Chandrachud, Modi & Electrol Bond : चन्द्रचूड़ का मोदी को झटका..फंडिंग बताओ ! - instathreads

Chandrachud, Modi & Electrol Bond : चन्द्रचूड़ का मोदी को झटका..फंडिंग बताओ !

दोस्तों नमस्कार इस दौर में काले धन को
सफेद बनाना कितना आसान है इस दौर में मनी
लरिंग करते चले जाइए और आप पर कोई हाथ
नहीं डालेगा कितना आसान हो चला है इसी दौर
में शेल कंपनियों का पैसा कॉरपोरेट के
नेटवर्थ को कैसे बढ़ाता है यह सारा खेल

क्या इस दौर में चल रहा है और इसी दौर में
पॉलिटिकल फंडिंग जो कॉर्पोरेट के आसरे
होती है उसी ट को कौड़ियों के मूल इस देश
की संपत्ति सौंपी जा रही है यह सारे सवाल
हैं और इन सवालों की नब्ज में कोई दूसरी

परिस्थिति नहीं इस दौर में इलेक्टरल बंड
को लेकर उठे सवाल है वही इलेक्टरल बंड
जिसके जरिए इस देश में कॉरपोरेट ने 15000
करोड़ से ज्यादा की फंडिंग पॉलिटिकल तौर
पर

2018 अप्रैल के महीने से अब तक की है तो
क्या यह सारा पैसा सारी पूंजी किसने दी
किसको दी इसको जानने का अधिकार इस देश के
लोगों को नहीं है और क्या वाकई इस देश के
भीतर में लोग इस बात से अनभिज्ञ रहे कि वह
कौन सा कॉर्पोरेट है और वह कौन सी

पॉलिटिकल पार्टी है जिसको यह पैसा दिया
जाता है और उस पैसे की एवज में उस
कॉर्पोरेट को लाभ दे दिया जाता है क्या यह
जानने का अधिकार इस देश के लोगों को नहीं
है यही वह सवाल है जिसको पूरे तरीके से

गैर कानूनी घोषित सुप्रीम कोर्ट ने कर
दिया इलेक्ट्रोल बॉन्ड को असंवैधानिक
घोषित कर दिया यानी आज के बाद से
इलेक्टोरल बॉन्ड जिसके जरिए हजारों करोड़

का खेल इस देश के भीतर होता रहा है अब उस
पर नकेल कस दी गई उस पर रोक लगा दी गई जिन
इलेक्टोरल बंड को जो जनवरी के महीने में
खरीदे गए उसको अभी तक भुनाया नहीं गया है

तो उस पर भी रोक लग गई और सुप्रीम कोर्ट
के पांच जजों की सं वैधानिक बेंच में
जिसमें खुद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ भी मौजूद
थे जब यह फैसला आया तो एक झटके में
इलेक्ट्रॉल बंड को लेकर वह तमाम पन्ने

खुलने लगे जिसके जरिए यह जिक्र बार-बार
होता था क्या वाकई इस देश में राजनीति
करने के लिए खूब पैसा चाहिए और खूब पैसा
कॉर्पोरेट देने को तैयार है उसकी एवज में

वह इस देश की संपत्ति कौड़ियों के मोल
चाहता है लेकिन यह सवाल अब भी छुपा हुआ था
क्या वाकई ऐसी स्थिति आ सकती है जिसमें
बताया जाए कि किस कॉरपोरेट ने किस

पॉलिटिकल पार्टी को कितनी रकम दी सुप्रीम
कोर्ट ने आज जब फैसला सुनाया तो उन्होंने
तीन बातें साफ कर दी एक यह इलेक्टरल बंड
दरअसल दोष के लोगों से ही सच को छुपाया
जाता है या झूठ परोसा जाता है या फिर

कांस्टीट्यूशनली ये टिकेगा नहीं क्योंकि
इस देश में एक आरटीआई एक्ट है यानी जनता
को जानने का अधिकार है उसकी यह अवहेलना कर
रहा है तो अब इस पर रोक लग जाती है और यह
अब इलेक्टोरल बंड बंद होगा दूसरा सवाल था
इस दौर में जो कॉरपोरेट कितनी बड़ी तादाद

