Myanmar कैसे बन रहा है अफीम की खेती का गढ़ ? | How Myanmar Is Becoming Opium Hub ? - instathreads

Myanmar कैसे बन रहा है अफीम की खेती का गढ़ ? | How Myanmar Is Becoming Opium Hub ?

जगह मणिपुर समय 19 और 20 जून 2018 की आधी
रात पुलिस अधिकारी थोना ओजम बंदा अपनी टीम
के साथ मिलकर मणिपुर के जंगलों में
छापामारी कर रहे थे उन्हें एक ऐसे शख्स की

तलाश थी जिनके बारे में इन्हें सूचना मिली
थी कि वह ड्रग की एक बड़ी खेप पड़ोस के
देश से लेकर भारत आ गया है बात सच भी
निकली और जब उसकी गिरफ्तारी की गई तो उससे

राजनीति में हलचल मच गई उससे जो ड्रग्स
बरामद की गई उसकी इंटरनेशनल मार्केट में
कीमत तकरीबन 8 करोड़ से ज्यादा थी वहीं
अगर मणिपुर नारकोटिक्स एंड अफेयर्स ऑफ

बॉर्डर विभाग की देखें तो पता चलता है कि
27 अप्रैल से जून 2019 तक नारकोटिक ड्रग्स
एंड साइकोट्रॉनिक्स
कररों को गिरफ्तार किया गया है और इनसे
मिलने वाले ड्रग की कीमत लगभग 2260 करोड़

आंकी गई है मणिपुर सरकार के खिलाफ ऑपरेशन
वॉर ऑन 2.0 70 दिनों के अंदर 142 करोड़ की
जब्त करता है यह तमाम आंकड़े भारत सरकार
के लिए चिंता का विषय है और उससे भी बड़ी

चिंता की बात यह थी कि जब यूनाइटेड नेशंस
की द यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन एंड क्राइम
ने दिसंबर 2023 में अपनी एक रिपोर्ट
पब्लिश की तो यह कोई आम रिपोर्ट नहीं थी

सभी मीडिया चैनल की हेडलाइंस बन गई खबर थी
कि कैसे भार का पड़ोसी मुल्क म्यानमार बना
अफीम का सबसे बड़ा सौदागर और पहले यह
उपलब्धि थी अफगानिस्तान के नाम भारत का

पड़ोसी बना दुनिया का सबसे बड़ा अफीम
उत्पादक यूएन ओडीसी के रीजनल डेलीगेट
जेरेमी डगलस ने अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस
में कहा कि अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते

हुए अफीम की खेती में नंबर वन देश
म्यानमार बन गया है और ऐसा पहली बार हुआ
है आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल
म्यानमार ने 1080 टन अफीम का प्रोडक्शन

किया जो एक वक्त वक्त इस मामले में नंबर
वन रहे अफगानिस्तान के 333 टन से तीन गुना
अधिक है यह चिंता की एक बात यह जरूर है कि
आखिर किन कंडीशन में म्यानमार बड़े पैमाने
पर अफीम की खेती करने लगा लेकिन उससे भी

बड़ी चिंता की बात यह है कि यह भारत के
लिए कितना ज्यादा हार्मफुल है तो आइए इन
सभी बातों को जानते हैं विस्तार से
यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट यूनाइटेड नेशंस

की द यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड
क्राइम के रीजनल डेलीगेट जेरेमी डगलस ने
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जब फरवरी
2021 में म्यानमार में सैन्य शासन लागू
हुआ तो यहां पर पॉलिटिकल सोशल और इकोनॉमिक

इंस्टेबिलिटी के कारण कई लोगों ने अफीम की
खेती करनी शुरू कर दी इकोनॉमिक सिक्योरिटी
को बनाए रखने के लिए रिमोट एरिया में रहने
वाले फार्मर्स ने अफीम उप जाने का फैसला
कर लिया इसका परिणाम यह हुआ कि देश के

उत्तरी शान राज्य की सीमा से लगे एरिया
में अफीम की खेती का एरिया सबसे अधिक बड़ा
है शान राज्य म्यानमार की लगभग एक चौथाई
भूमि पर फैला हुआ है और यह खड्डो और
जंगलों से ढकी पहाड़ियों के बीच में स्थित

है यहां प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए
मॉडर्न टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया
जिसके कारण पैदावार पहले से 16 पर से

