मोदी के गले में नेहरू नाम की माला | PM Modi's Nehru speech - instathreads

मोदी के गले में नेहरू नाम की माला | PM Modi’s Nehru speech

नमस्कार आज हम भी आपको
नेहरू के कुछ किस्से सुनाना चाहते हैं
मैंने यह सारे किस्से राष्ट्र कवि रामधारी
सिंह दिनकर की किताब
लोकदेवता में किताबें हैं दिनकर की किताब

का ही चयन क्यों किया तो इसकी दो-तीन
मुख्य वजहें हैं 1964 में नेहरू का निधन
होता है और बतौर श्रद्धांजलि दिनकर 1967
में लोकदेवता हैं दिनकर ने नेहरू को जैसे
देखा जैसे समझा है वैसा ही लिखा यह किताब

राजकमल प्रकाशन से छपी है दिनकर की नजर से
नेहरू को देखना थोड़ा आसान भी है क्योंकि
किताब बहुत पतली है कम समय में पढ़ी जा
सकती है मात्र 168 पन्नों की किताब है एक
तो यह वजह है दूसरी वजह यह है कि 2015 में

बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे तब
दिल्ली के विज्ञान भवन में दिनकर की
रचनाओं के 50 साल होने पर भव्य का
कार्यक्रम का आयोजन किया गया बात-बात में
नेहरू का नाम लेने वाले प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के रूप में वहां
भाषण देते हैं उस समय का उनका भाषण जब पढ़
रहा था तब थोड़ी हंसी भी आई पता चल रहा था
कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिनकर के
बारे में कितना कम जानते हैं यह स्वाभाविक

भी है प्रधानमंत्री सभी को ठीक से जाने
सभी को पढ़ चुके हो ऐसी उम्मीद नहीं करनी
चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री होने के नाते
उन्हें इस तरह की स्मृति सभाओं में जाना
ही पड़ता है और भाषण भी देना पड़ता है

दिलचस्प बात यह है कि दिनकर पर बोलते हुए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत सावधानी
से अपना भाषण शब्दों की महिमा बिहार के
सामर्थ्य और विकास से जोड़कर निकाल ले
जाते हैं खुद को शब्द ब्रह्म का उपासक बता
देते हैं कहते हैं वे सरस्वती के उपासक

हैं एक पूरा पैराग्राफ यह बताने में खर्च
कर देते हैं कि साहित्यकार ऋषि मुनि के
समान ही होता है ऐसा नहीं है कि दिनकर के
जीवन पर उन्होंने कुछ नहीं बोला परशुराम

की प्रतीक्षा का जिक्र किया और बाकी दिनकर
को लेकर जनरल सी बातें कह डाली खेत खलिहान
से जोड़ते हुए बिहार बंगाल असम पर चले गए
और फिर बिहार के सामर्थ्य की बात करने लग
गए क्योंकि कुछ महीनों के बाद बिहार में

विधानसभा चुनाव होने वाले थे उस चुनाव में
जेडीयू और राजत का महागठबंधन जीत गया था
यह भाषण मई 2015 का है चुनाव नवंबर में
हुए थे दिनकर जी का भी सपना था बिहार आगे
बढ़े बिहार तेजस्वी ओजस्वी यह

बिहार संपन्न भी
हो बिहार को तेज और ओछ किसी से किराए पर
लेने की जरूरत नहीं उसके पास
है उसे सपन संपन्नता के अवसर
चाहिए उसको आगे बढ़ने का अवसर

चाहिए और बिहार में वो ताकत है अगर एक बार
अवसर मिल गया तो बिहार औरों को पीछे
छोड़कर आगे निकल
जाएगा दिनकर राष्ट्र कवि थे बिहार को लेकर
दिनकर का क्या सपना था इसके बारे में मुझे

जानकारी नहीं शायद प्रधानमंत्री को ज्यादा
हो मगर जब प्रधानमंत्री मोदी ने दिनकर के
सपने का जिक्र कर ही दिया तो हमने भी सोचा
कि क्यों ना दिनकर के नेहरू की बात की जाए
जिस नेहरू को उन्होंने सपने में नहीं देखा

था उनके साथ कई मौकों पर उठते बैठते देखा
था काम किया था नेहरू को बहुत बारीक नजर
से उन्होंने परखा इस किताब में दिनकर
नेहरू से मोह नहीं रखते बल्कि बहुत
सावधानी से उन्हें अलग-अलग मौकों पर परख

