Black And White: समझिए MSP का ABCD? | Minimum Support Prices | Farmers Protest | - instathreads

Black And White: समझिए MSP का ABCD? | Minimum Support Prices | Farmers Protest |

अब इस सवाल पर आते हैं कि भारत में एमएसपी
की व्यवस्था कब और क्यों शुरू हुई थी और
इस पर आज तक किसी सरकार में कोई कानून
क्यों नहीं बना कोई सरकार चाहे किसी की भी

आई हो कांग्रेस की आई हो बीजेपी की आई हो
थर्ड फ्रंट की आई हो किसी ने भी कानून
नहीं बनाया और यह सारी सरकारें यह कहकर
आती थी सत्ता में कि हम गरीबों की सरकार
हैं और हम किसानों की सरकार

हैं आप सबको यह बात जानकर बड़ी हैरानी
होगी कि अगर वर्ष 1964 और 65 में भारत में
सूखा और अकाल ना पड़ा होता और फिर वर्ष
1965 में भारत की पाकिस्तान से जंग ना हुई

होती यानी पाकिस्तान से हमारा युद्ध ना
हुआ होता तो शायद एमएसपी की व्यवस्था
हमारे देश में आती ही नहीं यह वोह दौर था
जब भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी अपनी

जरूरत का अनाज और धान ठीक से उगा नहीं
पाता था और हम इसके लिए काफी हद तक
अमेरिका पर निर्भर रहते थे क्योंकि सारा
अनाज हम अमेरिका से खरीदते थे अमेरिका यह
बात जानता था कि अगर उसने भारत को अनाज का

यह निर्यात रोक दिया तो भारत में बहुत
बड़ा खाद्य संकट पैदा हो जाएगा और इसी वजह
से अमेरिका भारत को काफी नखरे दिखाता था
और हमारा देश भी अपनी जरूरत को देखते हुए

अमेरिका के इन नखरो को चुपचाप सहता रहता
था क्योंकि हमें अमेरिका से अनाज चाहिए था
क्योंकि हम अपना अनाज उगा नहीं सकते थे
इतनी मात्रा में लेकिन वर्ष 1964 और 65

में जब भारत में अकाल पड़ा और इसी दौरान
पाकिस्तान से युद्ध के कारण अमेरिका ने
भारत को आंखें दिखाने की कोशिश की क्योंकि
तब
अमेरिका पाकिस्तान की मदद कर रहा था पीछे

से तब भारत ने खाद्य उत्पादन के मामले में
आत्मनिर्भर बनने का फैसला ले लिया और इसी
मकसद से तब भारत में हरित क्रांति आई इस
हरित क्रांति के जनक मशहूर वैज्ञानिक

डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन थे जिन्होंने यह
फैसला लिया कि पंजाब हरियाणा और पश्चिमी
उत्तर प्रदेश की कृषि भूमि सिंचाई के
लिहाज से बहुत अच्छी है इसलिए हरित

क्रांति इन्हीं राज्यों से भारत में आएगी
हालांकि इस दौरान सरकार के सामने यह
चुनौती भी थी कि वह इन राज्यों के किसानों
को अनाज उगाने के लिए कैसे प्रोत्साहित

करें और आपको याद होगा उस जमाने में एक
नारा दिया जाता था जय जवान जय किसान
क्योंकि उस समय भारत को दो ही लोगों की
जरूरत थी एक जवानों की जो सीमाओं की रक्षा
कर सके और दूसरा किसानों की जो इस देश का

पेट भर सके हमारे अन्नदाता की इसलिए यह
नारा भी तब लगाया गया जय जवान जय
किसान इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए इंदिरा
गांधी की सरकार ने एमएसपी का समाधान

निकाला और किसानों से यह कहा कि अगर वह
अपनी जमीन पर चावल और अनाज की फसल उगाते
हैं तो सरकार उन्हें यह गारंटी देगी कि
उन्हें उनकी फसल का मिनिमम सपोर्ट प्राइस

यानी एमएसपी मिलेगा और यहीं से भारत में
एमएसपी की व्यवस्था लागू हुई तो इसे
इंदिरा गांधी ने लागू किया था क्योंकि यह
उस समय की जरूरत थी समय की मांग थी लेकिन
इस व्यवस्था को लागू करने का मकसद भारत को

खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर
बनाना था और बाद में यही हुआ वर्ष 1980
आते-आते भारत का भारत एक ऐसा देश बन गया
जहां धान और अनाज का इतना उत्पादन होने

लगा कि हम अनाज का आयात करने वाले देश से
अनाज का निर्यात करने वाले देश बन गए मतलब
हमने अपनी जरूरत तो पूरी कर ही ली अब
हमारे पास एक्स्ट्रा अनाज था और आज भी हम
अनाज के मामले में दुनिया के सबसे बड़े

देशों में है जो कि अनाज का प्रोडक्शन
करता है और क्योंकि भारत ने अपने लक्ष्य
की प्राप्ति कर ली थी इसलिए देश में
एमएसपी की व्यवस्था को खत्म करने की मांग

होने लगी और कहा जाने लगा कि जब भारत
खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो
चुका है अब हमारे पास जरूरत से ज्यादा
अनाज पैदा हो रहा है तो फिर एमएसपी की

व्यवस्था बंद क्यों नहीं की जाती लेकिन
क्योंकि इस समय तक हरियाणा पंजाब और
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान
एमएसपी वाली फसलों की खेती ही करने लगे थे
इसलिए एमएसपी इन राज्यों में एक राजनीतिक
मुद्दा बन गया इस पर राजनीति होने लगी इस

पर एक बहुत बड़ा वोट बैंक खड़ा हो गया और
इसमें अलग-अलग सरकारों ने और पार्टियों ने
इन राज्यों के किसानों का वोट हासिल करने
के लिए नई-नई फसलों को एमएसपी की सूची में

शामिल करना शुरू कर दिया शुरुआत में सिर्फ
गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार तय
करती थी सिर्फ गेहूं का बाद में धान इसमें
शामिल हुआ दालें शामिल हो गई और दूसरी

फसलें भी एमएसपी के दायरे में आती चली गई
और यह सब वोटों की राजनीति के लिए उस समय
हो रहा था आज की अगर आप स्थिति देखें तो
आज 22 फसलों पर सरकार एमएसपी दे रही है
यानी सूची जिसमें पहले

सिर्फ अनाज गेहूं था फिर धान हुआ होते
होते वह सूची इतनी बड़ी बन गई कि अब उसमें
22 प्रकार की फसलें हैं यहां एक और बड़ी
बात यह है कि हमारे देश में सिर्फ 6 पर

किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है
सिर्फ 6 पर और इनमें भी जिन किसानों के
पास बड़ी-बड़ी जमीने हैं बड़े-बड़े खेत
हैं वो किसान एमएसपी से से सबसे ज्यादा

लाभान्वित होते हैं और यह बड़े किसान भी
ज्यादातर पंजाब और हरियाणा राज्य से ही
आते हैं इस समय पूरे देश में पंजाब और
हरियाणा के किसानों की आय सबसे ज्यादा है

सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं वो और इससे भी
बड़ी बात यह है कि इन्हीं राज्यों के
किसानों को एमएसपी का सबसे ज्यादा लाभ भी
मिलता है वर्ष 2019 में पंजाब और हरियाणा
में 80 पर से ज्यादा धान और लगभग 70 पर

अनाज की खरीद एमएसपी पर हुई थी जबकि पूरे
देश में में 40 पर से भी कम धान की खरीद
एमएसपी पर हुई यानी पूरे देश में 40 पर की
धान की जो खरीद है वह हो रही है एमएसपी पर
लेकिन हरियाणा और पंजाब में 80 पर हो रही

है और इसी तरह तेलंगाना आंध्र प्रदेश
उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में भी धान की फसल
उगाई जाती है लेकिन इन राज्यों की कुल
मिलाकर सिर्फ 44 पर धान की फसल ही एमएसपी
पर खरीदी जाती है तो यह आंकड़े पूरे देश

के किसानों के हैं जिसमें आप पूरे देश के
के किसानों की तस्वीर एक अलग है तेलंगाना
आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसानों
की तस्वीर अलग है और पंजाब और हरियाणा के
किसानों की तस्वीर अलग है और इससे आप यह

समझ सकते हैं कि जिस पंजाब और हरियाणा से
वर्ष 1966 में एमएसपी की शुरुआत हुई वहां
आज भी किसानों को एमएसपी का सबसे ज्यादा
लाभ मिल रहा है और इसीलिए प्रमुख रूप से

