Kahani Kursi Ki: कहां से आया कितना चंदा...बताना तो पड़ेगा ! |Electoral Bond | Supreme Court | - instathreads

Kahani Kursi Ki: कहां से आया कितना चंदा…बताना तो पड़ेगा ! |Electoral Bond | Supreme Court |

आप रहे कहानी कुर्सी की और बात एक आज के
एक ऐसे फैसले की जिसका बड़ा दूरगामी
परिणाम होने जा रहा है सुप्रीम कोर्ट ने
आज इलेक्टोरल बंड्स पर चुनावी बंड पर जो
है सुनवाई करते हुए फैसला अपना सुना दिया

और उन्होंने कहा कि ये जो स्कीम ई गई थी
2017 18 के अंदर ये अनकंस्टीट्यूशनल है
असंवैधानिक स्कीम है इसके तहत बैंकों के
जरिए बंड खरीदकर चुनावी पार्टियों को चंदा

दिया जाता और इसमें चंदा देने वाले की
गोपनीयता का पूरा ख्याल रखा जाता था आप
अगर आरटीआई के जरिए भी ये जानना चाहे कि
ये इस पार्टी को किसने पैसा दिया किसने

चंदा दिया तो इसका मैकेनिज्म इलेक्टोरल का
कुछ ऐसा है कि वो ना डिस्क्लोज नहीं किया
जा सकता था लेकिन फायदा क्या था आप सरकारी
बैंकों के जरिए बंड खरीदते थे यानी काला

धन है वो सीधा चुनावी पार्टियों नहीं
पहुंच रहा आपको बंड के जरिए पैसा खरीदना
पड़ता बैंकिंग चैनल के जरिए पैसा जा रहा
था तो सफेद पैसा जा रहा था वाइट नहीं जा

रहा था जो का धन का खेल होता है वो कुछ हक
इसकी वजह से दबा हुआ था रुका हुआ था लेकिन
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा आज कि ये एक
मतदाता को जाने का अधिकार है मैं जिस

पार्टी को वोट करने जा रहा हूं उसको पैसा
कौन-कौन दे रहा है सुप्रीम कोर्ट ने यह भी
आज जो थोड़ा सा इसम इस पर फर्क करके
समझाया कि पैसा देने वाले दो किस्म के लोग

होते हैं एक है जो किसी पार्टी से अपना
उसकी विचारधारा मिती है या वो चाहता है कि
मेरे पैसे के जरिए पार्टी सत्ता में आएगी
तो जो वो नीतियां कहती है उनको लागू करें
एक इस किस्म मतदाता वो एक आम मतदाता भी हो

सकता है वो स्टूडेंट भी हो सकता है वो एक
आम नौकरी पेशा आदमी भी हो सकता है एक
दूसरा मतदाता हो सकता है दूसरा मतदाता हो
सकता है किसी बड़ एक दूसरा डोनर हो सकता

है वो डोनर कोई बड़ी कंपनी का कोई बड़ा
सेट हो सकता है कोई इस किस्म का व्यक्ति
और उसकी मंशा क्या हो सकती है कि मैंने यह
मोटा पैसा किसी पार्टी को दिया चंदे के

चुनाव में और जब यह जीत जाएगा तो मेरे कुछ
करेगा जिसको कहते हैंट प्रो को तो सुप्रीम
कोर्ट ने यह कहा कि इस पर भी विचार करना
पड़ेगा और सीधे-सीधे शब्दों में कहे तो

देखिए यह टक्कर जो थी यह दो आपके मेरे दो
अधिकार के बीच में थी एक सूचना का अधिकार
मुझे जो मेरा संविधान दे देता है जानकारी
सरकार से मांगू और मुझे जानकारी मिले

दूसरा गोपनीयता का अधिकार कि मेरी
प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं होना चाहिए इस
मामले में प्राइवेसी के ऊपर सुप्रीम कोर्ट
ने सूचना के अधिकार को रखा है ये

प्राइवेसी से ज्यादा वरीयता दी जाएगी मेरा
अधिकार है मतदाता के तौर पर कि इस पार्टी
को किसने पैसा दिया ये मुझे पता चलना
चाहिए साथ-साथ सुप्रीम ये भी कह दिया कि

एसबीआई को अब अपनी वेबसाइट पर इलेक्शन
कमीशन को ना पड़ेगा इलेक्शन कमीशन अपनी
वेबसाइट पर सारे डोनर्स के नाम डाल किसने
किस पार्टी को कितना पैसा दिया जरा सा मैं

