EP1695: गांधी परिवार का अंदरूनी झगड़े में कभी भी विस्फोट हो सकता है | - instathreads

EP1695: गांधी परिवार का अंदरूनी झगड़े में कभी भी विस्फोट हो सकता है |

नमस्कार

आपका
स्वागत है
पुराने जमाने में आपने देखा होगा राजा
महाराजाओं के हां जब उनका राज पाठ चला
जाता था तो परिवार के अंदर झगड़े बढ़ जाते
थे आपस में मारकाट होने लगती थी आरोप

प्रत्यारोप और इस तरह के दौर चलने लगते थे
आखिर में होता यह था कि बिखराव धीरे-धीरे
बढ़ने लगता था परिवार के अंदर जो जो बाकी
राजपाट है उसकी तो बात छोड़

दीजिए पॉलिटिकल डायनेस्टी में भी ऐसा ही
होता है जहां भी पॉलिटिकल डायनेस्टी है
यानी लोकतंत्र में जो राजशाही है वहां भी
सत्ता जाने पर ऐसा ही होता है और इसका

सबसे ताजा और सबसे बड़ा उदाहरण है नेहरू
गांधी परिवार इस परिवार की एक समय देश में
तूती बोलती थी जो चाहते थे वह होता था
इनका कहा हुआ इनका बोला हुआ कानून था यह
अपने को कानून से ऊपर मानते थे और देश के

तमाम लोग इनको कानून से ऊपर मानते थे यह
धारणा थी कि जो सामान्य कानून है सामान्य
लोगों पर लागू होते हैं वह इन पर लागू
नहीं होते जमाना बदल गया समय बदल गया और

सबसे बड़ी बात कहे मतदाता बदल गया मतदाता
ने कहा कि नहीं यह सिलसिला तो नहीं चल
सकता डेमोक्रेसी तो ऐसे नहीं चल सकती
राजशाही के ढंग से जो है वह लोकतंत्र नहीं

चल सकता 20144 तक देश के मतदाता को एक ऐसे
नेता का इंतजार था उसकी प्रतीक्षा थी कि
वह आए और यह बदलने का नैतिक साहस उसके
साथ-साथ राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाए कि जो
चल रहा है उसको वैसे ही चलने नहीं देंगे

उसमें बदलाव लाएंगे जैसे ही वह यह तय
करेगा कि देश कानून के मुताबिक चलेगा और
देश का कानून सब पर छोटे बड़े अच्छे बुरे
सब पर एक समान लागू होगा यह स्थिति बदल

जाएगी यह जो डायनेस्टिक डेमोक्रेसी है यह
अपने पैरों पर खड़ी नहीं
है यह एक आडंबर के झूठ के पैरों पर खड़ी
है और भरभरा कर गिरेगी रेत के महल की तरह
जैसे ही कानून का राज स्थापित करने की

कोशिश होगी तो मोदी आए कानून का राज
स्थापित होने लगा और इस परिवार का क्या हो
रहा है आप देख रहे हैं तो जब परिवार की
सत्ता गई परिवार का वह रसूक गया परिवार की
वह हनक चली गई तो अब परिवार के अंदर की जो

दरारें हैं जो पहले ढकी हुई थी नजर नहीं
आती थी जो दूर से बड़ी सुहावनी लगती थी वो
दरारें आप खुलकर सामने नजर आने लगी सोनिया
गांधी मतदाता के डर से रायबरेली छोड़कर
उत्तर प्रदेश छोड़कर चली गई राजस्थान से

वह राज्यसभा में जा रही हैं उनका जाना तय
ही है अब वह राज्यसभा की सदस्य होंगी तो
उन्होंने संसदीय राजनीति नहीं छोड़ी है
संसदीय राजनीति में बनी रहेंगी लेकिन

लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी क्यों नहीं
लड़ेंगी आखिर वह कांग्रेस की सर्वे सर्वा
है कांग्रेस की सर्वोच्च नेता है यूपीए की
यानी यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस जो

गठबंधन है उसकी अध्यक्ष हैं और इडी जो
एलायंस बना है उसमें पद उनका भले कुछ ना
हो लेकिन उनकी सबसे ज्यादा चलती है ऐसे
नेता की मोदी के खिलाफ जो सबसे बड़ी शक्ति
के रूप में हो सामने हो उस नेता के पास

