Indian Hidden Treasures_Lost Treasure in India_ भारत के रहस्यमयी खजाने_Treasure In Indian Temple - instathreads

Indian Hidden Treasures_Lost Treasure in India_ भारत के रहस्यमयी खजाने_Treasure In Indian Temple

बहुत घना अंधेरा था इतना कि हाथ में लिए
बड़े से दिए की लव भी जुगनू सी दिखाई देती
थी सन्नाटा इतना कि धीमी सी आवाज भी शोर
जैसा मालूम होती थी लेकिन कैसे भी कर

दोनों को आज खजाने के द्वार तक पहुंचना ही
था जो उनकी पहुंच से अब बहुत दूर भी नहीं
था तभी अचानक उनमें से एक को ऐसा लगता है
कि मानो कोई तीसरा भी उनके साथ चल रहा हो

वो डर जाता है और आनन फानन में अपनी कटार
निकालकर उस आवाज की तरफ चल देता है तभी
दूसरे आदमी के हाथ का दिया छूटकर जमीन पर
गिरता है और दिए की लौ बुझ जाती है साथ ही

सुनाई देती है किसी खोपड़ी के जमीन पर गिर
कर चटकने की आवाज बद हबाद सा वो आदमी तेजी
से बाहर की ओर भागा अंधेरे में जो रास्ता
समझ में आया उसी पर दौड़ा और किस्मत अच्छी

थी कि बिना कहीं भटके एकदम सही जगह पर लौट
आया हालांकि जब दहशत से बाहर निकला तो ये
एहसास हुआ कि उसने अपने ही कदमों की हाड़
सुनकर धोखे में आके अपने ही साथी को मार

दिया है दोस्तों ऐसी ना जाने कितनी ही
कहानियां हैं जो भारत के खजानो वन की तलाश
से जुड़ी हुई है कहीं सांपों के द्वारा तो
कहीं किसी अदृश्य शक्ति द्वारा रखवाली किए
जाने की घटनाएं खज खजाने के रहस्य और

तिलिस्म को और गहरा करने का काम करती हैं
कई खजाने तो ऐसे भी हैं जिनके तह खानों का
पता लग जाने के बाद भी सरकार तक उनके
दरवाजे नहीं खोल सकी है किसी ने तोड़ने की

कोशिश भी की तो नाकाम हो गया किसी ने
खुदाई करने में महीनों जीतो और मेहनत की
लेकिन हाथ कुछ भी नहीं आया भारत में ऐसे
तिलस्मी खजानो की भरमार है जो आज भी रहस्य

बने हुए हैं आज के इस वीडियो में हम ऐसे
ही कुछ खजानो से जुड़ी कहानियां आपके लिए
लेकर के आए हैं इसलिए बने रहिए हमारे साथ
इस वीडियो में शुरू से अंत तक नमस्कार
दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सूर्यवंशी और

आप देख रहे हैं नारद टीवी सभी जानते हैं
कि भारत को कभी सोने की चिड़िया भी कहा
जाता था सोने चांदी हीरे जवाहरात की कभी
कोई कमी नहीं थी सैकड़ों सालों तक मुगलों
और अंग्रेजों द्वारा लूटे जाने के बाद भी

यहां के मंदिरों गुफाओं और किलों के
तहखाने में आज भी बहुत बड़े मात्रा में
खजाने पड़े हुए
[संगीत]
हैं भारत के केरल राज्य के तिरुवंतपुरम
में भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध मंदिर है

पद्मनाभ मंदिर यह मंदिर जित जितना
प्रसिद्ध है उतना ही प्रसिद्ध है इसका
खजाना भी इस मंदिर को त्रावणकोर के राजाओं
ने बनवाया था नवीं शताब्दी में बने इस
मंदिर को बाद में 18वीं शताब्दी में जीवनो

उद्धार किया गया था बता दें कि भगवान
विष्णु की विश्राम अवस्था को पद्मनाभ कहा
जाता है 1750 में वहां के महाराजा मार्तंड

वर्मा ने खुद को भगवान पद्मनाभ का दास
बताकर अपने शाही परिवार सहित भगवान की
सेवा में लग गए माना जाता है कि इसी वजह
से त्रावणकोर के राजाओं ने अपनी दौलत
पद्मनाभ मंदिर को सौंप दी आजादी के बाद