बढ़कर 22.9 किग्रा प्रति हेक्टेयर हो गई
डगलस ने रिपोर्ट में आगे कहा कि
अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत आने के
बाद जब तालिबानियों के द्वारा 2022 में
अफीम की खेती करने पर अफगानिस्तान में बैन

लगाया गया तब ऐसे में यहां अफीम की
प्रोडक्शन में 95 पर की गिरावट आई और अब
ऐसे में अफीम के ग्लोबल सप्लाई को पूरा
करने के लिए इससे जुड़े तस्करों ने

म्यानमार में अफीम के प्रोडक्शन को बढ़ाने
के लिए किसानों को एक मोटी रकम देनी शुरू
कर दी अफीम की खेती का विस्तार म्यानमार
की बढ़ती इल्लीगल इकॉनमी को बढ़ावा दे रहा

है आज म्यानमार कुछ खास तरह की ड्रग्स के
लिए दुनिया का एक बड़ा इल्लीगल सप्लायर बन
गया है जो कि करीब 80 प्र का योगदान दे
रहा है जिसे समुद्री मार्गों और अन्य

गुप्त रास्तों के थ्रू अमेरिका ब्रिटेन
चीन और भारत में तस्क करी कर लाया जाता है
म्यानमार में अफीम से होने वाली भारी कमाई
से सैन्य शासकों के खिलाफ लड़ने वाले
विद्रोहियों को काफी मदद मिली है इस कारण

से यह लोग इस एरिया को सुरक्षित बनाए रखते
हैं साल 2022 से 2023 तक म्यानमार में
अवैध अफीम की फसल उगाने के लिए यूज किए

जाने वाला एरिया 18 पर से बढ़कर 40100
हेक्टेयर से 47000 हेक्टेयर हो गया है हाई
ओपियम प्राइसेस अट्रैक्ट फार्मर्स
अफगानिस्तान में अफीम की खेती पर बैन के

कारण अफीम का प्राइस काफी बढ़ गया किसानों
को 1 किग्रा अफीम के बदले $55 दिया जाने
लगा जो किसी भी दूसरी फसल से कई ज्यादा है
यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक यह कीमत 2022

के कंपैरिजन में 75 पर ज्यादा है इस वजह
से ज्यादा किसान अफीम की खेती की ओर
अट्रैक्ट हुए हैं कोरोना पेंडम और सैन्य
शासकों के लूट खसोली इकॉनमी भी गिरती जा

रही है और दुनिया भर में अफीम की आपूर्ति
में कमी के कारण इस एरिया में रहने वाले
लोग इसकी फसल उप जाने लगे हैं फार्मर्स
हैव लिमिटेड इनकम ऑप्शंस ऐसा नहीं है कि

म्यानमार में अफीम की खेती कम करने के लिए
कभी कोई कोशिश नहीं की गई सरकार ने
किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें चीनी
रबर और फलों जैसे उत्पादों की खेती करने
के लिए लोन भी दिया लेकिन पहाड़ी भूमि

होने के कारण इन्हें उगाना अफीम के
कंपैरिजन में ज्यादा डिफिकल्ट है इसके बाद
इस उपज को रिमोट एरिया से मेन मार्केट तक
लाना भी डिफिकल्ट है जबकि अफीम खरीदने के

लिए खरीददार उसके खेत पर खुद पहुंच जाते
हैं इस तरह किसानों का ट्रांसपोर्ट खर्च
भी बच जाता है और दूसरी फसलों की तुलना
में कीमत भी ज्यादा मिलती है हाल ही में

लागू हुए मिलिट्री रूल के बाद से म्यानमार
को बहुत कम फॉरेन इन्वेस्टमेंट या
इंटरनेशनल इकोनॉमिक एड मिली है इस वजह से
किसानों के लिए इनकम के एक्स्ट्रा सोर्स

ढूंढना मुश्किल हो गया इसके अलावा
म्यानमार की सबसे उपजाऊ भूमि शान प्रांत
में ही है हालांकि शान की 88 प्र भूमि पर

अफीम की खेती की जाती है जानकारों का
मानना है कि सेना का इरादा इस बिजनेस को
खत्म करने का है ही क्योंकि इस साल
म्यानमार सेंट्रल कमेटी ऑन ड्रग्स

अब्यूड़ोस को बंद करने को लेकर गंभीर भी
नहीं है म्यानमार कंटिन्यूज टू हैव सेवरल
इयर्स ऑफ सिविल पॉर वहीं अगर हम इसके कोर
रीजंस को जानने की कोशिश करें तो थोड़ा

