फैक्ट्री में मैदा कैसे बनता हैं? | How maida is made ? | - instathreads

फैक्ट्री में मैदा कैसे बनता हैं? | How maida is made ? |

हेलो दोस्तों जब भी हम कभी बाहर खाने की
सोचते हैं तब हम कई सारी चीजें खाते हैं
जो कि मैदे से बनी होती हैं फिर चाहे वह
समोसा हो चौ मीन हो बर्गर हो या मोमोज
मैदा आज के समय कई सारी खाने की चीजों में
मुख्य रूप से उपयोग हो रहा है लेकिन क्या

आपने कभी सोचा है कि आखिर मैदा किस चीज से
बनता है और इसे फैक्ट्री में कैसे बनाते
हैं तो चलिए जानते हैं इस कमाल की वीडियो
में कि मैदा कैसे बनता है इसलिए वीडियो को
एंड तक जरूर देखिए
दोस्तों आपको यह जानकर हैरानी होगी कि

मैदा मुख्य रूप से गेहूं से ही बनता है
जिसके आटे से बनी रोटी हम रोज ही खाते हैं
लेकिन फिर मैदा इतना अलग क्यों होता है
इसे समझने के लिए आपको गेहूं का स्ट्रक्चर
समझना पड़ेगा एक गेहूं के दाने के तीन
हिस्से होते हैं गेहूं की सबसे ऊपरी परत
को ब्रेन कहते हैं इसमें फाइबर और मिनरल

पाए जाते हैं गेहूं के बीच वाले हिस्से को
एंडोस्पर्म कहते हैं इसमें मुख्य रूप से
कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन होता है
स्टार्च और ग्लूटेन के रूप में और गेहूं
के सबसे बीच वाले हिस्से को जर्म कहते हैं
जिसमें विटामिंस और मिनरल्स होते हैं जब

हम मैदा बनाते हैं तो इसके लिए ब्रेन और
जर्म को गेहूं से अलग कर देते हैं और
सिर्फ एंडोस्पर्म यानी स्टार्च और ग्लूटेन
वाला हिस्सा बचता है जिसे पीसकर हम मैदा
बनाते हैं चलिए फैक्ट्री में इसकी प्रोसेस

को देखते हैं मैदा बनने की प्रक्रिया शुरू
होती है गेहूं की फसल को काटने से जिसके
लिए हार्वेस्टर का उपयोग करते हैं जो फसल
में से गेहूं के दाने को अलग कर देता है
जिसके बाद गेहूं को बोरियों में भरकर ट्रक
या ट्रैक्टर में लोड करके फैक्ट्री में
भेजते हैं फैक्ट्री में गेहूं को डंपिंग

या इंटेक पॉइंट पर खाली कर लेते हैं जिससे
गेहूं जाली से होता हुआ अंडरग्राउंड भंडार
में जमा हो जाता है वहां से सैंपल लेकर
सबसे पहले इसकी लैब टेस्टिंग की जाती है
और जिसके द्वारा गेहूं में नमी प्रोटीन

ग्लूटेन मिनरल्स आदि की जानकारी प्राप्त
की जाती है इसके बाद अंडरग्राउंड भंडार से
एक खास बकेट कन्वेयर द्वारा गेहूं को
फैक्ट्री के सबसे ऊपरी सिरे तक पहुंचाया
जाता है क्योंकि ज्यादातर फैक्ट्रीज में

टॉप टू बॉटम अप्रोच अपनाई जाती है जिसमें
ग्रेविटी का इस्तेमाल करते हुए अनाज ऊपर
से नीचे आता है ऊपर पहुंचने पर गेहूं को
सबसे पहले क्लीनिंग प्रोसेस से गुजारती
हैं जिसके द्वारा इसे साफ करते हैं सबसे

पहले होती है प्री क्लीनिंग प्रोसेस
जिसमें इसे ड्रम सीप से गुजारते हैं इसमें
एक ड्रम की तरह घूमती हुई छन्नी लगी होती
है जो गेहूं में से रस्सी प्लास्टिक कागज
जैसी बड़ी-बड़ी चीजों को अलग कर देती है
इसके बाद गेहूं पहुंचता है ग्रेविटी