पूरे 543 यानी 543 लोकसभा कांस्टेंसी में
से एक सुरक्षित सीट ना हो और उसका जो
पारिवारिक गढ़ की सीट रही हो वह भी
असुरक्षित लगने लगे तो इससे आप समझिए कि

हवा बदल रही है हवा का रुख बदल गया है तो
सोनिया गांधी गाधी को लोकसभा का मैदान
छोड़कर भागना पड़ा लेकिन संसदीय राजनीति
उन्होंने नहीं छोड़ी है क्योंकि संसदीय

राजनीति से ही सत्ता आती है और सत्ता से
ही ताकत आती है और ताकत से ही आपका राज
चलता है आपका रसूख बनता है तो राज्यसभा के
जरिए भले ही वह संसद में पहुंच जाए लेकिन
अब वह उनका रुतबा नहीं रहेगा जो लोकसभा

सीट जीतकर आने पर होता था लेकिन फिर भी
संसद में रहे और संसद में रहेंगी और
पार्टी की सर्वे सर्वा तो है ही लेकिन
पार्टी में जो कुछ भी हो पार्टी का जो कुछ

भी हो परिवार का क्या होगा कांग्रेस मुक्त
भारत बनाने की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने की थी लेकिन अभी तो लग रहा है कि
परिवार मुक्त जो है राजनीति होने जा रही

है मैं नेहरू गांधी परिवार की सिर्फ बात
कर रहा हूं अभी उसकी उसकी वजह उसकी वजह
मतदाता का जो रुख है वह तो है ही
अंदर के झगड़े भी हैं राहुल गांधी अमेठी

छोड़कर चले गए वायनाड पिछले चुनाव में
2019 के चुनाव में अमेठी की हवा जब उनको
बदली हुई नजर आने लगी जो सोनिया गांधी ने
और पहले भांप ली रायबरेली की हवा नॉमिनेशन
से पहले ही उन्होंने मैदान छोड़ दिया

राहुल गांधी ने नॉमिनेशन के बाद मैदान
छोड़ा और वायनाड चले गए केरल के और वहां
से सुरक्षित सीट तलाशी जो मुस्लिम बहुल
इलाका है वचन क्षेत्र है और वहां से

आईयूएमएल यानी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
के समर्थन से चुनाव लड़े हैं और जीते
लोकसभा में पहुंचे और आप याद रखिए 2019
में कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को
प्रधानमंत्री पद का के उम्मीदवार के रूप

में पेश करके चुनाव लड़ रही थी तो जो देश
का प्रधानमंत्री बनना चाहता था पार्टी
जिसको देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी
उसकी स्थिति को आप समझिए कि देश की 543

543 सीट्स में से एक भी सुरक्षित सीट उसके
अपने दम पर नहीं थी केरल की वायनाड भी
नहीं जीतते राहुल गांधी अगर आईयूएमएल का
समर्थन उनको हासिल ना

होता तो इससे परिवार की और कांग्रेस
पार्टी दोनों की हालत का अंदाजा लगता है
लेकिन अभी राहुल गांधी की बात आज नहीं कर
रहा हूं सोनिया गांधी की भी बात नहीं कर

रहा हूं इस समय देश में कई राज्यों में
राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव चल रहे हैं
इन चुनाव में अलग-अलग राज्यों से कुल
मिलाकर कांग्रेस पार्टी ने 12 उम्मीदवार
खड़े किए 12 में एक सोनिया गांधी है

राजस्थान से आपको पता है और इन्हीं 12 में
स्थान चाहती थी प्रियंका वाडरा प्रियंका
वाडरा के बारे में एक एक यह धारणा बनाई गई
थी कि जिस दिन वह राजनीति में आएंगी
राजनीति को बदल देंगी या कम से कम उत्तर

प्रदेश की राजनीति को तो बदल ही देंगी किस
आधार पर बदल देंगी किन तथ्यों तर्कों के
आधार पर यह बात कही जाती थी कि वह अपनी
दादी की तरह चलती हैं उनकी नाक अपनी दादी

की तरह है साड़ी अपनी दादी की तरह पहनती
हैं यह सब राजशाही जमाने के जो टोने टोटके
थे उनका समय निकल चुका है इस देश का
लोकतंत्र जो है बहुत मजबूत हो चुका है
बहुत प्रौढ हो चुका है मतदाता को यह सब

