3 गांवों को मिलाकर अंग्रेजों ने कैसे बसाया कोलकाता? | History Of Kolkata : Kolkata Ka Itihaas - instathreads

3 गांवों को मिलाकर अंग्रेजों ने कैसे बसाया कोलकाता? | History Of Kolkata : Kolkata Ka Itihaas

दोस्तों शायद ही आपको यह पता होगा की जी
भारत को हम आज देखते हैं उसे यूनाइटेड
भारत की नीव बंगाल के एक शहर कोलकाता से
राखी गई थी रू क्योंकि कोलकाता ही वह पहले

शहर था जो भारत की राजधानी हुआ करता था
लेकिन ऑफ जय के नाम से मशहूर हुगली नदी के
किनारे बस हुआ खूबसूरत कॉलोनियल एरा की
बिल्डिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की गवाही
देने वाला कोलकाता एक शहर के रूप में कैसे
उभर कर सामने आया और कैसे एक छोटे से गांव

से लेकर उसने देश की राजधानी तक का सफर ते
किया यह गाने अपने आप में काफी यूनिक है
इस वीडियो में हम कोलकाता के इतिहास के
रूबरू होंगे जिसमें कोलकाता शहर के बने की
कहानी समझेंगे और यह भी जन की कोशिश

करेंगे की क्यों 20वीं साड़ी की शुरुआत
में ही कोलकाता ने अपना चरण कोना शुरू कर
दिया और कैसे दिल्ली ने कोलकाता की जगह ले
ली तो दोस्तों कोलकाता की कहानी शुरू होती
है सातवीं शताब्दी से जब ब्रिटिश ईस्ट
इंडिया कंपनी इंडिया में आने की कोशिश कर

रही थी और इंडिया के रिसोर्सेस को यूरोप
में ले जाकर बेचना और उससे ज्यादा मुनाफा
कामना ही उनका एकमात्र लक्ष्य बच्चा हुआ
था इसे सिलसिले में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया
कंपनी का बंगाल में भी आना हुआ ईस्ट

इंडिया कंपनी बंगाल में अपनी जगह बनाने की
कोशिश कर रही थी लेकिन उसे ऐसा कोई मौका
नहीं मिल रहा था जिससे वह यहां पर अपने पर
जमा सकें क्योंकि ये समय बंगाल का
पॉलीटिकल कंडीशन काफी स्टेबल था और वहां

पर किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी
जिसका हवाला बेकर ईस्ट इंडिया कंपनी वहां
के माहौल को खराब कर सकें और खुद को वहां
की पॉलिटिक्स में घुसल उसे वक्त दोस्तों
आपको बता देंगे बंगाल में मुगलो का राज था

और बंगाल के नवाब थे नवाब सिराजुद्दौला
हालांकि बंगाल के ही चट्टोग्राम में
पुर्तगाली अपना बिजनेस किया करते थे यही
चट्टोग्राम आज चित्तागोंग के नाम से जाना
जाता है जो करेंटली बांग्लादेश के टेरिटरी
के अंदर आता है

पुर्तगालियों के बिजनेस करने का सबसे बड़े
करण था समुद्री से कनेक्टिविटी क्योंकि
सलाहकार आप मैप पर देखेंगे तो यहां पर
काफी बड़ा बंदरगाह हुआ करता था जैसे
समुद्री जहाज आसानी से इसे इलाके में आते

थे परियों के अलावा टच भी बंगाल में अपना
बिजनेस जमाई हुए थे और उसे वक्त बंगाल
बहुत ही अमीर और कलर वाइस बहुत ही रिच
स्टेट माना जाता था जिसके टूल भारत की कोई
और राज्य उसे वक्त दिखाई नहीं देते थे

इसलिए कोई भी विदेशी व्यापारी या उनकी
टुकड़ी बंगाल जरूर जाति थी औरत और 17वीं
शताब्दी से थोड़े पहले की बात करें तो
16वीं साड़ी के दौरान जब बंगाल पहले बार

मुगलो के कंट्रोल में आया तो ऐसा कहा जाता
है की उसे वक्त वह भारत का सबसे अमीर
राज्य हुआ करता था इसी वजह से सारे
यूरोपियन ट्रेडर्स यह मानते थे की बंगाल
में बिजनेस करना बहुत जरूरी है और उसे

