Black And White Full Episode: MSP कानून से देश में महंगाई 25% बढ़ जाएगी? | Farmers | - instathreads

Black And White Full Episode: MSP कानून से देश में महंगाई 25% बढ़ जाएगी? | Farmers |

आज प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई की राजधानी
आबूधाबी में पहले हिंदू मंदिर का उद्घाटन
किया है और इस भव्य मंदिर के गर्भ ग्रह
में स्थापित अक्षर पुरुषोत्तम महाराज की
प्रतिमा को पुष्पांजलि अर्पित की और वह
वहां इस मंदिर की वैश्विक आरती में भी आज
शामिल हुए हैं तस्वीरें आप

देखिए
सात
शिखर 12
सामर 402 स्तंभों से बना
यह बीएपीएस हिंदू
मंदिर अपने
आप आकर्षक और प्रभाव
है आप में से बहुत सारे लोगों को शायद अभी
यह पता नहीं होगा कि आबूधाबी में बना यह
मंदिर किस भगवान का है और इस भव्य मंदिर
के गर्भ ग्रह में जिन दो प्रतिमाओं की आज

प्राण प्रतिष्ठा हुई है वह प्रतिमाएं
किसकी है तो यह मंदिर स्वामी नारायण जी का
है जिनका जन्म वर्ष 1781 में अयोध्या के
पास छपिया नाम के एक गांव में हुआ था और
उनका मूल नाम घनश्याम पांडे था घनश्याम

पांडे वेदों और परंपराओं के महान ज्ञाता
थे और स्वामी रामानंद ने उन्हें अपना
उत्तराधिकारी घोषित किया था और उन्हें एक
नया नाम दिया था और यह नाम था स्वामी
सहजानंद स्वामी सहजानंद जब गुजरात पहुंचे

तब उन्होंने एक अलग संप्रदाय की स्थापना
की जिसे श्री स्वामीनारायण संप्रदाय कहा
गया और यहीं से लोग श्री स्वामी सहजानंद
को भगवान का अवतार मानने लगे और उन्हें
लोगों ने एक नया नाम दे दिया और यह नाम था

श्री स्वामी नारायण और आज पूरी दुनिया में
50 लाख से ज्यादा लोग स्वामीनारायण
संप्रदाय में विश्वास रखते हैं आस्था रखते
हैं और श्री स्वामीनारायण जी को भगवान की

तरह पूजते हैं और आबूधाबी में बना यह भव्य
मंदिर भी स्वामीनारायण जी का ही है जिसमें
हिंदू देवी देवताओं के प्रतिमा को भी
स्थापित किया गया है और वहां रहने वाले
हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ी बात है

हालांकि इस मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह में
जिन दो प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा हुई
है उनमें एक प्रतिमा श्री स्वामीनारायण जी
की है और दूसरी प्रतिमा उनके प्रमुख शिष्य
की है जिन्हें गुणातिता अंद कहते हैं और

जिस संस्था ने 700 करोड़ रुपए की लागत से
इस मंदिर का निर्माण करवाया है उस संस्था
के पहले गुरु गुणातिता अंद जी ही थे जिनकी
प्रतिमा को इस मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह
में स्थापित किया गया है और इस समय पूरी

दुनिया में श्री स्वामीनारायण जी के 1100
से ज्यादा मंदिर हैं और दिल्ली का मशहूर
और भव्य अक्षरधाम मंदिर भी श्री स्वामी
नारायण का मंदिर ही
है तो आबूधाबी से इस मंदिर में जो प्राण

प्रतिष्ठा हुई है जो पूरा कार्यक्रम है वह
अब आप देख चुके हैं अब हम आपको एमएसपी की
उस एबी सीडी के बारे में बताएंगे जिसकी
वजह से पंजाब के किसान एक बार फिर से

सड़कों पर हैं और इस आंदोलन को देखते हुए
राहुल गांधी ने यह ऐलान किया है कि अगर
लोकसभा के चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी
की सरकार बनती है अगर यह चुनाव कांग्रेस
पार्टी जीतती है तो वह देश के सभी 15

करोड़ किसानों के लिए एमएसपी पर
स्वामीनाथन आयोग की उस सिफारिश को लागू कर
देंगे जिसके लिए अभी किसान आंदोलन कर रहे
हैं तो आज आप सबके लिए य जानना बहुत जरूरी
है कि किसान आंदोलन कर क्यों रहे हैं इनकी

सबसे बड़ी मांग क्या है और उस मांग को
लागू करने में क्या अड़चन है तो यह जो
पूरा आंदोलन है उसमें सबसे बड़ी मांग
किसानों की है एमएसपी की मांग एमएसपी को
लेकर सरकार बाकायदा एक कानून बनाए और आपको

यह समझ में आना चाहिए आज कि यह एमएसपी की
राजनीति क्या है और एमएसपी का पूरा एबी
सीडी क्या है किसान क्यों चाहते हैं इस
एमएसपी को
राहुल गांधी असल में जिस सिफारिश को लागू

करने की इस बार गारंटी दे रहे हैं वह
सिफारिश यूपी की सरकार में स्वामीनाथन
आयोग ने ही की थी और बड़ी बात यह है कि उस
समय यूपीए सरकार ने इस सिफारिश को लागू
करने से इंकार कर दिया था और तब यह कहा था

कि यह सिफारिश व्यावहारिक नहीं है इसलिए
इसे लागू नहीं किया जा
सकता वर्ष 2010 में यूपीए की सरकार ने
राज्यसभा में यह बताया था कि केंद्र सरकार
स्वा स्वामीनाथन आयोग की उस सिफारिश को

