भारत को गुलाम बनाने वाली ये कंपनी आज क्या कर रही है ? | What Is East India Company Doing Now ? - instathreads

भारत को गुलाम बनाने वाली ये कंपनी आज क्या कर रही है ? | What Is East India Company Doing Now ?

दोस्तों समय ने बड़े-बड़े बादशाहों को
पटकने दी है चाहे दुनिया जीतने वाला
सिकंदर महान ही क्यों ना हो कुछ ऐसा ही
हुआ ईस्ट कंपनी के साथ भी देखिए एक समय था
जब ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार तो छोड़िए

ईस्ट के कई बड़े-बड़े देशों में सरकारें
चलाने का काम कर रही थी जी हां क्या रेल
और क्या जहाज सब कंपनी का ही हुआ करता था
260000 सैनिक थे इनकी सेना में यानी
ब्रिटेन की सेना से भी दोगुने और रेवेन्यू
की बात तो पूछिए मत खजाने भर रखे थे ट लूट

 

कर भाई लेकिन फिर एक आंधी आई और ईस्ट
इंडिया कंपनी की जड़ें हिलाक रख दी देखते
ही देखते कंपनी बर्बाद हो गई कहते हैं
ब्रिटिश राज में कभी सूरज नहीं डूबता था
लेकिन उस दिन खुद ईस्ट इंडिया कंपनी का
सूरज डूब गया उसे एक भारतीय ने ही घुटनों
पर ला दिया था लेकिन आखिर क्या हुआ था

उसके साथ कैसे दुनिया के बड़े-बड़े देशों
पर राज करने वाली कंपनी रातों-रात बर्बाद
हो गई और आज इसके क्या हालात हैं इन सब
सवालों के जवाब जानने के लिए हमें इतिहास
को थोड़ा टटोलना होगा कि कैसे ईस्ट इंडिया

राज हुआ खाक अब जरा इस पेंटिंग को देखिए
यह अगस्त 1765 का एक सीन है जब मुगल
सम्राट शाह आलम ईस्ट इंडिया कंपनी के
गवर्नर जनरल रॉबर्ट क्लाइव के साथ एक
समझौते पर दस्तखत कर रहे थे इसके बाद
बंगाल बिहार और ओड़ीशा के रेवेन्यू पर

मुगलों की जगह ईस्ट इंडिया कंपनी का
अधिकार हो गया और यही वह पल था जब कंपनी
ने कपड़ों मसालों के कारोबार से आगे
निकलकर कुछ ऐसा करना शुरू किया जो ना पहले
भी हुआ था और ना ही कभी किसी ने सोचा था
जिसका रिजल्ट यह निकला कि भाई अगले कुछ
सालों में कंपनी के 250 क्लर्क्स ने महज

20000 भारतीय सैनिकों के साथ मिलकर पूरे
बंगाल पर कब्जा कर लिया और अगले 50 सालों
में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना 2.50 लाख
से ज्यादा की हो गई इसने पूरे भारतीय
सबकॉन्टिनेंट को अपनी कॉलोनी बना लिया तब
नारायण सिंह नाम के एक मुगल अधिकारी ने

शाह आलम के साथ हुए समझौते के बाद कहा था
कि अब क्या इज्जत रह जब हमें ऐसे अंग्रेज
कारोबारियों के आदेश को मानना पड़ेगा
जिन्हें अब तक ठीक से अपना पिछवाड़ा धुलना
भी नहीं आया देखिए अक्सर हम कहते हैं कि

ब्रिटिश सरकार ने भारत को गुलाम बनाया
लेकिन सच तो यह है कुछ घुमंतु व्यापारियों
की एक प्राइवेट कंपनी ने भारत को गुलाम
बनाया था वो कंपनी जो रेंगते हुए ब्रिटेन
में पैदा हुई थी अब हम ऐसा क्यों कह रहे

