Akhilesh Yadav की इस रणनीति से यूपी में भाजपा पस्त! Election 2024 - instathreads

Akhilesh Yadav की इस रणनीति से यूपी में भाजपा पस्त! Election 2024

नमस्कार राजनीति तेजी से बदल रही है और
खासकर उत्तर प्रदेश की आज के वीडियो में
हम बात करेंगे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर
उत्तर प्रदेश जिस राज्य को किसी सामान्य
राज्य की तुलना में ज्यादा अहमियत प्राप्त
है उसके अपने

आकार उसके अपने लो लोकसभा विधानसभा की
सीटों उसके अपने प्रभाव और उसके अपने
राजनीतिक सामाजिक आंदोलनों और चेतना के
तहत इसीलिए एक जमाने में यह कहावत बहुत
मशहूर रही और आज तक कई और सुनी जाती है कि
दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है

तो लखनऊ और उसके आसपास की राजनीति में
क्या बदलाव आ रहा है आज हम उस पर बात
करेंगे बात करेंगे कि राज्यसभा चुनाव के
बीच ऐसा क्या हुआ कि प्रदेश का सबसे बड़ा
प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी

मुश्किलों में गिरती नजर आ रही है उसके
अपने नेता नाराज हो रहे हैं स्वामी प्रसाद
मौर्य जो राष्ट्रीय महासचिव थे उन्होंने
राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा भी दे

दिया गठबंधन की सहयोगी पल्लवी पटेल इस
फैसले से नाराज बताई जा रही हैं जैन चौधरी
साथ छोड़ चुके हैं ओम प्रकाश राज परर पहले
ही जा चुके हैं यह सब जो बदलाव आ रहे हैं
इसके पीछे की वजह क्या है क्या किस दिशा

में यह राजनीति जा रही है और आगे इसकी
दिशा क्या होगी आज के वीडियो में इस पर
बात
करेंगे सबसे पहले सूचना इस बात की जो शायद
आप तक पहुंच भी गई होगी
कि राज्यसभा के लिए समाजवादी पार्टी ने

तीन लोगों का नाम तय कर दिया उनका पर्चा
दाखिल कर दिया गया उसमें पहला नाम जो कि
लंबे समय से जया बच्चन का है और वह लंबे
समय से जया बच्चन राज्यसभा सदस्य समाजवादी
पार्टी के खाते की तरफ से बनी
रहे इस बार फिर से जया बच्चन को समाजवादी

पार्टी की तरफ से राज्यसभा का उम्मीदवार
दिया गया कुछ दिन पहले तक यह चर्चा हो रही
थी कि शायद जया बच्चन को इस बार राज्यसभा
ना भेजा
जाए इसका अंदेशा शायद उन्हें रहा भी होगा

इसलिए राज्यसभा में विदाई भाषण की तर्ज पर
उन्होंने अपना भाषण भी
दिया लेकिन समाजवादी पार्टी ने निर्णय
लिया कि वह फिर से जया बच्चन को राज्यसभा
भेज रही

है दूसरे
कैंडिडेट आलोक
रंजन जो समाजवादी पार्टी के ओर से
राज्यसभा जाने के लिए पर्चा भर चुके हैं
आलोक रंजन कौन है आलोक रंजन एक 1978 बैच
के आईएएस है और जब अखिलेश यादव

मुख्यमंत्री थे उत्तर प्रदेश में तो
मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ही
थे अनुभवी व्यक्ति
मुख्यमंत्री के साथ काम करने का अनुभव है
उत्तर प्रदेश का भी अनुभव है लेकिन इनको
राज्यसभा क्यों भेजा गया इसको लेकर के

अलग-अलग लोगों की राय है समाजवादी पार्टी
से वह लंबे समय से जुड़े रहे हैं उन्होंने
पिछले चुनाव
में चुनाव के 17 के बाद उन्होंने इस्तीफा
देकर के समाजवादी पार्टी के साथ काम करना

शुरू किया 22 के चुनाव में जो मेनिफेस्टो
कमेटी थी समाजवादी पार्टी के उसके प्रमुख
भी थे और अखिलेश यादव जी के ठीक ठाक करीबी
बताए जाते हैं इनका भी नाम फाइनल कर दिया
गया जया बच्चन बंगाली ब्राह्मण है आलोक

