Krishna Janmabhoomi Mathura Temple Case Explained_Shahi Eidgah Mosque Vs Krishna Janmbhumi_ - instathreads

Krishna Janmabhoomi Mathura Temple Case Explained_Shahi Eidgah Mosque Vs Krishna Janmbhumi_

राम अवध में काशी में शिव और कान्हा
वृंदावन में लिखने वाले ने भी कितनी
खूबसूरत लाइंस लिखी हैं लेकिन प्रमाणिक
होते हुए भी सत्य अपने प्रमाण के इंतजार
में बैठा हुआ है अपने घर में ही बेघर की

तरह राम जन्मभूमि को तो लगभग 500 सालों के
बाद न्याय मिल गया लेकिन काशी विश्वनाथ
मंदिर और कृष्ण जन्मभूमि की कानूनी लड़ाई
अभी भी जारी है कहानी वही है और अंजाम भी
वही होना है लेकिन जो राजनीति हमेशा से

होती आई है उसमें कोई कमी नजर नहीं आ रही
है एक पक्ष अपने अस्तित्व के प्रमाण लिए
खड़ा है तो गंगा जमुनी तहजीब की बात करने
वाला दूसरा पक्ष उसे मानने को तैयार नहीं

है जैसा कि आप जानते हैं कि मथुरा में
कृष्ण जन्मभूमि और मस्जिद को लेकर के
कानूनी लड़ाई चरों पर चल रही है इस लड़ाई
में जहां कृष्ण जन्मभूमि पक्ष की ओर से यह
दलील दी जा रही है कि मस्जिद के नीचे कई

ऐसे प्रतीक हैं जो हिंदुओं की भावनाओं से
जुड़े हुए हैं वहीं मस्जिद पक्ष की ओर से
इसका लगातार विरोध किया जा रहा है जिसमें
पूर्व में हुए समझौते और पूजा पाठ के
स्थान को लेकर बने कानून की दुहाई दी जा
रही है बहरहाल इसी बीच भारतीय पुरातत्व

सर्वेक्षण वि भाग यानी एएसआई के एक आरटीआई
जवाब में इस बात का खुलासा हुआ है कि
मथुरा में मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई
गई थी कृष्ण जन्मभूमि विवाद और मस्जिद को
लेकर के उठाया विवाद कितना पुराना है और

इस विवाद की वजह क्या है वह कौन सा समझौता
और एक्ट है जिसे मानने को कृष्ण जन्मभूमि
पक्ष तैयार नहीं है आखिर वो कौन से
साक्ष्य हैं जो मंदिर होने के प्रमाण के
लिए काफी हैं आज के इस वीडियो में हम ऐसे

ही कई सवालों के जवाब लेकर के आए हैं साथ
ही जानेंगे मथुरा के श्री कृष्ण मंदिर का
इतिहास क्या है इसलिए बने रहे इस वीडियो
में हमारे साथ शुरू से अंत तक नमस्कार
मेरा नाम है अनुराग सूर्यवंशी और आप देख

रहे हैं नारद टीवी यह वाकई में सोचने वाली
बात है कि रामलला को अपने स्थान पर
स्थापित होने में लगभग 500 साल लग गए वहीं
लगभग 350 वर्ष बीत जाने के बाद भी भगवान

कृष्ण को उनकी ही जमीन पर पूरी तरह से
मालिकाना हक नहीं मिल सका है हालांकि अब
हर किसी को पूरी उम्मीद है कि एएसआई
सर्वेक्षण से पूरा सच सामने आ जाएगा एएसआई
की रिपोर्ट में क्या-क्या सामने आया है और

क्या प्रमाण मिले इसके बारे में जानने से
पहले आइए एक नजर डाल लेते हैं श्री कृष्ण
मंदिर के इतिहास
पर मान्यता है कि मथुरा कारागार यानी
कृष्ण जन्म स्थान पर सबसे पहले मंदिर का
निर्माण भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र

ब्रजनाथ ने श्री कृष्ण को कुलदेवता मान कर
के करवाया था इसके कई सालों बाद सम्राट
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने कार्यकाल
में वहां एक भव्य मंदिर बनवाया जिसे
मुस्लिम लुटेरे महमूद गजनवी ने साल 107

