Rahul Guarantee & Modi : राहुल की गारंटी.. मोदी-शाह भी दंग ! - instathreads

Rahul Guarantee & Modi : राहुल की गारंटी.. मोदी-शाह भी दंग !

दोस्तों नमस्कार कॉर्पोरेट और कॉर्पोरेट
की पूंजी क्या भारत के लोकतंत्र को हड़प
सकती है अगर देश की राजनीतिक सत्ता जिसे
जनता ने चुना है अगर वह जनता के सरोकारों
को छोड़ दे और कॉर्पोरेट के साथ बेहतरीन

तालमेल बैठा ले और इस देश के हर क्षेत्र
में कॉरपोरेट की मौजूदगी खुले तौर पर इस
देश की नीतियों के आसरे होने लगे तो फिर
मुनाफा बचेगा या लोकतंत्र बचेगा या इस
लोकतंत्र के भीतर सिर्फ मुनाफा ही नहीं

रंगगा यह सवाल कांग्रेस से बेहतर और कौन
जान सकता है जिसने इस देश के भीतर में
खुली बाजार व्यवस्था को लेकर आए जिसने इस
देश में कॉर्पोरेट को एक जगह दी जिसने इस
देश में कॉर्पोरेट आपसी प्रतिस्पर्धा के
जरिए इस देश के विकास से जुड़ सके उस

रास्ते को बनाया और यह आज से नहीं 1991
में जब पीवी नरसिंहा राव देश के
प्रधानमंत्री थे और फाइनेंस मिनिस्टर के
तौर पर मनमोहन सिंह थे तब से इस जोड़ी ने

अर्थव्यवस्था को बाजार से जोड़ा लेकिन यह
किसे को पता था कि दरअसल बाजार से जुड़ती
हुई अर्थव्यवस्था एक झटके में इस देश के
लोकतंत्र को ही कहीं खत्म तो नहीं कर देगी

दरअसल यह एक ऐसी नब्ज है जिसको राजनीतिक
तौर पर पकड़ पाने की स्थिति में अभी तक
कोई आया नहीं था और इस देश के भीतर वह
तमाम मुद्दे जो इस देश में ओल्ड पेंशन से

जुड़े हुए हो या इस देश के भीतर किसानों
की आय से जुड़े हुए हो या इस देश के भीतर
में ड्रोन से जो जमीनों को परखा जाता है
और उसकी माप ली जाती है और उसको डेवलपमेंट
का हिस्सा बताया जाता है वह भी कॉरपोरेट
की पूंजी से जुड़ा हुआ हो सकता है इस बात

का जिक्र इससे पहले कभी किसी ने किया नहीं
कमोवेश पहली बार अगर इन तमाम परिस्थितियों
को आप परखे और राहुल गांधी की न्याय
यात्रा के वक्त में वह जिन मुद्दों की
गारंटी खुले तौर पर अब लेने लगे हैं उसमें

पहली बार यह सवाल आ गया है कि इस देश के
भीतर में कॉर्पोरेट और सत्ता के मिली भगत
की नब्ज को राहुल गांधी ने पकड़ लिया है
हालांकि इससे पहले राजनीति सामान्य तौर पर
मुद्दों के आसरे होती थी नीतियों को लेकर

होती थी लेकिन यह कोई बात खुले तौर पर
कहता नहीं था कि इस देश के भीतर में चाहे
मेड इन इंडिया हो या मेक इन इंडिया हो वह
आत्मनिर्भरता का नारा हो या इस देश के
भीतर आदिवासी ग्रामीण इलाकों में विकास का

जिक्र हो इस देश में किसानों की आय का
जिक्र हो या एफसीआई गोडाउन भी खत्म करने
की परिस्थिति हो तमाम क्षेत्रों में
कॉर्पोरेट सत्ता के साथ मिली भगत कर कैसे

हा हो चला और हर क्षेत्र के लोगों के
सामने इस दौर में मुश्किल आती चली गई
स्थिति इतनी विकट हुई कि इस देश में जो
नया शिक्षा को लेकर जो पॉलिसी सामने निकल

