Electoral Bonds Kya Hota Hai जिसने दिया Modi Government को झटका | Supreme Court | - instathreads

Electoral Bonds Kya Hota Hai जिसने दिया Modi Government को झटका | Supreme Court |

नई दुनिया है नया दौर है ई है उमंग वाह
वाह बहुत
अच्छा नई दुनिया है नया दौर है नई है उमंग
कुछ थे पहले के तरीके तो कुछ है आज के रंग
ढंग चुनावी बंड योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने

बहुत बड़ा झटका दिया है सरकार को देश की
सर्वोच्च अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम
को असंवैधानिक करार देते हुए कर दिया इतना
ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल के चंदे

का हिसाब किताब भी मांग लिया है अब
निर्वाचन आयोग को यह बताना होगा कि पिछले
5 साल में किस पार्टी को किसने कितना चंदा
दिया सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह स्टेट

बैंक ऑफ इंडिया से इसकी जानकारी जुटाकर
अपनी वेबसाइट पर साझा करें ओनली इन द यर द
प्रोजेक्ट इ
कंप्लीटेड द न्यू कैपिटल फॉर द स्टेट ऑफ
आंध्र प्रदेश इ बी कंस्ट्रक्टिव बाय एन

इनोवेटिव लैंड पूलिंग मैकेनिज्म विदाउट
यूज ऑफ द लैंड एक्विजिशन एक्ट शीर्ष अदालत
के इस फैसले को उद्योग जगत के लिए भी एक
बड़ा झटका माना जा रहा है पर अब सवाल यह
है कि इलेक्टोरल बंड्स होते क्या हैं आइए

जानते हैं 2017 के बजट में उस वक्त के
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनावी या
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को पेश किया था 29
जनवरी 2018 को केंद्र सरकार ने इसे नोट

किया यह एक तरह का प्रमिसरी नोट होता है
यानी कहे कि बैंक नोट भी कह सकते हैं
इसे माय नेक्स्ट आइटम मैडम कंसन ल ऑफ
अस इट डी वि ट्रांसपेरेंसी इन पॉलिटिकल

फंडिंग इंडिया इज द वर्ल्ड लार्जेस्ट
डेमोक्रेसी पॉलिटिकल पार्टीज आर एशल
इंग्रेडिएंट्स
न 70 इयर्स आफ्टर
इंडिपेंडेंस द कंट्री हैज नॉट बीन एबल टू

इवॉल्व अ ट्रांसपेरेंट मेथड ऑफ फंडिंग
पॉलिटिकल पार्टीज व्हिच इज वाइटल टू द
सिस्टम ऑफ फ्री एंड फेयर इलेक्शंस इसे कोई
भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है

अगर आप इसे खरीदना चाहते हैं तो आप यह
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनी हुई ब्रांच
से खरीद सकते हैं इसे खरीदने वाला उस
बॉन्ड को अपनी पसंद की पार्टी को डोनेट कर
सकता है बस वो पार्टी को इस के लिए

एलिजिबल मतलब यानी कि पॉलिटिकल पार्टी को
इसके लिए एलिजिबल होना चाहिए बॉन्ड खरीदने
वाला 1000 से ₹ करोड़ तक का बॉन्ड खरीद

सकता है खरीदने वाले को बैंक को अपनी पूरी
केवाईसी डिटेल्स देनी होती है खरीदने वाला
जिस पार्टी को यह बॉन्ड डोनेट करता है वो

पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से
कम 1 पर वोट उस पार्टी को मिला होना चाहिए
डोनर के बॉन्ड को डोनेट करने के 15 दिन के
अंदर ही उस पार्टी को चुनाव आयोग से
वेरीफाई करके या वेरीफाइड अकाउंट में इसे

कैश करवाना होता है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया
एक्ट टू नेबल द इंस ऑफ इलेक्टोरल बंड्स इन
अकॉर्डेंस वि स्कीम द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया
वड फ्रेम इन दिस रिगार्ड अंडर दिस स्कीम अ

डोनर कुड परचेस बंड फ्रॉम ऑथराइज बैंक्स
अगेंस्ट चेक्स एंड डिजिटल पेमेंट
ओनली स वुड बी रिडीमेबल ओनली इन द
डेजिग्नेट अकाउंट ऑफ अ रजिस्टर्ड पॉलिटिकल

