IT इंजीनियरों, IIM वालों को नहीं मिल रही नौकरी | IT, IIM Graduates without jobs - instathreads

IT इंजीनियरों, IIM वालों को नहीं मिल रही नौकरी | IT, IIM Graduates without jobs

नमस्कार  नौकरी खोजना और
अखबारों में नौकरी से जुड़ी खबरों को
खोजना दोनों में खास अंतर नहीं है कई
अखबार तो पूरी कोशिश करते हैं कि उनके
यहां नौकरी जाने या नहीं मिलने की खबरें
नहीं छपे ताकि उनकी हेडलाइन में जो

अर्थव्यवस्था चमक रही होती है वह फी ना
लगे इसके बाद भी नौकरी नहीं मिलने की इतनी
खबरें छप जाती हैं कि उन्हें देखकर आप
अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कौन सी
अर्थव्यवस्था है जो तरक्की कर रही है मगर

नौकरी नहीं दे रही अगर आईआईएम और आईआईटी
से पास करने वाले छात्रों को नौकरी के
लाले पड़ेंगे तो बाकी की क्या हालत होगी
सवाल है कि जिन्हें नौकरी नहीं मिल रही है
वह चुप हैं वही नहीं बोल रहे हैं तो क्या

किया जाए इसलिए हमने एआई से हासिल
तस्वीरों से उन नौजवानों को गढ़ लिया जो
देखने में इंसानी हाड़ मांस के ही लगते
हैं मगर वे भी नहीं बोलते हैं कप रेट के
लोग कभी बोला करते थे 2014 से पहले

अर्थव्यवस्था की हालत खराब है चिल्लाया
करते थे अब तो हालत खराब होने पर भी
उन्हें जयकारे लगाने पड़ते हैं आईआईएम
लखनऊ ने अपने पुराने छात्रों से संपर्क

साधा है कि इस बार पास करने वाले 72
छात्रों को नौकरियां नहीं मिली हैं वे
नौकरी दिलाने में मदद करें मीडिया में छपी
खबरों में संस्थान के बयान में सावधानी भी
छलक रही है कि नौकरी नहीं पाने वालों की

संख्या बहुत ज्यादा तो नहीं है और अभी तो
नौकरी की प्रक्रिया चल भी रही है मगर कई
आईएम संस्थानों से इसी तरह की खबरें आ रही
हैं इकनॉमिक टाइम्स के लिए श्री राधा बसु

और प्राची वर्मा ने एक रिपोर्ट फाइल की है
इसमें बताया है कि आईआईएम के प्लेसमेंट
सेल अपने पुराने छात्रों से संपर्क कर रहे
हैं कि इस साल पास होने वाले छात्रों को

नौकरी दिलवाने में मदद करें आईआईएम के
छात्र भारत की कंपनियों और ग्लोबल
कंपनियों में बड़े ओहद पर हैं इसलिए उनसे
मदद मांगी गई है यह तो आईआईएम का हाल है
वहां पर पुराने छात्रों का नेटवर्क है

बाकी संस्थानों की क्या हालत होगी जहां
ऐसे नेटवर्क नहीं होंगे और इस तरह से तो
होता नहीं कि अपने संस्थान के बंदे को
कंपनी में घुसा लिया अलनस नेटवर्क भाई

भतीजावाद और परिवारवाद का उम्दा संस्करण
है यह सुनने में भी ठीक लगता है इस तरह से
जुगाड़ से नौकरी मिलने में किसी को नैतिक
संकट नहीं है भाई भतीजावाद और परिवारवाद

की विरोधी सरकार भी इसे आजकल प्रमोट कर
रही है आईआईएम वालों को नौकरी नहीं मिल
रही है वह अपना देख लेंगे हमारे लिए यह
खबर इसलिए काम की है क्योंकि इससे दिख रहा

है कि अर्थव्यवस्था में कितना उछाल आ रहा
है दावे ही उछलते जा रहे हैं और नौकरियों
की हकीकत नीचे ढुकराके
दिन की यह खबर है पहले पन्ने पर बिजनेस
स्टैंडर्ड के आयुष्मान बरुआ शिवानी शिंदे