कर आई वह भी सिर्फ और सिर्फ पैसे वालों के
इर्दगिर्द ही रेंगने लगी यानी अभी तक
छितरा हुई अवस्था में इन बातों का जिक्र
होता था इन नीतियों को लेकर या किसी एक
क्षेत्र को लेकर पहली बार राहुल गांधी अगर

इस नब्ज को पकड़ चुके हैं और जिन बातों की
गारंटी अब वह अपनी न्याय यात्रा के दौर
में दे रहे हैं उससे दो बातें तो खुले तौर
पर सामने आ चुकी है पहली बात इस देश की

आर्थिक नीतियों को कॉरपोरेट के हवाले क्या
मोदी सत्ता ने कर दिया है और उसी मोदी
सत्ता से इस दौर में इंडिया टकराना चाहता
है राहुल गांधी न्याय यात्रा निकाल रहे
हैं या कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को उभारना

चाहती है और जनता इन मुद्दों को समझ जाए
दूसरी बात जो लगातार प्रधानमंत्री मोदी के
जरिए या फिर भारत सरकार के जरिए जिस विकास
डेवलपमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर इन तमाम बातों
का जिक्र किया गया उसके जरिए देश के ऊपर

सिवाय वसूली वह भी टैक्स वसूली से हटकर
कुछ भी नहीं सामने आया लेकिन कॉरपोरेट को
लाभा लाभ होने लगा आंकड़ों के लिहाज से
समझिए तो इस देश के भीतर में जो डिस

इन्वेस्टमेंट था वह 4 लाख करोड़ से ज्यादा
मोदी काल में हुआ इस दौर में जो
प्राइवेटाइजेशन था वह तकरीबन 4 लाख से
ज्यादा प्राइवेटाइजेशन के क्षेत्र में भी
हुआ और जो मोनेटाइजेशन का दौर था वह 6 लाख

करोड़ का एक आंकड़ा रखा गया यानी लगभग 14
लाख करोड़ इस दौर में जो इस देश की
राष्ट्रीय संपत्ति थी जो पब्लिक सेक्टर का
हिस्सा था जो इस देश के खनिज संसाधन थे उन
सबको ट्रांसफर कॉरपोरेट के हिस्से में कर
दिया गया और यहीं से सवाल उठा जब किसानों

का आंदोलन अब शुरू हुआ तो किसानों की
एमएसपी की गारंटी अगर मोदी सरकार नहीं दे
पा रही है और खुले तौर पर कांग्रेस ने
ऐलान कर दिया तो अब उन पन्नों को पलटने की
जरूरत है क्या वाकई इस देश में कॉरपोरेट

और उसकी पूंजी इस देश को लोकतंत्र को खत्म
कर अपने मुनाफे को जोड़ते हुए इस देश में
गवर्नेंस के तौर पर उभर चुकी है इन बातों
को एक-एक पन्ने के तौर पर आज आपके सामने
रखा जाएगा लेकिन उससे पहले हमें लगता है

कल जिस बात का जिक्र राहुल गांधी ने खुले
तौर पर किया कि एमएसपी हम सत्ता में आएंगे
तो एमएसपी की गारंटी कानूनी गारंटी लेकिन
बात यही नहीं रुकेगी बात इसके आगे तक

जाएगी वो कौन सी बातें थी आज इन पन्नों को
खोला जाए उससे पहले राहुल गांधी के इस
वक्तव्य को सुन
लीजिए कि इंडिया की सरकार आएगी
तो हम एमएसपी की गारंटी हिंदुस्तान के
किसानों को देंगे जो स्वामीनाथन रिपोर्ट

में लिखा है वह हम पूरा करके आपको दे
देंगे और यह हमारी शुरुआत
है
हमारा मेनिफेस्टो
है उसमें हमारा डिस्कशन चल रहा
है यह हमने आपको सिर्फ पहली बात बोली है