क्लीनर में जिसमें एक की के ऊपर एक कई
सारी तिरछी छन्नी लगी होती हैं और गेहूं
ग्रेविटी के कारण धड़कते हुए नीचे आता है
जिसके द्वारा अन्य फसलों के दाने और डंठल
आदि को साफ किया जाता है जिसके बाद गेहूं

एक फ्लो बैलेंसर से गुजरता है जिसमें एक
स्टोरेज टैंक भी जुड़ा होता है जो गेहूं
के आगे बढ़ने की मात्रा यानी फ्लो को
कंट्रोल करता है अब गेहूं को मैग्नेटिक डी

स्टोनर से गुजारते हैं जिस में एक बहुत
बड़ा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक चुंबक लगा होता
है जो गेहूं में से लोहे यानी आयरन की
चीजें जैसे कि नट बोल्ट तार के टुकड़े आदि
को अलग कर देता है इन्हें चिपकाकर इसके
बाद अगले प्रोसेस में इसे वाइब्रो सेपरेटर

में भेजते हैं जिसमें वाइब्रेट करती हुई
छनियारा हिलती रहती हैं जो गेहूं में
चिपके हुए डंठल बाली और कई छोटी चीजों को
साफ कर देता है जिसके बाद गेहूं पहुंचता
है डी स्टोनर में इसमें खास प्रकार की

वाइब्रेट करती हुई जाली लगी होती है जो
हल्की सी झुकी होती है और नीचे से हवा भी
लगातार फ्लो होती रहती है जब गेहूं इसके
ऊपर से गुजरता है तो गेहूं में मौजूद
पत्थर कंकड़ और कांच के टुकड़े भारी होने
के कारण नीचे बैठ जाते हैं और गेहूं हल्का
होने की वजह से ऊपर आ जाता है और नीचे से

आती हुई हवा इसे दोबारा मिक्स नहीं होने
देती और इसे ऊपर ही बनाए रखती है जिस वजह
से जाली के संपर्क में मौजूद कंकड़ पत्थर
के टुकड़े जाली के खास डिजाइन की वजह से
ऊपर की ओर बढ़ने लगते हैं और गेहूं
ग्रेविटी के कारण नीचे की ओर आने लगता है

जो नीचे साइड में एक तरफ आ जाता है जबकि
कंकड़ पत्थर दूसरी साइड कंटेनर में इकट्ठा
हो जाती हैं यह मशीन इतनी ज्यादा एफिशिएंट
होती है जो कि छोटे से छोटे कंकड़ को अलग
कर देती है बिना एक भी दाने को वेस्ट किए

इसके बाद गेहूं पहुंचता है स्कोरर में
जिसमें एक घूमता हुआ रोल लगा होता है एक
ड्रम के अंदर और ड्रम और रोल दोनों के ऊपर
कई सारे दांत जैसे लगे होते हैं इसलिए जब
ड्रम और रोल के बीच के थोड़े से गैप में
गेहूं को डाला जाता है तो घर्षण यानी

फ्रिक्शन होता है गेहूं के दाने और दांतों
के बीच में जिस कारण दानों पर जमा मिट्टी
और भूसा अलग हो जाता है जो नीचे जाली से
गिर जाता है और गेहूं के दाने अलग हो जाते
हैं इसके बाद गेहूं को एस्पिरेशन चैनल से
गुजारते हैं जिसमें गिरते हुए गेहूं में

पंखे की मदद से तेज हवा को गुजारते हैं जो
गिरते हुए गेहूं में मौजूद भूसे और डस्ट
को उड़ाकर अलग कर देता है जिससे हमें साफ
गेहूं मिल जाता है अब गेहूं को फाइनल
क्लीनिंग के लिए ग्रेन बसर में भेजते हैं
जहां पर इसे पानी की मदद से अच्छे से साफ