जमाने में भी बंगाली इंटरनेशनल ट्रेड का
एक अच्छा खास इलाका हुआ करता था बंगाल के
अमीर होने का सबसे बड़ा करण यह था की वहां
पर कपड़ा बनाने के लिए सारे रा मैटेरियल्स
बहुत ही बड़ी मंत्र में पाया जाते थे और

वहां का टेक्सटाइल उसे समय अपने बम पर था
कुछ लोगों का मानना ये भी था दोस्तों की
इस वक्त बंगाल की टेक्सटाइल इंडस्ट्री
दुनिया भर में सबसे बड़ी थी जी हां बंगाल
की है अमीरी उसके बर्बादी के भी करण बनी
क्योंकि जबरी को अंग्रेजन की नजर ग गई थी

और वह बंगाल को अपना ट्रेड सेंटर बनाना
चाहते थे अंग्रेजन ने जो बाकी के रोबिन
देश की तरह बंगाल में अपना बिजनेस शुरू
किया तब उन्होंने अपना शुरुआती प्रश्न और
बालेश्वर से शुरू किया था जी हां यह दोनों

ही इलाके आज के उड़ीसा राज्य में मौजूद
हैं लेकिन अभी भी अंग्रेजन का मीन बंगाल
रीजन में ज्यादा दखल नहीं थी पर जैसे-जैसे

समय बीता अंग्रेजन ने अपना बिजनेस फैलाया
और इस बार उन्होंने हुगली नदी के किनारे
के गांव सूत्नोती किस्सेद और साहूकारों के
साथ अक्षय रिलेशन बनाकर अपना व्यापार
बढ़ाना शुरू कर दिया क्योंकि हुगली नदी के

आसपास ही इलाकों में बेस सेठ लोगों के
अंदर ही टेक्सटाइल इंडस्ट्री का कंट्रोल
था उसे वक्त अंग्रेजन की नजर हुगली नदी के
किनारे सूत्नोती और गोविंदपुर नाम के दो
गांव पर थी जहां पर विशेष लोग रहा करते थे

लेकिन इन दोनों गांव के बीच में एक और
गांव था जिसका नाम था काली का था हो सकता
है की आप पहचान गए दोस्तों की ये गांव आगे
चलकर क्या बनेगा पर अभी फिलहाल कहानी के

साथ चलते हैं कहानी हमें यह बताती है की
अंग्रेजन ने उन दो गांव के साथ साथ
कोलकाता गांव के लोगों के साथ भी अपने
रिलेशन अच्छे किया और इन तीनों गांव को
मिलकर बना कोलकाता जिसे अंग्रेज उसे जमाने

में कोलकाता कहते थे यस बिकॉज़ ऑफ डर
एक्सेंट और यही खेल काटा 2001 में कोलकाता
बना जो की हुगली नदी किनारे बेस हुए
घटनाओं को मिलकर बना हुआ एक शहर था कलिकथा
के नाम का मतलब होता है देवी काली का घर

यानी की कैसा इलाका जहां पर देवी काली रहा
करती हो और प्राचीन बंगाल में ऐसी मान्यता
थी की इन इलाकों में देवी काली का निवास
स्थान हुआ करता था इसलिए यही लगाकर काफी
पूजनीय भी है और कोलकाता में आज भी काली
माता का सबसे बड़ा मंदिर मौजूद है जहां पर

लोग देश भर सुदर्शन करने के लिए आते हैं
जैसे नॉर्थ इंडिया के लोग कालीघाट के नाम
से जानते हैं लेकिन अब ऐसा तो था नहीं की
अंग्रेज आए और उन्होंने तीन गांव को बोला
की चलो अब आप शहर हो जो दोस्तों ये कहना

बेवकूफी होगी क्योंकि इन तीनों गांव को
मिलकर शहर बनाने का श्री एक ऐसे अंग्रेज
अधिकारी को जाता है जिसका मिशन था की
हुगली नदी के किनारे अगर अंग्रेज यह शहर