इसके आगे भी हम अपने मेनिफेस्टो में
किसानों के लिए मजदूरों के
लिए काम करने जा रहे हैं दरअसल सरकार जब
कहती है कि वह एमएसपी की गारंटी नहीं ले
सकती है क्योंकि बहुत बड़ा बोझ सरकारी

खजाने पर पड़ेगा लेकिन सरकार की अपनी
नीतियों को अगर परखे तो उन्होंने इस देश
के किसानों की जो बदहाली की है और उस
बदहाली पर रेड कार्पेट बिछाने के लिए जिन

नीतियों को सामने लेकर आए हैं वह चाहे
सब्सिडी की शक्ल में हो या फिर अलग-अलग
कल्याणकारी योजनाओं की शक्ल में हो अगर इन
सभी चीजों को समेटकर इस देश के किसानों को
अपने पैरों पर खड़ा कर दिया जाए तो शायद

सरकार के खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा इस
दौर में खाद तक में सब्सिडी लगभग 2 लाख
करोड़ की इस दौर में बीजों पर सब्सिडी इस
दौर में पांच किलो अनाज मुफ्त जो वितरण

होता है उनको लेकर जो 2 लाख करोड़ का
खर्चा है वह भी जोड़िए और बीमा योजना
जिसका लाभ कंपनियों को होता है उसको भी
जोड़िए अलग-अलग योजनाओं के जरिए चाहे वह
किसान सम्मान निधि की रकम को भी जोड़िए

अगर इन तमाम चीजों को जोड़िए तो आपके जहन
में एक हल्का सी रकम उभर कर आएगी जो
तकरीबन छ लाख करोड़ के लगभग की होगी अब
सवाल यह है कि एक तरफ 6 लाख करोड़ और

दूसरी तरफ 10 लाख करोड़ सिर्फ 4 लाख करोड़
का अंतर है और 4 लाख करोड़ जैसे इस देश के
भीतर में चाहे वह झारखंड का किसान हो चाहे
बिहार का हो चाहे तमिलनाडु का हो चाहे

पंजाब और हरियाणा का क्यों ना हो अगर सबको
लेकर एक दृष्टि से उनके उत्पादन को एमएसपी
के जरिए सरकार खरीदती है तो एक झटके में
इस देश के जो छोटे और सीमांत किसान भी है

उनकी स्थिति भी जो 000 हर चार महीने पर जो
सरकार देती है उससे बेहतर हो जाएगी तो यह
तो नीतियों का खेल है सरकार की अपनी
राजनीति का खेल है लो कल्याणकारी
कल्याणकारी योजनाओं के बार-बार बताने का

खेल है लेकिन इसके भीतर का सच उस कॉरपोरेट
के जरिए और कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने का
क्या है यह कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है
क्योंकि लगातार सरकार ने जो जमीने आदिवास
सियों की ली जो ग्रामीण इलाकों में जमीनें
ली जो देश के अलग-अलग हिस्सों में जो

पीएसयू चल रहे थे पब्लिक सेक्टर के उसको
कॉरपोरेट के हवाले किया सरकार अपने तौर पर
चाहे इंकार करें हमें लगता है कि उसकी
पूरी लिस्ट आपको बताएं उससे पहले एक बात
राहुल गांधी की और इसलिए सुनिए क्योंकि जब

वह रांची पहुंचते हैं तो वहां पर
एचईसी जहां के कर्मचारियों को वेतन नहीं
मिल पा रहा है और वह इस देश के भीतर में
सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर के तौर पर जब

स्थापना हुई तब से
रहा और क्यों उनको कहना पड़ गया कि इस दौर
में कॉरपोरेट के हवाले यह नहीं होने देंगे
बकायदा अडानी का नाम लेकर जिक्र हुआ लोगों
के बीच में क्यों करना पड़ा जिक्र इसके
पीछे की परिस्थिति क्या है और क्या वाकई
सरकार इस देश के भीतर में तमाम पब्लिक