समझ में आता है यह दिखावे की चीजें हैं
इनसे उसके उसकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं
आने वाला है उसने देखा है कि इतने लंबे
समय तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस

ने उसके लिए क्या किया है तो इन बातों से
वह प्रभावित होने वाली नहीं है उसका
उदाहरण भी आया सामने 2019 के चुनाव में
आधे से ज्यादा उत्तर प्रदेश का प्रभार

प्रियंका वाडा को दिया गया उनको राष्ट्रीय
महामंत्री बनाया गया और उनके पास पहले से
रायबरेली और अमेठी का जिम्मा तो था ही
रायबरेली में किसी तरह से सोनिया गांधी

जीती सोनिया गांधी क्यों छोड़कर गई
रायबरेली क्यों राज्यसभा में गई क्यों
लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं की
क्यों उत्तर प्रदेश की 80 में से एक भी

सीट उन्हें ऐसी नजर नहीं आई जहां से वह
लोकसभा में पहुंच सके कहा जा रहा है कि
उनका स्वास्थ्य खराब है इसलिए लोकसभा
चुनाव नहीं लड़ी यह बात बिल्कुल सही है
उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है लेकिन जब

स्वास्थ ठीक था तब भी लोकसभा चुनाव में वह
बहुत ज्यादा भागदौड़ या मेहनत नहीं करती
थी दो या तीन रैलियां मुश्किल से करती थी
और एकाद दिन जनसंपर्क बाकी जो उनके चुनाव

प्रभारी हैं वह सारा काम वह लोग देखते थे
अब वह स्थिति क्यों नहीं रह गई इसलिए कि
2014 और
2019 दो लोकसभा चुनाव के नतीजे अगर आप

देखें तो आपको पता चलेगा कि सोनिया गांधी
की जीत का मार्जिन रायबरेली लोकसभा में
एकदम से आश्चर्यजनक रूप से कम हो गया यानी

इस आशंका इस बार इस बात की थी कि वह
रायबरेली से अगर लोकसभा चुनाव लड़ेंगी तो
हार सकती हैं वह इसलिए मैं इतने दावे के
साथ कह रहा हूं कि पिछला चुनाव याद रखिए
पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का
गठबंधन था गठबंधन की दोनों पार्टियों
गठबंधन में शामिल इन दोनों पार्टियों ने
कांग्रेस के लिए 80 में से चार सीटें छोड़
दी थी अमेठी रायबरेली उसके अलावा कानपुर
और

सहारनपुर तो अमेठी भी नहीं जीत पाई
कांग्रेस रायबरेली बड़ी मुश्किल से जीती
और रायबरेली जीतने का मेरा मानना है कि
सबसे बड़ा कारण था भारतीय जनता पार्टी का
कमजोर कैंडिडेट दिनेश सिंह जो उम्मीदवार

बनाए गए वह कुछ समय पहले तक गांधी परिवार
के करीबी व्यक्ति माने जाते थे उनके उनके
इशारे पर काम करने वाले उनके इशारे पर
चलने वाले व्यक्ति थे लोगों ने उनको

परिवार के विरोधी के रूप में या
प्रतिद्वंदी राजनीतिक प्रतिद्वंदी के रूप
में नहीं देखा तो वह सीट बीजेपी को हारने
ही थी बीजेपी ने उतने मन से वह सीट लड़ी

भी नहीं पूरी ताकत लगाई नहीं जैसी अमेठी
में लगाई अमेठी केवल 2019 की बात नहीं कर
रहा हूं 2014 में भी स्मृति ईरानी जब लड़ी
दोनों दोनों बार लड़ी थी वही 2019 में
जीती 2014 में हार गई थी तब भी वह पूरी

ताकत से लड़ी थी लेकिन राय बरेली उतनी
ताकत से बीजेपी नहीं लड़ी थी उसकी वजह थी
कि जिस उम्मीदवार को चाहती थी पार्टी उस
वो उम्मीदवार तैयार नहीं हुई भारती जनता

पार्टी की कोशिश थी योजना जो थी कि अमेठी
से स्मृति रानी और रायबरेली से उमा भारती
को उम्मीदवार बनाया जाए सोनिया गांधी के
खिलाफ और अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ
स्मृति रानी