इसके इतिहास में झांक कर देखना होगा
म्यानमार को साल 1948 में ब्रिटिश शासन से
स्वतंत्रता मिली लेकिन इसके बाद यहां एक

चलता रहा है साल 2020 के चुनाव में ओंग
सांसू की जीत हासिल करके देश के
प्रधानमंत्री बने लेकिन सेना ने 1 फरवरी
2021 को इन्हें गिरफ्तार करके जेल में बंद
कर दिया और देश की सत्ता पर कब्जा कर लिया

इसके बाद देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन
होने लगे क्योंकि लोग लोकतंत्र की बहाली
की मांग कर रहे थे और इसी बीच सेना ने
शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के

खिलाफ वायलेंस की कार्रवाई करना शुरू कर
दिया इसके बाद भड़की हिंसा को दबाने के
लिए सेना ने सैकड़ों हवाई हमले ले कर दिए
हजारों घरों में आग लगा दी जिसके कारण
करीब 16 लाख लोगों को अपना घरबार छोड़ना

पड़ गया अब इनमें से कई लोगों ने थाईलैंड
चीन और भारत की सीमा पर पहले से रह रहे
उग्रवादियों से हाथ मिला लिया और इनसे कुछ
प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद देश की

सेना के ही खिलाफ लड़ने के लिए वापस अपने
देश लौटकर आ गए इन्होंने पीपल्स डिफेंस
फोर्सेस के नाम से एक सशस्त्र समूह बनाया
लेकिन थाईलैंड और चीन से सटे म्यानमार के
शान राज्य के कई समूह के नेता सेना के

विरुद्ध चल रहे विरोध प्रदर्शन का हिस्सा
नहीं बने क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही
दुनिया में अवैध रूप से अफीम के
प्रोड्यूसर के रूप में जाना जाता रहा है
और अब जहां लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति काफी

ज्यादा खराब हो गई है तो इन्हें एक सुनहरा
अवसर मिल गया है अफीम के प्रोडक्शन को
बढ़ाकर उसे बेचकर और ज्यादा पैसे कमाने का
इनका यह टारगेट भी पूरा हो रहा है अब यहीं
पर सबसे बड़ा सवाल आता है कि म्यानमार की

अफीम की खेती से भारत को क्या नुकसान होगा
तो इसे जानने के लिए आप एक एक बार इस
गोल्डन ट्रायंगल के कांसेप्ट को समझिए
होता क्या है कि जहां पर थाईलैंड लाओस और
म्यानमार की बाउंड्रीज रुआ और मेकांग

नदियों के संगम पर मिलती हैं इसे गोल्डन
ट्रायंगल कहा जाता है और यह गोल्डन
ट्रायंगल जिओ पॉलिटिकली और स्ट्रेटजिकली
काफी इंपॉर्टेंट माना जाता है और इसे
अमेरिका की सीआईए इस ट्रायंगल के बीच वाले

एरिया को ड्रग्स प्रोडक्शन के मामले में
काफी सेंसिटिव भी मानती है गोल्डन
ट्रायंगल लिंक्ड टू इंडिया देखिए गोल्डन
ट्रायंगल मयमार थाईलैंड और लाओस के बीच तो

स्थित है जिसे दक्षिण एशिया में ड्रग्स की
अपूर्ति का सबसे बड़ा सोर्स माना जाता है
अफीम के लिए उपजाऊ जमीन सस्ते मजदूर और
बेरोजगारी का फायदा इस क्षेत्र के तस्करों

ने उठाया इस क्षेत्र में दशकों से अफीम की
खेती की जाती रही है जो कुछ खास तरह के
तैयार करने के लिए इंपॉर्टेंट मटेरियल है
गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र कई सालों से

ग्लोबल क्राइम का सेंटर भी रहा है ड्रग्स
का उत्पादन इल्लीगल वेपंस का बिजनेस
गैंबलिंग ह्यूमन ट्रैफिकिंग और ऑनलाइन
फ्रॉड जैसी तमाम एक्टिविटीज यहां होती रही
हैं इस सुदूर पहाड़ी क्षेत्र की सीमाएं