में आक्रमण करके तोड़ दिया और मंदिर में
मौजूद कई टन सोना अपने साथ लेता गया इसके
बाद साल 1150 में राजा विजयपाल देव के
शासनकाल में इसी स्थान पर फिर से एक भव्य
मंदिर बनवाया गया हालांकि इस मंदिर को भी

16वीं शताब्दी के दौरान सिकंदर लोदी के
शासनकाल में तोड़ दिया गया जिसके करीब 125
सालों के बाद जहांगीर के शासनकाल में ओरछा
के राजा वीर सिंह बुंदेला ने उसी स्थान पर
एक बार फिर से श्री कृष्ण के भव्य मंदिर
का निर्माण करवाया लेकिन इस मंदिर की

सुंदरता औरंगजेब की आंखों को बर्दाश्त
नहीं हो सकी और उसने साल 1669 में मंदिर
को ना सिर्फ ड़वाया बल्कि मंदिर के एक
हिस्से के ऊपर ही ईदगाह का निर्माण करा
दिया जिसके सारे सबूत हाल ही में एक-एक

करके सामने आते जा रहे हैं रही बात और
औरंगजेब की उसकी क्रूरता और कट्टरपंथी
शासन से जुड़ी कितनी कहानियां इतिहास में
भरी पड़ी हैं उसके आदेश पर भारत में ना
जाने कितने हिंदू मंदिर तोड़ दिए गए काशी

विश्वनाथ मंदिर तोड़ने के लिए औरंगजेब का
दिया हुआ आदेश तो आज भी सुरक्षित है एसआई
को हाल ही में जो ठोस प्रमाण मिले हैं
उसके हिसाब से मथुरा में भी औरंगजेब ने

कृष्ण मंदिर तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद
बनवाई थी इसके अलावा कुछ रिपोर्ट्स में
दावा किया जा चुका है कि मुगल दरबार में
आने वाले इटालियन यात्री निकोलस मंची ने

अपने किताब मुगलों का इतिहास में बताया है
कि कैसे रमजान के महीने में श्री कृष्ण
जन्मस्थान को ध्वस्त किया गया और वहां
ईदगाह मस्जिद बनाने का फरमान जारी हुआ

बताया जाता है कि 1770 में मुगलों और
मराठा हों के बीच जंग हुई जिसमें मराठा की
जीत के बाद फिर से मंदिर का निर्माण किया
गया मराठा ने तब ईदगा मस्जिद के पास ही
13.3 7 एकड़ जमीन पर भगवान केशव देव यानी

कि श्री कृष्ण का मंदिर बनवाया था जो कि
समय के साथ जरजर होता चला गया बाद में
भूकंप के कारण मंदिर पूरी तरह से ध्वस्त
हो गया और वह स्थान एक टीले के रूप में
बदल गया उस जमीन को आगे चलकर साल 1815 में

अंग्रेजों ने लाम कर दिया जिसे बनारस के
राजा पटनी मल ने खरीद लिया अब यहां तक तो
जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हाल चलता रहा
लेकिन आगे चलकर 1920 और 30 के दशक में इस
जमीन को लेकर के विवाद शुरू हो गया इस

जमीन को लेकर मुस्लिम पक्ष ने दावा कर
दिया कि उसमें कुछ हिस्सा ईदगाह मस्जिद का
भी था बहरहाल बाद में इस जमीन को 1944 में
उद्योगपति जुगल किशोर बडला ने 00 में खरीद
ली जो साल 1951 में बने श्री कृष्ण

जन्मस्थान ट्रस्ट को सौंप दी गई इसके बाद
साल 1958 में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का
निर्माण भी कर दिया गया जो शाही ईदगाह से
बिल्कुल सटा करके बनाया गया था इसके बाद
साल 1958 में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा

संस्थान नाम की एक संस्था का गठन हुआ
जिसने 12 अक्टूबर 1968 को शाही मस्जिद
ईदगा ट्रस्ट के साथ एक ऐतिहासिक समझौता
किया जिसमें यह तय हुआ कि 13.3 7 एकड़
जमीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों ही बने

रहेंगे हालांकि श्री कृष्ण जन्मस्थान
ट्रस्ट आज भी इस समझौते को धोखा बताता
है इस पूरे मामले में विवाद क्या है वह तो
आप जान ही चुके होंगे फिर भी इन शॉर्ट हम
आ कोण के आधार पर एक बार बता देते हैं