पार्टी दिस बंड्स विल बी रिडीमेबल विदन अ
प्रिसक्राइब्ड टाइम फ्रॉम द इंस ऑफ द
बॉन्ड एवरी पॉलिटिकल पार्टी वुड हैव टू
फाइल इट्स रिटर्न्स विद इन द टाइम

प्रिसक्राइब इन अकॉर्डेंस विद द प्रोविजन
ऑफ द इनकम टैक्स एक्ट नीडलेस टू से द
एसिस्टिंग अमेंडमेंट्स टू पॉलिटिकल

पार्टीज फ्रॉम पेमेंट ऑफ इनकम टैक्स
वुड बी अवेलेबल ओनली सब्जेक्ट टू द
फुलफिलमेंट ऑफ द अबब कंडीशंस दिस रिफॉर्म
विल ब्रिंग ग्रेटर ट्रांसपेरेंसी एंड

अकाउंटेबिलिटी इन द पॉलिटिकल फंडिंग अब ये
पूरा मामला कैसे लैम लाइट में आया आइए उसे
भी जानते हैं इस योजना को 2017 में ही
चुनौती दी गई थी लेकिन सुनवाई 2019 में

शुरू हुई 12 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट
ने सभी पॉलिटिकल पार्टी को निर्देश दिया
कि वह 30 मई 2019 तक एक लिफाफे में चुनावी

बॉन्ड से जुड़ी सभी जानकारी चुनाव आयोग को
दे दें हालांकि कोर्ट ने इस योजना पर रोक
तब नहीं लगाई थी बाद में दिसंबर 2019 में
याचिकाकर्ता यानी एसोसिएशन फॉर

डेमोक्रेटिक रिफॉर्म एडीआर ने इस योजना पर
रोक लगाने के लिए एक आवेदन दिया इसमें
मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया
कि किस तरह से चुनावी बंड्स योजना पर

चुनाव आयोग और रिजर्व बैंक की चिंताओं को
केंद्र सरकार ने दरकिनार किया था इस पर
सुनवाई के दौरान तत्कालीन सीजीआई यानी
बोबडे ने कहा था कि मामले की सुनवाई जनवरी

2020 में होगी चुनाव आयोग की ओर से जवाब
दाखिल करने के लिए सुनवाई को फिर से
स्थगित कर दिया गया था इसके बाद फिर अभी
इस मामले की सुनवाई नहीं हुई है अभी तक

पूरी सुनवाई नहीं हुई है अब आते हैं कि
किस पार्टी के पास कितना इलेक्टोरल
बॉन्ड्स है वैसे भी तीन पार्टी के पास अभी
यह सबसे ज्यादा बॉन्ड्स है इसमें सत्ता

पक्ष यानी बीजेपी के पास सबसे अधिक रकम के
बॉन्ड्स हैं साल 2018-19 की बात करें तो
1450 करोड़ बीजेपी के पास थे
383 करोड़ कांग्रेस के पास आए थे और 97

करोड़ टीएमसी के पास आए थे 201920 की बात
करें तो 22555 करोड़ बीजेपी के पास 318
करोड़ कांग्रेस के पास और 100 करोड़
टीएमसी के पास 202021 यानी जब कोरोना काल
चल रहा था तब 22 करोड़ लगभग 22 करोड़

बीजेपी के पास आए थे 10 करोड़ कांग्रेस के
पास और तब के समय में 42 करोड़ आए थे
टीएमसी के पास 202122 में यह आंकड़ा बढ़
गया बीजेपी के पास 032 करोड़ आए कांग्रेस

के पास 236 करोड़ आए और टीएमसी के पास
5528 करोड़ आए पांच जजों के इस बेंच ने
सर्वसम्मति से फैसला सुनाया है चीफ जस्टिस
ने कहा है कि पॉलिटिकल प्रोसेस से राज दल

एक अहम यूनिट है और उसको अलग नहीं किया जा
सकता पॉलिटिकल फंडिंग की जानकारी एक
प्रक्रिया है जिसे मतदाता को वोट डालने
में सही चॉइस करने मिलती है वोटर्स को
चुनावी फंडिंग के बारे में जानना उनका

अधिकार भी है जिससे मतदान करने में या
किससे उन्हें वोट डालना है इसमें चयन करने
में काफी आसानी होती है

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