लागू नहीं कर सकती जिसमें यह लिखा है कि
किसी भी फसल का एमएसपी उसकी लागत का डेढ़
गुना यानी 50 पर ज्यादा होना चाहिए तो मैं
आपको वह कागज आज पढ़कर सुनाता हूं और यह

मैंने राज्यसभा में जो प्रश्न पूछे जाते
हैं और फिर सरकार जो जवाब देती है वह पेपर
आज मैं अपने साथ लेकर आया हूं और इसी में
से पढ़कर मैं आपको बताऊंगा अब
देखिए यह 164

2010
को बीजेपी के सांसद प्रकाश जावड़ेकर
उन्होंने यह सवाल
पूछा और सवाल में
उन्होंने जो
कहा वेदर गवर्नमेंट हैज एक्सेप्टेड

रिकमेंडेशंस ऑफ स्वामीनाथन कमीशन
रिगार्डिंग कैलकुलेशन ऑफ रिमुनरेटिव
प्राइसेस टू बी पेड टू फार्मर्स अब देखिए
जवाब में श्री केवी थॉमस जो उस समय कृषि
मंत्री थे उन्होंने क्या जवाब

दिया उन्होंने लिखा द नेशनल कमीशन ऑन
फार्मर्स अंडर द चेयरमैनशिप ऑफ प्रोफेसर
एम एस स्वामीनाथन हैज
रिकमेंडेटरी 50 पर मोर देन द वेटेड एवरेज
कॉस्ट ऑफ

प्रोडक्शन द रिकमेंडेशन हाउ एवर अब यहां
आप ध्यान से सुनिए सरकार कह रही है यूपी
की सरकार दिस रिकमेंडेशन हाउ एवर हैज नॉट
बीन एक्सेप्टेड बाय द गवर्नमेंट बिकॉज़

एमएसपी इज रेकमेंडेड बाय द कमीशन फॉर
एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस बेस्ड
ऑन ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया एंड कंसीडरिंग
वैराइटी ऑफ रिलेवेंट फैक्टर्स हेंस
प्रिसक्राइब एन इंक्रीज ऑफ एटलीस्ट 50 पर

ऑन कॉस्ट मे डिस्टोर्ट द मार्केट अ
मैकेनिकल लिंकेज बिटवीन एमएसपी एंड द
कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन मे बी काउंटर
प्रोडक्टिव इन सम
केसेस यूपीए सरकार के इसी जवाब को आधार

बनाते हुए बीजेपी ने अब कांग्रेस पर
किसानों से झूठा वादा करने का आरोप लगाया
है और कहा है कि कांग्रेस पार्टी एमएसपी
पर देश के किसानों को भ्रमित कर रही है और
बीजेपी का यह कहना है कि जब आपकी सरकार थी

तब तो आपने यह कह दिया कि एमएसपी को लागू
करना व्यावहारिक नहीं है इससे बाजार खराब
हो जाएगा और अब आप कहते हैं कि अगर हमारी
सरकार आ गई तो हम एमएसपी लागू कर देंगे
जबकि कांग्रेस का कहना है कि यूपीए की

सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की 201
सिफारिशों में से सबसे ज्यादा 175
सिफारिशों को मान लिया था 175 सिफारिशों
को लागू भी कर दिया था और वो अब एमएसपी पर
भी इस आयोग की सिफारिश को लागू करने की
गारंटी देती

है प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री बनने से
पहले 2014 में प्रचार के दौरान ऊंची आवाज
में चिल्लाते हुए कहा था इनपुट कॉस्ट प्लस
50 पर एमएसपी मैं दूंगा 10 साल हो गए इस
बात को क्यों नहीं दे रहे स्वामीनाथन

कमीशन की 201 सिफारिशों में से 175 हमने
लागू की आपके जो रिप्लाई में जो मंत्री जी
ने कहा था उसमें ये कहा था कि इसको देना
पॉसिबल नहीं है इससे मार्केट डिस्टोर्ट हो

जाएगा यही आर्गुमेंट आज बीजेपी की तरफ से
दिया जा रहा हमने पूरा विशेषज्ञों से सलाह
ली है अपने रायपुर अधिवेशन में भी हमने
प्रस्ताव पारित किया था कृषि संबंधित

उसमें भी स्पष्ट अपनी मंशा की थी और अब हम
पूरी तरह से आश्वस्त है कि यह लागू किया
जा सकता है अगर वो कहते हैं कि डब्ल्यूटीओ
में से भारत हट जाए वर्ल्ड ट्रेड

ऑर्गेनाइजेशन से भारत अपने आप को अलग कर
ले वह कहते हैं कि एफटीआर कर दो फ्री
ट्रेड एग्रीमेंट रद्द कर दो वह कहते हैं
स्मार्ट मीटर मत लगाओ वह कहते हैं कि

पराली को जलवायु के क्षेत्र से निकाल दो
कृषि क्षेत्र को निकाल दो इलेक्ट्रिसिटी
अमेंडमेंट बिल में यह बदलाव कर दो अब यह
सारे नए नए मुद्दे जुड़ते जा रहे हैं
हमारा केवल इतना कहना है कि हम इन विषयों

पर भी चर्चा करने के लिए तैयार है लेकिन
अल अन्य लोगों से बात करनी पड़ेगी राज्य
सरकारों से बात करनी पड़ेगी और कन किसान
संस्थाओं से बात करनी

