Supreme Court में Modi सरकार कैसे हारी Electoral Bonds case? CJI Chandrachud | kisan andolan| - instathreads

Supreme Court में Modi सरकार कैसे हारी Electoral Bonds case? CJI Chandrachud | kisan andolan|

ब्रॉट टू यू बाय सेंसेंट के अभी लेके आए
सेंसेंट के टूथ का करंट गन तो लाइव का
करंट ऑन नमस्कार देश की संविधान पीठ जो कि
सुप्रीम कोर्ट के जजों से बनती है जिसमें
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया यानी मुख्य

न्यायाधीश होते हैं यह जब किसी मुद्दे पर
फैसला देती है तो सबकी निगाह जाती है आज
देश के सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने
इलेक्टोरल बॉन्ड पर फैसला दिया आप कहेंगे

यह क्या होता है हम सब विस्तार से बताएंगे
हम आपको बताएंगे कि हमारे और आपके वोट की
खातिर राजनीतिक पार्टियां जो प्रचार करती
हैं अपना तंत्र चलाती हैं दफ्तर चलाती हैं

इसके लिए इन्हें चंदा चाहिए होता है यह
चंदा हम और आप दें अलग-अलग कंपनियां दें
कोई समस्या नहीं है लेकिन जब कंपनियां
इलेक्टोरल बंड के जरिए चंदा दें और हमें
यह पता ना चले कि किस पार्टी को किस कंपनी

ने कितना चंदा दिया है जब यह पारदर्शी ता
से बाहर हो जाए तब समस्या होती है कई
चुनावी एक्टिविस्ट ने इसी समस्या की तरफ
ध्यान दिलाया था और फिर मामला सुप्रीम

कोर्ट की चौहद्दी तक पहुंचा था इलेक्टोरल
बॉन्ड पर फैसला किसने दिया क्या दिया
इलेक्टोरल बॉन्ड क्या है और इस फैसले के
बाद क्या प्रतिक्रियाएं आई भविष्य की क्या

रूपरेखा होगी आज इन सब के बारे में
विस्तार से बात करेंगे बात इस पर भी
करेंगे कि अंग्रेजी के एक अखबार में चुनाव
आयोग से जुड़ी एक प्रक्रिया पर जो रिपोर्ट
आ है उसके मायने क्या हैं क्योंकि बताया

गया है कि 2019 के चुनाव से पहले लोकसभा
के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम
में कुछ खराब आं आ रही थी जिसका इलेक्शन
कमीशन ऑफ इंडिया ने संज्ञान भी लिया था

इसके बाद क्या सुधार हुआ है अलग-अलग
पक्षों की तरफ से क्या सफाई आई है इसकी
प्रक्रिया क्या होती है इस पर बात करेंगे
क्योंकि एक धड़ा है जो ईवीएम पर सवाल

उठाता रहता है सवाल उठे तो जवाब हासिल
करना जरूरी है नमस्कार सौरभ द्विवेदी नाम
है हमारा आप देखना शुरू कर चुके हैं ललन
टॉप शो जिनमें आज इन दो बड़ी खबरों पर
विस्तार से बात होगी लेकिन उससे पहले दिन
की

सुर्खियां पहली सुरखी किसान आंदोलन से है
आज किसान आंदोलन का तीसरा दिन शुरू हुआ तो
तीन किसान संगठनों की एक्टिविटी समझ में
आई संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि वह

दोपहर 11 से 2 बजे तक 3 घंटे के लिए पंजाब
के सब टोल प्लाजा फ्री करवाएंगे भारतीय
किसान यूनियन उग्रह ने पंजाब के छह जिलों
में 12 बजे से 400 बजे तक दोपहर तक ट्रेन
रोकने का ऐलान किया यह हो गया

ऑर्गेनाइजेशन नंबर टू हरियाणा में भारतीय
किसान यूनियन चढ होनी ग्रुप के प्रमुख
गुरुनाम चलनी ने 11:00 बजे समर्थकों की
इमरजेंसी मीटिंग बुलाई इतनी एक्टिविटी
देखने के बाद रेलवे ने क्या किया पंजाब

में कई ट्रेनें रद्द की कई डाइवर्ट की और
हरियाणा में हरियाणा पंजाब का जो शंभू
बॉर्डर है वहां पर भी आज एक्शन चलता रहा
इस एक्शन के बारे में बता रहे हैं ग्राउंड

पर मौजूद हमारे साथी हम उस ब्रिज पर मौजूद
हैं जिसके फुटेजेस आपने पिछले कुछ दिनों
में ललन टॉप चैनल पे वीडियो में देखा है
यहां पे अभी यह सुबह का वक्त है करीब 9:00
बज रहे हैं एक शांति है धीरे-धीरे किसान

जुट रहे हैं अभी दैनिक दिनचर्या से निपट
के नाश्ता वास्ता कर रहे हैं लंगर लगे हुए
हैं वो लोग लंगर करके यहां पहुंचे हैं कुछ
यहां पर पहले से मौजूद हैं यहां पर कुछ

निहंग निहंग समुदाय के भी लोग हैं और वह
यहां पर मीडिया कर्मी कुछ कुछ मौजूद है
उनसे बात कर रहे हैं वो अपनी बातें रख रहे
हैं हालांकि एक शांति है जो हमने पिछले दो

दिनों में जो फुटेज देखा है उसमें आंसू
गोले दागे जाने की खबर आती थी भगदड़ मस्ती
थी किसानों की तरफ से भी गतिरोध जताया
जाता था विरोध जताया जाता था वह भी आगे
बढ़ने की कोशिश करते थे नाका को तोड़ने की

कोशिश करते थे फिलहाल ऐसा कुछ नहीं हो रहा
है पर यह सुबह का वक्त है और अच्छी खबर यह
है कि बातचीत के लिए भी कल एक पहल हुई है
सरकार अ किसान संगठन के जो कुछ नेता हैं
उन्होंने कल बयान दिया कि हम बातचीत के

फेवर में हम चाहते हैं कि बातचीत हो और
बातचीत हो ताकि गतिरोध को खत्म किया जा
सके हालांकि उनकी गुजारिश सरकार से यह भी
थी कि इस तरह से गोले ना बरसाए जाए हमारे
साथ ऐसा व्यवहार ना किया जाए कि हम हम हम

उपद्रवी हैं या फिर हम आतंकवादी हैं यह
किसानों का कहना था पर अभी फिलहाल जिस
वक्त ललन टॉप की टीम शंभू बॉर्डर पहुंची
ऐसा कोई हाल नहीं था शांति है करीब डेढ़