की रिपोर्ट कहती है कि भारत के आईटी
सेक्टर में छटनी की लहर शुरू हो गई है मिड
लेवल के कर्मचारी निशाने पर हैं और इस लहर
में सैकड़ों लोगों की छटनी हो सकती है

अखबार लिखता है कि निवेशक पैसा नहीं डाल
रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के
कारण रूटीन काम के लिए अब लोगों की जरूरत
पहले की तरह नहीं रह गई कंपनियां भविष्य
के लिए खुद को तैयार कर रही हैं दिसंबर

में जो नतीजे आए थे उसमें चार बड़ी टेक
कंपनियों में विप्र की मार्जिन सबसे कम थी
उसका मुनाफा घट गया इकोनॉमिक टाइम्स की
जोकल मडोका ने अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
में लिखा है कि जनवरी से ही कर्मचारियों

को उनकी बर्खास्तगी की जानकारी दी जा रही
है नवंबर के महीने से ही आईटी कंपनियों
में छटनी की खबरें आ रही हैं पुराने
निकाले जा रहे हैं और नए को नौकरी नहीं

मिल रही है इकोनॉमिक टाइम्स की बीना परमार
की रिपोर्ट है कि इस साल भारत की आईटी
कंपनियां 70 से 80000 को ही नौकरी दे
सकेंगी या 20 साल में 20 साल में सबसे कम

होगा इस रिपोर्ट में नौकरी उपलब्ध कराने
वाली कंपनी का अनुमान है कि इस साल 15 लाख
इंजीनियर पास हो रहे हैं इनमें से मुश्किल
से सवा लाख को ही नौकरी मिल सकती है 10
प्र को भी नौकरी मिलने की उम्मीद नहीं है

यह अपने आप में अप्रत्याशित एक समय था जब
कैंपस में 6-6 लाख इंजीनियरों को नौकरियां
मिल जाया करती थी अब अगर उसकी जगह 10000
20000 या सवा लाख को नौकरी मिलेगी तो इस

सेक्टर में कुछ बड़ा बदलाव हो रहा है यही
सब कुछ कह रहा है हम जरूर नौकरी की खबर कर
रहे हैं नौकरी के संकट की लेकिन अगर आप
इसे राजनीतिक मुद्दे के रूप में देख रहे
हैं या इसके जरिए राजनीतिक बदलाव की

उम्मीद पाल रहे हैं तो हम आगे बढ़ने से
पहले रुककर आपके लिए कुछ कहना चाहते हैं
यह सभी तस्वीरें एआई जनित हैं इसकी कल्पना
हमारी है मगर एआई ने उस समाज का करीब-करीब
चित्रण कर ही दिया जिसकी बात अपने तमाम
वीडियो में करता रहा हूं 10 सालों में

देखते देख देखते हाउसिंग सोसाइट
whatsapp-web
मगर उससे भी बड़ा इन सभी ने वह सपना देख
लिया है जिसे मौजूदा सरकार गोदी मीडिया और
आईटी सेल का तंत्र दिखा रहा है
जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं वह

बीजेपी में चला जाता है जांच बंद हो जाती
है उसे भी गलत नहीं मानते अदालतों के
फैसलों में कमजोरियां झलक रही हैं उसे गलत
नहीं मानते किसी की जमानत की सुनवाई
महीनों से बार-बार स्थगित होती जा रही है

तब भी इन्हें शक नहीं होता इसे गलत नहीं
कहते तो मैं आप सभी से जानना चाहता हूं कि
दुनिया के किस स्टुपिड राजनीतिक विद्वान
ने कहा है कि नौकरी नहीं मिलेगी और
जिन्हें मिली हुई है वह चली जाएगी तो

राजनीतिक बदलाव आएगा नौजवान बेरोजगारी
बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं भारत के संदर्भ
में यह बात बिल्कुल फालतू है इन्हें पता
होना चाहिए कि भारत की राजनीति की

रेलगाड़ी से आर्थिक मुद्दों का डिब्बा कब
का अलग हो चुका है और धर्म का डिब्बा जुड़
चुका है नौकरी के सुख से कहीं ज्यादा बड़ा
है इन सभी का हिंदू सुख इस हिंदू सुख के