में सरकार को पैसा देते हैं क्योंकि
इलेक्ट्रोल बंड के जरिए बार-बार यही
आंकड़े निकल कर आ रहे थे कि सबसे ज्यादा
पैसा सत्ताधारी पार्टी के पास जाता है तो
अब उस कॉर्पोरेट ने कितना पैसा दिया और

अप्रैल 2019 के बाद से जो भी रकम दी गई
उसका पूरा कच्चा चिट्ठा अब तीन हफ्तों के
भीतर में सामने लाना होगा और तीसरी
परिस्थिति है क्या वाकई जिन सवालों को
इलेक्ट्रोल बंड को लाने से पहले इलेक्शन

कमीशन ने उठाया था आरबीआई ने उठाया था
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया था क्या वह बातें
अब सच लगने लगी हैं जिसमें ब्लैक मनी को
वाइट करने का जिक्र था फॉरेन फंडिंग का
मामला था मनी लॉन्ड्री का जिक्र था शेल

कंपनियों का जिक्र था और यह सारी
परिस्थिति क्या इस दौर में अब सामने आ
जाएगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तीन हफ्ते
का वक्त दिया है सामान्य तौर पर बीजेपी यह

कहने से चूक नहीं रही है कि देखिए फंडिंग
तो सबको मिलती थी इसमें सिर्फ हमारे खिलाफ
फैसला कैसे हुआ लेकिन दूसरा सच यह भी है
कि लगभग 72 पर फंडिंग जो थी वह सीधे
बीजेपी के हक में जाती रही जो हर बार वह

चुनाव आयोग को अपने आय वय का जो पूरा
ब्योरा सौंपते उसमें यह खुलकर नजर आने लगा
और दूसरा सवाल यह था कि बाकी लगभग 28 पर
में कांग्रेस समेत इस देश की तमाम नेशनल
पार्टी और तमाम रीजनल पार्टी सभी का बंदर

बाट उसी में होता था तो 72 पर वाला जो पा
रहा था अब उस पर नकेल कस गई और एक सवाल
तुरंत पैदा हो गया क्या 2024 से पहले यह
मोदी सरकार को सबसे बड़ा झटका इसलिए लग
चुका है क्योंकि इस दौर में सत्ता का पूरा

चका चौन प्रचार से लेकर विधायकों की खरीद
फरोख्त और सत्ता को डिगा को लेकर और बूथ
स्तर से लेकर ऊपरी स्तर तक जो पूरी
प्रक्रिया होती है उसमें सिर्फ पैसा
रेंगता है और अब वह बंद हो जाएगा तो क्या

होगा कोई भी कह सकता है बड़ी पूंजी इस दौर
में बीजेपी के पास है और दूसरे पॉलिटिकल
पार्टीज की तुलना में यह पूंजी एक दो गुना
नहीं तकरीबन 10 गुना ज्यादा है जो इस दौर
में उसने कमाई की है तो एक क्षण के लिए आज

उन पन्नों को खोला जाए और समझा जाए कि
दरअसल इलेक्टरल बंड के असंवैधानिक होने का
असर कितना व्यापक पड़ने वाला है चीफ
जस्टिस चंद्रचूड़ जस्टिस संजीव खन्ना

जस्टिस बी आर गवई जस्टिस जेबी पारदी वाला
और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह
फैसला सुरक्षित रखा था थोड़े से अतीत में
अगर आप चले जा जाएंगे तो आपके जहन में
होगा कि यह दरअसल मार्च अप्रैल

2018 से य इलेक्टोरल फंडिंग शुरू हुई थी 2
जनवरी 2018 को यह बंड स्कीम नोटिफाई किया
गया था लेकिन 2017 में ही इसे चुनौती दी
गई थी और चुनौती देते वक्त जो अलग-अलग राय
निकल कर आई थी आज उन्हीं बातों का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट के भीतर हुआ है उस दौर में
एक क्षण के लिए चले जाइए तो उस वक्त
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था 2017 में तब
कहा था कि इलेक्ट्रॉल बंड के जरिए काले धन
को कानूनी जामा पहनाया जा सकता है विदेशी