से 2 किलोमीटर का स्ट्रेच है इस हाईवे पे
यह हाईवे जो दिल्ली की ओर जाता है डेढ़ से
2 किलोमीटर का स्ट्रेच हमने देखा जिसमें
किसान जत्थे जत्थे पूरा किसानों का जत्था

बना हुआ है गाड़ियों की लंबी पंगत है और
करीबन दोनों तरफ एक तरफ नहीं क्योंकि
यातायात की आवाजाही पूरी तरह से ठप है इस
रास्ते पे तो दोनों तरफ किसानों ने
अपनी-अपनी गाड़ियां लगा रखी हैं वह पूरी

तैयारी के साथ आए हैं इसके अलावा हरियाणा
के मुख्यमंत्री ने किसानों के प्रदर्शन पर
बयान दिया कहा कि दिल्ली जाना सबका
लोकतांत्रिक हक है लेकिन मंशा का ध्यान

रखना होता है खट्टर यह भी बोले कि इस
मुद्दे पर जरह लोकतांत्रिक तरीके से होनी
चाहिए जिससे समाधान निकाला जा सके देखि
मैं इसमें थोड़ा सा भूमिका य रखूंगा कि
पहली बात तो कि विषय जो डिमांड है वो
हरियाणा सरकार से नहीं है व सारी डिमांड

उनकी केंद्र सरकार से जुड़ी हुई है और उस
केंद्र सरकार से जुड़ने के बाद उन्होने
आवान भी य किया कि हम दिल्ली जाएंगे मुझे
लगता है कि दिल्ली जाना हर एक का
लोकतांत्रिक अधिकार है ऐसा कि नहीं जाना

लेकिन कैसे जाना और क्या मोटिव है जाने का
यह जरूर ध्यान करना होता है और इस विषय का
अनुभव हम पिछले साल देख चुके हैं जब हो
रहा था तब किसान नेताओं और केंद्र सरकार

के मंत्रियों के बीच एक मीटिंग भी चल रही
थी पहले दो दौर की मीटिंग हो चुकी है जो
फेल रही अगली सुर्खी बंगाल से है यहां के
संदेश खाली में तनाव बरकरार है टीएमसी के

नेता शाहजहां शेख और उनके समर्थकों पर यौन
उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं आज इस
मामले में सूबे की मुख्यमंत्री ममता
बैनर्जी का विधानसभा में बयान आया

उन्होंने कहा संदेश खाली में आरएसएस के
बंकर बने हैं वहां से बाहर आकर बीजेपी के
कार्यकर्ता मास्क पहनकर बयानबाजी कर रहे
हैं ममता बनर्जी के हमले का जवाब भारतीय

जनता पार्टी ने दिया आप तो एक बड़ी महिला
नेत्री रही है ना संघर्ष आई
है सीपीएम सरकार में आपने कितना संघर्ष
किया हमने देखा है और आज आपके सीपीएम के

ये टीएमसी के गुर्गे महिलाओं को रात में
नॉक करते हैं उनका यन शोषण करने का प्रयास
करते हैं वो खुलकर बोल रही हैं राजपाल जी
के सामने गई और आप विधानसभा में बोलती कि

आर इसका बर्नर है ममता सरकार ने संदेश
खाली मामले में जांच का आश्वासन देते हुए
यह भी कहा कि गलत काम में शामिल किसी भी
व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा लेकिन जब

विधानसभा में ममता बनर्जी यह बयान दे रही
थी उसी समय उनकी पार्टी के एक सांसद
इस्तीफे की तैयारी में थी नाम मिमी
चक्रवर्ती बांगला फिल्म इंडस्ट्री में काम
कर चुकी मिमी पश्चिम बंगाल की जादवपुर

लोकसभा सीट से सांसद हैं उन्होंने कहा कि
मैं स्थानीय नेतृत्व से यानी टीएमसी की
लोकल लीडरशिप के कामकाज से नाखुश हूं
इसलिए इस्तीफा देने का मन बनाया है
हालांकि उन्होंने अपना इस्तीफा लोकसभा के

अध्यक्ष को नहीं सौंपा है यानी अभी यह
आधिकारिक नहीं है बस फैसले की घोषणा हुई
है अगली सुरखी जम्मू-कश्मीर से है
जम्मू-कश्मीर के कद्दावर नेता पूर्व
मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी

के मुखिया फारूक अब्दुल्ला का आज एक अहम
बयान आया उन्होंने साफ किया कि आगामी
लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी किसी से
गठबंधन नहीं करेगी यानी गुपकर अलायंस
पीडीपी कांग्रेस सबको उन्होंने किनारे कर

दिया यह इंडिया ब्लॉक के लिए भी टका बताया
जा रहा है क्योंकि कयास है कि वह एनडीए से
जुड़ सकते हैं लगता है कि दोनों रियासत और
पार्लिमेंट लेक्शन मुझे लगता है इठे हो ट
अबाउ

अब के हवाले से शायद बात कर रहे
थे सीट शेरिंग का सवाल है आपको क्लियर
करना
चाहता नेशनल कान्फ्रेंस अपने बल बूटे पर

लड़ेगी
इसमें कोई दो राय नहीं है अब बारी बड़ी
खबर
की सबसे पहले बात चुनावी बॉन्ड की सुप्रीम
कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने

आज आदेश जारी किया कि भारतीय स्टेट बैंक
यानी एसबीआई तत्काल इलेक्टोरल बंड जारी
करने पर रोक लगाए ये आदेश एसबीआई के लिए
क्यों है क्योंकि देश में ये एकलौती ऐसी
बैंक है जो कि सरकारी भी है जिसके पास यह

हक है कि वोह चुनावी चंदे के लिए इस्तेमाल
होने वाला इलेक्टोरल बॉन्ड एक किस्म का
कागज एक किस्म का वायदा पत्र जारी करें इस
बॉन्ड के बारे में हम आपको तफसील से

बताएंगे पर पहले बात करते हैं सुप्रीम
कोर्ट के फैसले की जिस बेंच ने आज फैसला
सुनाया कांस्टीट्यूशनल बेंच उस बेंच में
कौन-कौन जज थे पहले नंबर पर भारत के मुख्य
न्यायाधीश जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्र चूर्ण
देश के पूर्व चीफ जस्टिस यशवंत विष्णु

चंद्र चूर्ण के बेटे हैं दिल्ली के सेंट
स्टीफेंस कॉलेज कैंपस लॉ सेंटर और फिर
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की अध्यापक
भी रहे कानून के और 1988 98 में मुंबई हाई