एहसास को आप नौकरी या सैलरी की बात कर
नहीं मिटा सकते नौकरी और सैलरी कोई मुद्दा
है ही नहीं जब इस समाज ने प्रचंड महंगाई
से लेकर सुस्त कमाई तक को गलत नहीं कहा तो
अपने बच्चों की नौकरी चले जाने से नहीं
मिलने से नाराज हो जाएगा यह किस स्टुपिड

पॉलिटिकल साइंटिस्ट ने आपसे कहा है तब आप
मुझसे यह सवाल पूछ सकते हैं फिर इस वीडियो
का क्या मतलब है तो जवाब है कि इस वीडियो
का मतलब है नौकरी जाने पर भी यह लोग
बोलेंगे नहीं गलत को गलत नहीं कहेंगे इसे

तो दर्ज करना पड़ेगा इसी के लिए यह वीडियो
है आप कुछ भी कर लीजिए मगर इन लोगों को
हाउसिंग सोसाइटी के
सोसाइटी वाले आपको ही फ्लैट से निकाल
देंगे जैसा कि मणिशंकर अयर की बेटी के
मामले में दिल्ली के एक आरडब्ल्यूए ने

फरमान जारी कर दिया अदालतों से ज्यादा
बेहतर और तेजी से आजकल यही लोग फैसला दे
रहे हैं कम से कम यह बताने में संकोच नहीं
करते कि अब कानून वानून की बात किसी और
देश में जाकर कीजिए हम हिंदू सुख में डूबे

लोग हैं हमारा हिंदू सुखी कानून है अगर
कोई दूसरा लाउड स्पीकर बजाएगा तो मोहल्ले
से निकाल दिया जाएगा नौकरियां जा रही हैं
मिल नहीं रही हैं इस खबर को मैं खुद के
लिए कर रहा हूं इससे पता चलता है कि जो

कहा जा रहा है और जो हो रहा है उसमें
कितना फर्क है क्या हम एक ऐसी
अर्थव्यवस्था को देख रहे हैं जिसकी गति
बहुत तेज बताई जा रही है मगर इसकी गाड़ी
पर कोई चढ़ नहीं पा रहा है बस एक गाड़ी

आती है तेजी से निकल जाती है आप जहां है
वहीं खड़े रह जाते हैं या उन खबरों की कुछ
कतरने हैं जो पिछले दो-तीन महीनों के

दौरान नौकरी को लेकर छपी हैं अगस्त 2023
में ही इकोनॉमिक टाइम्स की रोमिता मजूमदार
की खबर इशारा दे चुकी थी इसका टाइटल है वश
आउट ईयर फॉर आईटी भारत की बड़ी आईटी
कंपनियां 2024 में 40 प्र कम हायरिंग

करेंगी क्या यह मामूली कटौती है क्या इस
पर बात नहीं होनी चाहिए मिंट की हेडलाइन
देखिए अक्टूबर 2023 की है भारत के आईटी
सेक्टर में 25 साल में पहली बार हायरिंग
सिकुड़ गई है जुलाई से सितंबर के महीने

में ही नौकरियां घट चुकी थी 25 साल में
पहली बार ऐसा हुआ है कारण भले ग्लोबल है
लेकिन यहां तो डंका बज रहा है कि
आत्मनिर्भर भारत इतनी तेज रफ्तार से बढ़
रहा है तब फिर सवाल उठता है कि क्या

आंतरिक तौर पर भारत में इंजीनियरों के लिए
कोई जॉब मार्केट नहीं है तो किस तरह की
नौकरियां हमारी अर्थव्यवस्था पैदा कर रही
है दिसंबर 2023 में ईटी की खबर देखिए
भारत में छह बड़ी टेक कंपनियां नई

नौकरियों पर ब्रेक लगाने जा रही हैं
13.4 पर और फीमेल ग्रेजुएट्स उनकी संख्या
व 20.6 पर हो जाती है अगर एजेंसियों के
आंकड़े देखे तो स्थिति और भी खतरनाक है यह
है बेरोजगारी के कारण लोग लिखे पढ़े रहे
तो भी युवाओं को आज नौकरी नहीं मिल रही