बस लेते हैं तो इंडिया में उनकी पकड़ और
मजबूत हो जाएगी इसलिए जब नाम के इस
अंग्रेज ने इन तीनों को मिलकर शहर बनाने
का कम किया कोलकाता शहर का जनक भी कहा
जाता है जब चरणों में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया
कंपनी के एजेंट थे इनका जन्म 1630 में

इंग्लैंड में हुआ था और 1656 में वह पहले
बार इंडिया आए इंडिया आते ही हुगली नदी के
किनारे बस एक कमर्शियल पोटेंशियल को उसे
समझ गए थे शादी में बंगाल के रिसोर्सेस को
देखकर यह भी समझ गए थे की अगर यहां पर

ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी कॉलोनी बनती है तो
यह उसके लिए अब तक का सबसे फायदेमंद कम
होगा इसलिए इंडिया आते ही जब चलना को
बंगाल के मुर्शिदाबाद के कासिम बाजार का
जूनियर मेंबर ऑफ काउंसिल बना दिया गया

कासिम बाजार बंगाल रीजन का ट्रेड हब हुआ
करता था यानी की इलाके से बंगाल में रहने
वाले हर तरह के व्यापार को कंट्रोल किया
जाता था हम जो इस कासिम बाजार का जिक्र कर
रहे हैं दोस्तों वह उसे वक्त मुर्शिदाबाद

में हुआ करता था जी हां और आपको यहां पर
बता दें की जब यहां पर मुगलो का राज था
यानी की 17वीं शताब्दी के द्वारा जब तक
यहां पर नवाब सिराजुद्दौला राज कर रहे थे
तब तक बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद ही थी

इसलिए कासिम बाजार वहां का ट्रेड हब हुआ
करता था जहां पर जब जूनियर काउंसिल बनाए
गए थे उसके बाद जब चरणों को बिहार की
राजधानी पटना बेचा गया जहां उन्हें ईस्ट

इंडिया कंपनी की एक फैक्ट्री का इंचार्ज
बनाया गया लेकिन 1680 में वापस उन्हें
मुर्शिदाबाद के कासिम बाजार में बुला लिया
गया और इस बार उन्हें वहां की फैक्ट्री का
इंचार्ज बना दिया होगा लेकिन 1686 आते आते

कर नो पूरे बंगाल रिकों के ईस्ट इंडिया
कंपनी के एजेंट बन गए पिछले इतिहासकार ऐसा
बताते हैं की जी वक्त जब चरणों पूरे बंगाल
विजन के इन चार्ज बने थे उसे वक्त
मुर्शिदाबाद में सिल्क के कारीगरों और
अंग्रेज व्यापारियों के बीच काफी झाड़ में

होने लगी जी वजह से अंग्रेजन को लगा की वह
अपना कम ठीक से नहीं कर का रहे हैं और
नवाब की तरफ से भी अंग्रेज अधिकारियों के
ऊपर दबाव डाला जान लगा की वह राजधानी में
इस तरह के देंगे फसाद ना करें जी हां जैसे

की आपको बताया था की चरणों के दिमाग में
हुगली नदी के किनारे के गांव हमेशा से बेस
हुए थे इसलिए उसने ईस्ट इंडिया कंपनी का
बेस मुर्शिदाबाद से हटाकर हुगली नदी के

किनारे शिफ्ट कर दिया और यही शिफ्टिंग
अंग्रेजन के लिए सबसे बड़ा चेंज साबित हुई
लेकिन वह इतनी आसानी से भी यहां पर पहुंच
गए हो ऐसा भी नहीं हुआ था क्योंकि शुरुआत
में चरणों में जब हुगली नदी के किनारे

अपना देश बनाने की कोशिश की तो मुगलो के
सूबेदार शाइस्ता खान से उन्हें फटकार
झेलनी पड़ी और शायद ठाणे उन्हें नदी के
किनारे से भाग दिया था ऐसे में कर नो किसी

नदी के किनारे बेस सूत्नोती गांव गए और जब
उसे गांव के किनारे पूरे नदी का माहौल
देखा और गांव के इलाकों को गौर से देखा तो
उन्हें लगा की बस इसी गांव में अंग्रेजन
का बेस बनाया जा सकता है और यही से शुरुआत
हुई कोलकाता शहर के बने की इस एन चनौद