कंपनियां सरकार और राजनीति को प्रभावित कर
सकती है क्योंकि कौन खरीद रहा है इसकी
जानकारी सिर्फ एसबीआई को होगी एसबीआई को
ही यह पावर दिया गया था कि आप इलेक्ट्रोल
बॉन्ड बेचेंगे और इलेक्ट्रोल बंड कौन दे

रहा है कौन ले रहा है इसकी जानकारी सिर्फ
एसबीआई को होगी और सरकार को इसकी जानकारी
की जरूरत नहीं पड़ेगी पड़ेगी क्यों जनता
को इसकी जरूरत जाननी चाहिए क्योंकि इसकी
एवज में कोई भी मुफ्त में धन दान करता

नहीं है यह मंदिर नहीं है यह राजनीति है
इस बात को समझना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट
ने आज इस नब्ज को पकड़ा है उस दौर में
इलेक्शन कमीशन कह रहा था कि चंदा देने
वालों के नाम गुमनाम रखने से पता लगाना

संभव ही नहीं होगा कि राजनीतिक दल ने जो
पूरा की पूरी धारा 29 ऑ बी का उल्लंघन कर
चंदा लिया है या नहीं लिया है और विदेशी
चंदा लेने वाले कानून भी बेकार हो जाएंगे
क्योंकि इस देश में रोक लगी थी कि आप

फॉरेन फंडिंग नहीं कर सकते हैं अब किसी
भारत की कंपनी ने कोई अगर सब्सिडरी बाहर
खोली या बाहर की किसी कंपनी ने भारत में
अपनी सब्सिडरी खोली और उसी माध्यम से वह
चंदा दे रही है और उस चंदा देने की एवज

में विदेशी कंपनियों को लाभ अगर भारत की
इकोनॉमिक पॉलिसी के तहत अलग-अलग योजनाओं
के साथ मिल रहा है तो फिर इसको पकड़ेगा
कौन और जानेगा कौन और उसी दौर में आरबीआई
ने भी कहा था कि दरअसल इलेक्ट्रोल बंड मनी
लरिंग को बढ़ावा देगा इसके जरिए ब्लैक मनी

को वाइट करना संभव होगा अब आप सोचिए कि उस
दौर में आरबीआई थी सुप्रीम कोर्ट था
इलेक्शन कमीशन था सभी कह रहे थे गलत था
लेकिन बावजूद इसके वही संसद की ताकत वही
बहुमत का जोर और

2018 के बाद से इस देश में इलेक्टोरल
बॉन्ड का खेल शुरू हो गया इस इलेक्टरल
बॉन्ड के जरिए कितना पैसा किस रूप में
उगाही की गई और सरकार क्या कहती रही अगर
इस पन्ने को खोलिए तो सरकार ने बार-बार

क्या कहा सिर्फ एक ही बात कही कि दरअसल जो
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता है जब वह
सुप्रीम कोर्ट में अपनी सरकार की तरफ से
बात कह रहे थे तो उनका कहना होता था किसने
कितना पैसा डोनेट दिया यह सरकार जानना

नहीं चाहती चंदा देने वाला ही अपनी पहचान
छिपाकर रखना चाहता है वह नहीं चाहता है कि
किसी दूसरी पार्टी को इसका पता चले और
उन्होंने उदाहरण दिया अगर मैं कांग्रेस को

चंदा दे रहा हूं तो मैं नहीं चाहूंगा कि
बीजेपी वालों को इसका पता चले और इस
इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कांग्रेस की तरफ
से भी जया ठाकुर ने अपील की थी और उसके

साथ सीपीएम ने भी अपील की थी और इसके साथ
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म एडीआर
ने भी यह अपील की थी कि पता तो चलना चाहिए
कौन कह रहा है कि नहीं पता चलना चाहिए और
इसे क्यों छुपाया जा रहा है सरकार ने इन