तीन देशों से लगी हुई हैं जिससे यह
क्षेत्र अपराधियों के लिए सुरक्षित है
क्योंकि एक देश में अपराध करने के बाद
अपराधी दूसरे देश की सीमा में चले जाते
हैं और ऐसे में किसी भी देश के सैनिक या

पुलिस सीमा उल्लंघन नहीं करती है अब ऐसे
में अपराधी बच हो जाते हैं यहां कोई
पेट्रोलिंग भी नहीं होती जिससे अपराधियों
के लिए कानून से बचना और भी आसान हो जाता
है भारत की साथ समस्या यह है कि भारत ना

केवल गोल्डन ट्रायंगल के पास पड़ता है
बल्कि गोल्डन क्रिसेंट के पास भी है
गोल्डन क्रिसेंट में भी अवैध ड्रग्स का
बड़ा कारोबार होता है और इसमें पाकिस्तान

अफगानिस्तान और ईरान का क्षेत्र भी शामिल
है यह सारे ही देश ड्रग्स की तस्करी के
लिए जाने जाते हैं और ड्रग तस्करी के लिए
बदनाम इस ट्रायंगल का भारत से गहरा नाता

है क्योंकि भारत इनके बीच में फसा हुआ है
इनके बारे में कहा जाता है कि जब चीन ने
अपने यहां नशे का कारोबार बंद कर दिया तो

यह उन तीनों देशों की सीमाओं के भीतर फलने
फूलने लगा जिसे हम आज गोल्डन ट्रायंगल के
नाम से जानते हैं भारत इन देशों से जुड़ा
हुआ है और इसलिए यहां पर ड्रग्स आसानी से

आ जाती है संयुक्त राष्ट्र ने खुद साल
2018 की एक रिपोर्ट में माना था कि भारत
ड्रग्स की तस्करी का केंद्र बन गया है आज
भारत और म्यानमार के बीच तकरीबन 1640 किमी
लंबा बॉर्डर है जिसमें भारत के अरुणाचल
प्रदेश मणिपुर मिजोरम और नागालैंड राज्य

की सीमा म्यानमार से जुड़ी हुई हैं ड्रग
सप्लाई रूट को विस्तार से देखें तो पाएंगे
कि म्यानमार के भामू लेसो और मंडा से होते
हुए अफीम हेरोइन जैसे घातक ड्रग्स भारत के
इन्हीं राज्यों में सबसे पहले आता है जो

यहां से होते हुए देश के दूसरे राज्यों के
महानगरों तक आसानी से पहुंच जाता है इसी
तरह से भारत में भी जो ड्रग्स है उनकी
तस्करी दूसरे देशों को इसी रूट के जरिए

होती है कुल मिलाकर ड्रग तस्करों के लिए
भारत का नॉर्थ ईस्टर्न रेजन स्वर्ग बना
हुआ है गोल्ड ट्रायंगल हैज अ बिग कनेक्शन
इन मणिपुर वायलेंस नारकोटिक्स कंट्रोल

ब्यूरो से जुड़े सूत्रों का कहना है कि
मणिपुर में हो रही हिंसा के पीछे चाहे जो
भी राजनीतिक कारण हो लेकिन असल में इन सब
के पीछे सबसे बड़ा कारण इस इलाके में नशे

का कारोबार है एंटी ड्रग यूनिट नारकोटिक्स
एंड अफेयर्स बॉर्डर से जुड़े सूत्रों का
कहना है कि साल 2017 से साल 2020 तक
2518 लोग बड़े ड्रग तस्करी में शामिल पाए
गए और हिरासत में भी लिए गए मणिपुर में

873 लोगों को ड्रग के धंधे में शामिल पाया
गया और हिरासत में लिया गया म्यानमार और
भारत के नॉर्थ ईस्टर्न रीजन में रहने वाले
लोगों के बीच सामाजिक सांस्कृतिक संबंध कई
सालों से हैं इस कारण से भारत के कई

जनजातीय समूह को म्यानमार जाने के लिए वीज
की जरूरत नहीं होती ठीक इसी प्रकार
म्यानमार के भी कई जनजातीय समूह को भारत
आने के लिए वीजा की जरूरत नहीं होती है इस
तरह की छूट इन्हें भारत सरकार से मिली हुई

है अब ऐसे में आने जाने वाले लोगों की कोई
पक्की जांच नहीं होती करीबी रिश्ता होने
और एक दूस दूसरे के यहां आने जाने के कारण
ड्रग्स की आपूर्ति के लिए आसान रास्ता बन