रहे हैं कि नेहरू कितने लोकतांत्रिक हैं
उतने हैं या नहीं जितना दावा करते हैं
दिनकर लिखते हैं और यह उन्हीं के शब्द हैं
कि पंडित जी घनघोर रूप से साहसी पुरुष थे
राजनीति के कामों में तो वे उबल करर भी
शांत हो जाते थे किंतु जहां आस्था और

वैयक्तिक पसंद नापसंद का सवाल जरा तेज
होता उनके आचरण अत्यंत निर्भग होते थे
1935 ईसवी के आसपास जब पंडित जी रोम होकर
भारत लौट रहे थे मुसोलिनी ने हवाई अड्डे
पर अपना दूत भेजा कि पंडित जी मुझसे मिलने

क्षण भर को शहर में आ जाएं किंतु पंडित जी
ने मुसोलिनी से मिलना कबूल नहीं किया यह
नेहरू का साहस था कि उन्होंने इटली में
होते हुए भी मुसोलिनी से मिलने से मना कर
दिया आज फासीवादी ताकतें दुनिया में राज

कर रही हैं क्या भारत सहित दुनिया में
किसी नेता को जानते हैं दक्षिण अफ्रीका को
छोड़कर जो ऐसा कर सके दिनकर इस किताब के
पेज नंबर 72 पर लिखते हैं और मैं पढ़ रहा
हूं शब्द श कि पंडित जी हिटलर और मुसोलिनी

से घृणा करते थे और इतनी घृणा करते थे कि
उन दोनों के साथ मिलने से उन्होंने एक ऐसे
समय में इंकार कर दिया था जब जवाहरलाल
गुलाम देश के नेता थे और हिटलर और

मुसोलिनी अपने प्रताप से दुनिया को दहला
रहे थे यह बताना जरूरी है कि दिनकर को
नेहरू ने राज्यसभा का सदस्य बनाया था
प्रधानमंत्री मोदी ने दिनकर की रचनाओं की
50वीं जयंती पर नेहरू का नाम नहीं लिया और

ना दिनकर के संसदीय जीवन की भूमिका का
जिक्र किया जिस तरह की श्रद्धा दिनकर
नेहरू में रखते हैं आप जानते हैं कि
प्रधानमंत्री मोदी की नेहरू में कितनी

श्रद्धा है वे कितना सम्मान करते हैं यहां
तक कि 10 साल कार्यकाल का आखिरी भाषण भी
उनका नेहरू के बिना पूरा नहीं हो सका
नेहरू का जिक्र करने से पहले प्रधानमंत्री

बताना नहीं भूलते कि उनका नाम बोलूंगा तो
उनको जरा चुभन होगी तो चुभा के लिए नेहरू
का नाम उनके काम आ रहा है
जिस व्यक्ति ने जिंदगी के 9 साल से ज्यादा
जेल में गुजारे भारत की आजादी के लिए उसका

नाम उनको चुभने के लिए उनको याद आ रहा है
सुनिए देश के नागरिकों के लिए कैसा सोचते
थे मैं जानता हूं मैं नाम बोलते हु उनको
जरा चुबन
होगी
लेकिन 15 अगस्त

लाल किले
से प्रधानमंत्री नेहरू ने जो कहा था वो
मैं जरा पढ़ता
हूं लाल किले से भारत के प्रथम
प्रधानमंत्री ने जो कहा था वह पढ़ रहा हूं

नेहरू जी ने उन्होंने कहा था हिंदुस्तान
में काफी मेहनत करने की
आदत आम तौर से नहीं
है हम इतना काम नहीं करते
जितना कि यूरोप
वाले या जापान

वाले या चीन
वाले या रूस
वाले या अमेरिका वाले करते हैं नेहरू जी
लाल किले से बोल रहे
हैं यह ना
समझिए यह ना

समझिए यह ना समझिए महिला क्या बोला कि वह
कौम
है में महिला सासद क्या कहा सर ये ना
समझिए कि व

कौम कोई जादू से खुशहाल हो
गई वो मेहनत से हुई है और अकल से हुई है
यह उनको सर्टिफिकेट दे रहे हैं भारत के
लोगों को नीशा दिखा रहे हैं
यानी यानी नेहरू जी
यानी नेहरू जी की भारतीयों के प्रति सोच
थी कि भारतीय आलसी है नेहरू जी की

भारतीयों के लिए सोच थी कि भारतीय कम अकल
के लोग होते हैं नेहरू की एक आदत थी जैसा
कि दिनकर ने लिखा है वे लिखा हुआ भाषण
नहीं पढ़ते थे दो दो घंटे तक भाषण दिया