कोर्ट जिसको जो सही भाषा है वह है बॉम्बे
हाई कोर्ट क्योंकि शहरों के नाम बदले हैं
हाई कोर्ट के नाम नहीं बदले हैं इसलिए आज
भी कलकाता हाई कोर्ट या बंबई हाई कोर्ट ही

कहा जाता है इसके वह सीनियर वकील बने और
2000 में पहली दफा देश के एडिशनल सॉलिसिटर
जनरल और 29 मार्च 2000 को ही फिर वह
बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बने और उसके बाद

से उनका सिलसिला इसमें पदविका बढ़ने का
चलता रहा 2016 में वो सुप्रीम कोर्ट में
बतौर जस्टिस आई दूसरा नाम है जस्टिस संजीव
खन्ना का यह भी दिल्ली के कैंपस लॉ सेंटर
से पढ़ाई करके निकले हैं और बतौर जज इनकी

पारी शुरू हुई 2005 में जब यह दिल्ली हाई
कोर्ट के ही एडिशनल जज बने 2019 में
सुप्रीम कोर्ट में आए सीजीआई जो अभी हैं
जस्टिस चंद्र चूर्ण उनके रिटायरमेंट के

बाद जस्टिस संजीव खन्ना ही वरता क्रम में
अगले हैं यानी देश के मुख्य अगले मुख्य
न्यायाधीश बनने की कतार में है तीसरा नाम
है जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई का यह
महाराष्ट्र के अमरावती से आते हैं 25 साल

की उम्र में वकालत शुरू कर दी थी लंबे
वक्त तक बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच
में प्रैक्टिस की और 2003 में बॉम्बे हाई
कोर्ट के एडिशनल जज बने 2019 में सुप्रीम
कोर्ट में बतौर जज आए चौथा नाम जस्टिस

जमशेद बुर्जर पारदी वाला का है यह मुंबई
में पैदा हुए गुजरात के वलसाड से पढ़ाई की
और 1990 में अहमदाबाद हाई कोर्ट में
प्रैक्टिस शुरू की 2011 में गुजरात की हाई
कोर्ट में एडिशनल जस्टिस बने और उसके बाद

2022 में सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज जाए
पांचवा और आखिरी नाम है जस्टिस मनोज मिश्र
का 1988 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से
कानून की पढ़ाई की फिर वहीं वकालत की 23
साल तक और 2011 में एडिशनल जज बने अब तक

आप समझ गए होंगे कि सबसे पहले अतिरिक्त
न्यायाधीश बनाया जाता है उसके बाद
कंफर्मेशन होता है फिर हाई कोर्ट से किसी
दूसरी हाई कोर्ट में ट्रांसफर होता है
वहां पर चीफ जस्टिस बनते हैं और उसके बाद

सुप्रीम कोर्ट आते हैं यह एक प्रक्रिया है
और यह सुप्रीम कोर्ट का आए 2023 में आए यह
पांच जज हैं जो आज की संविधान पीठ में
बैठे थे इनके आदेश के बारे में तो हमने
आपको बताया पर विस्तृत ब्यौरे क्या हैं
आदेश के एसबीआई 12 अप्रैल 2019 से लेकर अब

तक इलेक्टोरल बंड से चंदा पाने वाली
राजनीतिक पार्टियों की डिटेल ब्योरे तैयार
करें जिसमें हर किस्म के विवरण हो एसबीआई
इस डिटेल को 6 मार्च 2024 तक केंद्रीय
चुनाव आयोग को सौंप दे और केंद्रीय चुनाव

आयोग यह सारे ब्योरे 13 मार्च 2024 तक
अपनी वेबसाइट पर पोस्ट करें यानी पब्लिक
करें जिन राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक
खुद को मिले बॉन्ड को बैंक खाते में जमा
नहीं करवाया वह वापस कर दें यह फैसला आया

इस फैसले पर यदि अमल हो गया तो हमें और
आपको यह पता चलेगा कि हमारे देश के
राजनीतिक दलों को किसने कितना चंदा दिया
इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए ये कोई व्यक्ति
हो सकता है यह कोई संस्था हो सकती है यह

कोई कंपनी हो सकती है और यह पारदर्शिता
बहुत जरूरी है ताकि हमें पता चले कि कोई
अपने व्यवसायिक हितों के चलते पार्टियों
को चंदा तो नहीं दे रहा है कहीं पॉलिसी

में इस तरह की तब्दीलियां तो नहीं हो रही
हैं कि किसी को गैर वाजिब लाभ पहुंचे अब
बात करते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड की हम जानते
हैं कि राजनैतिक पार्टियों को अपने
क्रियाकलाप के लिए अपने एजेंडे के प्रचार
प्रसार के लिए दफ्तर के लिए धन की जरूरत

होती है इसके लिए मिलता है चंदा पर यह
बहुत जान जरूरी है जानना कि चंदा किसने
दिया कितना दिया ताकि हमें यह पता चले कि
किन पार्टियों को कौन समर्थन दे रहा है यह
महत्त्वपूर्ण है इसलिए ताकि पॉलिसी के

स्तर पर कोई भेद ना दिखे और इसीलिए
इलेक्टोरल बॉन्ड की जो जवाबदेही है उसे तय
करने के लिए कोर्ट में यह मामला चल रहा था
यह तो हुआ सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब
इलेक्टोरल बॉन्ड की बारीकियां समझते हैं

और इतिहास से शुरू करते हैं 2017 के संसद
के बजट सत्र में केंद्र की नरेंद्र मोदी
सरकार यह इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम लेकर आई
थी उस समय देश वित्तमंत्री थे अरुण जेटली
इस स्कीम को लाते समय उन्होंने संसद में

यह बयान दिया था और आउटलाइन यह है कि 70
वर्ष
बाद हम कोई ना कोई प्रक्रिया लाए जिसमें
पॉलिटिकल फंडिंग क्लीन हो
पाए और इसमें हमने यह सुझाव रखा है कि चेक
की जो पेमेंट हो एक व्यवस्था हम लोगों ने
2002 में जब सरकार

थी और मैंने हमेशा स्वीकार किया है कि उस
वक्त कांग्रेस पार्टी ने एक कमेटी बनाई थी
मनमोहन सिंह जी उसके अध्यक्ष थे उसकी
रिकमेंडेशन भी थी हमने उसको मिला था और उस
वक्त सरकार वाजपई जी की सरकार उस संशोधनों

को लाई
थी थोड़ा फर्क पड़ा बहुत फर्क नहीं
पड़ा उसके
बाद जब मौजूदा राष्ट्रपति जी वित्तमंत्री
थे तो मैंने उनको एक प्रस्तावना दी थी उस
तरफ से