एंप्लॉयमेंट का बहुत बड़ा मुद्दा है
बेरोजगारी का बहुत बड़ा मुद्दा है इसके
तरफ आप ध्यान देना चाहिए था इस क्या है
बताइए उसके विषय में कुछ नहीं अब युवाओं

को तो आप आकर्षित करते हो अपने भाषणों से
ये सब यहां जाओ फॉरेन जाओ कहीं कहीं जाते
ना हर जगह जाते हैं तो उनको बोल के अपने
भाषणों से तो आकर्ष लेकिन वो पाप बिचारा

भूख पेट से क्या सुनेगा आपका पेट भूखा है
उसका बेरोजगारी है वो क्या सुनेगा तो ये
बेरोजगारी के लिए आपने क्या किया यह हमारा
सवाल है लेकिन उसम कोई कोई जिक्र नहीं है
उसमें और आज महाराष्ट्र में एक उदाहरण

देता हूं 4500 वैकेंसीज के लिए जहां से
हमारे लीडर ऑफ द हाउस आते हैं 10 लाख
एप्लीकेशंस आए और उसमें एमबीए इंजीनियरिंग
यह सब लोग शामिल है हम एक पब्लिक सेक्टर
से एक के बाद एक खत्म कर रहे हैं उससे
नौकरियां भी खत्म हो रही है सरकार में कम

से कम सब मिला के मैं बोलता हूं चाहे चाहे
वो रेलवे के हो चाहे वो पोस्ट ऑफिस के हो
चाहे पुलिस के हो चाहे केंद्रीय विद्यालय
के हो चाहे सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हो ये

सभी मिलाए तो एडेड इंस्टिट्यूशन प्लस
गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन आज नियर 30 लाख
वैकेंसीज
है क्या आपको अपने आसपास की चर्चाओं से या
गोदी मीडिया की बहसों से कभी लगा कि
नौकरियों पर पहाड़ टूटने वाला है

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्रों
की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं बेरोजगार
क्या करेंगे क्या चुनाव में आईटी सेल में
जाकर ट्रोल बनेंगे या कम पैसे की सैलरी पर

दिन रात टते रह जाएंगे यह कैसी तरक्की है
अगर इंजीनियरिंग के लिए काम नहीं है तो
फिर किसके लिए काम है 26 दिसंबर की यह खबर
है कि नए साल से पहले
paytm2 से ज्यादा लोगों को नौकरी से निकाल

दिया 10 प्र लोग निकाले गए कहीं ऐसा ना हो
आरबीआई के ताजा फैसले के बाद और अधिक लोग
निकाल दिए जाएं 26 जनवरी की खबर है स्विगी
ने भी 400 लोगों को निकाल दिया इसी दिन की

खबर है कि फप काट में फिर से 1000 से अधिक
कर्मचारी नौकरी से निकाले जाएंगे शेयर चैट
ने 200 लोगों को निकाल दिया अड्डा 247
शिक्षा के क्षेत्र की वेबसाइट है जिसमें

google3 लोगों को नौकरी से निकाला है
बाइजू ने 4000 5000 लोगों को निकाल दिया
है और पिछले 2 सालों में 10000 लोगों को
नौकरी से बाहर किया है इस वक्त नौकरियों
पर बात ज्यादा होनी चाहिए उसी पर बात कम

हो रही है इस मुद्दे को छिपाने से कुछ
नहीं होने वाला हम यह बात पहले के वीडियो
में भी बता चुके हैं कि कर्मचारी भविष्य
निधि संगठन ईपीएफओ में जुड़ने वाली संगठित
क्षेत्र की नौकरियों की संख्या 30 महीने

में सबसे कम है 20 जनवरी के बिजनेस
स्टैंडर्ड की यह रिपोर्ट थी नवंबर 2023
में अक्टूबर 2023 की तुलना में 10 प्र की
गिरावट आई वैसे भी ईपीएफओ में नए जुड़ने
वाले सब्सक्राइबर की संख्या 6 से 7 लाख ही

होती है इतने बड़े देश में यह संख्या बहुत
ज्यादा तो नहीं है बिजनेस स्टैंडर्ड की इस
खबर में ध्यान देने वाली बात यह है कि
संगठित क्षेत्र में युवाओं को कम मौके मिल
रहे हैं यानी उनके लिए सुरक्षित अच्छी
नौकरी अच्छी सैलरी की नौकरी का कोई पता

