल वोट
पड़ता है उसको यह पता होना चाहिए कि आखिर
कौन सी पॉलिटिकल पार्टी के पीछे कौन है

उसकी फंडिंग कौन कर रहा है बात उनकी भी
जायज थी सुप्रीम कोर्ट ने इन दो आर्गुमेंट
पर कि कंपनी को अनलिमिटेड नहीं छोड़ा जा
सकता क्योंकि ये शेल कंपनी को बढ़ावा देगा

दूसरा उन्होंने कहा राइट टू इंफॉर्मेशन
एक्ट या फिर फ्रीडम ऑफ इंफॉर्मेशन एक्ट
2002 या फिर आर्टिकल 191 ए जिसमें कि अ फड
इंफॉर्मेशन पब्लिक इंफॉर्मेशन देने का कहा
गया है राइट है फंडामेंटल राइट है इनका

उल्लंघन होता है अतः यह संशोधन नहीं
स्वीकार हालांकि जब ये इलेक्शन कमीशन ने
कहा था कि साहब इसके पीछे इंपार्शियल्टी
को खत्म करना को बढ़ावा देना और
पार्शियलिस करना है और लोगों के ऊपर

अनुचित पॉलिटिकल पार्टियां दबाव ना बनाएं
इसके लिए है और करप्शन को रोकना है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा करप्शन को रोकने के
और भी तरीके हो सकते हैं यह तरीका करप्शन

को रोकने का नहीं है यह करप्शन को रोकने
के अलावा बढ़ावा भी दे सकता है इसलिए यह
संवैधानिक संशोधन असंवैधानिक है यानी कि
यह रिफॉर्म असंवैधानिक है इसको

कांस्टिट्यूशन से अनुमति नहीं दी जा सकती
यह कहते हुए 2017 के संशोधन को अवैधानिक
घोष किया है जय हिंद जय भारत वंदे
मातरम

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