रंजन कायस्थ है जिसे वैश्य समुदाय कह सकते
हैं और तीसरा नाम एक दलित परिवार से आने
वाले एक बड़े नेता रामजी सुमन जी का है
मुलायम सिंह यादव जी के करीबी रहे पुराने
नेता है कद्दावर नेता लंबे समय से

समाजवादी आंदोलन और राजनीति से जुड़े रहे
तो एक ब्राह्मण एक कायस्थ और एक दलित तीन
उम्मीदवारों को समाजवादी पार्टी ने अपनी
तरफ से राज्यसभा के लिए नॉमिनेट कर
दिया इसको लेकर सबसे पहली प्रतिक्रिया आई
पल्लवी पटेल जी की जो गठबंधन में शामिल है

और पल्लवी पटेल कौन है य आपको पता हो अगर
आप थोड़ा भी उत्तर प्रदेश की राजनीति को
समझ
पल्लवी पटेल अपना दल कमेरा वादी की एक
कद्दावर नेता है शानदार वक्तृत्व कला के

माहिर है विचारधारा में बिल्कुल स्पष्ट है
और उस विचारधारा में जिसके बाद समाजवादी
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव
जी लंबे समय से अब कर रहे हैं खता तरीके
से कर रहे द मदारी से कर रहे

पीडीए पिछड़ा दलित अल्प
उस वंचित शोषित कमेरा लोगों की बुलंद आवाज
है पल्लवी पटेल चाहे वो विधानसभा में बोले
चाहे वह किसी सामाजिक कार्यक्रम में बोले
उनका अपना एक तेवर और यह वही पल्लवी पटेल

है जिन्होने 2022 के चुनाव में उप
मुख्यमंत्री जो तब भी थे और अब भी है केशव
प्रसाद मौर्य उनको चुनाव हरा दिया था
सिराथू से कवर नेता इनकी आपत्ति सीधी यह
है

कि जिस पीडीए की बात हम अपने विचार में
अपने बातों में अपने पार्टी की तरफ से कर
रहे हैं उस पीडीए की बात उस तरह की बात इस
राज्यसभा चुनाव के समय नहीं दिखी और इसलिए
उन्होंने कहा कि और कितना वाजिब सवाल किया

है देखिए लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए
सवालों पर आप गौर करिए अगर हम पीडीए की
बात करते हैं तो इन पीडीए में महिलाएं
कहां
है दलित एक कैंडिडेट

है और दलित महिला क्यों नहीं ओबीसी महिला
क्यों नहीं मुसलमान क्यों नहीं और मुसलमान
महिला क्यों
नहीं मुझे लगता है किय एक वाजिब आलोचना है
य वाजिब

आलोचना आज के तौर में आप कल्पना करिए इस
आलोचना को यहां से समझिए और फिर हम आएंगे
स्वामी प्रसाद मौर्य जी पर बात करेंगे
उनकी आलोचना पर
बात समाजवादी पार्टी की तरफ से जिन लोगों
को राज्यसभा भेजा गया है उसमें आलोक रंजन

जी करीबी हो सकते हैं अच्छे ब्यूरोक्रेट
हो सकते हैं अनुभवी हो सकते हैं
ब्यूरोक्रेट लॉबी में अपनी एक दखल भी रख
सकते हैं पुराने
हैं लेकिन सब कुछ होने के बाद किसी पार्टी
की तरफ से वो भी तब जब दो या तीन लोग ही

पार्टी की तरफ से आपके राज्यसभा जाएंगे
क्या आलोक रंजन सबसे सबसे सटीक चयन हो
सकते हैं क्या आलोक रंजन को कभी
आपने धारदार तरीके से पीडीए पर बोलते देखा
है क्या आलोक रंजन बोलते भी हैं क्योंकि
राज्यसभा बोलने की जगह है राज्यसभा अपने
मुद्दों को रखने की