जाता है क्योंकि इससे तस्करी का रास्ता
आसान हो जाता है कहते हैं कि गोल्डन
ट्रायंगल से पहले चीन में ड्रग्स का
बिजनेस बड़े पैमाने पर होता था यह साल
1820 के आसपास की बात है जब ब्रिटिश

बिजनेसमैन चाय के बदले चीन को अफीम की
सप्लाई करते थे चीन में अफीम का उपयोग
दवाएं मनाने के लिए किया जाता था लेकिन
बाद में यहां के युवा इसे खाने लगे नशे

करने के लिए हालांकि अफीम वहां वैध थी फिर
भी मांग को देखते हुए ब्रिटेन के लोग चोरी
छिपे यहां अफीम पहुंचाते रहते थे अब यहां
के लोग इस नशे के आदि हो गए थे और साल

1849 में चीन के राजा डाओ गुआंग ने अपनी
जनता की हालत देखकर नशे के खिलाफ युद्ध
छेड़ दिया और बड़े पैमाने पर नशे के विरोध
में छापेमारी कर दी नशे से जुड़ी हर वस्तु
को जप्त करने का आदेश दे दिया गया और नशा
करने वाले को भी जेल में डालने का आदेश

दिया गया उस अफीम का बिजनेस हिलता देख
ब्रिटिश सेना क्रोधित हो गई और चीन पर
अटैक कर दिया युद्ध के के बाद साल 1842
में ब्रिटेन और चीन के बीच एक समझौता होता

है लेकिन यह इतना गैर बराबरी का था कि इसे
अनइक्वल ट्रीटी के नाम से जाना गया इस
एग्रीमेंट के तहत चीन को अपने पोर्ट
ब्रिटिश मर्चेंट्स के लिए खोलने पड़ गए

यहां तक कि उन्हें अफीम के बिजनेस को
नुकसान पहुंचाने के लिए ब्रिटिश सरकार को
भारी मुआवजा भी देना पड़ा कई सालों बाद
आखिरकार ब्रिटिश के जाने के बाद चीन ने

अपने लोगों को अफीम की लत से मुक्ति दिला
दी चीन के बाद ये उन तीन देशों की सीमाओं
के भीतर नशीली दवाओं का बिजनेस फलने फूलने
लगा जिसे आज हम लोग गोल्डन ट्रायंगल के
नाम से ही जानते हैं भारत इन देशों से

जुड़ा हुआ है और इसलिए यहां पर सभी प्रकार
के ड्रग्स आसानी से आ जाती हैं यह ड्रग्स
विशेष रूप से नॉर्थ ईस्टर्न रीजन से ही
आती हैं हालांकि भारत का पंजाब राज्य भी

ड्रग्स तस्करी के लिए बहुत बदनाम है
तालिबान बैन ओपियम कल्टीवेशन इन
अफगानिस्तान हालांकि जब भी अफीम की खेती
की बात होती है तो हमारे दिमाग में सबसे
पहले अफगानिस्तान का नाम आता है क्योंकि

अफगानिस्तान कई वर्षों तक दुनिया के सबसे
बड़े अफीम प्रोड्यूसर देश बना रहा है
लेकिन साल 2021 में तालिबान संगठन के
सत्ता में वापस आने के बाद अफीम की खेती

पर प्रतिबंध लगा दिया गया तालिबानियों का
कहना है कि तमाम नशे की वस्तु जो मेंटल
बैलेंस के लिए हार्मफुल है और इस्लाम धर्म
में हराम किया गया है तालिबानियों ने अफीम

की खेती पर प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी
करते हुए अफीम प्रोडक्शन करने वाले
किसानों को कड़ी सजा की चेतावनी भी दी है
जिस कारण से यहां अफीम की खेती में 95 पर

तक की गिरावट आई अफगानिस्तान में अफीम पर
यूनाइटेड नेशंस के सर्वे से पता चलता है
कि देश में साल 2022 में 6200 टन अफीम की
खेती हुई थी जो साल 2023 में 95 फीदी तक

घटकर 333 टन ही रह गई है और म्यानमार अब
इसके टॉप पर है बहरहाल आज की वीडियो में
फिलहाल बस इतना ही इन सभी बातों को लेकर
आपकी क्या राय है नीचे कमेंट सेक्शन में

हमें जरूर बताएं अगर वीडियो अच्छी लगी हो
तो इसे लाइक और शेयर अवश्य कर

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