त्रावणकोर का तो भारत में विलय कर दिया
गया लेकिन पद्मनाभ स्वामी मंदिर को सर
सकार ने वहां के शाही परिवार के पास ही
रहने दिया ऐसा कहा जाता है कि जब भारत

सरकार हैदराबाद के निजाम जैसे शाही
परिवारों की दौलत को अपने कब्जे में ले
रही थी उसी समय शायद त्रावणकोर के

तत्कालीन राजा ने अपनी सारी दौलत मंदिर
में छिपा दी हो हालांकि मंदिर हमेशा ही
विदेशी आक्रमणकारियों की नजरों में रहा था
लेकिन कभी कोई उसे लूट नहीं सका यहां तक

कि 1790 में टीपू सुल्तान ने भी इस मंदिर
को कब्जे में लेने की कोशिश की लेकिन
कामयाब नहीं हो सका साल 1991 में
त्रावणकोर के अंतिम राजा बलराम वर्मा की

मौत हो गई तब से पद्मनाथ स्वामी मंदिर का
कामकाज शाही परिवार के अधीन एक प्राइवेट
ट्रस्ट चलाता रहा है हालांकि साल 2007 में
एक आईपीएस अधिकारी ने याचिका दायर कर इस
खजाने पर राज परिवार के अधिकार को चुनौती

दी जिसके बाद 27 जून 2011 को सुप्रीम
कोर्ट ने इस मंदिर के तहखाने को खोलकर
पूरी संपत्ति का व्यव तैयार करने को कहा
इसी के बाद एक के बाद एक कई रहस्यों से
पर्दा उठना शुरू हुआ जो कि उन दिनों काफी

चर्चा का विषय भी बना दरअसल इस मंदिर में
कुल छह तहखाने थे जिनके पांच तहखाने से
काफी बड़े खजाने मिले जिन्हें इकट्ठा करने
पर लगभग 1 लाख करोड़ की वैल्यू बताई गई

हालांकि छम तहखाने को नहीं खोला जा सका
जिसमें इन सबसे कहीं बड़े खजाने की उम्मीद
की जा रही थी दरअसल राज परिवार इस तहखाने
को खोलने की अनुमति नहीं दे रहा है उन्हें

डर है कि य इस मंदिर का छठा तहखाना खुल
गया तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा कहा जाता
है कि आज से 140 साल पहले छठे तहखाने को
खोलने की कोशिश की गई थी तब तहखाना खोलते

वक्त कई तरह की भयानक आवाजें सुनाई देने
लगी जिसके बाद किसी ने कोशिश नहीं की कहा
जाता है कि उन आवाजों के साथ उन्हें पानी
की तेज लहरों जैसी आवाज भी सुनाई देती थी

जैसे दरवाजे के पीछे ही समंदर उफान मार
रहा हो इन भयानक आवाजों की वजह से वहां के
पुजारी और स्थानीय लोगों का मानना है यदि
इस तहखाने खाने को खोला गया तो धरती का

सर्वनाश तक हो सकता है मंदिर के पुजारी और
राज परिवार के लोगों का यह भी मानना है कि
छठे तहखाने में एक गुप्त सुरंग है जिसका
रास्ता सीधे समुद्र में जाकर के मिलता है
कहा जाता है कि सुरंग में एक विशाल काय कई

सिर वाले काले नाग का वास है साथ ही नागों
का एक विशाल झुंड इस खा जाने की हिफाजत
करता है स्थानीय लोगों का तो मानना यह भी
है कि मंदिर का यह छठा तहखाना सीधे अरब
सागर से जुड़ा है जिस पूरे राज्य को

पश्चिमी देशों से जोड़ता है कहा जाता है
कि त्रावणकोर के राजाओं ने इस लिसम को कुछ
ऐसे डिजाइन ही करवाया था कि अगर उस वक्त
कोई खजाना को हासिल करने के लिए छठा
दरवाजा तोड़ने की कोशिश भी करता है तो