जगह आपको याद होगा
राष्ट्रीय जनता दल के एक भी लोकसभा सांसद
नहीं है
आरजेडी और आरजेडी के एक सांसद राज्यसभा
में है और पूरा देश उन्हें जानता है
आरजेडी की ताकत बनकर आरजेडी के विचारधारा
को इतनी बुलंदी से रखते हैं कि उनकी अपने

आप में पर्याप्त पहचान है कि एक सांसद सब
पर भारी पड़ता है प्रोफेसर मनोज कुमार
झा आम आदमी पार्टी जिसके राज्यसभा में कई
सांसद हैं और अब तो चीजें बदल गई लेकिन आम
आदमी की पार्टी की तरफ से राज्यसभा में

सबसे पुख्ता तरीके से बात रखने वाले नेता
संजय सिंह शायद उनका वो बात रखना इतना
भारी पड़ा कि मौजूदा निजाम ने उन्हें जेल
में डाल दिया है बहुत सारी राजनीति चल रही
है लेकिन इस बात को समझेंगे कि राज्यसभा

में होने का मतलब क्या है प्रोफेसर राम
गोपाल यादव समाजवादी पार्टी की तरफ से
सबसे वरिष्ठ सबसे लंबे समय से राज्यसभा
जाने वाले सदस्य हैं और कभी कभी अच्छा
बोलते हैं जैसे 13 पॉइंट रोस्टर पर

उन्होंने शानदार भाषण दिया था और भी कई
मुद्दे हैं जब वो राज्यसभा में एक अनुभवी
और वरिष्ठ नेता की तरह बहुत शानदार तरीके
से अपनी बात रखते जावेद अली खान समाजवादी
पार्टी की तरफ से जब भी मौका मिला

उन्होंने शानदार तरीके से अपनी बात रखी उस
कड़ी में क्या जया बच्चन जी का कोई भाषण
आपको याद है एक दो भाषण मुझे याद है चाहे
व महिलाओं का सवाल रहा हो या दो बार और
कोई सवाल रहा हो गुस्से में अच्छा बोला

उन्होंने लेकिन उसके बाद वो पीडीए पर कहां
खड़ी है ज बच्चन जी कभी आपको पीडीए पर या
पीडीए छोड़ दीजिए पीडीए एक नया शब्द है जो
अखिलेश जी ने याद किया है लेकिन जिस
पिछड़े दलित और अल्पसंख्यक की बात करते
हैं उस तेवर के साथ जिस तेवर में खुद

अखिलेश यादव बात करते हैं क्या आपने कभी
जया बच्चन को भाषण देते सुना क्योंकि वो
तो राजसभा रह चुकी है आप जरूरत किस बात के
थे क्या आलोक
पांडे आलोक रंजन उस भूमिका को निभा पाएंगे

माफ कीजिएगा मैंने उन्हें पांडे कह दिया
वो कायस्थ
है और तीसरे राम जी सुमन है वो एक पुराने
नेता है अच्छे नेता है लेकिन उनकी अपनी
जमीनी हैसियत
है इन दोनों चयन पर क्या है और यही आलोचना

पल्लवी पटेल की है और राजनीति में दो वजह
हो सकती है कई आलोचनाओं की कई वजह हो सकती
है कि भाई पल्लवी पटेल बारगेनिंग पावर
बढ़ा रही होंगी कुछ लोग यह कह रहे हैं कुछ

लोग यह कह रहे हैं पल्लवी पटेल खुद चाहती
थी कि राजमाता कृष्णा पटेल को राज्यसभा
भेजा जाए कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि
उनकी अपनी अभी सीट फाइनल नहीं हो रही है
वह और सीट चाहती है इसलिए आलोचना कर रही

राजनीति में इन सब गुंजाइश और संभावनाओं
से इनकार नहीं कह सकता और वो किया भी जा
सकता है और करते रहेंगे
लेकिन जो आलोचना है सवालों की उस पर तो
जवाब देना पड़ेगा और इस तरह से इन इन इस

राजनीतिक निर्णय का असर उत्तर प्रदेश की
राजनीति पर ठीक ठाक देखा जा बीजेपी किसे
भेज रही है बीजेपी मध्य प्रदेश में यादव
को मुख्यमंत्री बना रही है बीजेपी
छत्तीसगढ़ में आदिवासी को मुख्यमंत्री बना