बातों को इग्नोर किया और एक के बाद एक जब
2019 में पहली बार इसकी सुनवाई शुरू हुई
तब चुनाव सामने खड़े थे और इसको चाला गया
और होते-होते देखिए 2023 में जब दोबारा

तिबारा यह मामला चलते चला गया और अलग-अलग
पार्टी अलग-अलग याचिकाओं के जरिए जुड़ती
चली गई तो 1 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट
में सुनवाई शुरू हुई जिसके बाद सुनवाई के
बाद इस फैसले को सुरक्षित रख लिया गया

लेकिन यहां पर एक सवाल बड़ा महत्त्वपूर्ण
है कि कितनी बड़ी पूंजी और कितने
इलेक्ट्रोल बंड इस दौर में लिए गए क्योंकि
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है हर कॉरपोरेट
को जानकारी देनी होगी उसने कितने

इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे और यह भी जानकारी
देनी होगी कि उसने किस पॉलिटिकल पार्टी को
बताया सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि
उसके उसकी एवज में सत्ता और सरकार ने उस
कॉर्पोरेट को क्या लाभ दिया यह काम तो

हमारा और आपका है इन चीजों को जानना समझना
दौर में कॉरपोरेट का नेटवर्थ कैसे बढ़ता
चला जा रहा था और इस देश की जीडीपी तक
नीचे थी यानी इस दौर में कोविड काल में जब
भारत की जीडीपी एकदम नीचे चली गई उस दौर

में भी भारत के टॉप 20 कॉरपोरेट का
नेटवर्क बढ़ रहा था टॉप 20 में से टॉप
थ्री कॉरपोरेट का नेटवर्क दुगनी होने की
स्थिति में आ गया था यह कौन सी पैसा और
कौन सी पूंजी का खेल था इस दौर में सरकार

ने क्या-क्या बेच डाला इस बातों का जिक्र
तो बार-बार हुआ है कि हर पब्लिक सेक्टर के
भीतर में कितने ने शेयर सरकार ने किस
प्राइवेट पार्टी को बेचे कितनी कम कीमत

में बेचे कईयों को कंपनियां बेच दी कई
भारत सरकार की कंपनियों पर रोक लग गई
क्योंकि उस फील्ड में प्राइवेट कॉरपोरेट
आने को तैयार था यानी प्राइवेटाइजेशन के

हक के लिए इस देश की इकोनॉमिक पॉलिसी को
ही बदल दिया गया और उसी को विकास
डेवलपमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ दिया
गया अब सवाल है जिस बात का जिक्र सुप्रीम

कोर्ट ने किया है कि दरअसल अब आपको बताना
होगा तो अब तब से लेकर अब तक
2713 7 इलेक्ट्रॉल बंड जो थे वह खरीदे
गए इनकी कुल कीमत

946 करोड़ रुपए अब आप कल्पना शुरू कीजिए
और एवरेज अगर निकाले इस
946 करोड़ में से तो 11000 करोड़ से
ज्यादा इलेक्टरल बंड बीजेपी के हिस्से में
गया हालांकि यह एक एवरेज है अलग-अलग बरस

में अलग-अलग तरीके से यह सिर्फ एवरेज है
और 2019 19 के चुनाव से ठीक पहले
2555 करोड़ का इलेक्टरल बॉन्ड बीजेपी के
पास गया था और उस वक्त कांग्रेस के पास

गया था 318 करोड़ का और जो पहले वर्ष जब
शुरू हुआ फर्स्ट फाइनेंशियल ईयर 201819
में तब बीजेपी के पक्ष में इलेक्टोरल बंड
जो दिया गया था वह

1450 करोड़ का था और कांग्रेस के पास आया
था 388 करोड़ रपए 202021 के फाइनेंशियल
ईयर में बिल्कुल डल चल रहा था उस वक्त
बहुत कम इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए दिए गए
तो वह भी लेकिन कांग्रेस को 10 करोड़