आपको के पीछे जो डाटा है वो बता देता हूं
20222 में भारतीय जनता पार्टी को 720
करोड़ रप मिला 720 करोड़ और कांग्रेस
पार्टी से यह 10 गुना ज्यादा पैसा है 10

गुना ज्यादा पैसा कांग्रेस पार्टी से मिल
रहा है भारतीय जनता पार्टी को कुल मिलाकर
के राष्ट्रीय दलों को 850 करोड़ रप का
चंदा मिला था वित्तीय वर्ष 20222 में और
इसमें जो होता है 20000 रुपए से ज्यादा की

बड़ी जो रकम होती है वो इलेक्ट्रिक बंड के
जरिए जो है वो दी जाती है भाजपा ने बताया
उसको 719 करोड़ मिला है कांग्रेस पार्टी
को 894 करोड़ मिला है और इस तरीके से अगर
आप देखेंगे तो आम आदमी पार्टी को और

सीआईएम को ये इनके बाद आते हैं जिनको
डोनेशन प्राप्त हुआ बहुत अंतर है पहले और
दूसरे में 10 दिने का अंतर है बी बीजेपी
और कांग्रेस के बीच में तमाम विपक्षी

पार्टियां यही कह रही थी कि जब से
इलेक्टोरल बंड आया है बहुत गैप बढ़ गया है
जो पैसा बीजेपी को मिलता है और हमें जो
मिलता है उसम बहुत बड़ा अंतर आ चुका हैजन

जी अब सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार
दे दिया है वो भी चुनाव से एन पहले क्या
होगा आगे देखिए जो अभी हम बात कर रहे थे
कि कितना च आया अगर हम बीजेपी की बात करें

आपने 20222 की बात की तो 2120 करोड़ आया
जिसमें 61 पर चंदा था वो इलेक्टोरल ब बंड
के जरिए आया यानी वैसे ऐसा नहीं है कि

 

सिर्फ इलेक्टोरल बंड के जरिए चंदा आता है
बाकी जो है उस से भी चंदा आता है लेकिन
बात यह हो रही थी कि क्या अगर मैं किसी
पार्टी को चंदा देना चाहता हूं तो मैं खुल

के क्यों नहीं दूं या मैं सामने आके देना
चाहता हूं मैं क्यों कोई ऐसा दरवाजा कर
रहा हूं जिसमें मेरा मेरा नाम जो है सामने
नहीं आया कि मैंने इस पार्टी को चंदा दिया

अब बड़े-बड़े जब हम कॉर्पोरेट हाउसेस की
बात करें कुछ कॉर्पोरेट हाउसेस ऐसे हैं जो
बकायदा चेक देकर सार्वजनिक तौर पर अपने
बुक्स में भी लिखते हैं कि ये चंदा हमने

इस पार्टी को दिया प्रॉब्लम क्या थी क्यों
इलेक्टोरल बंड के जरिए जो है वो चंदा
इकट्ठा कर देने की कोश सिंपल सा जवाब मान
लीजिए मैं मैं कोई कंपनी और मैं कोई चंदा

देना चाहता हूं मान लीजिए मैंने कांग्रेस
पार्टी को चंदा दिया तो अब कांग्रेस
पार्टी आज के सिस्टम में मान लीजिए में
सत्ता में नहीं है राज्यों में तो सत्ता

में है मैंने पैसा दिया कांग्रेस पार्टी
को बीजेपी की जहां सरकार है वो मुझे
परेशान करेगी मैंने बीजेपी को चंदा दिया
तो कांग्रेस पार्टी की जहां राज्य में

सरकार है वो मुझे परेशान करेगी ज्यादातर
ज्यादातर कॉर्पोरेट हाउस जो है वो सभी
पार्टियों को या ज्यादातर पार्टी देते हैं

फिर इतना गैप क्यों है वो गैप है कौन
किसको ज्यादा दे रहा है ये बात है अब बात
आती है कि क्या इससे दूसरी पार्टी जो है

आपको नहीं करेगी क्या सार्वजनिक जगहों पर
आपको कॉरपोरेट लीडर्स जो है वो पर्टिकुलर
पार्टी के साथ नहीं दिखाई देते दिखाई देते
हैं जब वहां पर सार्वजनिक स्थानों पर उनको