हमारा दावा है कि आप भी इसके बारे में
जानकर अपना माथा पीट लेंगे कि मस्जिद पक्ष
की बेवजा की जिद का कितना राजनैतिक फायदा
उठाया गया है वरना मस्जिद पक्ष कप काहु
जमीन कृष्ण जन्मभूमि पक्ष को वापस कर देता

दरअसल मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि
विवाद 13.3 7 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक से
जुड़ा हुआ है जिसे लेकर श्रीकृष्ण
जन्मस्थान सेवा संस्थान ने शाही मस्जिद

ईदगाह ट्रस्ट के साथ 12 अक्टूबर 1968 को
एक समझौता किया था इस समझौते में 13.7
एकड़ जमीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों बनने
की बात हुई थी जिसके बाद से श्री कृष्ण
स्थान सेवा संस्थान के पास 10.9 एकड़ जमीन
का मालिकाना हक है और बाकी के 2.5 एकड़

जमीन का मालिकाना हक शाही ईदगाह मस्जिद के
पास है हालांकि इस समझौते को लेकर हिंदू
पक्ष का कहना है कि शाही ईदगाह मस्जिद को
बलपूर्वक और अवैध तरीके से कब्जा करके
बनाया गया

है मंदिर मस्जिद विवाद को लेकर दायर
याचिकाओं में कुल चार पक्षकार है जिसमें
श्री कृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ श्री कृष्ण
जन्मभूमि संघ शाही ईदगाह मस्जिद और यूपी
सुन्नी सेंट्रल वक बोर्ड शामिल है हिंदू

पक्ष की ओर से दायर याचिकाओं में कथित तौर
पर अवैध रूप से बनी शाही ईदगाह मस्जिद को
हटाए जाने की मांग की गई है ताकि अयोध्या
के राम मंदिर की तरह मथुरा में भी भव्य
कृष्ण मंदिर का निर्माण हो सके कोर्ट में

दावा किया गया था कि ईदगाह का निर्माण
मुगल बादशाह औरंगजेब ने भगवान कृष्ण की
13.3 7 एकड़ जमीन पर बने मंदिर को तोड़ कर
के करवाया था याचिका में श्री कृष्ण
जन्मस्थान सेवा संघ बनाम शाही मस्जिद

ईदगाह के बीच पांच दशक पूर्व हुए समझौते
को भी चुनौती दी गई है याचिका में कहा गया
है कि भगवान श्री कृष्ण का मूल जन्मस्थान
कंस का कारागार यानी श्री कृष्ण जन्मस्थान
ईदगाह के नीचे है भगवान श्री कृष्ण की

भूमि सभी हिंदू भक्तों के लिए पवित्र है
विवादित जमीन को लेकर 1968 में हुआ समझौता
गलत था कटरा केशव देव की पूरी 13.3 7 एकड़
जमीन हिंदुओं की थी जानकार बताते हैं कि
जिस जमीन पर मस्जिद बनी है वह श्रीकृष्ण

जन्मस्थान ट्रस्ट के नाम पर है और सेवा
संघ की ओर से किया गया समझौता गलत है
इसलिए उक्त समझौते को निरस्त करते हुए
मस्जिद को हटाकर मंदिर की जमीन उसे वापस
कर देने की मांग की गई है हिंदू पक्ष का
यह भी दावा है कि ऐसे कई संकेत हैं जो यह

साबित करते करते हैं कि मस्जिद की जगह पर
एक हिंदू मंदिर ही था याचिका में कहा गया
है कि वहां कमल के आकार का एक स्तंभ है
जिसमें शेष नाग की एक प्रतिकृति है

जिन्होंने जन्म की रात भगवान कृष्ण की
रक्षा की थी इसके अलावा मस्जिद के स्तंभ
के आधार पर हिंदू धार्मिक प्रतीक है जो
नक्काशी में साफ-साफ दिखाई देते हैं अदालत

में दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि
शाही ददग ट्रस्ट ने मुसलमानों की मदद से
श्री कृष्ण से संबंधित जन्मभूमि पर कब्जा
कर लिया और ईश्वर के स्थान पर एक ढांचे का
निर्माण करा दिया भगवान विष्णु के आठवें

अवतार श्री कृष्ण का जन्म स्थान उसी ढांचे
के नीचे स्थित है इसके अलावा याचिकाओं में
यह भी दावा किया गया है कि मंदिर परिसर का
प्रशासन संभालने वाले श्री कृष्ण जन्म