हैं इसे समझने के लिए जरा 1600 ईसवी के उस
सिनेरियो पर गौर कीजिए जब भारत को सोने की
चिड़िया कहा जाता था और कहा भी क्यों ना
जाए पूरी दुनिया के कुल प्रोडक्शन का 25
पर माल अकेला भारत पैदा करता था उस वक्त
दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह जलालुद्दीन

मोहम्मद अकबर की हुकूमत थी वह दुनिया के
सबसे दौलतमंद बादशाहों में से एक थी और
लोमड़ी की तरह चालाक थी तब देश इकोनॉमिक
रूप से इतना समृद्ध था कि दूर दराज की
दुनिया से लोग भारत को देखने आते थे ठीक
इसी वक्त ब्रिटेन में क्वीन एलिजाबेथ 1स्ट

का शासन था और वह सिविल वॉर से उभर रहा था
उसकी इकॉनमी खेतीबाड़ी पर डिपेंड थी यह
दुनिया के कुल प्रोडक्शन का महज 3 फीदी
माल ही तैयार कर पाता था उस वक्त यूरोप की
पुर्तगाल और स्पेन जैसी प्रमुख शक्तियां

व्यापार में ब्रिटेन को पीछे छोड़ चुकी थी
व्यापार के रूप में तो ब्रिटेन के समुद्री
लुटेरे पुर्तगाल और स्पेन के व्यापारिक
जहाजों को लूटकर ही सेटिस्फाइड हो जाते थे

तभी घुमंतु ब्रितानी व्यापारी राल्फ फिच
को इंडियन ओशन मेसोपोटामिया पर्शियन गल्फ
और साउथ ईस्ट एशिया की बिजनेस ट्रिप्स
करते हुए भारत की समृद्धि के बारे में पता
चलता है ऐसे में राल फिच ने भारत की

यात्रा की उससे मिली इंफॉर्मेशन के बेसिस
पर जेम्स लैंकर ने ब्रिटेन के 200 रूस
कदार व्यापारियों को एकजुट किया और 31
दिसंबर 1600 को एक नई कंपनी की नीव डाली
जिसका नाम पड़ा ईस्ट इंडिया कंपनी इस

कंपनी को ब्रिटेन की महारानी से ईस्ट
एशिया में व्यापार का एका अधिकार प्राप्त
हुआ इधर भारत में 1605 ईसवी में मुगल
बादशाह अकबर की मृत्यु हो चुकी थी अब उनकी
जगह पर जहांगीर तख्त पर बैठे थे अकबर ने
अपने शहजादे जहांगीर के लिए 5000 हाथी 12

1000 घोड़े 1000 चीते 10 करोड़ रुपए बड़ी
अशर्फियां में 100 तोले से लेकर 500 तोले
तक की हज अशरफियां 2 ब मन कच्चा सोना 370
मन चांदी ₹ करोड़ के मन जवाहरात अपने पीछे
छोड़े थे उस दौर में संपत्ति के मामले में

के बराबरी कर सकता था अब इन सबके बीच 1608
ईसवी में ईस्ट इंडिया कंपनी के कैप्टन
विलियम हॉकिंस ने पहली बार भारत के सूरत
बंदरगाह पर कदम रखा वहीं ब्रिटेन के
बिजनेस कंपट डच और पुर्तगाली पहले से ही

हिंद महासागर में मौजूद थे तब किसी ने
अनुमान भी नहीं लगाया होगा कि भैया यह
कंपनी अपने ही देश से 20 गुना बड़े दुनिया
के सबसे धनी देशों में से एक और उसकी लगभग
25 पर आबादी पर डायरेक्टली रूल करने वाली
थी इस कंपनी के हाथ पहली सफलता तब लगी जब

इसने पुर्तगाल का एक जहाज लूटा जो भारत से
मसाले भर कर ले जा रहा था ईस्ट इंडिया
कंपनी को उस लूट में 900 टन मसाले मिले
इसे बेचकर कंपनी ने जबरदस्त मुनाफा कमाया
अब यह उस समय की पहली चार्टेड जॉइंट स्टॉक