मिलते हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी को लगभग 22
2 करोड़ मिलते हैं वह अभी डबल है लेकिन
इसके बाद अगले साल आई है जब चीजें अनुकूल
हुई 202122 में तो कांग्रेस के पास गया
सिर्फ 236 करोड़ और बीजेपी के पास गया

1032 करोड़ यह एक स्थिति है जो निकल कर आई
इलेक्शन कमीशन के जरिए कि उन्होंने अपने
तौर पर सौंपा था कि हमने दिया है लेकिन यह
सवाल अब भी अनसुलझा वह कौन से कॉर्पोरेट

है और इस दौर में क्यों बार-बार कांग्रेस
अडानी को टारगेट करती है और पहले अंबानी
का नाम लेने से भी चूकती नहीं थी इस दौर
में अंबानी को लेकर एक खामोशी कांग्रेस ने

बरत ली है लेकिन अडानी का नाम अभी भी
राहुल गांधी खुले तौर पर लेते हैं इस दौर
में जब हिडन बर्ग की रिपोर्ट आई शेयर
बाजार में हड़ कम मचा एक झटके में लगभग एक

दो नहीं बल्कि बड़ी तादाद में लाख लाखों
करोड़ रुपए इस वैल्यूएशन के तहत गायब हो
गए जो बताए जाते हैं कुल 10 से 12 लाख
करोड़ का खेल था और उसका झटका भी किसी

कंपनी को लगा नहीं बल्कि वह दोबारा खड़ी
हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने उसको क्लीन चट
दी सेबी के कामकाज को सही बताया हालांकि
अब दोबारा एक पिटीशन दाखिल हुई है रिव्यू

पिटीशन जिसमें कहा गया है कि आपने सही
नहीं किया है तो क्या यह पूरा नेक्सिस जो
चल रहा था वह 2024 के चुनाव से पहले एक
झटके में सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ दिया है

अब इसको बेसिक तौर पर परखिए कि क्यों इस
बात का जिक्र इस वक्त करने की जरूरत है
अभी फरवरी का महीना चल रहा है 204 के
चुनाव को लेकर मार्च और अप्रैल में यह

खिड़की खुलने थी जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड
खरीदे जाने थे और पॉलिटिकल पार्टियों को
फंडिंग होनी थी आप सोच रहे होंगे कितनी
फंडिंग होती हमें लगता है इसके लिए आपको
2019 में लिए चलते हैं 2019 के मार्च के

महीने में
1365 करोड़ के इलेक्ट्रो बंड खरीदे और
पॉलिटिकल फंडिंग हुई अप्रैल के महीने में
अप्रैल 2019 में यह बढ़कर मैक्सिमम पर चला
गया

2256 करोड़ रुप इतने की फंडिंग इस दौर में
मार्च अप्रैल में रुक गई इस दौर में जो
अलग-अलग वरस में जो फंडिंग हुई है वह कुल
फंडिंग अगर 15000 करोड़ से ज्यादा की है

तो इसका दूसरा सच यह भी है कि लोकसभा
चुनाव के वक्त ही सबसे ज्यादा कॉर्पोरेट
से पैसे की मांग पॉलिटिकल पार्टीज करती है
और पॉलिटिकल पार्टीज बताती है कि हम सत्ता

में आ गए तो आपको क्या कुछ दे सकते हैं इस
दौर में बार-बार कहा जा रहा है कि मोदी
सत्ता तीसरी बार लौट रही है खुद
प्रधानमंत्री मोदी पार्लियामेंट के भीतर

हो या बाहर हो 3.0 का जिक्र करने से
कतराते नहीं हैं और बताते हैं कि आने वाले
वक्त में जब वह जीत कर आएंगे तो क्या कुछ
करेंगे और कैसे बड़े-बड़े निर्णय लेंगे इस
बड़े-बड़े निर्णय के समानांतर अगर आप
सोचिए तो बड़े निर्णय का मतलब इस देश में

