Farmer Protest:दिल्ली में 378 दिन तक डटे रहने वाले किसान नेता कहां हैं, क्यों हैं आंदोलन से दूर - instathreads

Farmer Protest:दिल्ली में 378 दिन तक डटे रहने वाले किसान नेता कहां हैं, क्यों हैं आंदोलन से दूर

पंजाब हरियाणा के किसान दिल्ली चलो 2.0 के
नारे के साथ एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी
का रुख कर चुके हैं दिल्ली पुलिस ने सभी
बॉर्डर सील कर दिए हैं सरकार और किसानों

के बीच लंबी बातचीत चल रही है लेकिन नतीजा
बेअसर और किसान ट्रैक्टर और ट्रॉली के साथ
दिल्ली पहुंच रहे हैं इस आंदोलन को देखा
जाए तो कोई बड़ा नाम इसमें शामिल नहीं है

जो साल 2021 के किसान आंदोलन में शामिल था
दरअसल साल 2020-21 के दौरान हुए किसान
आंदोलन में 1 साल से अधिक का समय दिल्ली
में डटे किसानों ने बॉर्डर पर बिताया था

उस वक्त संयुक्त किसान मोर्चा एसकेएम के
बैनर तले 35 किसान संगठन बड़े संगठन जो थे
और 400 से ज्यादा छोटे संगठन दिल्ली
पहुंचे थे प्रमुख किसान संगठनों में 31 तो
अकेले पंजाब के थे कुछ संगठन हरियाणा से

और कुछ मध्य प्रदेश से भी थे इस बार
किसानों के दिल्ली चलो मार्च में पांच सात
संगठन ही शामिल है खास बात यह भी है कि
एसकेएम खुद इस मार्च में ज्यादा एक्टिव
नहीं है एसकेएम ने 16 फरवरी को ग्रामीण

भारत बंद और औद्योगिक बंद का आहवान कर रखा
है यह बात अलग है कि दिल्ली चलो मार्च में
सैकड़ों संगठनों के शामिल होने का दावा हो
रहा है लेकिन असलियत ऐसी कुछ नहीं नजर आती
संयुक्त किसान मोर्चा के अहम घटकों में

शामिल हो रहे एक संगठन के अध्यक्ष ने इस
बात पर विस्तृत बातचीत की इस इस पर
विस्तृत चर्चा की इस संगठन के साथ किसानों
के अलावा खेत मजदूर भी जुड़े हुए हैं

उन्होंने यह बात स्वीकार की कि दिल्ली चलो
मार्च को लेकर किसान संगठनों में
सर्वसम्मति का अभाव रहा है यानी सब एकजुट
नहीं है इस स्थिति में ऐसी संभावना से

इंकार नहीं किया जा सकता कि किसान संगठन
की इस कमजोरी को कहीं केंद्र सरकार अपनी
ताकत ना बना ले अब यह भी जान लीजिए कि किन
संगठनों ने दिल्ली चलो का बीड़ा उठाया है

किसान संगठन के अध्यक्ष ने बताया कि
दिल्ली चलो मार्च का आहवान मूल रूप से
पंजाब के तीन-चार संगठनों की तरफ से हुआ

है हरियाणा से भी दो-तीन संगठन यह बताए जा
रहे हैं इनमें से एक संगठन पंजाब किसान
मजदूर संघर्ष समिति का का है इसके महासचिव

सरवन सिंह पंढेर हैं जिनको कि कहा जा रहा
है कि यही अगुवाई कर रहे हैं यह वही संगठन
है जिसने 26 जनवरी 2021 को लालकिले में
घुसकर उपद्रव मचाया था लाल किले की

प्राचीर पर चढ़कर तिरंगे का अपमान किया
गया था पंढेर सरकार के साथ हुई बातचीत में
भी शामिल थे दूसरा जो संगठन है वह भारतीय
किसान यूनियन एकता सिंधुपलचौक
दिल्ली चलो मोर्चा का हिस्सा है हरियाणा

से बीकेयू जो शहीद भगत सिंह वाला है
अंबाला एसकेएम बलदेव सिंह सिरसा का अमृतसर
से लखविंदर सिंह का एक छोटा सा समूह है
फतेहाबाद में खेती बचाव संगठन भी इसके साथ
जुड़ा हुआ है वहीं भारतीय किसान यूनियन

क्रांतिकारी संगठन के अध्यक्ष सुरजीत सिंह
फूल को भी संगठन दिल्ली चलो मार्च का
हिस्सा बताया जा रहा है सुरजीत सिंह फूल

