Farmers Protest- क्या है स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट, जिसे लागू करने के लिए हो रहा है बवाल? - instathreads

Farmers Protest- क्या है स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट, जिसे लागू करने के लिए हो रहा है बवाल?

भारतीय किसानों ने एक बार फिर केंद्र
सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है यह
आंदोलन किसानों ने एमएसपी की गारंटी समेत
कई अन्य मांगों को लेकर किया है लेकिन

इसमें प्रमुख रूप से एमएसपी की मांग है और
स्वामीनाथन कमीशन को लागू करने का डिमांड
शामिल है जिनकी कमीशन की रिपोर्ट को लागू
करने की मांग की जा रही है उनका पूरा नाम
डॉ मोन कोबू साम शिवन स्वामीनाथ है

स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का
जनक माना जाता है भारत में कृषि के
प्रोडक्टिविटी को बढ़ाने के लिए एक
रिपोर्ट पेश की थी जिसे स्वामीनाथन
रिपोर्ट कहा जाता है इस रिपोर्ट को लागू
करने के लिए किसान समय-समय पर अपनी मांग

उठाते रहते हैं तो आइए जानते हैं इस
रिपोर्ट में क्या है स्वामीनाथन रिपोर्ट
इस रिपोर्ट में क्या कहा गया है सरकार
क्यों नहीं कर पा रही है इसे लागू एमएसपी

क्या है कौन थे स्वामीनाथन साल 1925 में
तमिलनाडु के कुंभकोणम में जन्मे
स्वामीनाथन ने भारत को खदान के क्षेत्र
में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका

निभाई थी पिछले साल 28 सितंबर को उनका 98
साल की उम्र में निधन हुआ था स्वामीनाथन
ने देश में सदियों से चले आ रही खेती के
पुराने तरीकों को छोड़कर आधुनिक तकनीकी

अपनाने की वकालत की थी उन्होंने देशी और
विदेशी किस्म के अनाजों को मिलाकर नई संकर
किस्में बनाई थी ये किस्में कम समय में
बेहतर फसल देती थी इनका इस्तेमाल 60 के
दशक के आखिर में शुरू हुआ था और यह बेहद

सफल भी साबित हुआ यही वजह है कि उन्हें
हरित क्रांति के जनक के रूप में जाना जाता
है स्वामीनाथन कमेटी ने क्या सिफारिश किया
था किसानों की बढ़ती समस्या और घटते

पैदावार को देखते हुए केंद्र सरकार ने साल
2004 में एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता
में राष्ट्रीय किसान आयोग यानी एनसीएफ का
गठन किया था एनसीएफ ने 2004 2006 के बीच

पांच रिपोर्टें पेश की थी जिनमें भारत में
मेजर फार्मिंग सिस्टम प्रोडक्टिविटी
प्रॉफिटेबिलिटी और स्थिरता को बढ़ाने के
तरीकों पर सुझाव दिए गए इसके साथ ही इस

रिपोर्ट ने सरकार से सिफारिश की थी कि
सरकार किसानों की फसलों को लागत मूल्य से
सीधे डेढ़ गुना कीमत पर खरीदे और आगे अपने
हिसाब से बेचे इसके अलावा कमेटी ने
मुख्यतः किसानों के लिए लैंड रिफॉर्म
सिंचाई प्रोडक्शन क्रेडिट और बीमा फूड

सिक्योरिटी से संबंधित सिफारिशें की थी
इन्हीं सिफारिशों को आसान भाषा में
स्वामीनाथन की रिपोर्ट कही जाती है ये
रिपोर्ट 2006 के अंत और 2007 के शुरुआत

में सरकार को सौंप दी गई थी इसके बाद से
ही सरकारें इसे लागू करने की बात करती हैं
लेकिन इसे अब तक लागू नहीं किया जा सका है
क्या है एमएसपी किसान स्वामीनाथन कमेटी को

लागू करने की क्यों मांग कर रहा है इसको
समझने के लिए आपको एमएसपी यानी मिनिमम
सपोर्ट प्राइस को समझना होगा दरअसल किसान
साल भर में मौसम के हिसाब से फसले उगाता