कंपनियों में से एक थी जी हां आसान शब्दों
में कहे तो भैया अभी के शेयर मार्केट में
लिस्टेड कंपनियों की तरह कोई भी इन्वेस्टर
उसका हिस्सेदार बन सकता था इसलिए लूट की
कमाई का हिस्सा कंपनी के इन्वेस्टर्स को

भी मिला लूट पाट से किए गए पहले व्यापार
में ईस्ट इंडिया कंपनी को करीब % का
जबरदस्त मुनाफा हुआ वहीं इस दौरान कंपनी
को यह भी समझ आ चुका था कि भारत में देखना
है तो उसे मुगल बादशाह की इजाजत के
साथ-साथ सपोर्ट की भी जरूरत पड़ेगी

क्योंकि वह जानते थे कि मुगलों की विशाल
सेना के साथ डायरेक्टली युद्ध करने से
उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा इसलिए विलियम
हॉकिंस 1609 में मुगल राजधानी आगरा पहुंचा
और व्यापार की परमिशन मांगी गुजरात में

पुर्तगाली पहले से ही मुगल बादशाह के अंडर
में कारोबार कर रहे थे जिन्होंने विरोध
करना शुरू कर दिया पुर्तगालियों के विरोध
की वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी को शुरुआत
में व्यापार करने की परमिशन नहीं मिली

जिसके बाद कंपनी ने थॉमस रॉ को भारत भेजा
वह 1615 में मुगल राजधानी आगरा पहुंचे सिर
पर 600 पौंड सालाना की तनख्वा के बदले
कारोबार बढ़ाने का जिम्मा था थॉमस रो ने

बातचीत से इंप्रेस कर लिया था इसके बाद
जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक
व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए
समझौते के अकॉर्डिंग कंपनी और ब्रिटेन के
सभी व्यापारियों को खरीदने और बेचने के

लिए सबकॉन्टिनेंट के हर बंदरगाह के
इस्तेमाल की इजाजत दी गई बदले में ब्रिटेन
ने यूरोपियन प्रोडक्ट्स को भारत को देने
का वादा किया लेकिन तब वहां बनता ही क्या
था खैर इसके बाद कंपनी के कारोबार और भारत
में ब्रिटिश फौज लाने का रास्ता साफ हो

गया शुरुआत में कंपनी चांदी के बदले भारत
से चाय मसाले रेशम कपास गुड़ काशीरा कपड़ा
और खनिज ले जाती थी और उसे विदेशों में
बेचकर बड़ा मुनाफा कमाती थी खास तौर पर
ढाका के मलमल की ब्रिटेन में बड़ी मांग थी

जी हां कंपनी जो भी चीज खरीदती उसका मूल्य
चांदी देकर चुका ती जो उसने 1621 से लेकर
1843 तक स्पेन और संयुक्त राज्य अमेरिका
में दासो को बेचकर जमा किया था करीब भाई
पांच दशक तक ऐसा चलता रहा लेकिन वह अकेले

ऐसे नहीं थे जो चांदी के बदले सोना कमा
रहे थे ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपट के रूप
में पुर्तगाली और फ्रांसीसी भी भारत में
जड़े जमा कर बैठे थे यही बात ब्रिटेन के
गले से तले नहीं उतर पा रही थी ऐसे में
इनसे कंपटीशन करने के लिए 1600 70 में

ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स सेकंड ने ईस्ट
इंडिया कंपनी को विदेश में जंग लड़ने और
कॉलोनी बनाने का अधिकार दे दिया और यह
कंपनी के लिए एक अहम फैसला साबित हुआ
कंपनी ने अपने कंपीटीटर को हराकर बंगाल के