उन 25 किसान नेताओं में शामिल थे
जिन्होंने किसी कानूनों पर सरकार के साथ
चर्चा की थी पंजाब में पीएम मोदी का

काफिला रोकने की जिम्मेदारी भी इसी संगठन
ने बाद में ली थी यानी अगर देखिए तो ऐसे
बहुत सारे संगठन हैं जो इसका हिस्सा है

लेकिन बहुत सारे ऐसे संगठन हैं जिनकी
संख्या बहुत ज्यादा है जो कि इसका हिस्सा
नहीं है सरकार से बातचीत के लिए तैयारी की
बात कही जा रही है किसान संगठन के अध्यक्ष
बताते हैं कि 2020 में जब किसानों ने

दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाला था तब
सरकार ने बातचीत में काफी आनाकानी की थी
कभी तो अफसरों को ही आगे कर दिया था लेकिन
इस बार सरकार ने दो केंद्रीय मंत्री

अर्जुन मुंडा और पियूष गोयल को तुरंत
बातचीत के लिए भेज दिया है सरकार भी चाहती
है कि मामला जल्दी रफा-दफा हो क्योंकि
सामने लोकसभा का चुनाव 2020 में शुरू हुए

आंदोलन के दौरान पंजाब के डॉक्टर दर्शन
पाल जो कि क्रांतिकारी किसान यूनियन के
साथ जुड़े थे वो और 30 अन्य किसान संगठनों
के समन्वयक भी थे इस बार वह भी नजर नहीं आ

रहे भारतीय किसान यूनियन की सक्रियता भी
उतनी नहीं दिखाई पड़ती पंजाब के मालवा
क्षेत्र में एक्टिव रहे बीकेयू के भारतीय
किसान यून यूनियन के संस्थापक नेताओं में

से एक है बीकेयू और उसके जो संयोजक हैं
बलबीर सिंह
राजेवाडी चलो में एक्टिव नजर नहीं आते
राकेश चिकत मीडिया में बयान जरूर दे रहे
हैं कि दिल्ली में ट्रैक्टर ले जाएंगे

गुरनाम सिंह चड़ी हन्नान मोल्ला जोगेंद्र
सिंह उग्रह शिव कुमार शर्मा युद्धवीर सिंह
योगेंद्र यादव अविक साहा भारतीय किसान
यूनियन लक्खोवाल के अध्यक्ष अजमेर सिंह

लक्खोवाल और किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के
सतनाम सिंह पन्नू सहित कई ऐसे बड़े नाम
हैं जो कि फिलहाल इसका हिस्सा नजर नहीं

आते अगर देखा जाए तो किसान संगठनों के बीच
सामंजस्य का अभाव नजर आता है खेत मजदूर
संगठन के पदाधिकारी बताते हैं कि संयुक्त
किसान मोर्चा के बैनर तले 26 नवंबर 2020

को शुरू हुआ आंदोलन 378 वें दिन यानी
378 दिन तक लगातार सीमा पर किसान डटे थे
हालांकि उस आंदोलन में 700 से ज्यादा
किसानों ने अपनी जान भी गवाई थी ऐसे

आंकड़े थे उसके बाद से हालात बदले किसानों
के कई संगठन और पदाधिकारी सियासत में हाथ
आजमाने को आतुर थे पर्दे के पीछे विभिन्न
राजनीतिक दलों के साथ किसान संगठनों की

बातचीत होने लगी ऐसे में केंद्रीय स्तर पर
एसकेएम भी कमजोर पड़ गया मध्य प्रदेश के
किसान संगठन जिसके संयोजक शिवकुमार कक्का
हैं उन्होंने 26 जनवरी को देश भर में जिला
स्तर पर ट्रैक्टर के जरिए विरोध प्रदर्शन

की बात कही है इस पर एसकेएम सहमत नहीं था
नतीजा ये आहवान फ्लॉप हो गया उसके बाद तय
हुआ कि 16 फरवरी को भारत बंद होगा हालांकि
यहां पर भी ग्रामीण भारत और औद्योगिक
प्रतिष्ठानों के बंद करने की बात कही गई

मजदूरों को भी इसमें जोड़ा गया है इस बीच
पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों ने 13
फरवरी को दिल्ली मार्च का ऐलान कर दिया इस
कॉल के बाद सरकार भी तुरंत बातचीत के लिए
राजी हो गई और अपने दो मंत्री पीयूष गोयल