पड़ेगी तो आगे बढ़ने से पहले मैं आपको एक
बार फिर से बता देता हूं कि कांग्रेस अब
कहती है कि पहले उन्होंने उनकी राय अलग थी
और अब उनकी राय अलग है पहले जब उन्होंने

जवाब दिया था जब उनकी सरकार थी तो वह कहते
थे कि प्रिसक्राइब एन इंक्रीज ऑफ एटलीस्ट
50 पर ऑन कॉस्ट मे डिस्टोर्ट द मार्केट
फिर कहते थे अ मैकेनिकल लिंकेज बिटवीन

एमएसपी एंड कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन मे बी
काउंटर प्रोडक्टिव इन सम केसेस लेकिन अब
कांग्रेस के नेता कहते हैं कि अब उन्होंने
अपना होमवर्क अच्छे से कर लिया है और अब

उन्हें ऐसा लगता है कि यह लागू किया जा
सकता है यानी पहले जब उनकी सरकार थी तो
उन्हें लगता था नहीं किया जा सकता क्योंकि
संसद में लिखकर वह दे रहे हैं यह बात और

अब वह उनका उनका यह मानना है कि अब इसे
लागू किया जा सकता है इसलिए अगर उनकी
सरकार आई तो वह इसे लागू कर देंगे अब आप
यह देखिए कि हमारे देश में स्वामीनाथन

आयोग की जिस सिफारिश पर इतना विवाद हो रहा
है वह सिफारिश इस एमएसपी के बारे में क्या
कहती है यह सारे लोग आज स्वामीनाथन आयोग
की बात क्यों कर रहे हैं और स्वामीनाथन

आयोग ने असल में ऐसा क्या कह दिया था
जिससे लेकर किसान भी इतने इमोशनल हैं और
सरकारें भी अलग-अलग तरह की बातें कर रही
हैं तो अब आप वह भी समझ लीजिए वर्ष 2006
में जब डॉक्ट एम एस स्वामीनाथन की

अध्यक्षता में बने एक आयोग ने यूपीए सरकार
को अपनी रिपोर्ट सौंपी तब उस रिपोर्ट में
सबसे बड़ी सिफारिश इस एमएसपी को लेकर ही
की गई थी जिसमें यह बताया गया था कि सरकार
किस फार्मूले के तहत फसलों का न्यूनतम

समर्थन मूल्य तय कर सकती है उसका फार्मूला
बताया गया इस आयोग ने सरकार को कुल मिलाकर
तीन फॉर्मू के बारे में बताया था जिनमें
से एक फार्मूले को कहते हैं a2 जिसका मतलब

होता है एग्रीकल्चर कॉस्ट दूसरे फार्मूले
को a2 प् ए ए कहते हैं जिसका मतलब होता है
एग्रीकल्चरल कॉस्ट प्लस फार्मर लेबर और
तीसरे फार्मूले को कहते हैं c2 जिसका मतलब

होता है कंप्रिहेंसिव कॉस्ट तो ए2
फार्मूला का मतलब यह है कि सरकार को फसलों
की लागत के आधार पर उसका एमएसपी तय करना
चाहिए तो मतलब जितनी भी लागत जितना भी

पैसा किसान ने खर्च किया है उस फसल को
उगाने में उसके आधार पर एमएसपी तय होना
चाहिए पहला फार्मूला यह है लागत किसान की
जो है वो निकलनी चाहिए दूसरा फार्मूला है

a2 प् एफ ए इस फार्मूले का मतलब यह है कि
सरकार फसल की लागत के साथ-साथ उस फसल को
उगाने के लिए किसानों ने जो मजदूरी की है
उस मजदूरी के हिसाब से फसल का एमएसपी तय
करना चाहिए ए2 प्लस

एफएल तो यानी जो किसान मजदूरी कर रहा है
जो उसका लेबर है उसकी भी तो कोई कीमत होगी
इसलिए किसान को उसका लेबर की जो कॉस्ट है
मजदूरी की जो कीमत है वो मिलनी चाहिए और
जो उसने अपने जेब से पैसा लगाया है लागत

वो मिलनी चाहिए तीसरा फार्मूला है
जिसमें आयोग यह कहता है कि फसलों के
एमएएसपी में किसान की लागत और उसकी मजदूरी
के साथ-साथ उस जमीन की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट
भी शामिल होनी चाहिए जिस जमीन पर वह फसल

उगाई गई है यानी जमीन का जो किराया है वो
भी शामिल होना चाहिए अपॉर्चुनिटी कॉस्ट का
मतलब है कि जिस जमीन पर फसल उगाने की बजाय
कोई दूसरा काम कर लेने से किसानों को लाभ
होता उस लाभ को भी एमएसपी में शामिल किया

जाए और यही वजह है कि हमारे देश के किसान
इस तीसरे फार्मूले के तहत फसलों का एमएसपी
तय करने की मांग कर रहे हैं तीसरा
फार्मूला मतलब कि उनकी जो लागत है वह भी

मिले उन्होंने जो मजदूरी की है लेबर किया
है उसका पैसा भी मिले और जिस जमीन पर
वह यह फसलें पैदा कर रहे हैं उगा रहे हैं

उस जमीन की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट एक तरीके से
आप कह लीजिए उस जमीन का किराया भी उन्हें
मिलना चाहिए यह तीनों चीजें उन्हें चाहिए
और आज भी आंदोलनकारी किसान यही मांग कर