करते हैं ताकि बची हुई थोड़ी बहुत गंदगी
भी निकल जाए और गेहूं अच्छे से साफ हो जाए
और फिर यह मशीन पानी को अलग करके धुले हुए
गेहूं को अलग कर देती है जिसके बाद धुले
हुए गेहूं को ग्रेन ड्रायर में भेजते हैं
जिसमें इलेक्ट्रिक हीटर और पंखे लगे होते
हैं जो की गर्म हवा छोड़ते हैं जिस वजह से

कनमर पर जाते हुए गेहूं में से लगातार
गर्म हवा फ्लो होती रहती है जो नमी को
गेहूं में से अलग करके उसे जल्दी सुखा
देती है और हमें सूखा हुआ गेहूं मिल जाता
है इस साफ सुधरे गेहूं को कमेर की मदद से
स्टोरेज साइलो में भेजते हैं जहां पर इसे

जमा करके रख लेते हैं ताकि यह वातावरण और
कीड़े आदि से सुरक्षित रहे अगर हमें सादा
आटा बनाना ना हो तो सीधा फ्लोर मिल में
गेहूं को भेजकर चक्की से पीस लेते हैं
लेकिन मैदा बनाने के लिए सबसे पहले

स्टोरेज साइलो से गेहूं को मॉइश्चर
मेजरिंग डिवाइस से गुजारते हैं जिसमें लगे
माइक्रोवेव और ऑप्टिकल सेंसर गेहूं में
नमी का पता लगाती हैं यहां से होता हुआ यह
पहुंचता है टर्बो आइजर डंपर में जहां पर
जरूरत के अनुसार इसमें पानी मिलाया जाता

है और घूमते हुए रोटर गेहूं में पानी को
अच्छे से मिक्स कर देते हैं जिससे इसकी
नमी को 7 से 20 पर तक बढ़ाया जाता है इसके
बाद गेहूं को होल्डिंग टैंक में रखा जाता
है 10 से 12 घंटों के लिए जिस वजह से
गेहूं के बाहर का खोल यानी ब्रेन सख्त हो

जाता है जबकि अंदर का एंडोस्पर्म फूला
रहता है इस तरह से दोनों के टेक्सचर में
आया डिफरेंस बहुत इंपोर्टेंट है मैदा
बनाने के लिए अब गेहूं को क्रैकिंग मिल
में भेजते हैं जिसमें दो रोल लगे होते हैं
जो अलग-अलग डिफरेंशियल स्पीड पर घूमते हैं

जिनके बीच में थोड़ा सा गैप होता है जिस
वजह से जब गेहूं के दाने इनके बीच से
गुजरते हैं तो वह पिसते नहीं हैं बल्कि
क्रैक होकर अखरोट की तरह खुल जाती हैं गैप
और नमी होने की वजह से जिस वजह से ब्रेन
जर्म और एंडोस्पर्म सब अलग-अलग हो जाता है

और इन सबका एक मिक्सचर बन जाता है जिसमें
तीनों चीजें होती हैं अब इस मिक्सचर को
प्यूरीफायर से गुजारते हैं जिसमें सीरीज
और पैरेलल में कई सारी वाइब्रेट करती हुई
छन् नियां लगी होती हैं जिनके छिद्रों का
आकार ऊपर से नीचे आते हुए बारीक होता है

जब क्रश किए हुए मिक्सचर को फीडर से दिया
जाता है तो वह हिलने के कारण पूरी छडियो
पर फैल जाता है और गर्म हवा लगातार नीचे
से दी जाती है जो ब्रेन और जर्म को हल्का
होने के कारण ऊपर उठा देती है जबकि भारी
एंडोस्पर्म नीचे रह जाता है साथ ही गर्म
हवा एंडोस्पर्म को सुखा भी देती है

अलग-अलग हिलती हुई छन् नियों से गुजरते
हुए साफ एंडोस्पर्म के टुकड़े नीचे इकट्ठा
होते रहते हैं जबकि ब्रेन और जर्म साइड
में अलग होकर फिर से मिल में भेज दिए जाते
हैं नीचे इकट्ठा हुए एंडोस्पर्म के टुकड़े
जो छड़ने के बाद हमें मिलते हैं इसे ही हम