कई क्षेत्रों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया
1686 में तो ब्रिटेन से सेना बुलाकर वह
मुगलों से भी भिड़ गए जी हां हालांकि
इसमें कंपनी की बुरी तरह हार हुई जिसके
बाद औरंगजेब ने ईस्ट इंडिया कंपनी के तमाम

फैक्ट्री आउटलेट्स की घेराबंदी करवा दी तब
ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारियों को
भेजकर औरंगजेब से माफी मांगी इसके बाद ही
उन्हें वापस बिजनेस की इजाजत मिल सकी
लेकिन 1707 में औरंगजेब के निधन के बाद

सारा गेम ही पलट गया देखिए सभी नवाब
अपनी-अपनी ताकत दिखाने लगे ईस्ट इंडिया
कंपनी एक नवाब के खिलाफ दूसरे की मदद करने
लगी और अपनी ताकत बढ़ाती रही कंपनी ने इन
सरकमस्टेंसस का फायदा उठाते हुए लाखों की

संख्या में स्थानीय लोगों को सेना में
भर्ती करना शुरू कर दिया जिसने प्लासी की
जंग को जन्म दिया दरअसल बंगाल के नवाब
सिराज उ दौला ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक
बढ़ाने से खफा थे जिसके चलते 23 जून 1757

प्लासी में ईस्ट इंडिया कंपनी और सिराज उ
दौला के बीच जंग हुई नवाब के सेनापति मीर
जाफर ईस्ट इंडिया कंपनी से मिले हुए थे
जिससे नवाब बनने की बहुत चाहत थी करीब 500
सैनिक 500 हाथी और 50 तोपों से ले सिराज उ
दौला की सेना ईस्ट इंडिया कंपनी के महज

3000 सैनिकों से हार गई जिसके बाद मीर
जाफर को बंगाल की गद्दी मिलती है लेकिन
उसकी कमान अंग्रेजों के हाथ में थी मीर

जाफर ने कंपनी से पीछा छुड़ाने के लिए डच
सेना की मदद ली लेकिन वह हार गए इसके बाद
बंगाल प्रांत के टैक्स कलेक्शन की कमान
ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चली गई तब
बंगाल में आज का पश्चिम बंगाल बिहार और

उड़ीसा शामिल थे इसकी राजधानी मुर्शिदाबाद
थी जिसकी चका चौद लंदन से भी कहीं ज्यादा
थी तो भैया इस जीत ने कंपनी के बिजनेस
मॉडल को बदल के रख दिया अब तक जो कंपनी

मुनाफे के लिए व्यापार करती थी उसका पूरा
फोकस टैक्स कलेक्शन पर हो गया 1784 में
ब्रिटिश संसद ने इंडिया एक्ट पारित कर
दिया जिसके बाद भारत की धरती पर ब्रिटिश
साम्राज्य का शासन हो गया वहीं जब कंपनी

को लगने लगा कि कठपुतली नवाब अब काम नहीं
आएंगे तो उसने मीर जाफर की मौत के बाद
बंगाल को डायरेक्ट अपने कब्जे में ले लिया
इसके बाद मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल
का दीवान बना दिया यानी इसके बाद कंपनी
बहादुर अस्तित्व में आया लेकिन अंग्रेजों

के सामने अब भी दो बड़ी चुनौतियां थी साउथ
में टीपू सुल्तान और विंध्या के साउथ में
मराठा टीपू सुल्तान ने फ्रेंच व्यापारियों
से दोस्ती करके सेना को आधुनिक बना दिया
था वहीं मराठा दिल्ली के जरिए देश पर शासन

करने का सपना देख रहे थे कंपनी ने टीपू और
उनके पिता हैदर अली से चार युद्ध लड़े
लेकिन 1799 में टीपू श्रीरंग पटनम की जंग
में हार जाते हैं इसी तरह पानीपत की तीसरी
लड़ाई में हार के बाद मराठा साम्राज्य
टुकड़ों में बट गया इसके बाद 1819 में