कि क्योंकि इसमें और सुधार करना है सो पास
टू थ्रू ट्रस्ट जो है इलेक्टोरल
ट्रस्ट मैंने एक पत्र उनको लिखा था तो
उन्होंने उसको स्वीकार किया था कि कुछ लोग
चाहते हैं कि उनकी बैलेंस शीट में यह
डिटेल्स ना

आए तो उस वक्त के बजट में उन्होंने
फाइनेंस बिल में उसको स्वीकार किया था
थोड़ा उससे भी अंतर हुआ लेकिन आज भी यह
फर्क नहीं पड़ा इसलिए हमने यह चुनाव आयोग
का सुझाव था कि कैश डोनेशंस को 000 लाया

जाए हमने वो सुझाव को रखा है
दुनिया भर में डिजिटल फॉर्म में कलेक्शन
होता
है और व उस तरह से जितना कलेक्शन होगा उस
पर भी टैक्स की माफी रहेगी यह प्रावधान है

और इलेक्टोरल बंड्स की एक स्कीम बनेगी और
मैं चाहूंगा कि सभी राजनीतिक
दल उस स्कीम बनाने के लिए जो जो उनके
सुझाव है हम लोगों को दे ताकि इसको किस
तरीके से बिल्कुल क्लीन किया जा सके स्कीम

से जुड़े बिल पर संसद में विवाद भी हुआ
इलेक्टोरल बॉन्ड लाना एक नीतिगत निर्णय था
ना कि सरकारी खजाने से जुड़ा फिर भी सरकार
इसे मनी बिल बनाकर सिर्फ लोकसभा से पास

करवा लाई ताकि राज्यसभा में पास करवाने की
जरूरत ना हो मनी बिल है अगर तो साल 2018
में इस कानून की अधिसूचना जारी हुई और तब
सरकार ने प्रचार किया कि पॉलिटिकल फंडिंग
पारदर्शिता और काले धन के दखल को रोकने की

दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण सुधार है और
इससे भ्रष्टाचार प लड़ाई में मदद मिलेगी
लेकिन जैसे ही चुनावी चंदे की यह कूपन
स्कीम शुरू हुई सवाल भी उठने लगे उन पर

आएंगे पर पहले स्कीम समझ लेते हैं इसके
लिए सरकार ने अपने सबसे बड़े बैंक स्टेट
बैंक ऑफ इंडिया को मार्क किया कि वही इस

बिल को जारी करेंगे लोग एसबीआई में जाकर
बॉन्ड एक किस्म का कागज है जो आप तयशुदा
धनराशि देकर खरीद सकते हैं और फिर वह इसे
अपनी पसंद की पार्टी को डोनेट कर सकते हैं
कैसे करेंगे इलेक्टोरल बॉन्ड गिफ्ट वाउचर

जैसा होगा तीन-तीन महीनों के अंतराल पर
साल में चार बार एक टाइम विंडो में से इशू
किया जाएगा 10 दिन की वो टाइम विंडो होती
है जिसके बारे में पब्लिसाइज किया जाता है
प्रचार किया जाता है जनवरी अप्रैल जुलाई

और अक्टूबर के महीने में ये इलेक्टोरल
बॉन्ड 10-10 दिन के लिए रिलीज होते हैं
चंदा देने के इच्छुक व्यक्ति या संस्थान
अलग-अलग मूल्यों के बॉन्ड ले सकते हैं यह
मूल्य कितना हो सकता है आप ₹1 ज का बॉन्ड

ले सकते हो बैंक में ₹1 देके 10000 का 10
लाख का अधिकतम 1 करोड़ रए का भी एक बॉन्ड
ले सकते हो कोई भी व्यक्ति या कॉरपोरेट
हाउस एसबीआई की तयशुदा शाखाओं से यह बॉन्ड
खरीद सकता था बॉन्ड खरीदने के बाद का काम

आसान था 15 दिन के भीतर अपनी पसंद वाली
पार्टी को आप इसे चंदे के रूप में दे दें
वो इन बॉन्ड्स को बनाकर पैसा अपने खाते
में ले लेगी बॉन्ड बुना रही पार्टी को यह

नहीं बताना होता था कि उनके पास यह बॉन्ड
आया कहां से डिस्क्लोज नहीं करनी होती थी
ये इंफॉर्मेशन गोपनीयता थी दूसरी तरफ
भारतीय स्टेट बैंक को भी यह बताने के लिए

बाध्य नहीं किया जा सकता कि उसके यहां से
किसने कितने बॉन्ड खरीदे और ठीक इसी बिंदु
पर विवाद का जन्म हुआ क्योंकि चुनावी चंदे
में पारदर्शिता भी जरूरी भी है यह

लोकतांत्रिक मूल्य है दिसंबर 2020 में एक
खबर आई महाराष्ट्र के एक सामाजिक
कार्यकर्ता बिहार धुर्वे ने इलेक्टोरल
बॉन्ड योजना के तहत चंदा देने वालों को
लेकर एसबीआई से सूचना मांगी बिहार का कहना

था एसबीआई को जवाबदेही और पारदर्शिता के
लिए बताना चाहिए कि पार्टियों को चंदा
देने के लिए बॉन्ड खरीद कौन रहा है इस
अपील को खारिज कर दिया गया 21 दिसंबर 2020

को और खारिज किसने किया सूचना आयुक्त
सुरेश चंद्रा ने और उन्होंने अपने आदेश
में कहा कि डोनर्स के निजता के अधिकार का
उल्लंघन करना लोक हित में नहीं है एसबीआई

की तरफ से दिए गए तर्कों को बरकरार रखते
हुए फिर केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआईसी
ने भी अपने आदेश में कहा कि जानकारी देना
आरटीआई एक्ट के सेक्शन 81 ई जे का उल्लंघन
होगा जो अथॉरिटी को ये छूट देता है कि वो

तब तक जानकारी ना दे जब तक उसे विश्वास ना
हो कि यह जानकारी व्यापक लोकहित से जुड़ी
है यानी आरटीआई लगाकर भी आप नहीं जान सकते
थे कि पार्टियों को गिफ्ट वाउचर से किसने
चंदा दिया यह सब कुछ पार्टियों को मिले

गुप्त दान की तरह हो गया था पर ऐसा नहीं
था कि स्कीम में कुछ पार्टियों को को ही
लाभ मिल रहा हो चंदा देने वालों का भी लाभ
था इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाली कंपनियां

या लोग इसकी खरीद पर लगने वाले इनकम टैक्स
के रिफंड के हकदार होते हैं और राजनीतिक
पार्टियां भी इस बॉन्ड को भुनाने पर इनकम
टैक्स रिफंड लेती हैं इसके बाद एक और
जानकारी सामने आई कि किस पार्टी को