रहे हैं कि उनकी लागत उनकी मजदूरी और फिर
उनकी जमीन का
भाड़ा हालांकि आज आपको यह भी समझना चाहिए
कि कानून बनाकर किसानों को एमएसपी की
गारंटी देने में आखिर सरकार को क्या

परेशानी है फिलहाल केंद्र सरकार जिस
फार्मूले के आधार पर हमारे देश में 22
फसलों का एमएसपी तय करती है वह एमएसपी
किसानों द्वारा मांगे जाने वाले एमएसपी से
25 से 30 पर कम होता है लेकिन आज अगर

सरकार ने किसानों की मांगों को मान लिया
तो इससे इन फसलों का एमएसपी 25 से 30 पर
बढ़ जाएगा क्योंकि किसान चाह रहे हैं कि
उन्हें ऊंचे दाम का एमएसपी मिले और ऊंचा
दाम कितना जो सरकार दे रही है उससे कम से

कम 25 से 30 पर ज्यादा अब सोचिए अगर फसलों
का यह एमएसपी बढ़ा तो इससे बाजार में इन
फसलों की कीमत बढ़ेगी खाने पीने का सामान
जो इन फसलों से बनता है उसकी कीमत भी बढ़
जाएगी और खाने पीने की जो वस्तुएं हैं

उनकी महंगाई भी 25 से 30 पर तक बाजार में
बढ़ जाएगी इसलिए आज एक बड़ा सवाल ये भी है
जो जो सबको सोचना होगा कि क्या हमारा देश
और आप लोग महंगाई में 25 से 30 पर की

वृद्धि के लिए तैयार हैं क्योंकि जैसे ही
अनाज 25 से 30 पर महंगा होगा उस अनाज से
जितनी भी वस्तुएं खाने पीने की बनती हैं
वो भी स्वतः उतनी ही महंगी हो जाएंगी और
इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर सरकार ने

एमएसपी पर किसानों की मांग मान ली तो इससे
सरकार का 10 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त
खर्च बढ़ेगा जो हमारे रक्षा बजट से भी
कहीं ज्यादा है हमारा रक्षा बजट है 6
21000 करोड़ रपए का और अगर सरकार यह

एमएसपी देती है तो इसका खर्च आएगा 10 लाख
हजार करोड़ रुपए का यह देख लीजिए 10 लाख
करोड़ 10 लाख करोड़ माफ कीजिएगा 10 लाख
करोड़ का अतिरिक्त खर्चा आएगा और रक्षा

बजट है हमारा 6 21000 करोड़ का अब इस सवाल
पर आते हैं कि भारत में एमएसपी की
व्यवस्था कब और क्यों शुरू हुई थी और इस
पर आज तक किसी सरकार में कोई कानून क्यों
नहीं बना कोई सरकार चाहे किसी की भी आई हो

कांग्रेस की आई हो बीजेपी की आई हो थर्ड
फ्रंट की आयु हो किसी ने भी कानून नहीं
बनाया और यह सारी सरकारें यह कहकर आती थी
सत्ता में कि हम गरीबों की सरकार हैं और
हम किसानों की सरकार

है आप सबको यह बात जानकर बड़ी हैरानी होगी
कि अगर वर्ष 1964 और 65 में भारत में सूखा
और अकाल ना पड़ा होता और फिर वर्ष 1965
में भारत की पाकिस्तान से जंग ना हुई होती
यानी पाकिस्तान से हमारा युद्ध ना हुआ

होता तो शायद एमएसपी की व्यवस्था हमारे
देश में आती ही नहीं यह वो दौर था जब भारत
कृषि प्रधान देश होते हुए भी अपनी जरूरत
का अनाज और धान ठीक से उगा नहीं पाता था
और हम इसके लिए काफी हद तक अमेरिका पर

निर्भर रहते थे क्योंकि सारा अनाज हम
अमेरिका से खरीदते थे अमेरिका यह बात
जानता था कि अगर उसने भारत को अनाज का यह
निर्यात रोक दिया तो भारत में बहुत बड़ा
खाद्य संकट पैदा हो जाएगा और इसी वजह से

अमेरिका भारत को काफी नखरे दिखाता था और
हमारा देश भी अपनी जरूरत को देखते हुए
अमेरिका के इन नखरो को चुपचाप सहता रहता
था क्योंकि हमें अमेरिका से अनाज चाहिए था

क्योंकि हम अपना अनाज उगा नहीं सकते थे
इतनी मात्रा में लेकिन वर्ष 1964 और 65
में जब भारत में अकाल पड़ा और इसी दौरान
पाकिस्तान से युद्ध के कारण अमेरिका ने

भारत को आंखें दिखाने की कोशिश की क्योंकि
तब अमेरिका पाकिस्तान की मदद कर रहा था
पीछे से तब भारत ने खाद्य उत्पादन के
मामले में आत्मनिर्भर बनने का फैसला ले
लिया और इसी मकसद से तब भारत में हरित

क्रांति आई इस हरित क्रांति के जनक मशहूर
वैज्ञानिक डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन थे
जिन्होंने यह फैसला लिया कि पंजाब हरियाणा
और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि भूमि
सिंचाई के लिहाज से बहुत अच्छी है इसलिए

हरित क्रांति इन्हीं राज्यों से भारत में
आएगी हालांकि इस दौरान सरकार के सामने यह
चुनौती भी थी कि व इन राज्यों के किसानों
को अनाज उगाने के लिए कैसे प्रोत्साहित

