Electoral Bonds Verdict: पहले Farmers Protest, अब Supreme Court, फंसी Modi Sarkar | - instathreads

Electoral Bonds Verdict: पहले Farmers Protest, अब Supreme Court, फंसी Modi Sarkar |

लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले इलेक्टोरल
बंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला
सुनाया है सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बंड
स्कीम को अवत करार देते हुए उस पर रोक लगा

दी है कोर्ट ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड
सूचना के अधिकार का उल्लंघन है वोटर को
पार्टियों की फंडिंग के बारे में जानने का
हक है कोर्ट ने यहां भी यह भी कहा है कि

बॉन्ड खरीदने वालों की लिस्ट को सार्वजनिक
करना होगा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि
नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि
सरकार के पास पैसा कहां से आता है और कहा

जाता है कोर्ट ने माना है कि गुमनाम
चुनावी बंड सूचना के अधिकार और अनुच्छेद
191 ए का उल्लंघन है सीजीआई ने फैसला
सुनाते हुए कहा है कि इलेक्टोरल बंड के
अलावा भी काले धन को रोकने के लिए दूसरे

तरीके हैं अदालत ने फैसले में कहा है कि
इलेक्टोरल बंड की गोपनीयता जानने के
अधिकार के खिलाफ है राजनीतिक दलों की
फंडिंग के बारे में जानकारी होने से लोगों
को मताधिकार का इस्तेमाल करने में स्पष्ट

स्ता मिलती है फैसला सुनाते हुए सीजेआई ने
कहा है कि राजनीतिक दलों की फंडिंग की
जानकारी उजागर ना करना मकसद के विपरीत है
एसबीआई को 12 अप्रैल 2019 से लेकर अब तक

की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी एसबीआई को
यह जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी वहीं
इलेक्शन कमीशन इस जानकारी को साझा करेगा
एसबीआई को तीन हफ्ते के भीतर यह जानकारी

देनी होगी योजना को सरकार ने 2 जनवरी 2018
को अधिसूचना किया था इसके मुताबिक चुनावी
बंड को भारत के किसी भी नागरिक या देश में
स्थापित इकाई खरीद सकती है कोई भी व्यक्ति
अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त

रूप से चुनावी बॉन खरीद सकता है
जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29a के
तहत पंजीकृत राजनीतिक दल चुनावी बंड
स्वीकार करके पात्र थे शर्त बस यही थी कि

उन्हें लोकसभा या विधानसभा के पिछले चुनाव
में कम से कम 1 प्र वोट मिले हो चुनावी
बंड को किसी पात्र राजनीतिक दल द्वारा

केवल अधिकृत बैंक के खाते के माध्यम से
भुनाया जाता था बॉन्ड खरीदने के पखवाड़े
भर के भीतर संबंधित पार्टी को उसे अपने
रजिस्टर्ड बैंक खाते में जमा कराने की

अनिवार्यता होती थी अगर पार्टी इसमें विफल
रहती है तो बंड निरर्थक और निष्प्रभावी
यानी रद्द हो
जाएगा
आज एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण फैसला सुप्रीम

कोर्ट ने दिया जिसका कि बहुत लंबा असर
होगा हमारी पूरी चुनावी लोकतंत्र के ऊपर
उन्होंने यह इलेक्टोरल बॉन्ड की स्कीम
कंप्रिहेंसिवली स्ट्राइक डाउन कर दी है यह
कहते हुए कि इसमें जो

एनोनिमस एलिमेंट इन्होंने लाया कि भाई
किसी को पता नहीं लगे कि भई इलेक्टोरल बंड
कि किसने खरीदे और किसको दिए यह बिल्कुल

हमारे जनता के सूचना के अधिकार के खिलाफ
है जो कि एक मौलिक अधिकार है जनता का और
साथ में उन्होंने तो यह जितने भी
अमेंडमेंट्स आए थे कंपनीज एक्ट में इनकम

टैक्स एक्ट में रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल
एक्ट में सबको रद्द कर दिया है इलेक्टोरल
बंड स्कीम को जो ला रहे थे दूसरी बात
उन्होंने यह भी बोला है कि यह जो
अमेंडमेंट करा गया था