इलेक्टोरल बॉन्ड से कितना पैसा मिला
इंडियन एक्सप्रेस अखबार में दामिनी नाथ की
रिपोर्ट नजर आई जो बताती है कि साल 2017
से 2022 के बीच भारतीय स्टेट बैंक ने

9208 करोड़ और 2 लाख इतना जोड़ दीजिए 9208
करोड़ 23 लाख के चुनावी बॉन्ड बेचे और यह
मिले किसे पहले नंबर पर है भारतीय जनता
पार्टी जिसे
5271 करोड़ और 97 लाख का चंदा मिला कुल

चंदे का इलेक्टोरल बॉन्ड से 57 फीदी
कांग्रेस को मिला 952 करोड़ 29 लाख यानी
कुल पैसे का 10 फीदी से ज्यादा तृणमूल
कांग्रेस को 767 करोड़ 68 लाख यानी कुल
पैसे का लगभग 8वा फीदी फिर नंबर आया चौथे

पर बीजू जनता दल का जिन्हें मिले 622
करोड़ पांचवे नंबर पर तमिलनाडु की
सत्ताधारी डीएमके है जिन्हें मिले 431
करोड़ के लगभग इसके बाद राष्ट्रवादी
कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी आम आदमी

पार्टी और जनता दल यूनाइटेड हैं इन्हें
मिली रकम 100 करोड़ से कुछ कम है इन
पार्टियों से तर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट
पार्टी बहुजन समाज पार्टी और मेघालय में

सत्तारूढ नेशनल पीपल्स पार्टी इन्होंने
चुनाव आयोग को बताया कि इन्हें इलेक्टोरल
बंड से बिल्कुल भी पैसा नहीं मिला जीरो
हमने आपको यह बताया कि ये आंकड़े साल 2017
से 2022 तक के हैं 2017 इस लिए क्योंकि

2017-18 के वित्त वर्ष में स्कीम शुरू हुई
और 22 इसलिए क्योंकि केंद्रीय चुनाव आयोग
ने अभी तक पार्टियों की 20222 की अवधि की
सालाना रिपोर्ट पब्लिश नहीं की है जिससे
आगे की जानकारी सामने आ सके आप देखेंगे

लगभग सभी चर्चित पार्टियां चंदा स्कीम का
लाभ उठा रही थी बस यह नहीं बता रही थी कि
किसने उन्हें कितना चंदा दिया यह पता चल
जाता स्थिति पारदर्शी हो जाती पर पूरा

तंत्र पर्दे में रखना चाहता था सब कुछ
इतना समस्या ग्रस्त कि भारतीय रिजर्व बैंक
और केंद्रीय चुनाव आयोग ने भी इस स्कीम पर
आपत्ति जाहिर की थी साल 2017 में आरबीआई

के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने वित्त
मंत्रालय को चिट्ठी लिखी और कहा इससे मनी
लरिंग को बढ़ावा मिल सकता है बैंक नोट पर
भरोसा कम हो सकता है फिर 27 मार्च 2019 को
केंद्रीय चुनाव आयोग ने अभी सुप्रीम कोर्ट

में एक हलफनामा दाखिल किया और इलेक्टोरल
बॉन्ड को भारत के चुनावों के लिए खतरनाक
माना आयोग ने अपने एफिडेविट में क्या कहा

था इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम से राजनीतिक
दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर
गंभीर असर पड़ेगा राजनीतिक दल बगैर किसी

जांच के विदेशी चंदा भी लेंगे और चंदा
देने वाली विशी कंपनियां भारत की नीतियों
को प्रभावित कर सकती हैं इसके अलावा कौन

इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद रहा है यह पता नहीं
चल रहा है यह एफिडेविट में था इसके बाद
बारी थी मामले के कोर्ट में पहुंचने की
बॉन्ड के केस में इनी दुश्वारियां देखते

हुए दो गैर सरकारी संगठन सामने आए जिनके
नाम थे कॉमन कॉज और एसोसिएशन फॉर
डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी कि एडीआर
इन्होंने साल 2017 में ही इलेक्टोरल बॉन्ड
को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी

याचिका लगी इसके अलावा कांग्रेस नेता जय
ठाकुर और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी
ने भी आजका लगाई सुनवाई करते हुए 2019 में

सर्वच सच न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश दिया
जिसमें राजनीतिक दलों से कहा गया कि वह
बंड्स की जानकारी चुनाव आयोग को दें फिर
एडीआर अदालत गई एक बार फिर से यह कहते हुए

कि बॉन्ड खरीदने वालों की जानकारी प्राप्त
करने का कोई तरीका हमारे पास देश के पास
नहीं है फिर मार्च 2021 में डीआर ने एक और
याचिका लगाई और कहा जब तक मामला अदालत में

है तब तक इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने पर रोक
लगाई जाए पर यह याचिका न्यायालय ने रद्द
कर दी फिर 5 अप्रैल 2022 को वरिष्ठ वकील
प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में एक

दूसरे मामले में दलीलें देते हुए
इलेक्टोरल बंड्स का जिक्र किया और उस समय
सीजीआई थे एनवी रमन्ना उन्हों की उनकी
बेंच ने कहा न्यायालय के संगन में मामला
है कोरोना काल के चलते सुनवाई नहीं हो पाई

है पर फिर सुनवाई होगी इसके बाद इलेक्टोरल
बॉन्ड पर सुनवाई की राह खुली अलग-अलग
तारीखें बीती और अंतता मामला सुप्रीम
कोर्ट की संविधान पीठ के सामने गया इस पीठ

का हमने थोड़ी देर पहले जिक्र किया यह
सुनवाई 31 अक्टूबर 2023 से शुरू हुई मामले
में एक तरफ याचिका करता थे दूसरी तरफ

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार क्योंकि यही
सरकार स्कीम लेकर आई थी इस मामले में
केंद्र सरकार ने सुनवाई से एक दिन पहले
यानी 30 अक्टूबर को ही एक बड़ा बयान दिया

हलफनामे की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट में
सेंट्रल लाइन इस हलफनामे की यह थी कि
इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी प्राप्त करने
का हक जो भारत के नागरिकों को मिला है वह

रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन के तहत आता है यानी
जरूरत पड़ने पर सूचना देने से इंकार भी
किया जा सकता है इससे हमें अंदाजा लग गया

कि केंद्र सरकार का रुक क्या होगा और वह
स्कीम आते समय भी पता ही था 31 अक्टूबर से
सुनवाई शुरू हुई याच का दायर करने वा का
पक्ष प्रशांत भूषण कपिल सिब्बल और संजय