सेक्टर को बेच रही है जो सरकार इंकार करती
है लेकिन उस कच्चे चिट्ठे को बताना होगा
लेकिन पहले सुनिए यह बात बीजेपी के लोगों
से मैं कहता हूं कर लो जो करना है अदानी
का नाम एसी पर नहीं लगेगा हम नहीं लगने
देंगे यह देश की पूंजी

है यह किसी उद्योगपति की पूंजी नहीं
है यह फ्री
गिफ्ट अदानी को नहीं
मिलेगा यह हम आपको आश्वासन दे रहे हैं और
हम सरकार आएगी तो जो आपको सपोर्ट की जरूरत
होगी वह आपको सपोर्ट मिलेगी और आपको कंपट
बनाया

जाएगा भाइयों और
बहनों पूरे देश
में प्राइवेटाइजेशन किया जा रहा
है यह देश का सच है मौजूदा सरकार का सच है
उसने जितनी बड़ी तादाद में इस देश में
पीएसयू को निजी हाथों में सौंपा है उसको

भी कई तरीके से पैसा कमाने के लिए सरकार
ने काम किया है कुछ के शेयर बेच डाले कुछ
पूरी कंपनी बेच डाली अगर बीते 10 बरस का
खाखा एक निकालकर आप देखना शुरू कीजिएगा तो
4200 करोड़ का पूरा आंकड़ा डिस

इन्वेस्टमेंट के इर्दगिर्द आकर खड़ा हो
जाएगा जिसमें से
31000 करोड़ रुपए माइनॉरिटी स्ट्रेक्स जो
होते हैं उसको सेल किए गए और स्ट्रिक
ट्रांजैक्शन जो था यानी स्ट्रेटेजिक
क्षेत्र का जो ट्रांजैक्शन था उसके जरिए

तकरीबन 70000 करोड़ रपए सरकार ने कमा लिए
कौन सी कंपनियां थी वो एचपीसीएल थी आरईसी
थी डीसीआईएल थी एचएससीसी थी एनपीसीसी थी
निपको थी टीडी टीएचडीसी थी कामराज पोर्ट
था एयर इंडिया था एनआईएनएल था और इतना ही
नहीं अगर इस फेरि को आप अगर शेयर के जरिए

परखिए और पिछले दिनों देखना शुरू कीजिएगा
पिछले वर्ष यानी 2023 में कोल इंडिया के 3
पर शेयर बेच दिए रेल विकास निगम के
5.36 पर शेयर बेज
दिए एस जेवन लिमिटेड को एस जेवीएन लिमिटेड
को 4.92 शेयर बेच दिए इंडिया रिन्यूएबल

एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी के 10 पर शेयर
आपने बेच दिए इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड के
8 पर शेयर बेच दिए एनएचपीसी के 3.5 पर
शेयर बेच दिए यह सिर्फ 2023 में हुआ है
उससे पहले चले जाइएगा तो ओएनजीसी 1 पर

शेयर बेचा आपने एलआईसी 35 पर शेयर बेचा
आपने पीपीएल लगभग 20 पर शेयर बेचे आपने
आईआरसीटीसी 5 पर शेयर बेचे आपने एचएएल 35
पर शेयर आपने बेचे यह तमाम कंपनियों की एक
पूरी फरिस्ट है जिसमें आप शेयर बेचते हैं

पूरी कंपनी नहीं बेचते हैं और जहां पूरी
कंपनी बेचते हैं उसके जरिए इस बात की
जानकारी दे देते हैं कि उसमें कुछ अभी भी
सरकार अपने तौर पर उसको मोनेटाइज कर रही
है और यह एक ऐसा आंकड़ा था जिसके जरिए

नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन तक जो 6 लाख
करोड़ की क्रिएट की गई 2022 में और उसका
खत्म होना है 2025 तक का टारगेट है 6 लाख
करोड़ अब यहां पर सवाल सबसे बड़ा यह है कि
सरकार जो डेवलपमेंट के लिए अलग-अलग

टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती है
प्रधानमंत्री मसलन बतलाते हैं कि देखिए हम
ड्रोन के जरिए इस देश के किसानों को लाभ
पहुंचाएंगे
जिससे वह जमीन का आकलन कर सके लेकिन क्या
यह सही मायने में यह बात नहीं है जब आपकी

पूरी इकोनॉमिक पॉलिसी ही कॉरपोरेट के लिए
हो जाए तो आप उन डाटा को उस आंकड़े को उस
कॉरपोरेट के इस्तेमाल के लिए यूज़ करेंगे
और यही वह वजह है जिसको लेकर इस बात का

जिक्र होता है कि जब अलग-अलग मंत्रालयों
से पूछा गया कि आपके अपने क्षेत्र में
कितनी चीजों को आप बेच सकते हैं कितनों को
मोनेटाइज कर सकते हैं तो 17 मंत्रालय निकल

कर आए अपने तौर पर बताने के लिए कि देखिए
हम ये ये कर सकते हैं इस इस रूप में किया
जा सकता है और वो एविएशन का क्षेत्र हो
पोर्ट का क्षेत्र हो माइनिंग का क्षेत्र

हो टेलीकॉम का क्षेत्र हो रेलवे का
क्षेत्र हो या पावर ट्रांसमिशन हो या पावर
जनरेशन हो और यहां तक कि नेचुरल गैस की
पाइपलाइन में भी उसको भी मोनेटाइज करने की
दिशा में बढ़ गए अब यह सवाल सबसे बड़ा है
क्या इतनी बड़ी तादाद में अगर

की दिशा में गवर्नमेंट की पॉलिसी बढ़ चुकी
है और राहुल गांधी हर जगह जाकर यह गारंटी
ले रहे हैं कि हम सत्ता में आए तो हम इसको
पलट देंगे इसको होने नहीं देंगे इस सच को
आप समझ जाइए तो इसके मतलब मायने दिल्ली के

लिए मुश्किल इसलिए हो चले हैं क्योंकि जो
पूरा का पूरा डेवलपमेंट मॉडल इस दौर में
मोदी सरकार ने खड़ा किया उसकी उस नब्ज को
सिर्फ पकड़ा गया है इस दौर में कि यह
सिर्फ कॉर्पोरेट के लिए ही हो रहा है

सुनना चाहिए कि ड्रोन के जरिए जमीनों की
माप के बाद कैसे कॉरपोरेट को लाभ होगा
इसका जिक्र भी इसी न्याय यात्रा से निकला
है आज आज मैं निकल रहा था रास्ते
में मुझे लोगों ने रोका कहा कि
देखिए यह ड्रोन जो सर्वे हो रहा

है यह ड्रोन सर्वे हो रहा है उसको आप
रोकिए तो यात्रा में हम लोगों से बात करते
हैं तो बताते क्या हो रहा है ड़ी में क्या
हो रहा है झारखंड में क्या हो रहा है तो
बता देख चीज निकली है यह ड्रोन सर्वे है

ऊपर से य ड्रोन उड़ देते हैं और यह
बेसिकली क्या हो रहा
है यह आदिवासियों की जमीन चने चोरी करने
की तैयारी हो रही
है यह क्या करेंगे यह गाव गांव में

जाएंगे और कहेंगे की देखो
भैया यह जमीन इस व्यक्ति की
यह जमीन इस व्यक्ति की है मगर यह जो जमीन
है जिसको ग्राम सभा की जमीन कहा जाता है
यह किसी के नहीं
है बात समझ गए

आप तोय आगे पीछे ू रहे ना यह आनी का काम
किया जा रहा है य दरअसल राहुल गांधी जिन
मुद्दों को जिस तरीके से उठा रहे हैं इससे
पहले भारत की राजनीति में कम से कम देश की
आर्थिक नीतियों को लेकर इतने माइन्यूट