स्थान सेवा संस्थान ने संपत्ति के लिए
शाही ईदगा ट्रस्ट से एक अवैध समझौता किया
साथ ही आरोप भी लगाया है कि श्री कृष्ण
जन्मस्थान सेवा संस्थान ने श्रद्धालुओं के
हितों के विपरीत काम किया है इसलिए धोखे

से शाहीद ग ट्रस्ट की प्रबंध समिति ने
कथित रूप से साल 1968 में संबंधित संपत्ति
के एक बड़े हिस्से को हथियाने का समझौता
कर
लिया हाल ही में मिली जानकारी के मुताबिक

एएसआई ने साफ किया है कि मथुरा में में
मंदिर को तोड़ कर के मस्जिद बनाई गई थी
खास बात कि एएसआई का यह दावा ब्रिटिश राज
के 1920 में प्रकाशित गजट के आधार पर किया
गया है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यहां

पहले एक मंदिर था जिसे औरंगजेब ने तोड़कर
ईदगाह बना दिया था दरअसल एएसआई से इसको
लेकर सवाल किया गया था कि क्या मथुरा में
मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी इस
आरटीआई के बाद पुरातत्व विभाग का यह सारा

जवाब आया है जिसे अब हिंदू पक्ष की तरफ से
सुप्रीम कोर्ट में भी दाखिल किया जाएगा
जिसकी सुनवाई आगामी 22 फरवरी के दिन होनी
है एसआई सर्वेक्षण से जो बातें सामने निकल

कर के आई हैं में कई बातें हैरान कर देने
वाली हैं जिसके बारे में जानकर आप भी यह
महसूस करेंगे कितने सारे प्रमाण जो कितने
पुराने हैं इसके बावजूद इतने सालों तक
न्याय नहीं मिल सका तो इसके पीछे सिर्फ और

सिर्फ राजनीति है श्री कृष्ण जन्मभूमि की
ओर से प्रमुख पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह
एडवोकेट के मुताबिक ब्रिटिश राज में हुए
सर्वेक्षण के दौरान साल 1920 में इलाहाबाद
से प्रकाशित कराए गए गजट में दर्ज उत्तर

प्रदेश के विभिन्न जगहों के 39 स्मारकों
की सूची उपलब्ध करवाई गई थी और इसी सूची
में 37 नंबर पर कटरा केशव देव भूमि पर
श्री कृष्ण भूमि का उल्लेख है जिसमें साफ

लिखा है कि कटरा टीले पर पहले केशव देव
मंदिर था जिसे ध्वस्त कर दिया गया था और
उस स्थान का प्रयोग मस्जिद के तौर पर किया
जाने लगा था इसमें कोई शक नहीं कि एसई
द्वारा ब्रिटिश राज के दस्तावेजों के रूप

में मिलाया सरकारी सबूत काफी है यह बताने
के लिए कि वहां पर मंदिर ही था जिसे तोड़
कर के मस्जिद बनाई गई थी इसके अलावा हाल
ही में एएसआई को कुछ और ऐसे प्रमाण मिले

हैं जो सच साबित करने के लिए काफी
हैं भारत में शासन के बहाने लूटपाट करने
के इरादे से आए मुगल आक्रांता औरंगजेब ने
श्री कृष्ण जन्मभूमि की दीवारों पर मत
खड़े कर उस स्थान को शाही मस्जिद घोषित कर
दिया था जिसे लेकर एएसआई के सबसे पहले

महानिदेशक के दस्तावेज संग्रह में कई ठोस
प्रमाण मिला है दरअसल एएसआई के पहले
महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने साल
18626 4 के बीच कृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह
का सर्वे किया था महन प्रताप सिंह एडवोकेट

ने इस रिपोर्ट को आधार बनाकर मीडिया को यह
जानकारी दी है कि कनिंघम की रिपोर्ट में
यह साफ लिखा गया है कि औरंगजेब ने श्री
कृष्ण मंदिर के ऊपरी हिस्से को ड़वाया था

मुगल शासक ने मंदिर की दीवारों को तो
यथावत रखा मगरोन के ऊपर ही गुंबद बनाकर
उसे शाही ईदगाह मस्जिद घोषित कर दिया
दरअसल कनिघम ने उस दौरान पूरे देश में कई
स्थानों पर सर्वे किया था इसमें मथुरा का
श्री कृष्ण मंदिर और ईदगाह मस्जिद भी