हेगड़े जैसे वकील रख रहे थे उनकी दलीलें
क्या थी सुनिए पूर्व में चंदा लेने वाली
पार्टियों को रिकॉर्ड रखना पड़ता था
क्योंकि आईटी एक्ट में प्रावधान था लेकिन

यह बॉन्ड पर लागू नहीं होता मौजूदा वक्त
में चंदा देने वालों की जानकारी सरकार के
अलावा और किसी के पास नहीं है दूसरी दलील
कल कोई भी राजनीतिक पार्टी यह कह सकती है
हमने सुबह अपना ऑफिस खोला देखा वहां पर

100 करोड़ के बॉन्ड पड़े थे हमने उन्हें
खाते में जमा कर दिया पर हमें नहीं पता कि
उसे दिया किसने था अगर मतदाताओं को
प्रत्याशियों की संपत्ति और दे दारी की
जानकारी प्राप्त करने का हक है तो यह भी

जानने का हक कि प्रत्याशियों की पार्टियों
को पैसा कौन दे रहा है और दलील क्या थी
अगर हमें पता चलता है कि किसी पार्टी को
कोई ऐसी कंपनी बॉन्ड के जरिए पैसा दे रही

जिससे उस पार्टी ने फायदा पहुंचाया तो हम
इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वह
पार्टी भ्रष्ट है बॉन्ड स्कीम अपराधियों
को सजा से बचाती है अगर बॉन्ड स्कीम का

मकसद था कि कैश फ्लो को रोका जाए तो वह
अभी भी हो रहा है याच का कर्ताओं के
आरोपों के बाद बारी केंद्र सरकार के
सबमिशन की थी सरकार सुनवाई के पहले ही
रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन की दलील दे चुकी थी

पर कोर्ट में क्या कहा सरकार का पक्ष रखा
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने और उनकी
दलीलें यह रही भारत समेत दुनिया के कई देश
काले धन की समस्या से जूझ रहे हैं और यह
जो इलेक्टोरल बॉन्ड की स्कीम है इसका मकसद

है साफ पैसा चुनाव में बैंकिंग सिस्टम में
और राजनीतिक पार्टियों के पास आए यह स्कीम
क्लीन मनी की दिशा में एकमात्र स्टेप नहीं

ऐसे कई स्टेप लिए गए जिसकी वजह से सिस्टम
में बहुत सारी क्लीन मनी आज की तारीख में
मौजूद है अगर स्कीम से गोपनीयता चली जाती

है तो स्कीम खत्म हो जाएगी और मैं 2018 के
वक्त में वापस लौट जाएंगे हम सब आप
याचिकाकर्ताओं से पूछिए अगर देश 10 कदम
पीछे चला गया तो उन्हें क्या फायदा होगा
कंपनी इसलिए चंदा देती है ताकि पॉलिसी

उनके फेवर में आए और वो चैरिटी करती हुई
ना दिखें मान लीजिए मुझे चुनाव में चंदा
देना है और मैं चेक के जरिए पैसा देता हूं
तो सभी पार्टियों को पता चल जाएगा कि
मैंने पैसा दिया और किसको दिया लेकिन अगर

मैं इस जरिए पैसा नहीं देता हूं तो लोगों
को नहीं पता चलेगा कि मैंने किसे कितना
पैसा दिया मान लीजिए किसी राज्य में मेरी
पार्टी है और मुझे किसी ने पार्टी के चंदे
के लिए 30 करोड़ दिए मैंने पार्टी के फंड

में 20 करोड़ ही जमा कराए लेकिन अगर ये
पैसा बॉन्ड के जरिए आएगा तो – एक रुप
पार्टी के फंड में जाएगा कुछ सेफगार्ड
प्रैक्टिस भी है मैं तभी बॉन्ड खरीद सकता
हूं अगर मैंने केवाईसी कराया है कंपनी की

बात है तो कंपनी की बैलेंस शीट में दिखेगा
कि फला अमाउंट डोनेट किया गया पार्टियों
के खाते दिखाएंगे कि पैसा मिला है अगर
चंदा देने वाला अपनी पहचान गुप्त रखना

चाहता है तो वो बॉन्ड से चंदा दे लेकिन
अगर उसे पहचान जाहिर करने से गुरेज नहीं
है तो उसके पास चेक से चंदा देने का ऑप्शन
अभी भी मौजूद है फिर नरेंद्र मोदी सरकार
के वकील ने कहा कि हम कोर्ट को एक विकल्प

देना चाहते हैं विकल्प यह कि बॉन्ड के तहत
चंदा देने वाले की पहचान गुप्त रहे लेकिन
अगर कोर्ट का आदेश उनकी पहचान खोलने की
बात करता है तो पहचान जाहिर कर दी जाएगी
सभी पार्टियां जानती है कि उन्हें चंदा

कौन दे रहा है गोपनीयता दूसरी पार्टियों
के लिए है कल कोई यह कह दे कि कोई आया और
मेरे पोस्टल बॉक्स में 100 करोड़ का
लिफाफा रखकर चला गया लेकिन ऐसे कोई डोनेट
करता नहीं है हम ऐसे तो तीर्थ यात्राओं

में चचंदा देते हैं वोटर इस आधार पर वोट
नहीं देते कि पार्टी को पैसा कौन दे रहा
है वह पार्टी की विचारधारा सिद्धांत
नेतृत्व और कार्य कुशलता के आधार पर वोट
देते हैं यह दलील थी अब बारी जजों की

सुनवाई के समय बेंच के ऑब्जर्वेशंस और
केंद से सवाल सामने आए क्या सवाल थे लोग
ये मानकर चल रहे हैं कि अगर आप बंड के
जरिए चंदा देने वाले का नाम जाहिर कर देते
हैं तो बाकी दूसरी पार्टियों को भी पता चल

जाएगा कि अमुक व्यक्ति ने या संस्था ने
अमुक पार्टी को चंदा दिया मान लीजिए कोई
डोनर किसी राज्य में अपना काम धंधा फैलाए
और उसने खासकर उस पार्टी को डोनेट किया जो
सत्ता में है या डोनेट नहीं किया और उस

डोनर का नाम सभी पार्टियों को पता चल जाता
है तो विरोधी पार्टियां बातें करेंगी अगर
कोई कंपनी डोनेट कर रही है तो उसके तमाम
शेयर होल्डर्स को भी पता नहीं चल सकता कि
आपने किसे डोनेट किया जब कंपनी का नेट