तरीके से देश की जनता वह भी ग्रामीण जनता
वह भी आदिवासी समुदाय के बीच जाकर इन
बातों का जिक्र इससे पहले कोई पॉलिटिशियन
करता नहीं था लेकिन इस देश के भीतर में
राजनीतिक सत्ता ने भी राष्ट्रवाद की जो नई

परिभाषा पूंजी के आसरे गड़ी और जनता के
भीतर जो मैसेज यह दिया कि हम इस देश को
किस रूप में विकसित कर रहे हैं और 204 7
तक भारत कैसे विकसित राष्ट्र हो जाएगा
इसके लिए चाहे वह आत्मनिर्भरता का नारा हो

चाहे लोकल फॉर वोकल का नारा हो ध्यान
दीजिए लेकिन जनता के बीच इंडस्ट्री का
खुलना और इंडस्ट्री जनता के मालिकाना के
तहत हो और वहीं के मजदूर काम कर रहे हो इस
दृष्टि से देखिएगा तो इस देश के भीतर में

आपको तीन या चार राज्य मिलेंगे जहां
इंडस्ट्री बड़े पैमाने पर है बिहार में
गायब है इंडस्ट्री झारखंड में गायब है
बंगाल में गायब है छत्तीसगढ़ में गायब है
मध्य प्रदेश में गायब है जिस तर्ज की बात

हो रही है सवाल है कि इस देश राजस्थान की
यही परिस्थिति है तो इसका मतलब है कि
कॉर्पोरेट के लिए ही पूरा का पूरा
नेशनलिज्म या डेवलपमेंट और या राष्ट्रवाद
की जो परिभाषा है जो विकास के साथ जुड़

जाए यह कॉरपोरेट की पूंजी को बढ़ाएगी और
इसी पंजी को बताने के लिए क्या इस नए

न्याय यात्रा के माध्यम से चीजों को राहुल
गांधी इसलिए आगे बढ़ाना चाह रहे हैं कि
जनता कम से कम समझ तो जाए कि जो भी विकास
का जिक्र प्रधानमंत्री मोदी करते हैं वह
दरअसल कॉर्पोरेट के विकास का जिक्र हो रहा
है वह उनके विकास का जिक्र नहीं हो रहा है

क्योंकि जब आप और माइन्यूट स्थिति में
आएंगे तो इस देश के भीतर में जो ग्रामीण
इलाके में जमीन अलग-अलग प्रोजेक्ट के नाम
पर ली गई या आदिवासियों की जो जमीन ली गई
वह सरकारी योजनाओं के लिए नहीं ली गई वहां

पर कोई सरकारी योजना नहीं बनी और
महत्त्वपूर्ण बात तो यह भी है कि जो सड़क
और रेल के लिए जमीन ली गई वह भी निजी
हाथों में सौंप दिया गया क्योंकि इस दौर

में रेलवे का जो प्राइवेटाइजेशन था वह
10496 करोड़ और 2 लाख करोड़ से ज्यादा
प्राइवेटाइजेशन जो बड़ी कंपनियों को दिया
गया सड़क बनाने के लिए और सड़क और रेलवे

और उसके पैरेलल में एविएशन उसको भी ले आइए
यानी वायु की स्थिति हो जमीन की स्थिति हो
सड़क रेल की स्थिति हो सब कुछ निजी हाथों
में सौंपा गया और यह बकायदा गवर्नमेंट के
डॉक्यूमेंट बताने लगे कि एविएशन के
क्षेत्र में 20 हज करोड़ से ज्यादा रेलवे

के क्षेत्र में 5 लाख करोड़ से ज्यादा रोड
के क्षेत्र में सड़क के क्षेत्र में 2 लाख
करोड़ से ज्यादा और यह अलग-अलग तरीके से
जो माइनिंग का क्षेत्र है उसमें भी लगभग
300 करोड़ के करीब जो पाइपलाइन है नेचुरल
गैस की उसमें भी लगभग 25000 करोड़ से