है खरीफ की सीजन में धान या चावल और रबी
में गेहूं की पैदावार करता है और उसे
सरकार या फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में
बेचता है ऐसे में सब ठीक रहता है लेकिन
समस्या उस समय आ जाती है जब किसी मौसम में

पैदावार अधिक हो जाती है क्योंकि पैदावार
की खपत में बढ़ोतरी नहीं होती है जिसकी
वजह से भंडारण बढ़ जाता है और डिमांड कम
हो जाती है जिसकी वजह से फसलों की कीमत

में गिरावट आ जाती है ऐसे में किसानों की
फसल की कीमत नहीं निकल पाती और किसान
परेशान होकर खेती छोड़ने को मजबूर हो जाते
हैं या फिर कर्ज वापस नहीं कर पाते और

आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं ऐसे में
स्वामीनाथन कमेटी ने सिफारिश की थी कि
किसानों के फसल के लागत के डेढ़ गुना यानी

मिनिमम सपोर्ट प्राइस तय कर सरकार उनके
फसल खरीदे ताकि किसान को नुकसान ना उठाना
पड़े इसे ही एमएसपी कहा गया है कौन-कौन सी
फसलों पर एमएसपी मिलता है इसमें सात तरह
के अनाद है धान गेहूं मक्का बाजरा ज्वार

रागी और जौ पांच तरह की दालें हैं चना
अरहर उड़द मूंग और मंसूर सात तिलन है
रेपीसीड सरसों मूंगफली सोयाबीन सूरजमुखी
तिल कुसुम चार व्यवसायिक फसलें हैं
कपास गन्ना खोपरा कच्चा जूट एमएसपी के

बाजार की कीमतों को भी एक आधार मिल जाता
है और यह सुनिश्चित हो सकता है कि किसानों
को एक निश्चित प्रासिक मिले ही ताकि उनकी
खेती की लागत कम हो सके क्या एमएसपी की
गारंटी दी जा सकती है एमएसपी की गारंटी
देने के लिए तीन तरीके हैं इसमें पहला

तरीका है खरीददारों को एमएसपी पर फसल
खरीदने के लिए कहा जाए लेकिन व्यवसायिक
तौर पर यह ठीक नहीं होगा और ना ही
व्यापारिक तौर पर क्योंकि गन्ना उत्पादकों

को चीनी मिलों की तरफ से खरीद के लिए 14
दिनों के अंदर पेमेंट करने के निर्देश है
और राज्य का सलाह मूल्य मिलेगा लेकिन
कानून होने के बावजूद कुछ जगहों पर ऐसा
नहीं है क्योंकि ऐसा कंपनियों को करने में

मुश्किल होता है और व्यापारिक रूप से घाटा
भी हो सकता है इसीलिए गंडे के मूल्य 14
दिनों पर नहीं पेमेंट हो पाता है और ना ही
एमएसपी तय हो पाती है और सरकार को यह भी
डर है कि एमएसपी के डर से व्यापारी किसान

से अनाज खरीदना बंद भी कर सकता है दूसरा
तरीका यह है कि सरकार ही किसानों की पूरी
फसल एमएसपी में खरीद ले मगर यह बीत लिहाज
से टिकाऊ प्लान नहीं है तीसरा का सरकार यह

कर सकती है कि किसी भी फसल के लिए मूल्य
कमी भुगतान यानी पीडीपी तय करें इसमें
सरकार को किसी भी फसल को खरीदने या स्टॉक
करने की जरूरत नहीं है एक बार कीमत फिक्स

होने के बाद बाजार में उसी कीमत पर फसल
बिक सकती है इसे मध्य प्रदेश में भावांतर
भुगतान योजना के जरिए आजमाया गया था लेकिन
देश के स्तर पर लागू नहीं किया गया है तो

अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के हिसाब से
इसमें भी खामियां निकल सकती हैं तो ऐसे
में सरकार के सामने भी एमएसपी लागू करने

के पीछे कई चुनौतियां हैं जिसकी वजह से
इसे लागू नहीं किया जा रहा है इस ट में
फिलहाल इतना ही बाकी देश दुनिया खबरों के
लिए बने रहिए जनसत्ता के साथ
धन्यवाद

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