रिजल्ट आएगा तो आप बस इतना कहेंगे कि हमने
250 करोड़ डोनेशन की तरह दिए किसे दिए
नहीं पता इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के साथ
दिक्कत यह है कि ये लोगों को चुनिंदा
मसलों पर गोपनीयता देता है अगर हम इस
स्कीम को आज खारिज कर देते हैं तो इसका
मतलब यह नहीं कि सरकार को दूसरी ऐसी स्कीम

बनाने से रोका जा रहा है जिसमें सभी के
पास बराबर का हक हो चुनावी प्रक्रिया में
और ज्यादा वाइट मनी लाने के प्रयास के साथ
हमने एक गड्ढा भी पैदा कर दिया जहां सूचना

गायब है ये किसी एक या दो पार्टी की बात
नहीं पूरे सिस्टम की बात है सबको ये
प्रभावित कर रहा है जब एक इलेक्टोरल बॉन्ड
खरीदा जाता है तो पैसा कहां से आया इसके
बारे में जानकारी नहीं होती डोनर का पता

नहीं होता खर्च कहां किया गया यह नहीं पता
होता सवाल पारदर्शिता का है ये बात कतई
जरूरी नहीं कि बॉन्ड खरीदने वाला इंसान ही
डोनर हो बस उनका खाता दिखाएगा कि उन्होंने

बॉन्ड खरीदा उस बॉन्ड का डोनर कौन है यह
जिक्र नहीं मिल रहा है 2 नवंबर 2023 को
आखिरी बार इस केस में फिर बहस हुई अदालत
ने फैसला सुरक्षित रखा जो आज डिलीवर किया
गया और फैसला सुनाते हुए जजेस ने यह

ऑब्जर्वेशन दिए पॉलिटिकल प्रोसेस में
राजनीतिक दल अहम यूनिट है वोटर्स को
चुनावी फंडिंग के बारे में जानने का हक है
जिससे मतदान के लिए सही चयन हो सारी

राजनीतिक फंडिंग पब्लिक पॉलिसी में बदलाव
के मकसद से नहीं होती छात्र दिहाड़ी मजदूर
भी चंदा देते हैं ऐसे में सिर्फ इसलिए
चुनावी चंदे को गोपनीयता के दायरे में

रखना क्योंकि कुछ कंट्रीब्यूशन किसी और
मकसद से किए गए हैं अनुचित है इलेक्टोरल
बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन है
वोटर्स को चंदा देने वालों की जानकारी

होनी चाहिए चंदा देने वालों की जानकारी
सार्वजनिक नहीं करना नियमों के खिलाफ है
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है काले धन को
रोकने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड के अलावा

दूसरे विकल्प हैं इस तरह की खरीद से काले
धन को बढ़ावा ही मिलेगा इससे कोई रोक नहीं
लगेगी और पारदर्शिता का हनन होगा कोर्ट
सिर्फ इस आधार पर आंखें नहीं मन सकता कि

इसके दुरुपयोग की संभावना है कोर्ट की राय
काले धन पर रोक लगाना चुनावी बॉन्ड का
आधार नहीं है और काले धन पर रोक लगाने के
लिए आरटीआई का उल्लंघन करना ठीक नहीं है

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के जजेस ने यह
भी कहा कि गुमनाम चुनावी बॉन्स अनुच्छेद
191 ए का उल्लंघन है भारतीय संविधान का यह
अनुच्छेद सभी नागरिकों को भाषण अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता का हक देता है यह

स्वतंत्रता मौखिक लिखित इलेक्ट्रॉनिक
प्रसारण प्रेस या अन्य किसी भी रूप में हो
सकती है इसमें नागरिकों को सूचनाओं तक

पहुंचने का भी अधिकार दिया गया है
राजनीतिक प्रक्रिया पर किसी व्यक्ति के
योगदान की तुलना में किसी कंपनी के योगदान
का अधिक गंभीर प्रभाव पड़ता है कंपनियों
द्वारा योगदान पूरी तरह से व्यवसायिक

लेनदेन है धारा 182 कंपनी अधिनियम में
संशोधन स्पष्ट रूप से कंपनी और व्यक्तियों
के साथ एक जैसा व्यवहार करता है फैसला आ
गया इसके बाद हमने बात की उनसे जो इस

लिटिगेशन के पीछे थे सबसे पहले रुक किया
एडीआर के फाउंडर्स में से एक त्रिलोचन
शास्त्री का उन्होंने फैसले पर अपनी
प्रतिक्रिया हमारे साथ साझा की जैसे हम
कहते हैं लड्डू बांटे सड़को पर नाचेंगे

बहुत बढ़िया निर्णय लिया है हमारे
डेमोक्रेसी के लिए प्रजातंत्र के लिए
लोगों के लिए पारदर्शिता के

लिए तो हम तो इसको पूरा स्वीकार करते हैं
सुप्रीम कोर्ट को बधाई देते हैं इतना
जल्दी नया कानून लाना उतना आसान नहीं है

और इलेक्टोरल बंड्स के पहले कुछ हद तक
पारदर्शिता थी वो खत्म हो गई थी अब
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से उसको हमें वापस
दे दिया और हमारा जो तर्क तो बिल्कुल

सिंपल था कि चाहे आप हिंदुस्तान में ले
लीजिए या देश पूरे विश्व में देख लीजिए
तमाम देशों में डेमोक्रेसी है हर एक जगह
पर 100%
100% पारदर्शिता ट्रांसपेरेंसी है दूसरे
देशों में पाई पाई का हिसाब होता है
इसीलिए वह डेमोक्रेसी चल रही हैं कि कौन

किसको कितना पैसा दे रहा है क्यों दे रहा
है वह पब्लिक को जानकारी होनी चाहिए और हो
भी है तो यह जो इलेक्टोरल बंड्स है वो
हमको वो पारदर्शिता नहीं दे रही है और

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आज कहा कि
हमारा एक यह संविधानिक हक है
कांस्टिट्यूशन राइट है आर्टिकल 19 19 में
राइट टू इंफॉर्मेशन जो बोलते हैं कि भाई
जब मतदाता वोट देने जा रहा है या जा रही

है उसको पूरा अधिकार होता है कि भाई पैसा
कौन किसको कितना दे रहा है अगर मैं फलाने
पार्टी को वोट देना चाहता हूं तो मुझे यह
तो जानकारी होना चाहिए पार्टी चल कैसे रही

है कौन उसको पैसा दे रहा है तो यह
उन्होंने उसको एक मूल अधिकार या
कांस्टीट्यूशनल राइट से जोड़ दिया है और
उसके आधार पर उन्होंने इलेक्टोरल बाउंड्स
को रद्द कर दिया अब सवाल उठेंगे कि