रही है बीजेपी नरेंद्र मोदी को ओबीसी
बनाकर पेश करती है तमाम तरह की सियासी
चालाकियां और धूर्तता के साथ क्योंकि जब
जाति जनगणना की बात होती है तब वो ओबीसी
अपने को नहीं कहते इसे मैं एक राजनीतिक
चाला की और धुरता कह और पिछले दिन उन्होने

कहा कि सबसे बड़ा ओबीसी उन्हें नहीं
दिता इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति से
ऐसे चेहरे जाने चाहिए थे जो आंख में आंख
डालक तानाशाह से पीडीए की बात करते

समाजवाद की बात करते आलोक रंजन समाजवाद पर
कितनी देर बोल सकते हैं या कभी आपने बोलते
हुए सुना है राम गोपाल यादव बोल सकते हैं
आप राम प्रोफेसर राम गोपाल यादव से असहमत
सहमत हो सकते हैं लेकिन प्रोफेसर राम

गोपाल जब बोलेंगे तो वह समाजवाद पर बोल
सकते हैं जावेद अली खान बोल सकते हैं उनके
पास वो तेवर है वो विचारधारा है जया बच्चन
को कभी बोलते नहीं सुनाया आलोक रंजन को
कभी यह भूमिका निभा पाएंगे इसमें गहरा

संदेह लोगों का है और इस वक्त जरूरत कैसे
लोगों को राज्यसभा भेजने की थी और इस
आलोचना के साथ कि हमसे बातचीत भी नहीं हुई
वल्लवी पटेल नाराज और स्वामी प्रसाद मौर्य
उन्होंने कल अपना इस्तीफा दिया समाजवादी

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद
से आपको याद होगा 2022 का चुनाव और उस
चुनाव में माहौल बनाने का काम जनता ने
किया अब स्वामी प्रसाद मौर्या यह बोले कि

उन्होंने उनकी वजह से 45 से सीटें बढ़ कर
के 111 हो गई तो ये थोड़ा आतिश योग थी है
ऐसा नहीं होता कई परिस्थितियां मिलकर के
वो साथ देती है वो ओम प्रकाश राजभर की भी
भूमिका उसमें जैन चौधरी की भी भूमिका

उसमें आम आवाम की भूमिका सबसे बड़ी भूमिका
उसमें खुद अखिलेश यादव जी की सबसे बड़ी
भूमिका लेकिन उस माहौल ने एक ताकत दे दी
थी और 22 का चुनाव व जीत रहे थे कई तरह की
साजिशों और कुछ एक गलतियों की वजह से वह

चुनाव हाथ से निकल गया तो यह बात समझने की
है कि इस आलोचना को छोड़ दे तो स्वामी
प्रसाद मौर्या ने एक सवाल पूछा है कि एक
ही राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कई लोगों को
राष्ट्रीय महासचिव

बनाया तो स्वामी प्रसाद मौर्या उसी पीडीए
की बात करते हैं और क्लियर कट बात करते
हैं स्वामी प्रसाद मौर्या बसपा के मान्यवर
कांशीराम की राजनीतिक नर्सरी से निकले हुए

नेता है स्वामी प्रसाद मौर्या अपनी
बिरादरी और अपने बहुजन तबके में बहुत गहरी
पकड़ रखते हैं अब आलोचना किस बात पर हो
रही है कि वह धर्म पर बोलते हैं शुरुआत

कहां से हुई कल्पना अब मैं आपको सिलसिले
बार कहूंगा स्वामी प्रसाद मौर ने एक सवाल
उठाया कि एक राष्ट्रीय महासचिव के बयान
निजी हो जाते हैं और दूसरे राष्ट्रीय
महासचिव के बयान सार्वजनिक पार्टी का हो

जाता यह सवाल उनका है उन्होंने एक सवाल
किया कि हम लंबे समय से जाति जनगणना पर एक
रथ यात्रा निकालना चाह रहे हैं उत्तर
प्रदेश में इसके लिए अखिलेश यादव जी ने
हमें परमिशन नहीं दी इस सबका जवाब तो