फिलहाल इन्हीं राज्यों के किसान एमएसपी पर
कानून बनाने की मांग भी कर रहे हैं
हालांकि अब आपके मन में यह सवाल भी जरूर
आएगा कि जब 22 फसलों के लिए एमएसपी की
व्यवस्था पहले से ही चल रही है और इससे

सबसे ज्यादा फायदा भी पंजाब और हरियाणा के
इन्हीं किसानों को हो रहा है तो फिर इन
राज्यों के किसान इस एमएसपी पर कानून
बनाने की जिद पर क्यों अड़े
हैं तो इसका जवाब यह है कि जब सरकार किसी

फसल का एमएसपी तय करती है तो इसका मतलब यह
नहीं होता कि उस एमएसपी पर सरकार ही
किसानों से उनकी फसल खरीदने के लिए बाध्य
है सरकार बाध्य नहीं है सरकार तो सिर्फ यह
कहती है कि उक्त फसल का एमएसपी इतना होना

चाहिए या एमएसपी इतनी कीमत से कम नहीं
होना चाहिए इसीलिए इसको कहते हैं मिनिमम
सपोर्ट प्राइस यानी इतना पैसा तो किसान को
मिलना ही चाहिए बाजार में और जब यह एमएसपी

सरकार द्वारा तय हो जाता है तो किसान अपने
राज्य की एपीएमसी मंडियों में अपनी फसल को
इस एमएसपी पर बेचने के लिए ले जाते हैं और
अगर फिर भी मंडियों में किसानों को उनकी

फसल पर यह एमएसपी नहीं मिलता यह दाम नहीं
मिलता तो वह फिर सरकार के पास जाते हैं और
सरकार से कहते हैं कि वह एमएसपी पर उनसे
उनकी फसलों को खरीदे और यहां सरकार का

मतलब होता है फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया
यानी एफसीआई यानी सरकार एफसीआई के जरिए इन
फसलों को खरीदती
है एफसीआई किसानों से उनकी फसलों को
एमएसपी पर खरीदकर इन फसलों को अपने

गोदामों में रखता है और बाद में यही अनाज
और धान देश में वि जो है वह बांटा जाता है
इसका वितरण होता है जैसे आजकल आप जानते
हैं कि हमारे देश में 80 करोड़ लोगों
को सरकार मुफ्त में और सस्ती दरों पर अनाज

उपलब्ध करा रही है आपने भी देखा होगा 80
करोड़ लोगों को अनाज हमारे देश में मिलता
है वो अनाज कहां से आता है वो अनाज आता है
फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से और एफसीआई के

पास अनाज कहां से आता है वो अनाज आता है
इन किसानों से क्योंकि एफसीआई इन किसानों
से इन मंडियों से एमएसपी पर इस अनाज को
खरीदता है और उसके बाद इस अनाज को सरकार
की अलग-अलग योजनाओं के तहत देश में लोगों

को वितरित किया जाता है उन्हें बांटा जाता
है आसान भाषा में कहें तो पहले किसान
मंडियों में एमएसपी पर फसल बेचने जाते हैं
जब मंडियों में उन्हें उनकी फसल का एमएसपी
नहीं मिलता तो वह एफसीआई के पास जाते हैं

और क्योंकि सरकारों को देश के करोड़ों
लोगों को मुफ्त में राशन वितरण करना होता
है अनाज देना होता है इसलिए सरकार एमएसपी
पर किसानों से उनकी ये फसल खरीद लेती है
लेकिन इसमें एक चुनौती यह है कि किसान इस

खरीद में घोटाले का भी आरोप लगाते हैं और
घोटाला कैसे होता है देखिए किसानों का
आरोप है कि कई बार एफसीआई के अधिकारी
तुरंत उनकी फसल को नहीं खरीदते और इस
प्रक्रिया में समय लगने की वजह से फिर

किसानों को मंडियों में जाना पड़ता है और
मंडियों में जो बिचौलिए होते हैं वह
किसानों से कहते हैं कि अगर उन्हें इन
सारे झंझट से बचना है यह जो लंबा प्रोसेस

है इससे बचना है तो वह एमएसपी से थोड़े कम
दाम में यह फसल बिचौलियों को बेच दें और
क्योंकि किसान एफसीआई केंद्रों पर धक्के
खाने से बचना चाहते हैं सरकारी प्रक्रिया