और अर्जुन मुंडा को आगे कर दिया मध्य
प्रदेश से जुड़े किसान संगठन के एक
पदाधिकारी आरएसएस के करीबी रहे हैं ऐसे
में किसान आंदोलन की दशा और दिशा तय होने

में दिक्कत आना लाजमी है ऐसा लोग कह रहे
हैं जब 16 फरवरी के भारत बंद की कॉल
एसकेएम की है तो 13 फरवरी को दिल्ली कूछ
को बीच में क्यों लाया गया जैसा कि हम
शुरुआत से कह रहे थे इस वीडियो में कि एक

जो असमंजस की स्थिति है जो एक सामंजस्य है
वह नहीं दिखाई पड़ता है दिल्ली में 2020
और 21 के किसान आंदोलन से जुड़े कई
संगठनों ने पंजाब में विधानसभा चुनाव

लड़ने की इच्छा जाहिर की थी इस बात पर
संयुक्त किसान मोर्चे के पदाधिकारी और
किसान संगठनों के बीच टकरा हट बढ़ने लगी
थी पंजाब के किसान संगठनों का यह कहना था

कि संयुक्त किसान मोर्चा एसकेएम ने 23
संगठनों को निलंबित कर दिया था जबकि उनमें
से केवल आठ संगठन ही सीधे तौर पर चुनाव

में कूदे थे उस वक्त किसान नेताओं का यह
कहना था कि अगर किसी ने एसकेएम के नियमों
का उल्लंघन किया तो उसकी सजा व्यक्ति को
मिलनी चाहिए ना कि संगठन को एसकेएम के इस

निर्णय के खिलाफ पंजाब के दो दर्जन से
अधिक किसान संगठनों ने समन्वय समिति की
बैठक बुलाने की मांग की थी और उस वक्त
पंजाब के किसान संगठनों द्वारा गठित

राजनीतिक दल संयुक्त समाज मोर्चा का
नेतृत्व बलबीर सिंह रावाल कर रहे थे इनके
साथ ही भारतीय किसान यूनियन और हरियाणा के
अध्यक्ष गुरुनाम सिंह चडो की संयुक्त
संघर्ष पार्टी भी सक्रिय हो गई संयुक्त

समाज मोर्चा ने 100 से अधिक सीटों पर अपने
उम्मीदवार घोषित कर दिए इधर योगेंद्र यादव
और चड भी निलंबित हुए क्योंकि इससे पहले
जो किसान आंदोलन हुआ था उसके दौरान कोई भी

सदस्य किसी राजनीतिक प्लेटफार्म पर नहीं
जाएगा इस तरीके की बात कही गई थी लेकिन ना
आंदोलन खत्म होने के बाद एसकेएम ने कहा था
कि मोर्चे का काम मोर्चे का नाम किसी भी

राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होना
चाहिए अगर कोई सदस्य नियमों का उल्लंघन
करता है तो उसके लिए इसको निलंबन का सामना
करना पड़ेगा और तभी गुरनाम सिंह चड चुनाव
लड़ने की बात कहते दिखाई पड़े और उन्हें

पार्टी से निलंबित किया गया उसी वक्त
योगेंद्र यादव जब लखीमपुर खीरी में बीजेपी
के एक कार्यकर्ता के घर गए थे तो एक माह
तक उन्हें निलंबित कर दिया गया था दिल्ली

मार्च को लेकर पंजाब के किसान मजदूर
संघर्ष कमेटी के अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह
साबरा का यह दावा है कि करीब 200 किसान
यूनियने दिल्ली की तरफ मार्च कर रही हैं

नौ राज्यों के किसान यूनियंस से संपर्क भी
किया जा रहा है लेकिन ओवरऑल जो एनालिसिस
कहता है वो यह कि पिछली बार जब दिल्ली चलो
के मोर्चे के साथ किसान लामबंद हुए थे तो
उनके बीच में समन्वय था लेकिन इस बार ऐसा

नहीं दिखाई पड़ता किसान संगठनों को भी इस
बात का डर है कि कहीं ऐसा ना हो कि हमारे
बीच का जो अ समन्वय ठीक-ठाक नहीं है उसका
फायदा कहीं सरकार ना उठाए हालांकि सरकार
ने बातचीत करने के लिए अर्जुन मुंडा और
पियूष गोयल दोनों ही अपने केंद्रीय

मंत्रियों को आगे कर दिया है जो किसानों
से बातचीत करेंगे

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