सेमोलिना या सूजी कहते हैं जो कि हलवा
बनाने में इस्तेमाल होती है जिसकी मदद से
फिर आगे मैदा भी बनता है मैदा बनाने के
लिए सूजी यानी सेमोलिना को रोलर मिल में
भेजते हैं जहां पर इसे फीड रोलर की मदद से

एक सा फैलाकर ग्राइंडिंग रोलर के बीच में
पीसा जाता है और इसे ज्यादा बारीक पीसने
के लिए सीरीज में लगे एक के बाद एक कई
सारे रोलर के बीच में से पीसते हैं जब तक
इसके पार्टिकल का साइज 200 माइक्रोन से कम
ना हो जाए जहां से फिर इसे प्लान शिफ्टर

में भेजते हैं जिसमें एक के ऊपर एक कई
सारी बहुत ज्यादा बारीक छन् नियां लगी
होती हैं कई सारे बॉक्सेस में जो लगातार
हिलती रहती हैं काउंटर वेट मैकेनिज्म के
कारण प्लान शिफ्टर में ऊपर से बारीक पिसे
सेमोलिना को डाला जाता है जो ऊपर से नीचे

आते हुए बहुत बारीक पार्टिकल होते हैं वही
सारी छनि हों को पार करके नीचे पहुंच पाते
हैं बाकी पार्टिकल को फिर से रोलर मिल में
भेजते हैं पिसने के लिए सबसे आखिरी में
छनन के बाद जो आटा मिलता है उसके पार्टिकल

का साइज 10 से 100 माइक्रोन के बीच में
होता है इसे ही हम मैदा कहते हैं लेकिन
अभी भी यह ज्यादा सफेद नहीं होता क्योंकि
मैदा जब हवा के संपर्क में कुछ समय के लिए
रहता है तो ऑक्सीडो करर अपने आप सफेद हो

जाता है लेकिन कई बार कंपनियां इस प्रोसेस
को जल्दी करने के लिए इसे पॉक्स इड या
पोटेशियम ब्रोमेट की मदद से ब्लीज करती
हैं ताकि मैदा जल्दी सफेद हो जाए लेकिन
अभी भी सबसे इंपोर्टेंट क्वेश्चन यह है कि
आखिर जब गेहूं से ही आटा सूजी और मैदा

बनता है तो फिर स्वाद में इतना अंतर क्यों
होता है इसका सबसे पहला कारण है मैदा में
ब्रेन और जर्म का ना होना जिसमें फाइबर और
मिनरल होते हैं जो कार्बोहाइड्रेट के
स्वाद को कम कर देते हैं और दूसरा सबसे
बड़ा कारण है पार्टिकल साइज गेहूं से बने

दलिए के पार्टिकल का साइज 1000 से 1500
माइक्रोन के बीच में होता है सूजी के
पार्टिकल 400 से 800 माइक्रोन के होते हैं
और आटे के पार्टिकल 300 से 400 माइक्रोन
के होते हैं वहीं मैदे के पार्टिकल सिर्फ
10 से 100 माइक्रोन के बीच में होते हैं

और हम आपको बता दें कि पार्टिकल का साइज
जितना कम होगा वह उतनी ही जल्दी लार के
साथ घुल करर ज्यादा टेस्ट देगा और पेट में
भी जल्दी पचक ग्लूकोज में बदलकर एनर्जी
देगा यही कारण है कि बीमार लोगों को गेहूं

का दलिया खिलाया जाता है क्योंकि उसके
पार्टिकल बहुत बड़े होते हैं और धीरे-धीरे
पचती हैं जबकि डायबिटीज वाले लोगों को
मैदा से दूर रहने की सलाह दी जाती है
क्योंकि बहुत छोटे पार्टिकल होने के कारण
वह जल्दी पचक ग्लूकोज यानी शुगर लेवल को
बढ़ा देता है तो यह थी मैदा बनने की पूरीकहानी  जय हिंद जय भारत

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