अंग्रेजों ने पेशवा को पुणे से लाकर
कानपुर के पास बिठूर में बिठा दिया अब इसी
बीच देखिए पंजाब उनके लिए बड़ी चुनौती
बनकर उभरा था महाराजा रणजीत सिंह जब तक
रहे तब तक उन्होंने अंग्रेजों की दाल नहीं

गलने दी लेकिन 1839 में उनकी मौत के बाद
हालात बिल्कुल बदल गए दो लड़ाइयां और हुई
और 10 साल बाद पंजाब भी अंग्रेजों के हाथ
में आ गया इन सब के बीच 1848 में लॉर्ड डल
हाउजी विलय नीति लेकर आए इसके तहत जिस
शासक का कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता

था उस रियासत को कंपनी अपने कब्जे में ले
लेती थी इस तरह से अंग्रेजों ने सतारा
संबलपुर उदयपुर नागपुर और झांसी पर कब्जा
जमा लिया जिसने 1857 की क्रांति के बीच को
सीताराम पांडे ने फ्रॉम सिपोल टू सूबेदार

मेमोर में लिखा है कि सबको लग रहा था कि
अंग्रेज भारतीय धर्मों का सम्मान नहीं
करते नाराजगी तो थी लेकिन जब यह खबर आई कि
नई बंदूकों के कारतूस पर गाय और सूअर की
चर्बी का लेप है तो इसने सिपाहियों की
नाराजगी को क्रांति की शक्ल दे दी जिसके

चलते मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ा दिया
गया वहां से उठी चिंगारी ने झांसी अवध
दिल्ली बिहार में क्रांति को हवा दी रानी
लक्ष्मीबाई बहादुर शाह जफर नाना साहिब आदि
ने मिलकर एक साथ बगावत कर दी ब्रिटेन में
ईस्ट इंडिया कंपनी की मोनोपोली पर तो सवाल

19वीं सदी की शुरुआत से ही उठ रहे थे
जिसके चलते ब्रिटिश संसद ने 1813 में ही
दूसरी कंपनियों के लिए भारत में व्यापार
करने के रास्ते खोल दिए थे अब इसके बाद
1833 में ब्रिटिश सरकार ने कंपनी से

व्यापार का अधिकार छीनकर उसे एक सरकारी
कॉर्पोरेशन में बदल दिया वहीं 1857 की
क्रांति के लिए तो ईस्ट इंडिया कॉरपोरेशन
और उसकी नाकामी को ही जिम्मेदार माना गया
जिसके बाद ब्रिटेन की महारानी ने इस कंपनी

के सभी अधिकारों को खत्म कर दिया और वह
भारत पर सीधा शासन करने लगी कंपनी की करीब
2.50 लाख की सेना का ब्रिटिश सेना में
विलय कर दिया गया और आखिरकार भारत को करीब
एक सदी तक गुलाम बनाकर रखने वाली ईस्ट

इंडिया कंपनी को 187 4 में भंग कर दिया
जाता है अगर फिलहाल की बात करें तो अब भी
इसकी कमर टूटी हुई है उससे भी मजेदार बात
यह है कि भाई भारत को गुलाम बनाने वाली इस
ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक और अब भारतीय

मूल के बिजनेसमैन संजीव मेहता हैं संजीव
मेहता ने इसे 2010 में 15 मिलियन डॉलर
यानी 0 करोड़ में खरीद लिया था यानी अब यह
एक भारती के इशारों पर काम करती है
मेहतानी ईस्ट इंडिया कंपनी को खरीदने के
बाद इसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म बना दिया अभी

यह कंपनी चाय कॉफी चॉकलेट आदि की ऑनलाइन
सेल्स करती है आज दुनिया के बड़े-बड़े
देशों पर राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी
के ऐसे हालात देखकर आपके मन में क्या सवाल
आता है कमेंट जरूर करें

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