करें और आपको याद होगा उस जमाने में एक
नारा दिया जाता था जय जवान जय किसान
क्योंकि उस समय भारत को दो ही लोगों की
जरूरत थी एक जवानों की जो सीमाओं की रक्षा

कर सके और दूसरा किसानों की जो इस देश का
पेट भर सके हमारे अन्नदाता की इसलिए यह
नारा भी तब लगाया गया जय जवान जय
किसान इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए इंदिरा

गांधी की सरकार ने एमएसपी का समाधान
निकाला और किसान से यह कहा कि अगर वह अपनी
जमीन पर चावल और अनाज की फसल उगाते हैं तो
सरकार उन्हें यह गारंटी देगी कि उन्हें

उनकी फसल का मिनिमम सपोर्ट प्राइस यानी
एमएसपी मिलेगा और यहीं से भारत में एमएसपी
की व्यवस्था लागू हुई तो इसे इंदरा गांधी
ने लागू किया था क्योंकि यह उस समय की

जरूरत थी समय की मांग थी लेकिन इस
व्यवस्था को लागू करने का मकसद भारत को
खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर
बनाना था और बाद में यही हुआ वर्ष 1980

आते-आते भारत का भारत एक ऐसा देश बन गया
जहां धान और अनाज का इतना उत्पादन होने
लगा कि हम अनाज का आयात करने वाले देश से
अनाज का निर्यात करने वाले देश बन गए मतलब
हमने अपनी जरूरत तो पूरी कर ही ली अब

हमारे पास एक्स्ट्रा अनाज था और आज भी हम
अनाज के मामले में दुनिया के सबसे बड़े
देशों में हैं जो कि अनाज का प्रोडक्शन
करता है और क्योंकि भारत ने अपने लक्ष की

प्राप्ति कर ली थी इसलिए देश में एमएसपी
की व्यवस्था को खत्म करने की मांग होने
लगी और कहा जाने लगा कि जब भारत खाद्य
उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका
है अब हमारे पास जरूरत से ज्यादा अनाज

पैदा हो रहा है तो फिर एमएसपी की व्यवस्था
बंद क्यों नहीं की जाती लेकिन क्योंकि इस
समय तक हरियाणा पंजाब और पश्चिमी उत्तर
प्रदेश के ज्यादातर किसान एमएसपी वाली

फसलों की खेती ही करने लगे थे इसलिए
एमएसपी इन राज्यों में एक राजनीतिक मुद्दा
बन गया इस पर राजनीति होने लगी इस पर एक
बहुत बड़ा वोट बैंक खड़ा हो गया और इसमें
अलग-अलग सरकारों ने और पार्टियों ने इन

राज्यों के किसानों का वोट हासिल करने के
लिए नई-नई फसलों को एमएसपी की सूची में
शामिल करना शुरू कर दिया शुरुआत में सिर्फ
गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार तय
करती थी सिर्फ गेहूं का बाद में धान इसमें

शामिल हुआ दालें शामिल हो गई और दूसरी
फसलें भी एमएसपी के दायरे में आती चली गई
और यह सब वोटों की राजनीति के लिए उस समय
हो रहा था आज की अगर आप स्थिति देखें तो
आज 22 फसलों पर सरकार एमएसपी दे रही है है

यानी सूची जिसमें पहले
सिर्फ अनाज गेहूं था फिर धान हुआ
होते-होते वह सूची इतनी बड़ी बन गई कि अब
उसमें 22 प्रकार की फसलें हैं यहां एक और

बड़ी बात यह है कि हमारे देश में सिर्फ 6
पर किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है
सिर्फ 6 पर और इनमें भी जिन किसानों के
पास बड़ी-बड़ी जमीनें हैं बड़े-बड़े खेत
हैं व किसान एमएसपी से सबसे ज्यादा

लाभान्वित होते हैं और यह बड़े किसान भी
ज्यादातर पंजाब और हरियाणा राज्य से ही
आते हैं इस समय पूरे देश में पंजाब और
हरियाणा के किसानों की आय सबसे ज्यादा है
सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं वो और इससे भी

बड़ी बात यह है कि इन्हीं राज्यों के
किसानों को एमएसपी का सबसे ज्यादा लाभ भी
मिलता है वर्ष 2019 में पंजाब और हरियाणा
में 80 पर से ज्यादा धान और लगभग 70 पर
अनाज की खरीद एमएसपी पर हुई थी जबकि पूरे

देश में 40 पर से भी कम धान की खरीद
एमएसपी पर हुई यानी पूरे देश में 40 पर की
धान की जो खरीद है वह हो रही है एमएसपी पर
लेकिन हरियाणा और पंजाब में 80 पर हो रही
है और इसी तरह तेलंगाना आंध्र प्रदेश

उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में भी धान की फसल
उगाई जाती है लेकिन इन राज्यों की कुल
मिलाकर सिर्फ 44 पर धान की फसल ही एमएसपी
पर खरीदी जाती है तो यह आंकड़े पूरे देश
के किसानों के हैं जिसमें आप पूरे देश के
किसानों की तस्वीर एक अलग है तेलंगाना

आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसानों
की तस्वीर अलग है और पंजाब और हरियाणा के
किसानों की तस्वीर अलग है और इससे आप यह
समझ सकते हैं कि जिस पंजाब और हरियाणा से
वर्ष 1966 में एमएएसपी की शुरुआत हुई वहां

आज भी किसानों को एमएसपी का सबसे ज्यादा
लाभ मिल रहा है और इसीलिए प्रमुख रूप से
फिलहाल इन्हीं राज्यों के किसान एमएसपी पर