मद्रास काउंसिल ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी से
लाड गए उन्होंने स्टाफ का दिया की अगर
ईस्ट इंडिया कंपनी का बेस कहानी बनेगा तो
वह सिर्फ गांव में ही बनेगा इसी दौरान
1690 ई में मुगल बादशाह औरंगज़ेब से चरणों

के लिए परमिशन भी ले ली थी की ईस्ट इंडिया
कंपनी बंगाल में कंपनी फैक्ट्री को बड़े
पैमाने पर सेट कर ले और सूत्नोती की गांव
में अपना हेड क्वार्टर बना ले इसलिए
औरंगज़ेब की परमिशन के बाद ईस्ट इंडिया

कंपनी भी चरणों की बात मां गई ईस्ट इंडिया
कंपनी का पूरा ट्रेड मद्रास से बंगाल में
इस गांव में शिफ्ट हो गया इतिहास गानों का
मानना है की 24 अगस्त 1690 ई को पहले बार
जब चरणों ने सूत्नोती गांव के नेम ओला घाट
पर कम रखा और वहां पर ब्रिटिश फ्लैग

लहराया कहा जाता है की ईस्ट इंडिया कंपनी
ने हुगली नदी के किनारे बेस इन गांव में
जो भी जमीन खरीदी थी या फिर कहेंगे तीनों
गांव को बंगाल के जमींदार सबरन राय चौधरी

ने मरीज को बेचे थे उसे दौरान ईस्ट इंडिया
कंपनी के लोगों का मानना था की यह तीनों
गांव का इलाका रेट और मिलिट्री बेस के लिए
बहुत अच्छा और सफिशिएंट इलाका है क्योंकि
इसकी एक तरफ हुगली नदी है और दूसरी तरफ
वेटलैंड्स हैं और तो और इस जगह को लेकर
अंग्रेजन का जो दूसरा मत था वो ये था की

यह सब बंगाल से पूरे उत्तर भारत को भी
जोड़ने का कम करता है क्योंकि यही पर बहुत
साड़ी नदियां आकर मिलती हैं खास तोर से
अगर गंगा का एग्जांपल ले लेने तो इस
बंगाली इलाके से होकर उत्तर भारत में गंगा

नदी के रास्ते अच्छे से पहुंचा जा सकता है
नबी के अलावा शेर शाह श्री के द्वारा
बनवाया गया ग्रैंड ट्रक रोड भी इस इलाके
को भारत के उत्तरी भू-भाग से जोडा था जी

वजह से अंग्रेजन ने इसकी इंर्पोटेंस को
समझ लिया था लेकिन कुछ ही सालों में चरणों
की मौत हो गई और जो सपना उन्होंने देखा था
की इन तीनों गांव को मिलकर एक शहर बनाया
जाएगा वैसे अपना पूरा नहीं हो सका देखते

ही देखते इन तीनों गांव की जिम्मेदारी एक
दूसरे अंग्रेज अधिकारी के हाथों में ए गई
जिसका नाम था चार्ल्स टायर लेकिन चार्ल्स
शेयर कोई और नहीं बल्कि चरणों की जनों की

मौत के 6 यानी के 10 नवंबर 1698 को स्वर्ण
राय चौधरी और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच एक
डिड साइन हुई वह भी पूरे ₹1300 की और इसी
1300 के अंदर हल्की नदी के किनारे बेस से
38 छोटे पड़ेगांव ईस्ट इंडिया कंपनी के

कब्जे में थे ₹1300 में उसे दूर में 38
गांव बिजय करते थे सब गांव को खरीद कर
ईस्ट इंडिया कंपनी बहुत अच्छे से अपना
बिजनेस हुगली नदी के किनारे चला रही थी
लेकिन यह प्रश्न बहुत अच्छे से बहुत लंबे

समय तक चल पता की उससे पहले ही एक मोड ए
गया और वो मोड कुछ ऐसा था की मुगल बादशाह
और उनसे अल्लाह को प्यार हो गए थे जी हां
तीन मार्च 1707 ई को औरंगज़ेब की मौत हो