अच्छा बेहतर तब होगा जब खुद राष्ट्रीय
अध्यक्ष अखिलेश यादव जी बात करेंगे और इस
तरह से यह सब कुछ सही हो जाएगा यह सब कुछ
बदल सकता है और कैसे होगा ये तो अखिलेश जी
बताएंगे राष्ट्रीय अध्यक्ष बताएंगे

समाजवादी पार्टी के लोग बताएंगे इसलिए
फिलहाल मैं उस पर कोई टिपड़ी नहीं कर रहा
लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्या की सवाल और
नाराजगी पर बात करनी
चाहिए स्वामी प्रसाद मौर्या ने कहा कि एक
ही विचारधारा समाजवाद की जो है उस पर बात
करते हुए हमने पीडीए को जोड़ने की बात की

तो उस पर हमें कहा जाता है कि निजी बयान
है और पार्टी के ही कई नेता जो बहुत छुट
भए टाइप के नेता है वो कहते हैं कि सर्व
समाज की पार्टी है और इनकी वजह से पार्टी
का नुकसान हो रहा है आप कल्पना करके देखिए
यहां खड़े होकर देखिए पार्टी की मूल

विचारधारा क्या है समाजवाद डॉक्टर राम
मनोर लोहिया और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के
मूल विचार पर खड़े होकर के राष्ट्रीय
अध्यक्ष अखिलेश यादव जी आज की तारीख में
उत्तर भारत की एक बुलंद आवाज बने हुए हैं

आज मैं कहूं एकदम क्लियर क्लियर तो तीन
नेता है जो डरे नहीं
उनमें सबसे पहला नाम लेना चाहूंगा तेजस्वी
यादव का हेमंत सोरेन को भी आप जोड़ सकते
हैं राहुल गांधी और फिर अखिलेश याद वो डरे

नहीं लड़ आख में आ विचारधारा में स्पष्ट
तो इसी जाति जनगणना और इसी विचारधारा की
बात कर रहे थे राम स्वामी प्रसाद मौर्य और
स्वामी प्रसाद मौर्या का एक भी बयान एक भी
शब्द गैर कानूनी गैर संवैधानिक नहीं होगा

व एक विचारधारा जो बहुजन को पसंद आती है
और वही पीडीए के लोगों को पसंद आती है जो
पीडीए की बात राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश
यादव जी करते हैं जिस हजारों साल के शोषण
और अन्याय से गैर बराबरी से बराबरी की
दिशा में ले जाने का स्वप्न देखते हैं जिस

समाजवाद को अखिलेश यादव जी लागू करना
चाहते
हैं उसी की बात स्वामी प्रसाद मौर
करते उसके सांस्कृतिक और पाखंड वाले पहलू
पर उनका थोड़ा ज्यादा जोर रहता है लेकिन
वो स्वामी प्रसाद मौर्या य है जिन्होने
पिछले दिनों बुलंदी के साथ पल्लवी पटेल भी

है और भी समाजवादी पार्टी के भी विधायक है
मैं नहीं क रहा कि सपा नहीं उठा र खुद
अखिलेश यादव जी ने कई बार बुलंदी के साथ
उठाया चाहे वो 69000 शिक्षक भर्ती का
आरक्षण घोटाला हो चाहे दलितों पिछड़ों पर

हो र न्याय अत्याचार चाहे कोई भी सवाल अगर
ये लोग उस तेवर से बोल सकते हैं तो फिर ये
अगर पाखंड और अंधविश्वास पर हमला करते हैं
तो इसकी आजादी तो उनके पास है
ना पार्टी कहां कहती है कि पाखंडी
बनो पार्टी सब धर्म के सम्मान की बात करती

है और इसलिए स्वामी प्रसाद मौर्या की य
आलोचना जायज है अच्छा जो लोग पीडीए की बात
करके कहते हैं हमारे खिलाफ बोलते खिलाफ
किसी के नहीं है कुछ जातियों के लोग अपने
को उसका प्रतिनिधि बनाकर कहते हैं कि ये
हमारी जाति के ऊपर हमला करते नहीं महिलाएं

अगर इस देश में पुरुषों के खिलाफ गैर
बराबरी की आवाज उठाएं तो वो पुरुषों के
खिलाफ नहीं है उस गैर बराबरी के खिलाफ है
जिसका फायदा पुरुषों को मिला होता है इतनी
ट्रेनिंग इस देश में लोगों के पास नहीं है