से बचना चाहते हैं इसलिए वह बिचौलियों के
साथ एमएसपी से कम दाम पर अपनी फसल को
बेचने का सौदा कर लेते हैं या कह लीजिए
मजबूर हो जाते हैं लेकिन आरोप है कि बाद

में इन्हीं बिचौलियों से उसी एमएसपी पर
यही फसल एफसीआई के गोदामों में खरीद ली
जाती है या यही फसल एमएसपी पर बाद में
एफसीआई के गोदामों में पहुंच जाती है

लेकिन किसान तब तक इसे सस्ते में बेच चुका
होता है बड़ी बात यह है कि फिलहाल एमएसपी
पर कोई कानून नहीं है इसलिए एमएसपी होते
हुए भी सरकार और मंडियां एमएसपी पर
किसानों से उनकी फसलें खरीदने के लिए

बाध्य नहीं होती और इसीलिए अब किसान इस पर
एक राष्ट्रीय कानून की मांग कर रहे हैं
ताकि सरकार बाध्य हो जाए कि उसे किसानों
से इस दाम पर उसकी फसल खरीदनी ही पड़ेगी
यह चाहते हैं
किसान

जल
रहीस के गोले छोड़े जाने लगे किसान बड़ी
संख्या में मजूद है और उनको करने के
लिए बड़ी संख्या में के गोले छोड़े जा रहे
हैं ड्रोन से नजर रखी जा रही
है
अब एमएसपी पर हो रही इस राजनीति को आप कुछ

आंकड़ों के जरिए भी समझ सकते हैं और
समझाते हैं आपको वर्ष 2004 से 2014 के बीच
10 वर्षों में यूपीए की सरकार ने देश के
किसानों से उनकी लगभग 55 करोड़ टन फसल
एमएसपी पर खरीदी थी जिसके लिए सरकार ने

किसानों को 55 लाख करोड़ रुपए का भुगतान
किया था अब इसकी तुलना में देखिए मोदी
सरकार ने क्या किया
मोदी सरकार ने इन 9 वर्षों में एमएसपी पर

फसलों की यही खरीद 37 पर बढ़ गई यानी मोदी
सरकार ने यूपीए सरकार के मुकाबले 35 पर
ज्यादा फसलों की खरीददारी की इस एमएसपी पर
और पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार ने 75
करोड़ टन फसल एमएसपी पर खरीदी है जिसके

लिए देश के किसानों को 18 39000 करोड़ का
भुगतान हुआ है तो दोनों सरकारों के जो
10-10 साल के कार्यकाल रहे हैं मोदी सरकार
का कार्यकाल लगभग 9 साल का रहा है तो
यूपीए सरकार के कार्यकाल में 5.5 लाख

करोड़ रए का भुगतान हुआ किसानों को और
एनडीए की सरकार में यानी मोदी सरकार में
यह 55 लाख करोड़ का जो भुगतान है यह बढ़कर
हो गया
18.3 लाख करोड़ का इसी तरह यूपी की सरकार

में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर
लगभग 000 करोड़ खर्च हुए लेकिन मोदी सरकार
में सिर्फ इसी योजना के बजट में 136 पर की
वृद्धि हुई और यह खर्च 6000 करोड़ से
बढ़कर 15 511 करोड़ रपए पहुंच गया यूपीए

सरकार में कृषि मंत्रालय का जो बजट होता
था जिसे हम कृषि बजट कहते हैं वह लगभग
27000 करोड़ रप था जो अब मोदी सरकार में
125000 करोड़ रप हो गया है तो देखिए यूपीए
सरकार में 27000 करोड़ और एनडीए सरकार में
सवा लाख

करोड़ यूपी की सरकार में किसानों को हर
साल 000 की सम्मान निधि राशि नहीं मिलती
थी लेकिन मोदी सरकार इस समय देश के 11
करोड़ से ज्यादा किसानों को हर साल ₹ ज
सीधे उनके बैंक खातों में भेज रही है

लेकिन फिर भी पंजाब के किसान आज आंदोलन कर
रहे हैं और वह यह कहते हैं कि इसके अलावा
उन्हें 0000 की पेंशन भी चाहिए और एमएसपी
पर उन्हें एक नया कानून भी चाहिए

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