मिलने में उनके साथ उनके कार्यक्रमों में
जाने में प्रॉब्लम नहीं है तो चंदा देने
में छुपा मतलब छुप छुप क्यों देना दूसरी
बात आती है फिर आपका इशू आता है प्राइवेसी

का जो अभी हम इससे पहले थोड़ा सा जब कैमरा
नहीं था तो बात कर रहे थे के प्राइवेसी का
अधिकार फर प्राइवेसी का अधिकार एक ही चीज

पर लागू बाकी चीजों पर भी लागू कर लीजिए
कि ईडी रेड मारती है तो बा प्रेस
कॉन्फ्रेंस कर क्यों कह अच्छा हमने यहां

रेड मारी हमने इतना पैसा रिकवर किया
प्राइवेसी प्राइवेसी प्राइवेसी तो
प्राइवेसी है ना ये भी कानून चोरी कर रहा
हूं तोरी थोड़ी र मैं ही बोल रहा हूं ना

तो प्राइवेसी का
अध
अ आप नहीं कर आपको जो कानूनी कारवाही करनी
करनी है करिए आप सार्वजनिक ौर पर प्र
कान्फ्रेंस करके क्यों बोल देते आपको

कानूनी कारवाई नहीं है ना कानूनी कारवाई
कर रहे हैं आप उसको बाहर निकाल रहे हैं
देखिए इसको सिलेक्टिव तौर प अप्लाई नहीं
किया जा सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों बातों

को वे किया है और यह माना है कि राइट
इंफॉर्मेशन प्रीवेल करेगा य जानकारी
मतदाता को होनी चाहिए कि पैसा कहां से आ
रहा है किस पार्टी को आ रहा है मैं अब यह

भी आपसे समझना चाह रहा हूं कि इसका आगे
असर क्या होने जा यह सिस्टम मतलब अब जो
पैसा पार्टी को मिलना था मिल गया अब और

चंदा इस माध्यम से तो जा नहीं सकता देखिए
सबसे पहले तोय सौरभ जी मैं मतलब मैं फैसला
देख रहा था तो अभी उसमें उम्मीद करते हैं
कि रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से कोई भी

निर्णय सुप्रीम कोर्ट लागू नहीं करेगा
यानी अगर कोई एक निर्णय आया कोई एक तरीका
आया और उसको आप कहते हैं कि नहीं ये अनक
अनकंस्टीट्यूशनल है तो ठीक है असंवैधानिक
लेकिन अब मैं ये रिपोर्ट पढ़ रहा था तो जो

20222 की ऑडिट रिपोर्ट है वो बता रही है
कि आम आदमी पार्टी तृणमूल कांग्रेस डीएमए
वाईएसआरसीपी बीआरएस य जनता इन सबका जो
फंडिंग है उसकी फंडिंग का ज्यादातर वो आया
है इलेक्टोरल बॉन्ड से तृणमूल कांग्रेस

उसको भी जो आया है वो 99.4 पर यानी 327
में से 325 करोड़ इलेक्टोरल बंड से डीएमके
का 186 करोड़ उसमें से 185 करोड़
इलेक्टोरल बंड से मैं ये क्यों बता रहा

हूं देखिए जब यह चर्चा हुई थी इलेक्टोरल
बंड आया क्यों था क्योंकि चुनाव आयोग को
लगता था देश के जितने लोग इलेक्टोरल
प्रोसेस से जुड़े हुए हैं उनको लगता था कि

भाई अचानक ऐसे डिया बहने लगती है करोड़ों
रुपया इस गाड़ी में उस गाड़ी में चुनाव
आयोग के अंदर पुलिस आ जाती व पकड़ती रहती
तो शब पैसा तो कहा गया कि भाई कोई तरीका

निकालिए तो एक तरीका येला कि बैंकिंग चैनल
के जरिए पैसा जाए यानी किसी के खाते में
वो रकम है तो वाइट होगा ब्लैक तो नहीं हो
सकता वरना यहां तो अनअकाउंटेड मनी अन

ऑडिटेड मनी बिना टैक्स वाली मनी वो पैसा
आता था उसी तरफ सब लोग सहमत हुए ऐसा नहीं
कि सिर्फ भारतीय जनता पार्टी सहमत हुई थी
सारी पार्टियां सहमत हुई थी आज शायद
कांग्रेस सत्ता होती केंद्र में या

मिलीजुली सरकार होती तो वो भी कहते सत्ता
के फेवर में चंदा ज्यादा होता ये मूल है
उस मूल को कैसे निकाला जाएगा उसका कौन सा
रास्ता निकलेगा इसकी बात होनी चाहिए