समुद्र का पानी खजाने को बहा ले जाता और
किसी के हाथ कुछ नहीं
लगता इस कड़ी में अगला नाम है जयगढ़ किले
में स्थित खजाने का दोस्तों इस खजाने और
इसके खोज की कहानी इतनी दिलचस्प और फिल्मी

है जिसे सुनकर आप भी खादर खान स्टाइल में
बोलने लगेंगे कि दौलत मिली नहीं लेकिन
हिस्सा मांगने वाले पहले आ गए दरअसल
राजस्थान में स्थित जयगढ़ किले के खजाने

की यह कहानी जुड़ी है राजा मानसिंह प्रथम
से जो बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक
थे और उस समय अकबर के सेनापति हुआ करते थे
मान सिंह ने 1580 में अफगानिस्तान को जीता
और वहां के खजाने को अपने साथ भारत ले आए
जिसमें कई टन सोना चांदी हीरे जबरात भी थे

कहा जाता है कि यह संपत्ति उन्होंने मुगल
सल्तनत के हवाले ना करके जयगढ़ के किले
में छिपा दी थी अरबी भाषा की एक पुरानी
किताब हफ्त लस्ते अंबेरी यानी अंबेर के
साथ खजाने में भी इस बात का जिक्र है कि

किले में था सोना चांदी छिपा हुआ है ऐसा
माना जाता है कि जयगढ़ किले के नीचे पानी
की सात विशाल काय टंकियां बनी हुई है
जिनमें खजाना आज भी मौजूद है इस खजाने को

लेकर एक और कहानी भी राजस्थान में प्रचलित
है ऐसा माना जाता है कि मान सिंह ने इस
खजाने के बारे में रानी जोधाबाई को बता
दिया था जिसके बाद जोधाबाई ने इसे फतेहपुर

सीकरी स्थित एक मंदिर में रखवा दिया था
बाद में मंदिर नष्ट होकर रेत के नीचे दब
गया इसके साथ ही वह खजाना भी दफन हो गया
हालाकि स्थानीय लोगों का मानना है कि आज

भी खजाना उसी मंदिर के स्थान में दबा हुआ
है बहरहाल खजाना कहां गड़ा है ये आज भी एक
रहस्य है क्योंकि इसे खोजने की कोशिश किले
में भी की जा चुकी है कहा जाता है कि साल

1976 में जब देश में आपातकाल लागू हुआ था
उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा
गांधी ने इस खजाने की खोज में छ महीने तक
केले के अंदर खुदाई करवाई थी इस काम में

इन्होंने सेना को भी लगाया था और बाद में
आधिकारिक रूप से घोषणा की गई कि सरकार को
इस खुदाई में कुछ भी नहीं मिला हालक इस
दौरान यह भी कहा गया कि खजाना मिल गया था
लेकिन उस खबर को छुपाया गया बताया जाता है

कि जब सेना का अभियान समाप्त होने के बाद
एक दिन दिल्ली जयपुर हाईवे आम लोगों के
लिए बंद कर दिया गया था और इस दौरान जयगढ़
किले के खजाने को सीना के ट्रकों में भरकर
दिल्ली लाया गया था इसके पीछे कितनी

सच्चाई है ये तो हम कह नहीं सकते हैं
लेकिन हाईवे बंद हुए थे इसकी पुष्टि करने
के लिए कई स्रोत आज भी मौजूद हैं संदेह का
दूसरा कारण इसलिए भी बनता है कि सरकार ने
कभी इसका स्पष्टीकरण आरटी में भी ठीक-ठाक

नहीं दिया है सबसे दिलचस्प बात यह है कि
खुदाई के दौरान ही प्रधानमंत्री इंदिरा
गांधी के नाम पड़ोसी देश के तत्कालीन
प्रधानमंत्री जुलफ करर अली भुट्टो का एक
पत्र आता है जिसमें लिखा था आपके यहां

खजाने की खोज का काम आगे बढ़ रहा है और
मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि आप इस
दौरान मिली संपत्ति के वाजिब हिस्से पर
पाकिस्तान के दावे का ख्याल रखें इस पत्र

के जवाब में इंदिरा गांधी ने लिखा था कि
हमने अपने कानूनी सलाहकारों से कहा था कि
वे आपके द्वारा पाकिस्तान की तरफ से किए
गए दावे का ध्यान से अध्ययन करें उनका