करते थे और बीच में मंच से उतर भी जाते थे
भीड़ में चले जाते थे हल्ला हंगामा करने
वालों से भीड़ जाया करते थे नेहरू के समय
टेली प्रोमट नहीं था जिसका इस्तेमाल
प्रधानमंत्री मोदी करते हैं नेहरू जनता से

खुलकर बात करते थे अपनी और जनता की
कमजोरियों के बारे में उसके ही बीच जाकर
बात करते थे नेहरू भीड़ में कुछ जाते हैं
एक प्रसंग है कि बड़ौदा में जब भीड़ के

बीच चले गए तो उनका अंगरक्षक रोकने लगा
नेहरू ने अंगरक्षक को ही पटक दिया और उससे
भिड़ गए बाद में लौटकर मंच पर बैठकर दिनकर
से कहा कहो कुश्ती कैसे रही अब उनकी मौत
के 60 साल बाद नेहरू के भाषण के किसी छोटे

से हिस्से को निकालकर उन्हें किसी और रूप
में पेश किया जाए यह प्रधानमंत्री मोदी को
शोभा देता है ऐसा नहीं कि नहीं देता है
देता है तभी व ऐसा करते हैं बल्कि किसी और
को शोभा नहीं देता है कायदे से ऐसा नहीं

करना चाहिए मगर वे करते हैं 1946 का एक
वाकया है दिनकर लिखते हैं नेहरू पटना गए
बिहार में एक जगह गोली चल गई थी तो लोग
बहुत नाराज थे उसी दौरान उन्हें पटना
यूनिवर्सिटी में बोलने के लिए जाना पड़ा

अब वहां जो हुआ उसके बारे में दिनकर लिखते
हैं और मैं पढ़ रहा हूं कि नौजवानों के
बीच भाषण देने को सिनेट हॉल पहुंचे तब
लड़कों ने उनका कुर्ता फाड़ डाला और उनकी

टोपी उड़ा ली उस दिन भीड़ को काबू में
लाने का चमत्कार जयप्रकाश जी ने दिखाया जब
भीड़ काबू में आ गई जयप्रकाश जी लोगों की
तस्बीह करने लग गए जब जयप्रकाश जी लोगों

से यह कह रहे थे कि आपने पंडित जी का
अपमान करके अपने आप को अपमानित किया है
तभी पंडित जी जयप्रकाश जी को पीछे खींचकर
खुद आगे आ गए और कहने लगे नहीं साहब मैं
बड़ा ही बेहया आदमी हूं मेरी हद तक इज्जती

जरा भी नहीं हुई है उल्टे मैं आपसे खुश
हूं कि आपने बड़े ही जोश के साथ मेरा
स्वागत किया है जिस भीड़ ने नेहरू के
कुर्ते फाड़ डाले नेहरू उन्हें कुछ नहीं

कहते उनसे गुस्सा भी नहीं करते बल्कि कहते
मैं आपसे खुश हूं कि आपने बड़े ही जोश के
साथ मेरा स्वागत किया प्रधानमंत्री मोदी
की आलोचना करने वाले कितने ही लोगों को
जेल में डाल दिया गया दिनकर ने नेहरू के

बारे में एक प्रसंग लिखा है जो मैं पढ़
रहा हूं दिनकर लिखते हैं कि नेहरू के घर
पर संसद की हिंदी परिषद की बैठक चल रही थी
नेहरू के बोलने की बारी आई तो उन्होंने एक

मोदी कभी नहीं सुनाना चाहेंगे तो बतौर
दिनकर नेहरू कहते हैं और मैं दिनकर के
शब्दों को पढ़ता हूं कि अभी मैं उड़ीसा
गया हुआ था सुना वहां के आदिवासी भाई आर्य

रक्त वालों से नाराज हैं वे कहते हैं कि
एकलव्य अनार्य था और द्रोणाचार्य आर्य थे
इसी कारण द्रोणाचार्य ने उस अनार्य नौजवान
का अंगूठा कटवा लिया यह बात सुनकर सभी
श्रो हंसने लगे किंतु पंडित जी को हंसी

नहीं आई बल्कि विचलित होकर उन्होंने कहा
और अपनी बात मैं आपको बताऊं यह सब सुनकर
द्रोणाचार्य पर मुझे गुस्सा हो आया इस पर
दिनकर नेहरू के बारे में लिखते हैं के
द्वापर से कलयुग बहुत दूर पड़ता है लेकिन