सर्वोच्च न्यायालय ने जब ये कहा कि
इंफॉर्मेशन के तहत तो कोई भी जो आपने सवाल
भी पूछा यह सच है कि जितने भी घराने हैं
उद्योग घराने हैं वो पैसे देते हैं लेन

कोई नहीं चाहता है कि वो पैसे किसको कितना
दे रहा है ये दूसरे को पता चले वरना वो
कहेगा कि अच्छा तुमने इसको दिया हमको
क्यों कम दे रहे हो लेकिन ये भी तो जो

पब्लिक मैंडेट होता है जिसको पीपल्स
मैंडेट कहते हैं जनता जिस तरफ जा रही है
उद्योगपति भी तो उधर जा सकता है नहीं
जाएगा उसको आपे कि तुम धंधा लेने के लिए

काम लेने के लिए कर रहे हो मुझे लगता है
इतना सामान्य नहीं है कि शायद फिर से
चुनाव आ और सारी पार्टियों को बैठना होगा
एक रास्ता चुनाव सुधार की तरफ पब्लिक

फंडिंग की तरफ इलेक्टोरल फंडिंग की तरफ
बढ़े थे आज उस पर रोक लग गई अब इसको कैसे
आगे हम करेंगे और ठीक 24 के लोकसभा चुनाव
के पहले तो कैसे हम इस पे आगे बढ़ेंगे
मुझे तो लगता है सर्वोच्च न्यायालय नया

पेंडोरा बॉक्स खोल दिया जी समीर जी समीर
जी देखिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत स्पष्ट
बात बोली कि कंपनी एक्ट में संशोधन का जो
संशोधन किया है वो मनमाना और असंवैधानिक

है इसके जरिए कंपनी से राजनीतिक दलों को
अमित फंडिंग का रास्ता खुला है तो सुप्रीम
कोर्ट का मुझे लग रहा है इस डिसन की पछ ये
भी कहना कि जो लोग फंडिंग दे रहे हैं वो

कंपनिया कौन सी है क्या कोई शेल कंपनी है
क्या कोई फजी कंपनी है क्या कोई कंपनी
इसलिए बन गई थी कि राजनीतिक दल को पैसा
देना है ब्लैक मनी करना है तो पैसा उसमें

डालो वो पैसा किसी एक राजनीतिक दल को दे
दो बाद में सत्ता में आने पर उस दल से
अपने काम करवाओ तो यह सामने आना भी जरूरी
कि जो कंपनिया फंडिंग दे रही है वो एजिस्ट

करती है कि नहीं करती है क्या उनका जन्म
इसलिए हुआ था कि किसी राजनीतिक दल को आपको
पैसा देना है कंपनी बनाओ उसके थ्रू
इलेक्टोरल बंड खरीद दो कप तिक दल को दो
राज दल उसको कैश करा ले तो मुझे लग रहा है
कि इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का ये भी

निर्देश है कि ये ना चाहिए कि पैसा कौन दे
है और मुझे लग रहा है सरकार अब सुप्रीम
कोर्ट का निर्णय आ गया सरकार को दूसरा
विकल्प इसका वैकल्पिक समाधान निकालने की

और सरकार को बनना पड़ेगा सिफ ये कह देने
से कि इस ब्लैक मनीक लगा रहे हैं इसके
कारण हम ये गोपनीय रखते हैं सुप्रीम कोर्ट
ने इसे खारिज किया है और मुझे लग रहा है

कोई अब नया रास्ता निकालना पड़ेगा सपोर्ट
का निर्णय मुझे लगता है ल हां मुझे लगता
है ये ठीक निर्णय है क्योंकि इसके अंदर जो
सरकारों का कहना था कि ब्लैक मनी पर नके ई

जा रही थी मुझे ल पर्पस नहीं हो रहा था
इसके अंदर ब ब्लक मल की बात हम जरा
दर्शकों को सुना दें क सिबल ने ही इसको
चैलेंज किया था इलेक्टोरल बंड को आज उनकी
जीत हुई है बड़ी सुबह आज सुप्रीम कोर्ट
में मौजूद भी थे सुनिए उनकी

बात तीन हफ्ते में जो स्टेट बैंक ऑफ
इंडिया के पास जानकारी है कि किन-किन
लोगों ने इलेक्टरल बंड खरीदे और किस
पार्टी को दिए गए वह सारी जानकारी तीन