कानून बनाने की मांग भी कर रहे हैं
हालांकि यहां अब आपके मन में यह सवाल भी
जरूर आएगा कि जब 22 फसलों के लिए एमएसपी
की व्यवस्था पहले से ही चल रही है और इससे

सबसे ज्यादा फायदा भी पंजाब और हरियाणा के
इन्हीं किसानों को हो रहा है तो फिर इन
राज्यों के किसान इस एमएसपी पर कानून
बनाने की जिद पर क्यों अड़े

हैं तो इसका जवाब यह है कि जब सरकार किसी
फसल का एमएसपी तय करती है तो इसका मतलब यह
नहीं होता कि उस एमएसपी पर सरकार ही
किसानों से उनकी फसल खरीदने के लिए बाध्य

है सरकार बाध्य नहीं है सरकार तो सिर्फ यह
कहती है कि उक्त फसल का एमएसपी इतना होना
चाहिए या एमएसपी इतनी कीमत से कम नहीं
होना चाहिए इसीलिए इसको कहते हैं मिनिमम

सपोर्ट प्राइस यानी इतना पैसा तो किसान को
मिलना ही चाहिए बाजार में और जब यह एमएसपी
सरकार द्वारा तय हो जाता है तो किसान अपने
राज्य की एपीएमसी मंडियों में अपनी फसल को
इस एमएसपी पर बेचने के लिए ले जाते हैं और

अगर फिर भी मंडियों में किसानों को उनकी
फसल पर यह एमएसपी नहीं मिलता यह दाम नहीं
मिलता तो वह फिर सरकार के पास जाते हैं और
सरकार से कहते हैं कि वो एमएसपी पर उनसे

उनकी फसलों को खरीदे और यहां सरकार का
मतलब होता है फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया
यानी एफसीआई यानी सरकार एफसीआई के जरिए इन
फसलों को खरीदती
है एफसीआई किसानों से उनकी फसलों को

एमएसपी पर खरीदकर इन फसलों को अपने
गोदामों में रखता है और बाद में यही अनाज
और धान देश में जो है वो बांटा जाता है
इसका वितरण होता है जैसे आजकल आप जान ते

हैं कि हमारे देश में 80 करोड़ लोगों
को सरकार मुफ्त में और सस्ती दरों पर अनाज
उपलब्ध करा रही है आपने भी देखा होगा 80
करोड़ लोगों को अनाज हमारे देश में मिलता
है वो अनाज कहां से आता है वो अनाज आता है

फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से और एफसीआई के
पास अनाज कहां से आता है वो अनाज आता है
इन किसानों से क्योंकि एफसीआई इन किसानों
से इन मंडियों से एमएसपी पर इस अनाज को
खरीदता है और उसके बाद इस अनाज को सरकार

की अलग-अलग योजनाओं के तहत देश में लोगों
को वितरित किया जाता है उन्हें बांटा जाता
है आसान भाषा में कहे तो पहले किसान
मंडियों में एमएसपी पर फसल बेचने जाते हैं
जब मंडियों में उन्हें उनकी फसल का एमएसपी

नहीं मिलता तो वह एफसीआई के पास जाते हैं
और क्योंकि सरकारों को देश के करोड़ों
लोगों को मुफ्त में राशन वितरण करना होता
है अनाज देना होता है इसलिए सरकार एमएसपी

पर किसानों से उनकी यह फसल खरीद लेती है
लेकिन इसमें एक चुनौती यह है कि किसान इस
खरीद में घोटाले का भी आरोप लगाते हैं और
घोटाला कैसे होता है देखिए किसानों का

आरोप है कि कई बार एफसीआई के अधिकारी
तुरंत उनकी फसल को नहीं खरीदते और इस
प्रक्रिया में समय लगने की वजह से फिर
किसानों को मंडियों में जाना पड़ता है और

मंडियों में जो बिचौलिए होते हैं वह
किसानों से कहते हैं कि अगर उन्हें इन
सारे झंझट से बचना है यह जो लंबा प्रोसेस
है इससे बचना है तो वह एमएसपी से थोड़े कम

क्योंकि किसान एफसीआई केंद्रों पर धक्के
खाने से बचना चाहते हैं सरकारी प्रक्रिया
से बचना चाहते हैं इसलिए वह बिचौलियों के
साथ एमएसपी से कम दाम पर अपनी फसल को
बेचने का सौदा कर लेते हैं या कह लीजिए

मजबूर हो जाते हैं लेकिन आरोप है कि बाद
में इन्हीं बिचौलियों से उसी एमएसपी पर
यही फसल एफसीआई के गोदामों में खरीद ली
जाती है या यही फसल एमएसपी पर बाद में
एफसीआई के गोदामों में पहुंच जाती है

लेकिन किसान तब तक इसे सस्ते में बेच चुका
होता है बड़ी बात यह है कि फिलहाल एमस पर
कोई कानून नहीं है इसलिए एमएसपी होते हुए
भी सरकार और मंडियां एमएसपी पर किसानों से
उनकी फसलें खरीदने के लिए बाध्य नहीं होती

और इसीलिए अब किसान इस पर एक राष्ट्रीय
कानून की मांग कर रहे हैं ताकि सरकार
बाध्य हो जाए कि उसे किसानों से इस दाम पर
उसकी फसल खरीदनी ही पड़ेगी यह चाहते हैं
किसान