शामिल थी जिसकी रिपोर्ट का उल्लेख
उन्होंने दस्तावेजी संग्रह के साथ लिखी
किताब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में
किया है इसमें कनिंघम ने लिखा है कि मथुरा
स्थित कटरा केशव देव की भूमि पर बनी

मस्जिद की लंबाई 172 फुट चौड़ाई 66 फुट और
ऊंचाई 25 से 30 फुट है इतना ही नहीं
उन्होंने मंदिर को तोड़कर उसकी दीवारों पर
गुंबद बनाए जाने और उसे शाही ईदगाह मस्जिद
घोषित करने के संबंध में भी कई सार ठोस
प्रमाण दिए हैं कनिंघम के लिखित रिपोर्ट

के मुताबिक जिस छींट दार लाल बलुआ पत्थर
से कटरा केशव देव भूमि पर ओरछा राजा वीर
सिंह बुंदेला द्वारा श्री कृष्ण का मंदिर
बनवाया गया था वही पत्थर मस्जिद की

दीवारों पर भी मिले हैं यानी मंदिर को
तोड़ने के बाद उसी के पत्थरों से गुंबद का
निर्माण कर दिया गया मंदिर निर्माण के लिए
पत्थर फतेहपुर सीकरी से लाए गए थे इतना ही
नहीं सर्वे के बाद कनिंघम ने शाही मस्जिद
ईदगाह का हाथ से एक नक्शा भी बनाया जो कि

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया पुस्तक में
सुरक्षित किया गया है कनिंघम ने अपनी
सर्वे की रिपोर्ट में यभ लिखा है कि गाव
में एक खंभे पर देवनागरी भाषा में सम 1713

फाल्गुन लिखा है जिसमें से फाल्गुन काटकर
सिर्फ 1713 कर दिया गया था एक खंभे पर
केशव राय लिखा है इसके अलावा कुछ चिन्ह भी
मिले हैं जो हमेशा हिंदू मंदिरों में ही
पाए जाते
हैं साल 1951 में श्री कृष्ण जन्मभूमि

ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां
दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और
ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा इसके बाद मंदिर
निर्माण के साथ ही साल 1958 में श्री

कृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की एक
संस्था का गठन किया गया था हालांकि कानूनी
तौर पर इस संस्था को जमीन पर मालिकाना हक
हासिल नहीं था इसके बावजूद इसने ट्रस्ट के
लिए तै सारी भूमिकाएं भी खुद ही निभाना

शुरू कर दी रिपोर्ट के मुताबिक इस संस्था
ने पहले तो साल 1964 में पूरी जमीन पर
नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया
लेकिन फिर पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि साल
1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ
समझौता कर

लिया श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में
धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ केस को लेकर
सबसे बड़ी रुकावट साल 1968 में हुआ एक
समझौता भर नहीं है बल्कि उससे भी बड़ी एक
रुकावट है प्लेस ऑफ वशिप एक्ट जो साल 1991
में नरसिंहा राव सरकार में पास हुआ था
दरअसल प्लेस ऑफ वरशिप एक्ट 1991 में ये

कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 यानी देश की
आजादी के समय धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप
था उसे बदला नहीं जा सकता यानी 15 अगस्त
1947 के दिन जिस धार्मिक स्थल पर जिस

संप्रदाय का अधिकार था आगे भी उसी का
रहेगा श्रीराम जन्मभूमि को इस एक्ट से अलग
रखा गया था इसी एक्ट का हवाला देकर
मुस्लिम पक्ष द्वारा यह कहा जा रहा है कि
जब प्लेसेस ऑफ वशिप एक्ट 1991 देश में

लागू है तो किसी भी पूजा के स्थल के
परिवर्तन की बात क्यों की जा रही है इसके
अलावा भी कहा जा रहा है कि शाही यदग
ट्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ
ने इस विवाद का निपटारा साल 1968 में ही

कर लिया था तो अब इसे फिर से जीवित क्यों
किया जा रहा है तो दोस्तों आपको हमारा आज
का ये वीडियो कैसा लगा कमेंट करके जरूर

बताइएगा हमें ये भी बताएं कि श्री कृष्ण
मंदिर को लेकर के आपकी क्या राय है

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