हफ्ते में इलेक्शन कमीशन को दी जाएगी और
एक हफ्ते के बाद उसके उसके एक हफ्ते के
बाद यह इलेक्शन कमीशन अपनी वेबसाइट
पे उसको रखेगी ताकि जनता को आम सिटीजंस को

पता चल जाए किसने कितना पैसा दिया साथ में
एक और भी अभियान हो जाएगा कि किसने कितना
पैसा दिया और किसको किसको कितना फायदा हुआ
ये साफ जाहिर हो जाएगा क्योंकि जिन लोगों
ने पैसा दिया उनके प्रति सरकार ने फायदा

भी दिया होता ऐसा तो है नहीं कि पैसा देकर
कोई फायदा नहीं करता तो यही सुप्रीम कोर्ट
ने भी कहा है कि इसके पीछे तो क्विट हो
सकता है सुप्रीम कोर्ट ये कि है हो सकता

है और वो पता चल
जाएगा कपिल सपल कह रहे हैं कि इससे हमको
ये मालूम पड़ेगा कि पैसे के बदले किसने
क्या काम कराया है

साफ पता चलेगा नहीं इस एक फिर मतलब जाहिर
है कि बड़े विद्वान वकील और पांच-पांच
विद्वान न्यायाधीश इसम बैठे हैं तो
उन्होंने निर्णय ठीक लिया होगा और अब

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुना दिया तो
एक जिम्मेदार शहरी नागरिक होने के नाते
मैं वो मानता हूं लेकिन जैसे ही कपिल
सिब्बल मुस्कुराते हुए कहते हैं और उनके

आप भाव भंगिमा देखिए वो कहते हैं एक बार
ये जब पता चल जाएगा तीन हफ्ते के भीतर तो
फिर पता चले किसको कितना काम मिला है क्या
इस देश के लोगों ने सवाल खड़ा किया कि आजी
के बाद में टाटा बिडला के अलावा तीसरी

कंपनी का नाम क्यों नहीं आया क्यों इस देश
में बड़ी कंपनियां नहीं खड़ी हो पाई क्या
पहले अनुपात में कंपनियां खड़ी हो रही तो
उसमें जो बड़ी कंपनी है वो तय करे कि इसको
इतना इतना पैसा इस पार्टी को देना है क्या

उसका अपना कोई अधिकार नहीं है वो तय नहीं
करेगी और जैसे ही हम कहते हैं किसी कंपनी
के बड़े होने और कंपनी का चंदा देना उसको
आप जोड़ दिया यानी वेंडेटा पॉलिटिक्स

जिसको लंबे समय से राहुल गांधी कह रहे हैं
कि भैया सब अंबानी अडानी को बिक जा रहा है
सब लेके चले जा रहे हैं शायद ये डिबेट अब
उस तरफ जाएगी इलेक्टोरल रिफॉर्म था उसका
पॉलिटिकल वेंडेटा के लिए उपयोग होने जा

रहा है पर क्या हम ऐसा ना चाहते हैं कि
अगर किसी ने चंदा दिया और सरकार ने उसका
फेवर किया तो सही है नहीं बकुल नहीं अगर
ऐसा निकल के आता देखिए दोनों चीज निकल हर
आर्गुमेंट दोनों तरफ दिया जा स दूसरी चीज

ऐसा नहीं है कि कोई भी इलेक्शन जो है उसके
अल्टरनेटिव फंडिंग तरीके नहीं है इलेक्शन
कमीशन जो है वो इस देश में चुनाव करवाता
है क्या इलेक्शन कमीशन को फंडिंग नहीं कर
सकते कॉर्पोरेट हाउसेस क्यों पार्टियों

दूसरी चीज है कि क्या इले बराबर बराबर बा
बिल्कुल
बांट क्या दिक्कत है क्यों एक आदमी जो है
एक नेता अपने कांस्टिट्यूशन कंसी में जाकर
ज्यादा पैसा खर्च करवाना चाहता है अपनी
पार्टी से और दूसरा कम करवाना चाहता आपने

बिल्कुल कम्युनिस्ट वाली बात किया जा सता
दूसरा ये भी तरीका है कि कंसोलिडेट फंड ऑफ
इंडिया से पैसा लेकर उससे चुनाव करवा जाए
इसकी बातें हुई है ऐसा नहीं है कि इस
बातें नहीं
हुई

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