इंफ्रास्ट्रक्चर का डेवलपमेंट है बड़े
निर्णय का मतलब इस देश के भीतर में
कॉर्पोरेट की मनी को रोटेशन में लेकर आने
का है और बड़े निर्णय का मतलब इस देश में
कॉर्पोरेट के नेटवर्थ को इतना बढ़ा देना

है कि इस देश की जीडीपी का साइज बढ़ जाए
और जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी बार-बार
करते हैं कि भारत दुनिया की तीसरी बड़ी
इकोनॉमी हो जाएगा तो इसका दूसरा सच यह भी

है कि जब भारत दसवें नंबर की इकोनॉमी था
201 में उस वक्त भारत की असमानता मौजूदा
वक्त की असमानता से आधे से भी कम थी और
दूसरा सच यह भी है कि प्रति व्यक्ति आय और
प्रति व्यक्ति कर्ज दोनों जो है इस दौर
में दुगने से ज्यादा बढ़ गया प्रति

व्यक्ति आय कम हो गई और प्रति व्यक्ति
कर्ज बढ़ गया जीडीपी के बराबर कर्ज होने
की स्थिति की चेतावनी आईएमएफ और वर्ल्ड
बैंक तक दे रहे हैं तो क्या इस दौर की
इकोनॉमिक परिस्थितियों ने कॉर्पोरेट के

लिए ही सारी पॉलिसीज को बनाया अब यह सवाल
इसलिए बड़ा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अगर
आप एक एक बर्ष को परखना शुरू करें 2019
चुनावी वर्ष था 2024 चुनावी वर्ष होगा
2019 में
मैक्सिमम

5069 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रोल बंड खरीदे
बेचे गए 2018 में यह
1000 54 था 104 करोड़ रुपया 2000
में यह पांच गुना बढ़कर 5069 करोड़ हो
जाता है 2020 कोविड काल में यह घटकर 363
करोड़ होता है और 2021 में यह दोबारा से

बढ़ना शुरू होता है और 15501 करोड़ होता
है 2022 के चुनाव आपके जहन में आ जाने
चाहिए वह कहां-कहां चुनाव थे और क्यों
कर्नाटक महत्त्वपूर्ण था क्यों इस दौर में
2023 के भीतर में जो तीन राज्यों की

चुनावी जीत और उसमें तेलंगाना को भी जोड़
दीजिए चौथा राज्य इन दौर में तीन
3703 करोड़ के इलेक्टोरल बंड लिए
गए 2022 में और 2023 उसमें जोड़ दीजिएगा

तो 2023 के जो तीन राज्यों के चुनाव जो हो
रहे थे और दो राज्य और थे ये
4244 करोड़ रुपए यानी 2022 और 23 के चुनाव
के वक्त में जो लोकसभा चुनाव नहीं था
राज्यों के चुनाव 222 में कितने
महत्त्वपूर्ण हो गए जिसमें इलेक्टोरल बंड
जो था यह

7945 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे गए अब आप
ध्यान दीजिए जैसे ही चुनाव का जिक्र कर
रहे हैं हम 2019 में 5000 करोड़ से ज्यादा
20222 के विधानसभा चुनाव में 7000 लगभग
8000 करोड़ के लगभग और अब 2024 आ रहा था

तो इस पर रोक लग गई अब सवाल है कि क्या
वाकई इसका असर दूसरी पॉलिटिकल पार्टी पर
पड़ेगा या नहीं पड़ेगा उन परे जितना असर
पड़ेगा वह इस स्थिति में ही नहीं है कि इस
चुनाव के भीतर

वह बूथ लेवल पर बैठने वाले कर्मचारी को एक
दिन का 00 दे पाए लेकिन यह 00 इस दौर में
दिए जाते हैं एक दिन बूथ लेवल पर जो बैठा
है उसको 00 कौन देगा तो भारत में मनरेगा

में 200 से 00 हो जाए 100 दिन से 200 दिन
हो जाए इसकी लड़ाई चल रही है लेकिन चुनाव
के वक्त में एक दिन में आप 00 तक कमा सकते
हैं तो चुनाव की महत्ता कितनी है जितने
नोट बांटे जाते हैं जितने प्रचार में लगाए