को लेकिन उमा भारती तैयार तो हुई रायबरेली
से चुनाव लड़ने के लिए लेकिन वह चाहती थ व
झांसी से उस समय सांसद थी वो चाहती थी
झांसी और रायबरेली दोनों सीटों से वो

चुनाव लड़े पार्टी ने कहा कि यह नहीं हो
सकता इसका संदेश ठीक नहीं जाएगा इसका
संदेश सीधा यह जाएगा कि आपको रायबरेली में
जीत की उम्मीद नहीं है हालांकि उनको
पार्टी ने यह भी आश्वासन दिया था कि अगर

आप लोकसभा चुनाव रायबरेली से हार जाती हैं
तो आपको राज्यसभा में भेज दिया जाएगा जो
स्मृति रानी के साथ हुआ वो भी 2014 में
अमेठी का लोकसभा चुनाव हार गई थी उनको
राज्यसभा भेजा गया पार्टी ने राज्यसभा ही

नहीं भेजा मंत्री भी बनाया तो सोनिया
गांधी को इस बार लगा कि यह सब क्योंकि सपा
बसपा का एलायंस नहीं है अभी तक बसपा ने इस
बात की घोषणा नहीं की है कि व रायबरेली से
अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी समाजवादी

पार्टी ने हालांकि रायबरेली सीट छोड़ने की
घोषणा तो कर दी है लेकिन रायबरेली में वह
कितना समर्थन करेगी इसका कोई भरोसा नहीं
था तो यह बात तय लग रही थी कि वह चुनाव

हार सकती है तो हार की आशंका से सोनिया
गांधी चली गई अब प्रियंका वाडरा इससे पहले
जब तक हार की आशंका नहीं थी तब तक चाहती
थी सोनिया गांधी राज्यसभा जाए और रायबरेली

से वह लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन उनको मालूम
है कि अगर सोनिया गांधी नहीं जीतने वाली
तो उनके जीतने की तो कोई दूर-दूर तक
संभावना नहीं है उनको उत्तर प्रदेश की

राजनीति में उतारा गया इस उम्मीद से कि वह
चमत्कार करेंगी लेकिन चमत्कार तो कोई हुआ
नहीं वो उत्तर प्रदेश का 2022 का विधानसभा
चुनाव की प्रभारी थी पूरे प्रदेश की
उन्होंने एक नारा दिया था लड़की हूं लड़

सकती हूं लेकिन लड़ नहीं पाई यह साफ नजर
आया 403 विधानसभा सीटों में से सिर्फ दो
सीटें कांग्रेस पार्टी को मिली दो में से
भी एक सीट जो है आराधना मिश्रा की जो जीती

जो प्रमोद तिवारी जो अभी राज्यसभा में
डिप्टी लीडर हैं कांग्रेस के उनकी बेटी
हैं और वह सीट ऐसी है कि प्रमोद तिवारी

लंबे समय से दशकों से ज लगातार जीतते आ
रहे हैं अगर वह कांग्रेस के टिकट पर ना भी
लड़े तब भी वह सीट जीत सकते हैं इसलिए
कांग्रेस का जनाधार उत्तर प्रदेश से खत्म
हो चुका है उसे पूरे प्रदेश में कुल

मिलाकर सिर्फ 2.3 पर 2.3 प्र वोट मिले तो
प्रियंका वाड्रा के आने से कोई चमत्कार
नहीं हुआ लेकिन प्रियंका वाड्रा के जो

रणनीतिकार हैं एक चमत्कार की उम्मीद में
घूम रहे थे हिमाचल प्रदेश का विधानसभा
चुनाव हुआ उसमें प्रियंका वाडरा ने
तीन-चार सभाएं एड्रेस की उसके बाद नतीजा
निकला तो हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की

सरकार बन गई तो यह प्रचारित किया गया कि
प्रियंका के प्रचार की वजह से कांग्रेस
पार्टी हिमाचल प्रदेश में जीत गई और वह
जहां प्रचार करेंगी वहां कांग्रेस की

किस्मत बदल देंगी हालांकि उसके बाद फिर
ऐसा खेल कहीं हुआ नहीं हिमाचल में जीत का
कारण कांग्रेस की सबसे बड़ा कारण था
बीजेपी का बीजेपी के बड़े नेताओं का आपसी
मनमुटाव और झगड़ा लेकिन वह कहानी वो