साफ-साफ कहना है कि इस दावे का कोई कानूनी
आधार नहीं है वैसे यहां खजाने जै ऐसा कुछ
मिला ही
नहीं मंदिर और किले के अलावा खजाने को
छुपाए जाने की जो सबसे खास जगह होती है वो

है गुफा और उन्हीं में से एक है सोन गुफा
बिहार के राजगीर में स्थित इस गुफा में
सदियों से एक बहुत बड़े खजाने के मौजूद
होने का दावा किया जाता है भारतीय पुरा

तक्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार ये गुफाएं
तीसरी या चौथी शताब्दी की हैं यह माना
जाता है कि आजा शत्रु ने अपने पिता
बिंबिसार को गिरफ्तार करके इसी गुफा में

बंधक बना कर के रखा था और बिसार ने अपने
धन को आजार शत्रु के हाथों से बचाने के
लिए इस से गुफा के तहखाने में छुपा दिया
था इस पूरी गुफा को चट्टानों को काटकर दो
बड़े कमरे बनवाए गए थे गुफा के पहले कमरे

में बाकायदा सिपाहियों के रुकने का इंतजाम
था तोही दूसरे कमरे में खजाने को छुपाया
गया था जिसे एक विशाल चट्टान से ढका गया
है सबसे खास बात इस गुफा की एक चट्टान पर

शंख लिपि में कुछ लिखा हुआ है कहा जाता है
किसी शंख लिपि में खजाने के कमरे को खोलने
का उपाय भी लिखा हुआ है लेकिन अफसोस कि इस
लिपि को आज तक कोई पढ़ नहीं पाया है
हालांकि ऐसा नहीं है कि इसे खोलने के या

चट्टान को हटाने का कभी प्रयास नहीं किया
गया लेकिन चट्टान इतना मजबूत है कि हर
कोशिश नाकाम साबित हुई है दरअसल कभी
अंग्रेजों ने इस गुफा के कमरे को खोलने के

लिए काफी नाकाम कोशिश की थी यहां तक कि
तोपों से इस गुफा पर प्रहार भी किया था
जिसके निशान आज भी इसके ऊपर देखे जा सकते
हैं लेकिन य गुफा और इसकी चट्टान इतनी
मजबूत थी कि अंग्रेजों को खाली हाथ वापस

लौटना पड़ा
था इस कड़ी में जो अगला खजाना है वह किसी
मंदिर किले या गुफा में नहीं बल्कि पानी
के भीतर दबा हुआ है जिसके बारे में जानते
हुए भी धार्मिक मान्यताओं के कारण कभी
खोजने की कोशिश नहीं की गई हिमाचल प्रदेश

के मंडी से करीब 60 किमी दूरी पर स्थित
कमरूनाग झील जिसे लोग बहुत ही पवित्र
मानते हैं सैकड़ों सालों से आस्था वर्श
लोग दूर-दूर से आकर इस झील में अपने कीमती

गहनों और रुपयों को अर्पित कर देते हैं
ऐसी मान्यता है कि इस झील में सोना चांदी
चढ़ाने से मन्नत पूरी होती है लोग अपने
शरीर का कोई भी गहना यहां चढ़ा देते हैं

और यह परंपरा ना जाने कब से चली आ रही है
इसी कारण यह झील सोने चांदी और पैसों से
भरी रहती है लेकिन यह सब कभी भी इस झील से
निकाला नहीं जाता क्योंकि इसे देवताओं का

माना जाता है मान्यता तो यह भी है कि झील
का रास्ता सीधे पाताल तक जाता है जहां
पहले से ही देवताओं का खजाना छिपा हुआ है
कहा जाता है किय झील महाभारत कालीन है

यहां एक मंदिर है जो लकड़ी का बना है
इसमें कमरू नाग की एक पुरानी मूर्ति भी
रखी हुई है क्योंकि सदियों से झील में

गहने रुपए आदि चढ़ाने की परंपरा चली आ रही
है इसमें कोई संदेह नहीं है कि झील की
तलहटी में एक बहुत ही बड़ा खजाना मौजूद है
लेकिन कितना बड़ा इसकी गणना कोई नहीं कर
सकता देखा जाए तो भारत में दो-चार नहीं