गई और औरंगज़ेब के मरते ही ईस्ट इंडिया
कंपनी के मां में एक नई रोशनी जागो थी
क्योंकि बादशाह के मा जान से उसके जितने
भी राजा नवाब और उसके अंदर आने वाले राज्य
थे वह सब कमजोर हो गए क्योंकि औरंगज़ेब का

कोई उसके जैसा उत्तर अधिकारी नहीं था जो
पूरे भारत पर मुगलिया सल्तनत के राज को
कायम कर सके इसी वजह से ये सारे राज्य आपस
में ही एक दूसरे के खिलाफ लड़ने लगे और

औरंगज़ेब की मौत के बाद कोई एक सेंट्रलाइज
पावर नहीं बच्ची जी वजह से लगभग पूरा देश
ही जंग की आज में झुला रहा था और इसी आज
की वजह से भारत में रिसोर्सेस की सी की और
सेंट्रलाइज पावर की कमी हो गई जिसमें

देखते हुए अंग्रेजन ने मौके का फायदा
उठाना सही समझा इसी माहौल को देखते हुए
अंग्रेजन ने अपनी आर्मी बना लिए जिसके
लॉजिक ये था की वह सब खुद को प्रोटेक्शन

के लिए तैयार कर रहे हैं आर्मी बनवाने के
बाद धीरे-धीरे अंग्रेजन ने बंगाल को अपने
कंट्रोल में लेना शुरू कर दिया और तो और

बंगाल की राजनीति में भी अंग्रेजन ने दखल
देना शुरू कर दिया था और यह दूर करीब 40
से 50 साल तक चला रहा जिसमें भारत का एक
कमजोर केंद्रीय सत्ता की वजह से अलग-अलग
जगह पर अंग्रेजन से हर रहा था जिसके बाद

23 जून 1757 को प्लासी का युद्ध लाडा गया
युद्ध उसे वक्त के बंगाल के नवाब
सिराजुद्दौला और अंग्रेजन के बीच लाडा गया
था इतिहास कानून का मानना है की बंगाल अभी
भी इतना कमजोर नहीं हुआ था की उसे अंग्रेज
आर्मी आसानी से हर थे| लेकिन नवाब
सिराजुद्दौला का कंट्रोल बंगाल के अमीर

लोगों के ऊपर से खत्म हो गया था और इन्हीं
अमीर लोगों ने अंग्रेजन और ईस्ट इंडिया
कंपनी आकर उनसे ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर
में नवाब को धोखा जिससे सिराजुद्दौला
कमजोर पद गए और नवाब सिराज और डोला इस जंग
में हर गए जिससे पुरी बंगाल पर ईस्ट

इंडिया कंपनी का राज हो गया लेकिन अब भी
वहां पर नवाब बच्चे हुए थे और बंगाल के नए
नवाब बने थे मीर कासिम जिन्हें अंग्रेजन
का सागा माना जाता था लेकिन अंग्रेजन को
लगा था की वो उनके खिलाफ कुछ साजिश कर रहे

हैं इसलिए भारत के इतिहास में सबसे बड़ा
मोड कहे जान वाले बक्सर के युद्ध की
शुरुआत हुई यह युद्ध 22 और 23 अक्टूबर और
1764 में बक्सर नगर के आसपास एक्टर मुनरो

के लीडरशिप में ईस्ट इंडिया कंपनी और
बंगाल के नवाब मीर कासिम के लीडरशिप में
अवध के नवाब सोजा और दौला और मुगल सम्राट
शाह आलम द्वितीय की जॉइंट आर्मी के बीच
लाडा गया था लेकिन इस लड़ाई में अंग्रेजन
की जीत हुई और इसके रिजल्ट में पश्चिम

बंगाल बिहार झारखंड उड़ीसा बांग्लादेश का
पूरा कंट्रोल वेन्यू का अधिकार अंग्रेजी
कंपनी के हाथ चला गया इसे युद्ध के बाद से
ही बंगाल से नवाबी खत्म हो गई और ब्रिटिश
ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत इस सारे इलाके