सच्ची मानवता इस दूरी को नहीं मानती किंतु
कितनी सजीव थी उस पुरुष की मानवता जो
कलयुग में में खड़ा होकर द्वापर के अन्याय
से तिल मिला उठता था आज बहुजन राजनीति और
उसके विचारक द्रोणाचार्य की भूमिका की

समीक्षा इसी रूप में करते हैं बल्कि
एकलव्य के साथ हुए अन्याय को आज के
राजनीतिक संदर्भ में सही से उन लोगों ने
स्थापित करने का काम किया है मगर नेहरू
अपने समय में ही इस प्रसंग की कमजोरी भांप

गए और उन्होंने द्रोणाचार्य पर अपने
गुस्से के इजहार को रोका नहीं अब कौन जाने
किसी भाषण में प्रधानमंत्री मोदी यह भी
निकाल लाएं कि नेहरू ने द्रोणाचार्य का
अपमान किया था प्रधानमंत्री नेहरू को लेकर
गलत बयानी भी कर चुके हैं गलत संदर्भ में

भी पेश कर चुके हैं आईटी सेल ने नेहरू को
मुसलमान बताने में जितनी मेहनत की है उतनी
किसी मुसलमान ने भी खुद को मुसलमान बताने
में नहीं की होगी उसी नेहरू का इस्तेमाल
भी किया गया जब नई संसद में संगोल को

स्थापित करना था वीडियो बना सरकारी जिसमें
बता या जाने लगा कि नेहरू ने सत्ता के
हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में संगोल को
स्वीकार किया बाद में इस तरह की कहानियों
को चुनौती दी गई तब कहा जाने लगा कि नेहरू

ने इसे टहलने की छड़ी के रूप में इस्तेमाल
किया यह बात भी झूठ निकली नेहरू को
लोकदेवता भावे ने कहा था दिनकर भी उन्हें
लोक देव के रूप में देखते हैं तो दिनकर के
लोकदेवता रहे हैं दिनकर लिखते हैं और मैं

पढ़ रहा हूं कि पंडित जी के बारे में
इतिहास और चाहे जो बातें लिखे या ना लिखे
किंतु यह बात वह अवश्य लिखेगा कि भारत के
मन को आधुनिक बनाने की दिशा में जवाहरलाल

ने जो अथक प्रयत्न किया वह विस्मयकारी था
किंतु आधुनिकता के इतने बड़े ध्वज धारी
होने पर भी प्राचीन भारत के प्रति उनमें
एक प्रकार की ममता थी जो कभी-कभी ही

प्रत्यक्ष होती थी यह दिनकर की पंक्ति है
कि भारत के को आधुनिक बनाने की दिशा में
जवाहरलाल ने जो अथक प्रयत्न किया वह
विस्मयकारी था सरकारी प्रयोग में हिंदी
कैसी हो इसे लेकर दिनकर ने नेहरू के विचार
और उनके साथ मतभेद के प्रसंग पर विस्तार

से लिखा है इस मतभेद के बाद भी नेहरू और
दिनकर के संबंधों के बीच कोई दुराव नहीं
आता दिनकर लिखते हैं कि नेहरू को फारसी
नहीं आती थी अंग्रेजी आती थी हिंदी आती थी

और फ्रेंच आती थी थोड़ी बहुत उन्होंने
संस्कृत पढ़ी थी मगर जो कुछ भी पढ़ा था वह
सब का सब याद था नेहरू गीता का द्वितीय
अध्याय बार-बार पढ़ा करते थे और उन्हें यह
अध्याय पूरी तरह याद था नेहरू हठ योगी थे

हठ योग का अभ्यास करते थे शिर शासन करते
थे पंडित राम नरेश त्रिपाठी ने उन्हें
तुलसीकृत रामायण पढ़ाया था पंजाब और
दिल्ली में उर्दू बोलते थे बिहार और मध्य
प्रदेश में संस्कृत निष्ट हिंदी लेकिन

बोलने में हिंदुस्तानी ज्यादा पसंद करते
थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर
अक्सर कहा जाता है कि उन्होंने एक दिन की
छुट्टी नहीं ली इसका कोई तुलनात्मक
रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं है कि किस

प्रधानमंत्री ने कितना काम किया अगर आप
प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी रैलियों को
ही देखें तो पता चलेगा कि भारत के किसी भी
प्रधानमंत्री ने इतनी चुनावी रैलियां नहीं
की हैं इतने कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं

लिया होगा पहले कहा जाता था कि
प्रधानमंत्री कम रैली करते हैं खासकर
विधानसभा चुनाव में क्योंकि उनका काम बहुत
ज्यादा होता है व्यस्तता बहुत अधिक होती
है मगर मोदी के समय यह पूछा ही नहीं जाता

कि इतना काम रहता होगा फिर भी आप एक-एक
विधानसभा में 20-20 30-30 रैलियां कैसे
करते हैं हर उद्घाटन हर भाषण में आप कैसे
मौजूद रहते हैं तो काम कब करते हैं फरवरी
2019 में जिस दिन पुलवामा में आतंकी हमला

हुआ उस दिन प्रधानमंत्री जंगल में एक चैनल
के कार्यक्रम के लिए शूटिंग कर रहे थे कई
घंटों की शूटिंग का कार्यक्रम था क्या उसे
भी काम माना जाए या छुट्टी में गिना जाए
लक्षद्वीप में यह जो फोटो शूट हो रहा है

क्या यह भी प्रधानमंत्री के काम का हिस्सा
है इस फोटो शूट के पीछे कितना वक्त लगा
होगा कितनी मेहनत लगी होगी अगर यह भी काम
है तब फिर प्रधानमंत्री मोदी के काम के
बारे में लोगों को अपनी जानकारी और

धारणाएं बदल लेनी चाहिए अब प्रधानमंत्री
के काम में यह सब भी जोड़ा जाएगा जो नेहरू
के समय नहीं जोड़ा जाता था खैर यह किसी
व्यक्ति की अपनी क्षमता हो सकती है कि वह
दिन रात और खूब काम करें भारत में कई

दुकानदार ठेले वाले सब्जी वाले बिना संडे
की छुट्टी लिए साल भर काम करते हैं तो इस
देश में कोई रोज काम करें कोई बड़ी बात
नहीं है बड़ी बात तब है जब प्रधानमंत्री
के बारे में इस तरह के दावे किए जाते हैं

लेकिन नेहरू के काम का क्या तरीका था इस
पर भी दिनकर ने विस्तार से लिखा है और मैं
मैं पढ़ रहा हूं दिनकर लिखते हैं कि पंडित
जी की कार्यक्षमता अपार थी उन्हें देखकर
यह अनुमान आसान मालूम होता था कि ईश्वर एक

ही है और वह सारे जगत की सुधि लेता है
उनका शरीर हल्का किंतु स्फूर्ति से पूर्ण
था लॉबी में मैं अक्सर कहा करता था कि खाट
से उठकर तैयार होने में जिसे देर लगे उसे
भारत के प्रधानमंत्री की गद्दी की ओर

बढ़ने की ख्वाहिश छोड़ देनी चाहिए भारत का
प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति और
रूस के प्रधानमंत्री से कहीं मुश्किल काम
है पंडित जी मेधावी मनुष्य थे किंतु केवल
मेधा के बूते वे उतने काम नहीं कर सकते थे

उनकी कर्मठता का रहस्य उनके ठोस स्वास्थ्य
में था मेरा ख्याल है प्रधानमंत्री का
दायित्व निभाने के लिए पहला और आखिरी गुण
यह है कि आदमी की तंदुरुस्ती खूब मजबूत हो
पंडित जी काम के लिए आठ साल 8:30 बजे भोर

ही तैयार हो जाते थे ऊपर की मंजिल से
उतरते ही उन्हें दो प्रकार के लोगों से
मिलना पड़ता था एक तो वह लोग जो समय लिए
बिना ही सीढ़ी के नीचे वाले ड्राइंग हॉल
में जमा हो जाते थे और दूसरे वे लोग जो
गांव से आते थे और अहाते में खड़े या बैठे

रहते थे इनसे निपट करर पंडित जी दफ्तर चले
जाते थे फिर वहीं से संसद पहुंचते थे अगर
संसद का सत्र चल रहा हो दोपहर के भोजन के
बाद वे 3:00 बजे से पहले ही फिर दफ्तर या
संसद पहुंच जाते थे शाम को भोजन वे 8 बजे
करते थे और 900 बजे से फिर काम पर बैठ

जाते थे सोने का समय उनका 1 बजे रात से
लेकर 600 बजे भोर तक का था दिनकर लिखते
हैं कि नेहरू 8 बजे तैयार हो जाते थे रात
के 1 बजे तक काम करते थे हो सकता है कि
नेहरू की छाप प्रधानमंत्री मोदी के मन पर
गहरी हो भले वह नेहरू की आलोचना से से