ज्यादा जो पावर ट्रांसमिशन है उसमें भी 45
करोड़ से ज्यादा और जो पावर जनरेशन है
उसमें भी तकरीबन 40000 करोड़ रपए यह
आंकड़े बतलाते हैं कि कॉरपोरेट के हिस्से

में इसे जाना है जनता के साथ नहीं जुड़ना
है तो जनता अपने तौर पर एक आम नागरिक की
शक्ल में उसको रोजगार कहां मिलेगा वह काम
कहां पर करेगी और जो उसकी विरासत की अपनी
जमीन चली आ रही थी पुरखों की जमीन चली आ
रही थी वह डेवलपमेंट के नाम पर तो ले लिया

सरकार ने इसको भी बहुत माइन्यूट तरीके से
कहने की कोशिश इस न्याय यात्रा के दौर में
हुई है सुनिए
जरा सबसे पहले मैं चाहता हूं कि आज
से सात आ साल
बाद आप अपनी शर्ट के पीछे देखो उसके पीछे
लिखा हो मेड इन
झारखंड और फिर आप देखो कि आप पूछो भैया यह
कहां बन रही है शर्ट और यहां पर एक

फैक्ट्री
हो यहां गांव में जो लोग हैं वो उस
फैक्ट्री में काम
करें गांव से लोग उस फैक्ट्री को चलाएं
मैनेजमेंट दअसल सवाल तो यही है कि क्या
वाकई इस देश के भीतर में आम
नागरिक इस बात को समझ गया है या समझ पाएगा

कि इस देश में विकास का पूरा का पूरा
ढांचा कॉर्पोरेट के नेटवर्थ उसकी पूंजी
उसके मुनाफे से जुड़ा और इसीलिए इस देश के
भीतर में लोकतंत्र भी खत्म तो नहीं हो रहा
है यह सवाल इसलिए बड़ा महत्त्वपूर्ण है

क्योंकि जब सत्ता होती है तो वह विपक्ष से
टकराती है लेकिन यह किसे कहां पता था कि
विपक्ष के लोगों को ही अपने साथ ले आना है
और उनको अपने साथ लाकर विपक्ष को कमजोर कर
देना है और साथ लाने की एवज में जाहिर है

उनको बहुत रियायत दी जाएगी वह कानूनी तौर
पर रियायत हो पैसे के तौर पर रियायत हो इस
देश में विधायक और सांसदों का खरीद फरोख
तो बखूबी हर किसी ने देखा कोई पूछ भी सकता
था यह पैसा कहां से आता है लेकिन इसके बाद

की परिस्थिति नाजुक हो गई जब इस देश में
एजेंसियां भी काम करने लगी सरकार के इशारे
पर लेकिन उसके आगे का सवाल यह था कि आप उस
तरफ मत रहिए यानी अगर आपने अपराध किया है
तो आप इस तरफ आ जाइए और राजनीतिक तौर पर
विपक्ष को कमजोर कीजिए इस कतार में अगर आप

इंडिया का ही परीक्षण शुरू करें और उससे
पहले अगर आज की तारीख में आपसे बात करें
तो महाराष्ट्र में देखिए मिलिंद देवड़ा
राज्यसभा में जाएंगे पहले कहा कांग्रेस

में थे अशोक चौहान कांग्रेस में थे पूर्व
मुख्यमंत्री वह भी बीजेपी भेज रही है
आरपीएन सिंह मनमोहन सिंह की सरकार में
मंत्री हुआ करते थे वह उत्तर प्रदेश से आ
जाएंगे वह बीजेपी में चले आए एक लंबी कतार
है जो कांग्रेस के नेताओं की है जो कि खास

तौर से इंडिया से थ जुड़े छत्रपती भी है
इसीलिए छत्रपुर अगर बंगाल में टूट गई
पंजाब में टूट गई दिल्ली में टूट गई और
राजनीतिक तौर पर सब अपनी मजबूरी राजनीतिक
ताकत की दिखा रहा है तो यह सब कुछ इतना
आसान नहीं है कि उसकी राजनीतिक ताकत बढ़