अभी भी जल रही है
जसे कोई नहीं
कर हरियाणा सरकार इस वक्त जो है आसू गैस
के गोले छोड़े जाने लगे किसान बड़ी संख्या
में आज यहां पर मौजूद है और उनको तितर बतर
करने के लिए बाकायदा कई बड़ी संख्या में
आसू गैस के गोले छोड़े जा रहे ड्रोन से
नजर रखी जा रही
है

अब एमएसपी पर हो रही इस राजनीति को आप
कुछ आंकड़ों के जरिए भी समझ सकते हैं और
समझाते हैं आपको वर्ष 2004 से 2014 के बीच
10 वर्षों में यूपीए की सरकार ने देश के

किसानों से उनकी लगभग 55 करोड़ टन फसल
एमएसपी पर खरीदी थी जिसके लिए सरकार ने
किसानों को 55 लाख करोड़ का भुगतान किया
था अब इसकी तुलना में देखिए मोदी सरकार ने
क्या किया मोदी सरकार ने इन नौ वर्षों में

एमएसपी पर फसलों की यही खरीद % बढ़ गई
यानी मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के
मुकाबले 35 पर ज्यादा फसलों की खरीददारी
की इस एमएसपी पर और पिछले 10 वर्षों में

मोदी सरकार ने 75 करोड़ टन फसल एमएसपी पर
खरीदी है जिसके लिए देश के किसानों को 18
39000 करोड़ का भुगतान हुआ है तो दोनों
सरकारों के जो 10-10 साल के कार्यकाल रहे

हैं मोदी सरकार का कार्यकाल लगभग 9 साल का
रहा है तो यूपीए सरकार के कार्यकाल में
5.5 लाख करोड़ र का भुगतान हुआ किसानों को
और एनडीए की सरकार में यानी मोदी सरकार

में यह 55 लाख करोड़ का जो भुगतान है यह
बढ़कर हो गया
18.3 लाख करोड़ का इसी तरह यूपी की सरकार
में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर

लगभग 6000 करोड़ रुपए खर्च हुए लेकिन मोदी
सरकार में सिर्फ इसी योजना के बजट में 136
पर की वृद्धि हुई और यह खर्च 6000 करोड़
से बढ़कर 15 511 करोड़ रपए पहुंच गया
यूपीए सरकार में कृषि मंत्रालय का जो बजट

होता था जिसे हम कृषि बजट कहते हैं वह
लगभग 27000 करोड़ रुपए था जो अब मोदी
सरकार में 1 25000 करोड़ रुपए हो गया है
तो देखिए यूपीए सरकार में 27000 करोड़ और
एनडीए सरकार में सवा लाख

करोड़ यूपी की सरकार में किसानों को हर
साल 000 की सम्मान निधि राशि नहीं मिलती
थी लेकिन मोदी सरकार इस समय देश के 11
करोड़ से ज्यादा किसानों को हर साल 6000

सीधे उनके बैंक खातों में भेज रही है
लेकिन फिर भी पंजाब के किसान आज आंदोलन कर
रहे हैं और वह यह कहते हैं कि इसके अलावा
उन्हें 0000 की पेंशन भी चाहिए और एमएसपी

पर उन्हें एक नया कानून भी चाहिए हम आपको
पुलवामा के उन शहीद जवानों के बारे में
कुछ बताना चाहते हैं जिन्होंने आज ही के
दिन वर्ष 2019 में हुए एक आतंकवादी हमले

में देश की रक्षा के लिए आप सब की रक्षा
के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी उस
समय पुलवामा के इस हमले में सीआरपीएफ के
40 जवान शहीद हुए थे और यह वो जवान थे
जिनके लिए उनका देश ही उनका वैलेंटाइन था

उनका देश उनका पहला प्यार था और इस देश से
यह शहीद जवान इतना प्रेम करते थे कि उनकी
शहादत के बाद उनका यह प्रेम समाप्त नहीं
हुआ बल्कि यह प्रेम हमेशा के लिए अमर हो

गया यानी इस देश के लिए इन शहीदों का जो
प्रेम है इसे आप अमर प्रेम कह सकते हैं और
किसी ने कहा है कि दुनिया में मिल जाएंगे
आशिक कई पर वतन से हंसी सनम नहीं होता

हीरो में सिमटकर सोने में लिपटकर मरते हैं
कई मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफन नहीं
होता
अब वैलेंटाइंस डे के मौके पर हम आपको यह
बताएंगे कि क्या जीवन में किसी इंसान से

प्यार होना जरूरी है और जिन्हें अपने जीवन
में प्यार नहीं मिला अब वह डिजिटल
पार्टनर्स ढूंढ रहे हैं जो आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस के जरिए इन लोगों के साथ बातें

करेंगे इन लोगों के अकेलेपन को दूर करेंगे
यानी अकेलापन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
के जरिए दूर होगा और सबसे बड़ी बात यह है
कि इस डिजिटल रिश्ते में इमोशनल अत्याचार
की मात्रा जीरो है और इस समय दुनिया में

ऐसे 300 से ज्यादा ऑनलाइन डेटिंग एप्स
एक्टिव है जिनकी मदद से दुनिया भर के लोग
वर्चुअल बॉयफ्रेंड और वर्चुअल
गर्लफ्रेंड्स बना रहे हैं और इन डिजिटल
पार्टनर्स के साथ लोग ऑनलाइन डेट्स पर भी