नहीं चूकते अपमानित करने से नहीं चूकते
मगर उनके मन में कोई नेहरू जैसा तो है जो
उनका पीछा कर रहा है जिसके जैसा
प्रधानमंत्री मोदी दिखना चाहते होंगे इसका
विश्लेषण तो फ्रॉय ही बेहतर कर सकते थे
अगर जिंदा होते नेहरू के समय इस बात का
प्रचार नहीं होता था कि भारत का

प्रधानमंत्री 8 बजे से काम शुरू कर देते
हैं रात के 1 बजे तक काम करते हैं 5 घंटे
ही सोते हैं आज का भारत बदल गया है यह सब
प्रचार होता है सोचिए अगर यह प्रचार ना हो
तो हाउसिंग सोसाइटी के अंकिल गेट पर खाली
बैठे-बैठे गमले तोड़ने लग जाएंगे नेहरू के

काम के बारे में दिनकर आगे लिखते हैं कि
संसद के दोनों सदनों पर उनकी भक्ति एक
समान थी आवश्यकता अनुसार वे बारी-बारी से
दोनों सदनों में आते जाते रहते थे और दिन
भर में उन्हें बोलना भी कई बार पड़ता था

इतनी मेहनत वे कैसे कर पाते थे इस पर
आश्चर्य हमें पहले भी होता था और अब भी
होता है वे संचिका यानी फाइल पर केवल यथा
प्रस्तावित लिखने वाले मंत्री नहीं थे जो
संचिका एं उनकी मेज से निकलती थी उनमें से

अधिकांश पर अच्छी अंग्रेजी की दो-चार सतरे
अवश्य रहती थी उनका सचिवालय इतना चुस्त और
दुरुस्त था कि टेलीफोन से भी समय मांगने
पर हमें कोई ना कोई जवाब ठीक समय पर मिल
जाया करता था संसद सदस्यों के पत्रों का

वे अत्यंत सम्मान कर करते थे ऐसा शायद ही
कोई संसद सदस्य होगा जिसके पत्र का उत्तर
पंडित जी ने अपने हस्ताक्षर से नहीं दिया
हो अक्सर तो यह होता था कि आज आपने पत्र
लिखा और कल 9 बजे भोर में ही प्रधानमंत्री

का चपरासी उत्तर लिए आपके घर पर मौजूद है
और इतना अधिक काम करते हुए भी वे जितने
लोगों से मुलाकात करते थे उतने लोगों से
कोई और नेता नहीं मिल सकता था विपक्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी पर आरोप
लगाता है कि वे संसद में आकर प्रश्नों के
उत्तर नहीं देते हैं इस नेहरू को आज के
भारत में अपमानित कर क्या मिल गया
ऐसा नहीं कहा है

कर दिया गया इन्होंने 1959 में एक लेख
लिखा द एंग्री अरिस्टो कैट इस लेख को रफीक
जकारिया की किताब अ स्टडी ऑफ नेहरू में
शामिल किया गया है अपने लेख में खरे लिखते
हैं कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कहा है

कि मैं शिक्षा से ईसाई संस्कृति से
मुसलमान और दुर्भाग्य से हिंदू हूं जबकि
उन्होंने ऐसा नहीं कहा है यह किताब बीजेपी
की वेबसाइट पर आज भी मौजूद है उनकी ई
लाइब्रेरी में नेहरू के बारे में में झूठ

लिखने वाले गांधी हत्या में नजरबंद होने
वाले की किताब शायद काम आती होगी बीजेपी
के बीजेपी को दिनकर की किताब
लोकदेवता कहा है कि मैं शिक्षा से ईसाई
संस्कृति से मुसलमान और दुर्भाग्य से

हिंदू हूं जबकि कहा नहीं था नेहरू के दौर
में यह झूठ इतना नहीं चल पाया होगा मगर आज
यह चल पड़ा है नेहरू को मुसलमान बताने का
प्रोजेक्ट काफी लंबा चला 10 साल और इस पर
कई लोग यकीन करते हैं विवेकानंद ने

नैनीताल के मोहम्मद सरफराज हुसैन को
भारती के आर्काइव में नेहरू का एक
इंटरव्यू मिला
1958 में वे एक पत्रकार आर्नल मिशेल को
इंटरव्यू देते हैं और धर्म के बारे में

बात कर रहे हैं आप प्रसार भारती के
आर्काइव में जाकर इस इंटरव्यू को सुन सकते
हैं नेहरू कहते हैं कि जब धर्म संगठित हो
जाता है कर्मकांड संगठित हो जाते हैं
रूढ़िवादिता बढ़ जाती है तो उससे उन्हें