और जिस पर अखिलेश यादव जी को क्लियर बोलना
होगा अगर गैर बराबरी है आज की तारीख में 4
पर ओबीसी के प्रोफेसर हैं तो फिर यह सवाल
पूछना किसी सवण प्रोफेसर के खिलाफ नहीं है

अन्याय के खिलाफ है इतना सा फर्क है
संविधान खत में इसको बचाने के लिए पीडीए
के लोगों को एकजुट होना होगा उनको धर्म के
पाखंड से बचना होगा इसका इसमें कौन सी चीज
गलत है स्वामी प्रसाद मौर्या ने एक सवाल

पूछा कि शूद्र के नाम पर हमें गाली देने
की बात क्यों कही और यही बात अखिलेश यादव
जी ने सदन में पूछी क्या जवाब दिया योगी
आदित्यनाथ ने कोई जवाब नहीं था जब अखिलेश

यादव जी ने खड़े होकर पूछा कि मुख्यमंत्री
बताएं कि शूद्र का मतलब क्या है और हमारा
घर गंगा जल से क्यों धोया गया कितनी बार
उन सवर्ण नेताओं ने इस बात को पार्टी के
फ्लोर से उठाया है जो आज स्वामी प्रसाद

मौर्या के खिलाफ बोलते हैं पार्टी फोरम पर
बोले हो वो तो नेता से बोल सकते हैं
पार्टी का अनुशासन हो सकता है और अखिलेश
यादव जो निर्णय ले इसका पूरा अधिकार उनको
क्योंकि वो अपनी पार्टी के राष्ट्रीय
अध्यक्ष है अंतिम निर्णय लेना उनका उनका

काम है उनकी जिम्मेदारी और राष्ट्रीय
अध्यक्ष जी पिछले दिनों स्वामी प्रसाद
मौर्या जी के जन्मदिन के अवसर पर
कार्यक्रम में शामिल हुए उनके साथ लगातार
खड़े दिखते हैं पिछले दिनों अभी चंद दिनों

पहले मीडिया को दिए इंटरव्यू में जब लोगों
ने स्वामी प्रसाद मौर्या के ऊपर सवाल पूछा
कि वो धर्म के खिलाफ बोलते हैं तो अखिलेश
यादव जी ने कितनी चतुराई और कितनी समझदारी
से यह कहा कि ये जो टेस्ट ट्यूब बेबी सीता
माता को बोला वो तो बीजेपी मंत्री आपने

कितने सवाल उनसे पूछे नहीं बोलते चल
सन्यासी मंदिर में से लेकर के लात खाते हो
तो स्कूल जाते हो कि हॉस्पिटल जाते हो कि
कचहरी जाते हो थाने जाते हो कि मंदिर जाते
यह कहने वाले ओम प्रकाश राजभर जी बीजेपी

में अब स्वामी प्रसाद मौर्या जी की आलोचना
इस बात पर लोग करते हैं कि उनकी खुद की
बेटी जो है बीजेपी में है खुद जब पा साल
बीजेपी में मंत्री रहे तो नहीं बोले ठीक
बात है यह आलोचना जायज भी है और यह आलोचना
होनी

चाहिए लेकिन कल नहीं बोले तो आज बोलना गलत
कैसे हो जाएगा एक सवाल है हमारा बीजेपी
में गए होंगे स्वार्थ की वजह से गए होंगे
आ छोड़ कर आए आज भी बीजेपी में रहते या कल
को बीजेपी में चले जाएंगे तो इनकी आलोचना

और करेंगे और इनके समाज के लोग करेंगे
लेकिन अगर आज व पीडीए की बात करते हैं तो
इस बात से उनकी आलोचना कैसे हो जाए
क्योंकि बात में तो तर्क है
ना तर्क है इस बात में कि स्वामी प्रसाद
मौर्या का विचारधारा उनके समाज के लोगों
को पसंद