कि कंपनीज जो हैं कितना भी पैसा पॉलिटिकल
पार्टीज को दे सकती हैं पहले जो
रिस्ट्रिक्शन था कि अपना एनुअल प्रॉफिट से
75 पर से ज्यादा नहीं दे सकती वह भी रद्द

कर दिया है कि यह हमारे इलेक्टोरल
डेमोक्रेसी के खिलाफ है क्योंकि यह लेवल
प्लेइंग फील्ड को हटाता है और बड़ी-बड़ी
कंपनियों को इलेक्शन इन्फ्लुएंस करने देता

है साथ में उन्होंने यह भी बोला है कि
जितने ने भी इलेक्टोरल बंड्स खरीदे गए और
जो जमा करे गए पॉलिटिकल पार्टियों ने जो
अपने खातों में जमा करे उसका पूरा

बरा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जिसके पास यह
सारी इंफॉर्मेशन है वह इलेक्शन कमीशन को
दे और यह पब्लिक वेबसाइट पर डाला जाए
जिससे कि जनता को पता लगे कि किसने ये

इलेक्टोरल बंड्स खरीदे और किस पॉलिटिकल
पार्टी को दि जो पिछले पाच सात साल से जब
से ये स्कीम आई थी और बदतर हो गई थी उसको
बढ़ाने के लिए अब बहुत इसमें एक जबरदस्त

फिलिप मिला है उसको और अब जो भी फंडिंग है
वो पब्लिक के नॉलेज में रहेगी और जो इस इस
इस इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के तहत भी जो
फंडिंग हुई थी तीन हफ्ते में इलेक्शन

कमीशन को सारा डाटा कलेक्ट करना है और
उसके एक हफ्ते बाद अपने वेबसाइट पर डालना
है मतलब कोर्ट का इंटेंट यह है कि ये
पब्लिक डोमेन में आ जाएगी अब कोई भी
सिटीजन उसको आके वेबसाइट प देख सकता है कि

किसने किसको फंड किया किस पार्टी को कितने
पैसे मिले किस प्राइवेट एंटिटी से मिले तो
जो पब्लिक डिस्क्लोजर का जो प्रॉमिस है
उसको सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल एंड तक ले

गए हैं सिर्फ यह नहीं कहा कि स्कीम स्कीम
जो है वो अनकंस्टीट्यूशनल है उसके साथ-साथ
यह भी कहा कि जो भी इसके अंदर पैसे आए हैं
उसका आप डिस्क्लोजर कीजिए पब्लिक को पता
चले कि कैसे किसके पास पै इसके तहत जिस

तरीके से ये स्कीम लाई गई थी उसमें काफी
ब्लैक मनी को बढ़ावा दिया गया है एक
ट्रांसपेरेंसी नहीं है इसमें आप किसी भी
किसी का नाम डिस्क्लोज नहीं हो रहा इसके
पहले नाम डिस्क्लोज होता था और एक निश्चित

₹ ज से ज्यादा आप अगर नहीं दे सकते थे कैश
में अब इन्होंने कितने भी रुपए आप जो है
बॉन्ड खरीदिए बैंक में जाके और पार्टी को
डोनेट कर दीजिए इससे ट्रांसपेरेंसी तो

पूरी तरीके से खत्म हो गई और निश्चित रूप
से कहीं ना कहीं डेमोक्रेसी के लिए बहुत
बड़ा खतरा है तो मैंने इसमें पिटीशन दायर
करी थी कि इस स्कीम को रद्द किया जाए इट

शुड बी ट्रांसपेरेंट निश्चित रूप से देखिए
यह तो इंपॉर्टेंट है ही जब तक नाम
डिस्क्लोज नहीं होगा तब तक काफी सारे
मुद्दे हैं जो सामने आएंगे और काफी सारी

परेशानियों को साथ लेकर आएंगे जितना भी
ब्लैक मनी है या मनी लरिंग है वह एक बहुत
बड़ा मुद्दा है जो इस चीज से जुड़ सकता है

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