बल्कि दर्जनों ऐसे किले हैं जिनमें खजाने
आज भी मौजूद हैं लेकिन इन खजानो का रहस्य
किसी को नहीं पता हिमाचल प्रदेश के
हमीरपुर जिले में स्थित ऐसा ही एक किला है

जहां बहुत ही विशाल खजाना छिपा हुआ है
हमीरपुर जिले के इस किले को सुजानपुर किले
के नाम से जाना जाता है साथ ही खजाना छिपे
होने की वजह से इसे खजांची किला भी कहा

जाता है इस किले को साल 1758 में कटोच वंश
के राजा अभय चंद्र ने बनवाया था बाद में
राजा संसार चंद्र ने यहां शासन किया था और
ऐसा माना जाता है कि उन्होंने लूटपाट के
डर से इस किले में सोने चांदी हीरे

जवाहरात छिपा दिए थे जिसका रहस्य किसी को
नहीं पता कहा जाता है कि इस किले में अभी
भी वो खजाना मौजूद है जहां तक पहुंचना
काफी मुश्किल है जानकारों के मुताबिक इस

किले के अंदर लगभग 5 किमी लंबी एक सुरंग
है जिसके अंतिम छोड़ तक आज तक कोई नहीं जा
सका है इस स्वरंग का रास्ता भी काफी पतला
और अंधेरों से भरा हुआ है इतना ही नहीं

किले के पास रहने वाले लोगों का कहना है
कि रात के समय किले से अजीब सी डरावनी
आवाजें भी आती हैं स्थानीय लोगों का तो यह

भी मानना है कि इस खजाने की रक्षा करने के
लिए किले में रूहानी ताकतें मौजूद है
इसलिए उनके होते हुए वहां तक कोई पहुंच
नहीं सकता है बताया जाता है कि राजा संसार
चंद इस सुरंग का इस्तेमाल लूटे हुए खजाने

को छुपाने के लिए करते थे इसके अलावा इस
सुरंग में एक गुप्त रास्ता भी बना हुआ है
जो सीधे खजाने तक जाता है इस खजाने को
हासिल करने के लिए लोगों ने बार-बार खुदाई
की लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी है

दोस्तों भारत में नाना तो खजानो की कोई
कमी है और ना ही उनके पीछे की कहानियों की
इसलिए सबकी चर्चा हम एक वीडियो में तो
नहीं कर सकते हैं लेकिन उस कहानी को हम
जरूर पूरा करना चाहेंगे जिससे इस वीडियो

की शुरुआत हुई थी यानी ग्वालियर के राजा
माधव सिंह यानी सिंधिया राज घराने के
खजाने की इस खजाने को गंगाजली खजाना भी
कहा जाता है जिसे लेकर कर्नल बैनरमैन ने
कहा था यह खजाना अलीबाबा के खजाने की
कल्पना को हकीकत में देखने जैसा था खजाने

में 6 करोड़ 20 लाख सोने के सिक्के निकले
लाखों चांदी के सिक्के हजारों की संख्या
में बेशकीमती दुर्लभ रत्न मोती हीरे जवारा
निकले हालांकि ये तहखाना तो उन कई तहखाने
में से केवल एक ही था दरअसल ग्वालियर किले

में ऐसे कई और तैने भी थे जहां गंगाजली
खजाना छुपा हुआ था लेकिन इस खजाने के
मिलने के बाद कुछ वर्षों तक खजाने की खोज
रोक दी गई बाद में जब माधवराव बड़े हुए तो

उनका राजतिलक हुआ और सिंधिया राजवंश का
उत्तराधिकार उन्हें मिला उन्होंने अन्य
तहखाने की खोज पुनः शुरू की लेकिन माधवराव
की बहुत कोशिशों के बावजूद भी खजाने का
पता नहीं चल पाया एक दिन राजा माधवराव

शिकार खेलने के लिए जा रहे थे तभी वहां एक
वृद्ध ज्योतिषी आया और उसने माधवराव के
कान में बोला कि वह खजाने का पता जानता है
और वो राजा को खजाने तक ले जाएगा और उसकी
शर्त ये थी कि राजा को अकेले उसके साथ आना
होगा माधव राव ने थोड़ा सोच विचार के बाद