नहीं बजट के अगले दिन के हिंदी अखबार पलट
कर देखिए
इस तरह से गुब्बारे और रॉकेट बनाकर
ग्राफिक्स बनाए गए हैं कि इन्हें देखते ही

पाठक का पेट भर जाए और नौकरी की जरूरत ना
रहे समृद्धि का ऐसा दावा किया जा रहा है
क्या यह सच है यह तो समाज ही बता सकता है
लेकिन जब यह समाज महंगाई का विरोध नहीं कर
सका तो बेरोजगारी है इसे क्यों स्वीकार कर

लेगा बिजनेस की सोशल मीडिया वेबसाइट लिंकन
ने एक शोध किया है जिसके अनुसार साल 2024
में हर 10 में से नौ यानी करीब 88 प्र
पेशेवर किसी ना किसी नई नौकरी की तलाश में
हैं इतनी ही संख्या में लोग किसी दूसरे

सेक्टर में नौकरी और नया रोल चाहते हैं
नौकरी करने वाले 42 फीदी भारतीयों का कहना
है कि वे बेहतर कार्य जीवन संतुलन के लिए
नौकरी बदलना चाहते हैं यानी उन पर काम का

बहुत भयंकर दबाव है इसके अलावा 37 फीसद
लोग ऐसे हैं जो अधिक वेतन वाली नौकरी की
तलाश में निकल पड़े हैं इस सर्वे का
निष्कर्ष बताया जा रहा है कि साल 2024 में
बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है
यानी एआई कंपनियों की निरंतर छटनी और

बेहतर नौकरी की तलाश 2024 को नौकरियों के
लिए मुश्किल साल बनाने वाली है दुनिया में
बहस दूसरे स्तर पर है कि नौकरी करते हुए
आप जीवन भी जिए या उल्टा हो रहा है लोगों
के काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं दबाव

इतना कि आदमी बीमार हो रहा है कमा कम हो
रही है अभी हाल ही में इकोनॉमिस्ट नाम की
एक पत्रिका ने तुलनात्मक अध्ययन किया
प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह के दौर के बीच इसके नतीजे कुछ

और कहते हैं जो शायद सुनने में अच्छे ना
लगे प्रधानमंत्री मोदी के दौर में प्रति
व्यक्ति के हिसाब से जीडीपी 4.3 प्र रही
जो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 6.2 प्र

थी इसमें क्रय शक्ति को एडजस्ट करने के
बाद यह आंकड़ा निकाला गया है इसमें बताया
गया है कि युवाओं में बेरोजगारी की दर
मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान बढ़ने लगी
थी और उसके बाद से कभी पटरी पर नहीं लौटी

मनमोहन सिंह के कार्यकाल के अंत में यह 8
प्र थी 2022 में 7.3 प्र यानी मोदी के
दोनों कार्यकाल में इसमें खास सुधार नहीं
हुआ सीएमआईई का आंकड़ा है कि अक्टूबर 2023
में भारत में बेरोजगारी की दर 2 साल में

सबसे अधिक रही इसका मुख्य कारण था ग्रामीण
इलाकों में बढ़ती बेरोजगारी सितंबर में
7.09 प्र से बढ़कर देश में बेरोजगारी दर
10.05 प्र हो गई तो नौकरी का मुद्दा
निराकार होता जा रहा है आंकड़ों के कारण

लगता है आंकड़ा ही बेरोजगार है आदमी काम
पर है अगर तस्वीरों की भाषा से समझिए इस
मसले को देखिए तो बेरोजगारों को सामने
लाना पड़ेगा उनकी हालत पर बात होनी पड़ेगी
यह तभी होगा जब गोदी मीडिया संस्थानों में

जाएगा इंजीनियरिंग के और प्रबंधन
संस्थानों में वहां की हालत पता करेगा और
लोग सच बोलेंगे वहां फीस महंगी होती जा
रही है और नौकरी की सैलरी कम हम कम कमाने
वाला देश बनकर रह गए हैं गनीमत है कि भाषणमें हम किसी से कम नहीं

नमस्कार

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