आती और बीजेपी से सीखिए साहब
राजनीति बीजेपी के बड़े बड़े नेता कुछ भी
बोल
किसी नेता की हिम्मत नहीं होती कि मीडिया
में आकर अपने नेता के खिलाफ बयान दे
दे बीजेपी चाहती है तो बहुत कुछ लोगों को
और यह आत्मविश्वास कितने लोगों के पास है

केवल सवर्ण नेताओं के पास इतना
आत्मविश्वास इतनी छूट और इतनी हिम्मत कैसे
होती है जिनके वोट बैंक का सीएसडीएस कह
रहा है कि 90 पर हिस्सा बीजेपी की तरफ गया
है 2022 के चुनाव में 90 पर हिस्सा क्या

स्वामी प्रसाद मौर्या आज अगर बोलना छोड़
दे या पार्टी छोड़ दे तो क्या सवर्णों का
90 पर हिस्सा या 50 पर हिस्सा भी समाजवादी
पार्टी को वोट देना शुरू कर देगा यह सवाल
मेरा
है विचारधारा में जो सवण आपके साथ है वो

जाति देखकर नहीं है व समाजवाद के विचार
देखकर वो कल भी थे चाहे वो जनेश्वर मिश्र
हो चाहे वो मोहन सिंह हो चाहे कई
नेता वो विचारधारा से लेकिन क्या वजह है

कि पार्टी की मूल विचारधारा पर बयान कभी
नहीं आता पीडीए पर उनका बयान कभी नहीं आता
अंदर अंदर तो वो सारे नेता पीडीए का विरोध
करते हैं कि पीडीए में तो सण चले गए अरे
भाई सवर्ण अगर समाजवादी विचार को मानने
वाला है तो वह पीडीए के साथ खड़ा होगा

डॉक्टर राम मनोहर लोहिया भी सण थे याद
रखिएगा डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के बयान
उनका विचार कभी भी आपको आरएसएस के पास
नहीं दिखेगा और आज के तमाम समाजवादी
नेताओं का विचार कई बार आरएसएस के करीब

दिख जाता है आप बात करते हैं कि विरोध का
विचारधारा केंद्र में होती है और वह
विचारधारा पहली बार समाजवादी पार्टी के
मुखिया अखिलेश यादव पूरे कद्दावर तरीके से
उठा रहे हैं और ऐसे वक्त में अगर उनकी तरफ
से जयंत चौधरी देखिए भाई जो विपक्ष में

होता है उसके पास देने और सबको खुश करने
के लिए मौके बहुत कम होते हैं यह ठीक बात
है कि राजभर क्यों गए इसके पीछे बहुत सारी
वजह है जयंत चौधरी क्यों छोड़कर चले गए
इसके पीछे भी बहुत सारी वज हैं लेकिन अब
बीजेपी और उनकी मीडिया ये दिखाएगी कि

अखिलेश यादव संभाल नहीं पा रहे अखिलेश
यादव सब छोड़ के जा रहे हैं अरे भैया वो
विपक्ष में लड़ रहे हैं और लड़ना सबके बस
का बात नहीं होता किसी को टिकट नहीं मिला
किसी को सीट नहीं मिली किसी को बीजेपी ने

लालच दे दिया किसी को बीजेपी ने डरा दिया
वो सारे छोड़कर भागेंगे और इस बात से नेता
के ऊपर आवाज नहीं उठाई जा सकती इसकी
आलोचना आप नहीं कर सकते हो सकता है किसी
सीट का झगड़ा हो हो सकता है स्वामी प्रसाद
मौर्य किसी और बात से नाराज हो हो सकता है

पल्लवी पटेल किसी और बात से नाराज हो
लेकिन ये सब बैठ कर के लखनऊ में अखिलेश
यादव जी से बात कर सकते हैं और अगर अखिलेश
यादव जी इस बात को नहीं समझ पाएंगे कि अब
भले आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है

लेकिन लीडर वही होता है साहब जो अंतिम
वक्त तक अपने साथियों को अपने साथ रखने
में कामयाब रहे अंतिम वक्त तक अंतिम
गुंजाइश बाकी जो बिक गया जो डर गया जो
लालच में चला गया उसको नहीं रोका जा सकता
विपक्ष के नेता की तरह से वो नहीं रोक