जाते हैं जिन सुविधाओं के साथ मंचों को
तैयार किया जाता है उन मंचों पर लाने के
लिए लोगों की जो आवाज आई तो पैसा कहां से
आता है इलेक्शन कमीशन के पास सौंपी गई
तमाम राजनीतिक दलों के जो आंकड़े निकल कर

आते हैं वह बताने में चौकन्ना हो जाइए
क्योंकि एक रुपए के हिसाब से सोचिए कि अगर
एक रुपया पॉलिटिकल इकोनॉमी के तौर पर है
तो इस चुनाव में जो 2000 24 का चुनाव अगर

एवरेज आप निकालना शुरू करेंगे तो कांग्रेस
उस एक रुपए में से आठ पैसा खर्च करने की
स्थिति में आती है और बाकी तमाम पॉलिटिकल
पार्टी वो रीजनल फोर्सेस ले लीजिए बाकी

नेशनल पार्टीज ले लीजिए उन सबका मिलाइए तो
वह 12 पैसे सब मिलाकर खर्च करते और बाकी
80 पैसे खर्च बीजेपी के हिस्से में आता यह
स्थिति इस देश में राजनीतिक तौर पर चुनाव

लड़ते वक्त होती है तो क्या अब इन सारी
परिस्थितियों के बीच अगला सवाल सबसे बड़ा
यह है क्या यह पूरा पूरा कच्चा चिट्ठा
2024 के चुनाव से पहले जो कॉरपोरेट और
सत्ता के नेक्सस का था अब व उभर कर सामने

आ जाएगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार
एक ही बात
कही महत्त्वपूर्ण है इस देश की जनता को हर
चीज की जानकारी का होना और इसीलिए कानूनी
तौर पर आरटीआई एक्ट जब लाया गया था तो

जानकारी होनी चाहिए लेकिन अगर आप ध्यान
देंगे इस दौर में प्रधानमंत्री केयर भी
प्रधानमंत्री और सरकार से जुड़ा हुआ नहीं
है बल्कि उसको प्राइवेट पार्टी के तौर पर
हाई कोर्ट में दलील देते वक्त जो नुमाइंदे

हैं उन्होंने रखा और कहा इसका
प्रधानमंत्री से कुछ लेना देना नहीं है
इसका सरकार से कुछ लेना देना नहीं है
दफ्तर चाहे सरकारी दफ्तरों के बीच चल रहा

हो उसके ट्रस्ट के भीतर लोग चाहे कैबिनेट
मिनिस्टर और खुद प्रधानमंत्री की मौजूदगी
हो और उस पीएम केयर के पैसे तक पर फैसला
देने की स्थिति में खुद प्रधानमंत्री की

नीतियां हो लेकिन पीएम केयर के बारे में
जानकारी आरटीआई एक्ट के जरिए नहीं मिलेगी
इस देश में पीएमओ के भीतर की जानकारी
आरटीआई एक्ट के जरिए नहीं मिलेगी इस देश
के भीतर में तमाम मंत्रालयों का कच्चा

चिट्ठा अगर सीएजी नहीं ला पा रहा है और इस
देश के भीतर में अलग-अलग मंत्रालयों की
रिपोर्ट नहीं सामने आ पा रही है तो आरटीआई
के जरिए जब आप फाइल करेंगे तो कहा जाएगा
उसमें सीएजी के जिम्मे है अब सबसे बड़ा

सवाल जो आखिर सवाल सबसे बड़ा है जब सरकार
ने हर इंस्टिट्यूशन पर इस दौर में कब्जा
कर लिया और उसमें चुनाव आयोग भी बचा नहीं
और चुनाव आयोग जो 2017 में यह कहने से चूक
नहीं रहा था उस समय का डॉक्यूमेंट बताता