दिक्कत होती है तब उसमें आध्यात्म नहीं रह
जाता और बिना आध्यात्म के वह धर्म नहीं रह
जाता हो सकता है कि संगठित और रूढ़ीवादी
रूप से किसी को राहत मिलती हो मिलती होगी

लेकिन बहुत ज्यादा रूढ़ीवादी हो जाने से
दिमाग का इंसान का विकास रुक जाता है
आध्यात्म का विकास रुक जाता है यह नेहरू
कहते हैं तो नेहरू धर्म विरोधी नहीं थे
दिनकर ने एक प्रसंग लिखा है

लोकदेवता पत्र कल्याण ने इधर उनके दो एक
ऐसे फोटो भी छापे हैं जिनमें जवाहरलाल जी
आनंदमई मां के पास समाधि मग्न बैठे हैं
किंतु इसे मैं अपवाद कहूंगा उनके विषय में
जो बात खास जोर देकर कही जा सकती है वह यह
कि जवाहरलाल जी ईश्वर की सत्ता को समझ

नहीं पाते थे ना वे धर्म के बाहरी
अनुष्ठानों को महत्व देते थे वे धर्म की
व्याख्या में ना फंसकर उसे जीने के
अभ्यासी थे इसलिए भारतीय जनता ने उनका
उतना सम्मान किया भारत के सारे इतिहास में
जनता ने सबसे अधिक पूजा उन व्यक्तियों की

की है जो धर्म के मनुष्य थे केवल सेकुलर
गुणों के कारण इस देश में सम्मान के
अधिकारी केवल जवाहर लाल जी हुए यह अपने आप
में इस बात का प्रमाण है कि जनता ने
उन्हें यह सम्मान उनकी चारित्रिक

विशिष्टता के कारण दिया और धर्म पर उनकी
शंका को जनता ने एक अत्यंत सच्चे और
ईमानदार आदमी की सात्विक जिज्ञासा समझा
समय बदल गया है जिस दौर की जनता ने नेहरू
के काम को देखा उनके धार्मिक क्रियाकलापों

या मान्यताओं को नहीं आज के दौर की जनता
को यह देखना सिखा दिया गया है और
प्रधानमंत्री खुद ही कहते हैं कि ईश्वर ने
उन्हें फलाने काम के लिए चुना है उनके

आसपास के लोग उन्हें विष्णु का अवतार
बताते हैं कृष्ण का अवतार बताते हैं और
जनता को इसमें कुछ भी विचित्र नहीं लगता
दिनकर यही बताना चाहते हैं कि धर्म का
सहारा लेकर तो कोई भी लोकप्रिय हो सकता है

और लोकप्रियता मिलती रही है मगर केवल अपने
काम के दम पर बिना धर्म का सहारा लिए
नेहरू को ही ऐसी लोकप्रियता भारत में मिली
है क्या प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता
और मान्यता को आप बिना धार्मिक

क्रियाकलापों के देख सकते हैं उनकी
लोकप्रियता में धर्म की राजनीति की भूमिका
कितनी गहरी है धार्मिक आयोजनों में
प्रधानमंत्री खुद को राष्ट्रीय पुरोहित के
रूप में पेश करने लग जा ते हैं नेहरू ने

कभी धर्म का इस्तेमाल नहीं किया ना
प्रदर्शन किया बल्कि वे धर्म के खुले पन
के समर्थक रहे अगर प्रधानमंत्री के
राजनीतिक जीवन से आप धार्मिक पहलुओं को
माइनस कर दें तब क्या प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी केवल अपने काम के दम पर
प्रचंड रूप से लोकप्रिय नजर आएंगे जनता के
बीच उस आत्मविश्वास के साथ नजर आएंगे क्या
प्रधानमंत्री धर्म और ईडी का सहारा लिए
बिना राजनीति के मैदान में उतर सकते हैं

दिनकर का यह प्रसंग नेहरू की नहीं मोदी का
मूल्यांकन करता है दिनकर लिखते हैं कि
नेहरू को कविताएं तो बहुत पसंद नहीं थी वे
कवि सम्मेलनों में जाया करते थे उनके घर
की गोष्ठियों में कवि भी आते थे मगर कविता