आने लगे जैसे अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध
की वजह से बंगाल से नवाबी को खत्म किया
उसके बाद बंगाल की राजधानी भी बादल हो गई
और बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद की चौथ
कोलकाता हो गई थी 1790 तक कोलकाता में

पुरी तरह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का
एडमिनिस्ट्रेटिव सेटअप हो गया था और 1850
का कोलकाता दो हसन में बाढ़ चुका था और वो
लगातार डेवलप हो रहा था इन दो हसन को

व्हाइट टाउन और ब्लैक टाउन के नाम से जाना
जाता था व्हाइट डॉ का इलाका कोलकाता के
फोर्ट विलियम इलाके के आसपास आता था
बेसिकली इलाका गोविंदपुर का फल फुल डेवलप

इलाका था राम दूर से अंग्रेज अधिकारी रहा
करते थे और उन्होंने इस इलाके को अपने
रहने के हिसाब से डेवलप किया था इसलिए इस
इलाके में यूरोपियन स्टाइल के घर और
बिल्डिंग बनी हुई थी बड़े-बड़े चौड़े

चौड़े रोड बने हुए थे और उसे वक्त किसी
यूरोपियन शहर में जितनी फैसिलिटी होती थी
वह सब कोलकाता की व्हाइट टाउन में हुआ
करती थी वहीं दूसरी तरफ ब्लैक डॉ व्हाइट
टाउन का एकदम उल्टा था जो सुल्तान होती
गांव के आसपास बनाया गया जहां पर आमतौर से

भारतीय लोग रहा करते थे इस तरह से शहर
क्लास इसके सबसे बड़ा एग्जांपल बन गया था
लेकिन बंगाल पर राज करते ही लगभग अंग्रेजन
का राज पूरे देश पर हो गया था इस प्रकार

जाता है की नवंबर 1888 को इलाहाबाद के
ग्रैंड पैलेस में क्वीन विक्टोरिया का एक
लेटर पढ़ा गया जिसमें ये कहा गया की आज से
मुगल अंपायर को भारत से पुरी तरह खत्म
करके ब्रिटिश मोनार्की का राज होगा इस

लेटर में यह भी कहा गया था की कोलकाता को
रॉयल कैपिटल ऑफ ब्रिटिश इंडिया बनाया
जाएगा इस तरह से कोलकाता तीन गांव को
मिलकर बना हुआ एक टाउन था जिसे डेवलप करते
करते रॉयल कैपिटल बना दिया गया लेकिन जैसे

की हमने आपसे वीडियो के शुरू में कहा था
की हम आपको यह भी बताएंगे की आखिर क्यों
कोलकाता भारत की हमेशा से राजधानी नहीं र
पी और उसे बदलकर दिल्ली कर दिया दोस्तों
इसका सबसे बड़ा करण था 1960 में बंगाल का

विभाजन 1905 में बंगाल को बताकर अंग्रेजन
ने भारत पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे
दिया था जिससे विद्रोह का स्वर पूरे बंगाल
में उठने लगा था साड़ी रात कोलकाता में भी
इसका सर देखने को मिलता था जी वजह से

अंग्रेज ठीक ढंग से पूरे देश पर कंट्रोल
नहीं कर का रहे थे इसलिए उन्हें एक
अल्टरनेटिव की जरूर थी और ये अल्टरनेटिव
मिला दिल्ली के रूप में कलकत्ता के
विद्रोह और दिल्ली प्रशासन की संभावनाओं

को देखते हुए अंग्रेज महाराज जॉर्ज पंचम
ने देश की राजधानी को दिल्ली ले जान का
आदेश दे दिया लेकिन दिल्ली के इतिहास को
देखते हुए यहां के बड़े में एक बात मशहूर
थी वो थी दिल्ली पर कोई लंबे समय तक राज

नहीं कर सकता अंग्रेजन के मामले में भी
ऐसा ही हुआ दिल्ली को राजधानी घोषित करने
के 36 सालों के बाद उनके राज का अंत हुआ
उन्हें भारत छोड़कर जाना पड़ा दोस्तों यह
भी कहानी कोलकाता शहर के बने की आपको ये

कहानी कैसी लगी हमें कमेंट क्षेत्र में
जरूर बताएं साथ इस वीडियो को लाइक करें
शेर कर

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