हां कह दिया इसके बाद ज्योतिषी ने राजा के
सामने एक और शर्त रखी वो ये कि राजा
माधवराव को वहां नियते ही आना होगा और जते
स उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें
खजाने तक ले जाएगा माधवराव यह शर्त भी

मानने को तैयार हो गए लेकिन उन्होंने
सुरक्षा के नाम पर एक हथियार अपने कपड़ों
में छिपा लिया अगले दिन ज्योतिषी राजा
माधवराव को किले के अंदर कई गुप्त रास्तों

से ले जाते हुए आखिरकार खजाने के द्वार तक
पहुंचा दिया इसी बीच तहखाने के भीतर जाते
हुए राजा माधवराव को ऐसा लगा कि कोई तीसरा
व्यक्ति भी उनके साथ-साथ पीछे चल रहा है

और उन्होंने जान का खतरा समझकर अपना
हथियार निकाला और ताकत से प्रहार कर दिया
सब कुछ पल भर में ही हो गया इसके आगे की
कहानी तो आप सुन ही चुके हैं लेकिन उसके

चाहते हो क्योंकि राजा माधव राव तै खाने
तक एक बार जा ही चुके थे इसलिए उनको ये
भरोसा था कि वो कभी भी उस खजाने तक पहुंच

सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो सका अगले कई
सालों तक लाखों कोशिशों के बावजूद माधवराव
उस तहखाने तक दोबारा नहीं पहुंच पाए अपनी
नाकामी से राश होकर माधवराव ने खजाने की
खोज तो बंद कर दी लेकिन कहते हैं ना कि

किस्मत में जो कुछ मिलना है वह एक ना एक
दिन मिले जाता है दरअसल हुआ ये कि एक दिन
राजा माधवराव किले के एक पुराने गलियारे
से गुजर रहे थे जो केवल शाही परिवार के

लिए ही बनाया गया था उस रास्ते से गुजरते
हुए अचानक माधवराव का पैर फिसला और संभलने
के लिए उन्होंने पास के खंभे को पकड़ लिया
लेकिन ये क्या हाथ लगते ही वह खंभा एक तरफ

झुक गया और एक गुप्त छुपे हुए तहखाने का
दरवाजा अपने आप ही खुल गया माधवराव ने
फौरन अपने सिपाहियों को बुलाया और तहखाने
की छानबीन शुरू कर दी बताया जाता है कि उस

तहखाने से माधवराव सिंधिया को दो करोड़
चादी के सिक्कों के साथ अन्य बूल रथ मिले
इस खजाने के मिलने से माधवराव की आर्थिक
स्थिति में बहुत वृद्धि हुई इसके बाद

माधवराव राव ने लड़े लिया कि वो कभी भी
अपने धन को इस तरह गुप्त रूप से नहीं छुपा
पाएंगे ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियों को
इसे खोजने में कोई परेशानी ना उठानी पड़े
राजा माधवराव ने अपने खजाने को रुपयों में

बदला और मुंबई लाकर उद्योग जगत की कई
बड़ी-बड़ी कंपनियों में निवेश किया साल
1920 में जब टाटा ग्रुप कंपनी काफी बुरे
दौर से गुजर रही थी तब टाटा समूह के
प्रबंधकों ने राजा माधवराव से आर्थिक मदद

मांगी इसके लिए राजा माधवराव तुरंत तैयार
हो गए थे उसी समय माधवराव और सिंधिया राज
घराना टाटा समूह के सबसे बड़े निवेशकों के
तौर पर जुड़ गए थे और टाटा कंपनी के एक
बड़े हिस्से के मालिक भी तो दोस्तों भारत

के तिलस्मी खजानो से जुड़ा हमारा आज का यह
वीडियो आपको कैसा लगा कमेंट में जरूर
बताइएगा क्या आपने भी ऐसे खजानो और उनसे
जुड़ी कहानियां सुनी है अगर सुनी है तो
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रिस्पांस अच्छा रहा तो इसका अगला भाग भी
जल्दी लेकर के आएंगे मिलते हैं आपसे अगली
वीडियो में एक और नई कहानी के साथ तब तक
के लिए नमस्कार

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