सुनते समय अपना सर झुका लेते थे दिनकर के
अनुसार सिर्फ एक बार नेहरू वाह वाह कर
उठते हैं जब दिनकर ने राजर्षि टंडन के
अभिनंदन में एक कविता पढ़ी और उस कविता का
अंश मैं भी पढ़ रहा हूं एक हाथ में कमल एक
में धर्म दीप्त विज्ञान लेकर उठने वाला है

धरती पर हिंदुस्तान दिनकर लिखते हैं कि इस
पंक्ति को सुनते ही पंडित जी वाह वाह कह
उठते हैं आगे लिखते हैं दिनकर कि पता नहीं
यह वाहवाही

कवित्वम की उस कल्पना के लिए जो उनके समान
मुझे भी आलोट करती रही है धर्म दीप्त
विज्ञान पर वाहवाही की क्षमता जिस नेहरू
में थी उसे धर्म से नफरत नहीं हो सकती है
उनके लिए धर्म का मतलब जरूर अलग हो सकता

है नेहरू को इस देश के कणक से प्यार था वे
इसके प्रतीकों का महत्व समझते थे वरना एक
हाथ में कमल और एक में धर्म दीप्त विज्ञान
की पंक्ति पर वे झूमते नहीं तो मूर्खों से
सावधान रहे खासकर हाउसिंग सोसाइटी के

अंकिल से बहुत सावधान रह अपने बच्चों को
दूर रखें उनसे नेहरू की आलोचना जरूर करें
सख्त आलोचना करें होनी भी चाहिए मगर
आलोचना के नाम पर उन्हें नीचा दिखाया जाता

है एक प्रधानमंत्री के कार्यों की समीक्षा
होती रहनी चाहिए समय-समय पर मगर सारा समय
उन्हें मुसलमान साबित करने धर्म विरोधी
साबित करने नकारा साबित करने और उनके बारे
में झूठ फैलाकर यह काम नहीं किया जा सकता

दिनकर ने चीन युद्ध के समय नेहरू को बहुत
करीब से देखा है उसके बारे में विस्तार से
लिखा है बेहतर है आप पूरी किताब पढ़ें और
वहां से जाने उनकी किताब से नेहरू का सारा
किस्सा यहां बताना सही नहीं होगा लेकिन एक

प्रसंग रोचक लगा आज भी नेताओं को फलाना
हृदय सम्राट कहा जाता है नेहरू के दौर में
भी हृदय सम्राट कहने का चलन था दिनकर
लिखते हैं कि अपने यवन काल में पंडित

जवाहरलाल नेहरू युवक हृदय सम्राट कहे जाते
थे बाद को चलकर हम उन्हें जनता का हृदय
सम्राट कहने लगे किंतु उनका असली स्वरूप
उनके स्वर्गारोहण के बाद प्रकट हुआ जब
विनोबा जी उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित

करने लगे उन्होंने जवाहरलाल जी को लोक देव
के नाम से अभिहित किया नेहरू को गरिया
उन्हें अपमानित करना मौजूदा दौर में
राजनीति के प्रोजेक्ट का हिस्सा है उसका

एक हिस्सा यह भी है कि आजादी की लड़ाई की
स्मृतियों को बदलने के नाम पर भीतर भीतर
खत्म कर देना है मूर्तियां तो लग रही हैं
अमृत महोत्सव भी मन रहा है मगर झूठ और जहर
का भी प्रचार प्रसार उतना ही हो रहा है
गांधी की मूर्ति लगाकर गांधी के आंदोलन और

उसकी आत्मा को कुचला जा रहा है उसे गायब
किया जा रहा है नेहरू से भी कोई और बड़ा
हो सकता है होना भी चाहिए मगर बड़ा होने
से पहले नेहरू को ही दिन रात छोटा करता
रहे हम उसे दर्ज करते रहेंगे नेहरू जब

प्रधानमंत्री बने तब आधुनिक देश के रूप
में भारत और उसे चलाने का अनुभव किसके पास
था इसके बाद भी नेहरू ने शानदार काम किया
यह नेहरू की देन है कि उनके दौर के
संस्थान एम्स में आज भी आप दौड़े-दौड़े

चले जाते हैं उनके दौर की आईआईटी से आपके
बच्चों के सपनों की शुरुआत होती है ऐसा
नहीं है कि नेहरू के बाद एम्स और आईआईटी
की स्थापना नहीं हुई मगर नेहरू के समय में

बनी आईआईटी और एम्स के बराबर कौन सा एम्स
पहुंच पाया है कौन सी आईआईटी पहुंच पाई है
इसका उत्तर खोजते रहिएगा

नमस्कार

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