जाएगी वो बची रहे उस बचे रहने की सौदेबाजी
का यह दायरा होता है लेकिन फिर आखिरी सवाल
वही आता है तो क्या सरकार अब इस नब्ज को
जब कोई पकड़ चुका है और राजनीतिक तौर पर
जनता जानने समझने लगेगी तो जनता ही इस देश

के भीतर में विपक्ष के तौर पर उभर कर
सामने आ जाए उससे पहले अपनी चुनावी जीत पर
मोहर लगा लेनी है और यह मोहर तभी लग सकती
है जब विपक्ष गायब हो जाए और विपक्ष के

ऊपर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों को मत दिया
जाए उन आरोपों के दायरे में आने वाले
व्यक्तियों को अपने साथ ले लिया जाए यह एक
राजनीतिक चक्रव्यू नहीं है यह इस देश के
भीतर में लोकतंत्र को खत्म करने की

परिस्थितियां है जिसमें हावी कॉरपोरेट की
पूंजी है उसका मुनाफा है और उस मुनाफे और
कॉरपोरेट की पूंजी पर इस में सत्ताधारी की
राजनीति टिक गई और सत्ताधारी की राजनीति
ने अलग-अलग तरीके से कभी संसद का सहारा

लिया तो इस देश में इलेक्टोरल बंड आ गया
कभी अपनी ताकत का सहारा लिया तो सुप्रीम
कोर्ट ने उस पर सुनवाई करने के दौरान
ऑर्डर ही रिजर्व कर लिया अलग-अलग तरीके से

अगर चीजों को आप परखना शुरू करेंगे तो
आपके भीतर आखिर में दो ही सवाल बचेंगे तो
क्या सत्ता परिवर्तन बहुत मुश्किल है यहां
पर कोई भी कह सकता है कि राजनीतिक तौर पर
विपक्ष जितना कमजोर किया जा चुका है ऐसे

में इस देश की राजनीति किसी पारंपरिक
चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन कर पाए यह
बड़ा मुश्किल काम है आसान काम इस देश के
भीतर की जनता का है जो राजनीतिक तौर पर
परिपक्व हो जाए सवाल यही है और इसीलिए जब

राहुल गांधी एक के बाद एक गारंटी किसी भी
समुदाय विशेष से मिलते हैं उस समुदाय
विशेष के मुश्किल हालातों को समझकर जब यह
कहते हैं कि हम आए तो इसकी गारंटी लेते

हैं यह दिल्ली के भीतर एक बेचैनी पैदा
करता
है और यह बेचैनी आने वाले वक्त में अब तो
20 25 29 दिन बचे हैं नोटिफिकेशन 10 मार्च
तक आ जाएगा उससे पहले चाहे किसान आंदोलन
पर आंसू गोले छोड़ती हुई पुलिस हो चाहे

कॉरपोरेट का बढ़ता हुआ नेटवर्थ के बीच इस
देश में ईडी और सीबीआई की बढ़ती हुई
सक्रियता हो सब कुछ बहुत तीखा होगा और
राजनीतिक तौर पर मामला सिर्फ ममता या

केजरीवाल तक नहीं टिकेगा बात आगे भी जाएगी
जो महाराष्ट्र में चौहान तक गई है यह मध्य
प्रदेश की चूले भी हिलाने वाली है कुछ
इंतजार करना होगा और यह इंतजार आपको

हरियाणा को लेकर भी करना होगा वहां पर भी
विपक्ष की चूले हिलेगी जो कांग्रेस के
भीतर की आवाजें हैं वह भी सिमटे गी या साथ
खड़ी हो जाएगी सिर्फ आपको इंतजार करना

होगा क्योंकि यह
गारंटी कहीं दिल्ली की सत्ता पर भारी हो
चली है बहुत-बहुत शुक्रिया बहुत-बहुत
शुक्रिया

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