जाते हैं उनके साथ ऑनलाइन चैटिंग भी करते
हैं उनके साथ अपना सुख दुख बांटते हैं
अपने दिल की बातें उनके साथ करते हैं और
आज भी दुनिया के बहुत सारे लोगों ने
वैलेंटाइंस डे अपने इन्हीं डिजिटल

पार्टनर्स के साथ मनाया है यानी यह एक नए
युग की शुरुआत है और इन लोगों में चीन
जापान दक्षिण कोरिया और अमेरिका में भी
लोग अब डिजिटल पार्टनर्स के साथ
वैलेंटाइंस डे मना रहे हैं और चीन में तो

लोग असली पार्टनर से ज्यादा डिजिटल
पार्टनर्स को पसंद कर रहे हैं और इन लोगों
का कहना है कि यह डिजिटल पार्टनर्स ना तो
इमोशनल अत्याचार करते हैं ना ही महंगे

महंगे गिफ्ट्स मांगते हैं ना ही इनकी कोई
इमोशनल डिमांड होती है ना ही कभी इंसानों
की तरह रिश्तों में एक दूसरे पर हावी होने
की कोशिश करते हैं यानी लड़ाई झगड़े का
कोई सवाल ही नहीं है नाराजगी का कोई सवाल

ही नहीं है इससे आप यह समझ सकते हैं कि
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की टेक्नोलॉजी अब
रिश्तों की परिभाषा को बदल रही है और इसने
अब ऐसे लोगों को रिश्ते बनाने का एक नया
विकल्प दे दिया है जो रिश्ते बनाना तो
चाहते हैं लेकिन इंसानों के साथ रिश्तों

को निभाना नहीं चाहते क्योंकि रिश्तों को
निभाना बहुत मुश्किल होता है रिश्ते
निभाना आस सान काम नहीं है जबकि डिजिटल
पार्टनर्स के साथ रिश्ते में लोगों की कोई
कमिटमेंट नहीं होती कोई दबाव नहीं है कोई

स्ट्रेस नहीं है और इंसानों की तुलना में
डिजिटल पार्टनर्स को चुनने की एक वजह एक
बहुत बड़ी वजह अकेलापन भी है इस दुनिया
में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो
प्यार का भूखा नहीं होगा जिसे प्यार नहीं

चाहिए सबको प्यार अच्छा लगता है और जो यह
नहीं चाहता होगा कि उसका भी कोई पार्टनर
हो जो उसकी चिंता करे जो उससे अटूट प्रेम
करें जो सुख दुख में उसके साथ खड़ा रहे
सबको एक ऐसा सच्चा दोस्त चाहिए सबको एक

ऐसा पार्टनर चाहिए सबको अपने जीवन में
प्रेम चाहिए लेकिन इंटरनेट के इस युग में
सोशल मीडिया पर तो लोगों के हजारों दोस्त
होते हैं फॉलोअर्स होते हैं लेकिन असल
जीवन में यही लोग सबसे ज्यादा अकेले होते

हैं और यही अकेलापन फिर इन लोगों की जान
लेने लगता है और इस समय पूरी दुनिया में
जो सबसे बड़ी समस्या लोगों को आ रही है वह
है अकेलेपन की समस्या लोगों के पास सब कुछ

है है पैसा है टेक्नोलॉजी है उनके पास
स्मार्टफोन है सोशल मीडिया पर उनके पास
हजारों दोस्त हैं जो लगातार अपडेट करते
रहते हैं अपना स्टेटस लेकिन फिर भी यह लोग
अकेले हैं और इसीलिए अब जो लोग दुनिया में

अकेलेपन से संघर्ष कर रहे हैं वह डिजिटल
पार्टनर्स को अपना नया हमसफर बना रहे हैं
कुछ वर्ष पहले भारत में एक स्टडी हुई थी
जिसमें यह पता चला कि 45 वर्ष से ज्यादा
उम्र के 20 पर से ज्यादा लोगों को ये यह

लगता है कि वो बिल्कुल अकेले हैं हालांकि
कड़वा सच यह भी है कि ऑनलाइन डेटिंग भी अब
काफी खतरनाक हो गई है क्योंकि यहां भी अब
साइबर अपराधी पहुंच चुके हैं ऑनलाइन
डेटिंग एप्स पर हाल ही में दुनिया के सात

देशों में एक स्टडी हुई और इन देशों में
हमारा देश भारत भी था और स्टडी में यह पता
चला कि 39 पर भारतीयों ने डेटिंग एप्स पर
जिन लोगों के साथ दोस्ती की थी वो लोग बाद

में साइबर ठग निकले और चिंता की बात यह है
कि अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप फेक
से साइबर ठगी का खतरा और भी ज्यादा बढ़ता
जा रहा
है इस पर आज हम आपसे विस्तार में बात करना

चाहते थे लेकिन आज एक बार फिर से समय
हमारा समाप्त हो गया और आगे जिस भी दिन
हमें मौका मिलेगा उस दिन हम यह प्यार का
जो ब्लैक एंड वाइट विश्लेषण है इसे जारी

रखेंगे और इसका दूसरा हिस्सा आपको हम जरूर
दिखाएंगे पब्लिक डिमांड पर आपके लिए वही
विचार रख रहा हूं जो पिछले साल हमने आपको
वैलेंटाइन डे पर दिया था गुलाब लाकर देने
वाला तो फरवरी के महीने तक ही साथ चलता है

लेकिन उम्र भर का साथ उसी व्यक्ति के साथ
चल सकता है जो हर रोज आपको गुलाब के फूल
के साथ-साथ हरा धनिया भी लाकर दे

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