है इलेक्शन कमीशन का जब वह कह रहा था कि
चंदा देने वालों के नाम गुमनाम रखने से
पता लगाना संभव नहीं होगा कि राजनीतिक दल
ने धारा 29 ऑ बी का उल्लंघन कर चंदा लिया
है या नहीं लिया है और विदेशी ंद दे लेने
वाले कानून भी बेकार हो जाएंगे आज चुनाव

आयोग चुप है क्योंकि चुनाव आयुक्त की
नियुक्ति कौन करेगा नियुक्ति प्रधानमंत्री
करेंगे तो फिर प्रधानमंत्री से नियुक्त
होने वाला शख्स सवाल कैसे कर सकता है यही
सवाल सुप्रीम कोर्ट में उठा तो सुप्रीम
कोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए संसद

ने कानून बना दिया तो क्या अगला सवाल यह
भी है कि 2024 के फंडिंग को लेकर अब सरकार
कोई नया कानून सामने ला सकती है कोई
विधेयक सामने ला सकती है कैबिनेट कोई नया

प्रस्ताव पास कर सकती है कि किसी भी हालत
में क्योंकि इस देश के भीतर में जो
अलग-अलग इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए जो पैसा
आ रहा है वह पैसा अगर 2018 से 2023 तक
देखिएगा तो वह सब पैसा अगर मिला भी दीजिए

तो उस पैसे का पूरा आकलन 1000 करोड़ से
ज्यादा का होता नहीं है और यहां तो 15000
करोड़ के पार है और यहां तो बीजेपी 10000
करोड़ के पार पाई हुई पार्टी है तो
सुप्रीम कोर्ट ने क्या मौजूदा मोदी सत्ता
को एक ऐसा झटका चुनाव से ऐन पहले दे दिया
जिसके बाद सरकार के सामने अब उस तमाम अपनी

पूंजी को निकालने की जरूरत होगी जो अभी तक
उसके लगातार खजाने में बढ़ती जा रही थी और
इस बात से उसे कोई भय नहीं था कि इस देश
का कॉर्पोरेट पैसा लुटाने को तैयार है

क्योंकि कॉरपोरेट बिना सरकार के आगे बढ़
नहीं सकता है और यह सच रहा भी है और यह सच
मौजूदा वक्त में सिर्फ और सिर्फ कॉरपोरेट
और सत्ता के खुले नेक्सेस के तौर पर उभरे
यह किसी ने नहीं सोचा था इससे पहले भी
कॉरपोरेट का साथ रहा है लेकिन एक के हाथ

में सब कुछ सौंप देना चाहे वह सड़क हो
चाहे बिजली हो चाहे पानी हो चाहे हवाई
अड्डे हो चाहे पावर ट्रांसमिशन हो कुछ भी
हो चाहे कम्युनिकेशन हो चाहे माइनिंग हो

चाहे एफसीआई के गोडाउंस हो चाहे अनाज हो
चाहे फल हो सब कुछ सौंप देना और इस देश के
भीतर में खुले तौर पर सरकार और
प्रधानमंत्री अलग-अलग भाषणों में जब यह
संकेत दे कि इतनी बड़ी तादाद में हमने इस

देश के कानूनों को खत्म किया लेकिन उसके
बावजूद भी अगर ब्लैक से वाइट हो रहा था
उसके बावजूद भी मनी लरिंग के जरिए
कॉरपोरेट की फंडिंग हो रही थी उसी के जरिए
शेल कंपनियों के जरिए नेटवर्क बढ़ रहा था
तो क्या यह

एक ऐसा फैसला है जो राजनीतिक तौर पर
मौजूदा सत्ताधारी पार्टी यानी बीजेपी को
झटका दे चुका है और राजनीतिक तौर पर
बीजेपी की विसात बिछाने वाले मोदी शाह की
जोड़ी के सामने यह एक सुप्रीम कोर्ट का
सबसे बड़ा फैसला है जो आने वाले वक्त में

इस देश की राजनीति और इस देश की राजनीतिक
तौर पर चुनावी परिस्थिति को प्रभावित
करेगा या नहीं करेगा अब फैसला इस पर भी
टिका है बहुत-बहुत शुक्रिया बहुत-बहुत
शुक्रिया

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