आपके पास रेवड़ थोड़े है य सबको बाट देंगे
लेकिन इस बात की आलोचना जरूर होगी कि जो
आपने निर्णय लिया है उससे बेहतर निर्णय
लिया जा सकता था और यह निर्णय लिया जाना
चाहिए और इस आलोचना में कि एक रा

राष्ट्रीय महासचिव कोई एक बात कहे तो वह
पार्टी की बात हो जाए और जो विचारधारा का
काम करे क्या जितना मौर्या सुनेंगे या
ओबीसी सुनेगा स्वामी प्रसाद मौर्या की बात
और उनके कहने पर पार्टी के साथ आ सकता है
उन में से उन स्वामी प्रसाद मौर्या के

आलोचकों के पास क्या इतनी गुंजाइश है क्या
वह अपने समाज का वोट दिला सकते हैं क्या
वो ओबीसी का वोट दिला सकते हैं किसी का
वोट दिला सकते हैं वह अपना चुनाव जीत सकते
हैं समीकरण से और उनके अपने चुनाव में

उनके अपने विधानसभा और लोकसभा सीटों में
अगर यही पीडीए वोट ना दे तो वो खुद चुनाव
हार जाएंगे क्योंकि उनके अपने लोग बीजेपी
के साथ खड़े और ऐसे ही ओबीसी में भी एक
बहुत बड़ा तबका है जो बीजेपी की तरफ जा

रहा है दलितों में एक बहुत बड़ा का जो
बीजेपी की तरफ जा रहा है ओबीसी और दलित ही
सपा की तरफ आ सकते हैं और जो सवर्ण
समाजवादी मूल्यों और विचारधारा से संविधान
के साथ खड़ा होगा वो तो आपके साथ हमेशा

रहेगा उसको अलग से लाने के लिए खुश करने
के लिए परशुराम का मंदिर और मंदिर की बात
बोलना जरूरी नहीं है वह मंदिर के नाम पर
आपके साथ नहीं है वो मंदिर के नाम पर अगर
वोट देगा तो बीजेपी के साथ जाएगा वो विचार
के नाम पर अगर आपके साथ कल था तो वो आज भी

रहे तो इसलिए पार्टी नेतृत्व के ऊपर यह
चुनौती तो हमेशा रहती है कि वो निर्णय
लेने में कितना सक्त है आज की तारीख में
जया बच्चन जी को य कहा जाना चाहिए जिस
अमिताभ बच्चन को क्या नहीं दिया मुलायम
सिंह यादव जी ने उन्होंने एक ट्वीट नहीं

किया वह खुद आए भी नहीं और रामलला का
दर्शन करने जमीन खरीदने दो बार अयोध्या गए
लखनऊ मिलने तक नहीं गए अखिलेश यादव जी से
यह सवाल तो लोग पूछेंगे जैसे स्वामी
प्रसाद मौर्या से य सवाल पूछेंगे कि
बीजेपी में थे तो क्यों नहीं बोले ये

आलोचना जायज है लेकिन आज बोल रहे हैं ये
उससे गलत नहीं हो जा जाएगी जो आज बोल रहे
हैं उस बात को देखिए उसमें एक भी गलती हो
या एक भी गैर संवैधानिक बात हो या एक भी
विचारधारा से इतर बात हो तब आप स्वमी
प्रसाद मौर्या पर आलोचना कर सकते हैं जो

नहीं है तो एक विस्तार है समाजवादी
राजनीति का तो अखिलेश यादव जी को यह तय
करना पड़ेगा कि आपका वोट किससे बढ़ेगा आप
जीतेंगे किसके दम पर और बीजेपी को कैसे
रोकेंगे जो हर जाति के लोगों को अब टिकट
देकर के राज्यसभा विधानसभा मुख्यमंत्री और

कैबिनेट मंत्री तक बना रही है उस बीजेपी
से लड़ना है इस सारे समीकरणों को देखते
हुए उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगे बहुत
कुछ बदलने वाला है आप भी नजर रखिएगा आपका
क्या मानना है नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर
बताइए फिर मिलेंगे किसी और विशेष साथ तब
तक के लिए बहुत बहुत
धन्यवाद

Leave a Comment