किस्सा अलग है अभी बात कांग्रेस की हो रही
है तो प्रियंका वाडरा चाहती थी कि यह जो
12 उम्मीद दवार घोषित किए जा रहे हैं
राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव के लिए

उनमें से एक नाम उनका भी हो लेकिन ना तो
परिवार तैयार हुआ ना पार्टी परिवार तैयार
नहीं हुआ तो पार्टी कैसे तैयार हो सकती थी
तो उनको राज्यसभा में नहीं भेजने का फैसला

पार्टी का नहीं परिवार का था और यह परिवार
के अंदरूनी झगड़े का एक बड़ा कारण आने
वाले दिनों में बनने वाला है उसका पहला
प्रमाण मिला जब शुक्रवार को एक चिट्ठी

जारी की प्रियंका वाडरा ने आपको मालूम है
कि राहुल गांधी इस समय भारत जोड़ो न्याय
यात्रा पर हैं उनकी भारत जोड़ो न्याय
यात्रा बिहार से उत्तर प्रदेश में प्रवेश
करने वाली है शनिवार को इस यात्रा का रूट

पहले ही उत्तर प्रदेश में कम किया जा चुका
है पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज्यादा
समय लगाने वाले थे लेकिन जैसे ही जयंत
चौधरी इंडि अलायंस छोड़कर एनडीए में गए तो
वहां वहां पर जो है वह दिनों की संख्या कम

कर दी गई समय कम कर दिया गया और बहाना
क्या बनाया गया कहा गया कि बच्चों के
इम्तिहान करीब हैं इसलिए ज्यादा समय नहीं
लगाएंगे जैसे बच्चों के इम्तिहान सिर्फ
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है उत्तर प्रदेश

में और कहीं नहीं है या देश के और किसी
कोने में नहीं है तो य इस तरह के बहाने
जनता भी समझती है लेकिन क्या करें कैसे
कहे कि हमको जो है समर्थन मिलने की उम्मीद

नहीं थी इसलिए जो है यात्रा के दिन कम कर
दिए गए समय कम कर दिया गया प्रियंका वाडरा
ने एक बयान जारी करके कहा है कि अचानक
उनकी तबीयत खराब हो गई है और उ अस्पताल
में भर्ती होना पड़ा है इसलिए वह यात्रा

में शामिल नहीं हो पाएंगी जब भी उनकी
तबीयत ठीक होगी स्वास्थ ठीक होगा तो
यात्रा में शामिल होने की कोशिश करेंगी
उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की भारत
जोड़ो न्याय यात्रा आ रही है और प्रियंका

वाडरा उसमें शामिल नहीं होंगी याद कीजिए
उनका उनकी यात्रा का जो पहला चरण था पहली
बार जब गए थे तब कई जगह पर प्रियंका
वाड्रा उसमें शामिल हुई थी एक महीना हो
गया 13 जनवरी को मणिपुर से यह यात्रा शुरू

हुई थी उस यात्रा इस यात्रा का यह दूसरा
चरण शुरू हुआ था तब से अब तक प्रियंका
वाडरा कहीं भी यात्रा में शामिल नहीं हुई
अभी तो उनकी चलिए तबीयत खराब हो गई है जब

तक तबीयत ठीक थी तब तक भी व शामिल नहीं
हुई थी यह सब प्रमाण है कि परिवार के अंदर
सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और परिवार के
अंदर का यह झगड़ा आप मानकर चलिए अगर
लोकसभा चुनाव से पहले फूटकर सामने नहीं

नहीं आया तो लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के
बाद तो निश्चित रूप से आएगा परिवार में वह
जो कबीर दस ने लिखा है साधो घर में झगड़ा
भारी तो वही स्थिति इस समय गांधी परिवार

में है झगड़ा तो बहुत भारी च चल रहा है
उसकी बातें बहुत ज्यादा सामने नहीं आ रही
हैं लेकिन कुछ छिटपुट जो है वह संदेश और
और संकेत जो है सामने दिखाई दे रहे हैं वो
कब बड़ा रूप ले लेंगे कोई नहीं जानता

लेकिन बड़ा रूप लेंगे यह बात त नजर आ रही
है तो इस अंक में इतना ही अगले अंक में
फिर मिलेंगे किसी नए मुद्दे के साथ तब तक
के लिए अनुमति दीजिए आपसे अनुरोध है कि ये
चैनल देखिए शेयर कीजिए लाइक कीजिए
नमस्कार

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