पार्टियां क्या करेंगी क्या उनका सारा
हिसाब किताब अब सामने आएगा इस पर भी हमने
एक्सपर्ट से बात की जो आदेश हुआ है
सुप्रीम कोर्ट का इसके हिसाब से जो अब तक

राशि दी गई है पार्टी को ल बंड के
जरिए उसका डिस्क्लोजर करना आवश्यक
है इसलिए जिस जिस पार्टी को जो जो धनराशि
इलेक्टरल बंड के जरिए दी गई

है वह सामने आएगी कोर्ट ने आदेश दिया है
कि 13 मार्च को तक इलेक्शन कमीशन इसको
अपनी वेबसाइट पर डाले और स्टेट बैंक ऑफ
इंडिया को निर्देश दिए हैं कि वह सारी यह

सूचना 6 मार्च तक इलेक्शन कमीशन को उपलब्ध
कराए और 13 मार्च तक इलेक्शन कमीशन इसको
वेबसाइट पर डाले ताकि जिसको दिलचस्पी है
इस चीज को जानने में उसको पता हो कि किस
पार्टी को कितना पैसा कहां से आया जाहिर

है आपको भी पता होगी के 2019 के जब जनरल
इलेक्शन थे तब भी सुप्रीम कोर्ट का
वर्डिक्ट एक बंड के ऊपर आया था 12 अप्रैल
को 12 अप्रैल 2019 को और उस वक्त का जो

वर्डिक्ट था उसमें यह कहा गया था कि सार
पॉलिटिकल पार्टीज ने जो फंडिंग बंड के
जरिए पाई है उसकी पूरी सूचना इलेक्शन
कमीशन को दे बंद लिफाफे में और वह दी गई

थी और इस जजमेंट में उसका हवाला दिया गया
है और कहीं हालाकि पूरी जजमेंट मैंने पढ़ी
नहीं है लेकिन सरसरी तौर पर मैंने यह देखा
कि उसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि

उस जजमेंट में हमने यह इंफॉर्मेशन देने के
लिए कहा था और उन्हें उम्मीद है कि यह
इंफॉर्मेशन अप टू डेट प्रोवाइड कर दी गई
होगी इलेक्शन कमीशन क्योंकि यह नहीं था कि
वह सिर्फ उस वक्त तक जो बंड थे उन्हीं की
सूचना देनी थी तो इट इज अ कंटिन्यूएशन ऑफ

दैट लेकिन मैं आपको के माध्यम से आपके
दर्शकों को यह जरूर कहना चाहूंगा कि देखिए
पॉलिटिकल फंडिंग का जो मसला है यह एक बहुत
बड़ा मसला है अहम मसला है इलेक्टरल बंड की
स्कीम एक उसका कंपोनेंट है

तो यह जो सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है बहुत
महत्त्वपूर्ण है
बहुत स्वागत के योग्य है लेकिन ऐसा नहीं
है कि इससे मर्ज खत्म हो गया अदालत के
हुक्म की सही तामील हुई तो 13 मार्च 2024

इस देश की ऐतिहासिक तारीख होगी जब आप जान
सकेंगे कि हमारे देश की राजनीतिक
पार्टियों को कौन कितना चंदा इलेक्टोरल
बंड के जरिए दे रहा है किसका कितना टैक्स
बच रहा है अगर ऐसा होता है तो लोकतंत्र

पारदर्शिता की तरफ कुछ और कदम बढ़ाएगा
चुनाव के तापमान पर जो असर पड़ेगा वह तो
हम देखेंगे ही वैसे चुनाव की बात हो रही
है तो अगली बड़ी खबर का भी रुक कर लेते
हैं क्योंकि बात अब ईवीएम की होगी यह बड़ी

खबर है ईवीएम से जुड़ी हुई और यह इंडियन
एक्सप्रेस के हवाले से हम आपको बता रहे
हैं इस अखबार में 15 फरवरी के रोज रितिका
चोपड़ा की एक रिपोर्ट छपी इसका टाइटल था

आरटीआई सेवरल स्टेट्स फ्लैग्ड हाई ईवीएम
फेलर रेट टू ईसी अहेड ऑफ 2019 लोकसभा पोलस
यानी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कई
राज्यों ने ईवीएम की मशीनों में खराबी की
शिकायत की थी फेलर रेट यानी अगर 100 ईवीएम

का रैंडम सैंपल लिया जाए तो उसमें से
कितनी मशीनों में तकनीकी खराबी किसी भी
स्तर पर मिली एक नाम पर गौर करिए वेंकटेश
नायक ये कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स
इनिशिएटिव के निदेशक हैं नायक को उनके

आरटीआई एप्लीकेशन के जवाब में कुछ
दस्तावेज मिले जिसमें लिखा था कि 2019 की
लोकसभा चुनाव के समय केंद्रीय चुनाव आयोग
की चिंता थी कि चुनाव में इस्तेमाल होने
वाली ईवीएम फर्स्ट लेवल चेक में फेल क्यों

हो रही है बड़ी संख्या में इस खबर को
समझने के लिए आप पहले ईवीएम की वर्किंग
समझिए चुनाव के समय जब ईवीएम सेट की जाती
है तो उसके तीन हिस्से आपको देखने को
मिलते हैं पहला बैलेट यूनिट जिस मशीन में

बटन दबाकर हम और आप वोट डालते हैं दूसरी
होती है कंट्रोल यूनिट जो चुनाव अधिकारी
के पास होती है और तीसरी वोटर वेरीफाइड
पेपर ऑडिट ट्रेल जिसको हम वीवी पैड कहते
हैं जब हम बटन दबाते हैं तो एक पर्ची

गिरती और यह दिखता भी कि हमने किस पार्टी
को या नोटा को वोट दिया पर्ची छापने वाली
मशीन वीवी पैड यह बैलेट यूनिट के पास ही
रखी होती है ताकि वोटर वेरीफाई कर सके कि

जिसकी बटन दबाई वोट उसी को गया कि नहीं
गया इन ईवीएम को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स
लिमिटेड बीएल और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन
ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाते हैं अब यह जो
पहले लेवल का चेक है वह चुनाव के 6 महीने
पहले जिला निर्वाचन अधिकारी की मौजूदगी

में इंजीनियर करते हैं इसमें ईवीएम के
किसी भी पार्ट में अगर गड़बड़ी निकलती है
तो चुनाव आयोग उस मशीन के साथ रिजेक्शन का
नोट लगाकर इन्हें बनाने वाली कंपनियों को
वापस भेज देता है
इस सामान्य ज्ञान के बाद अब आज की खबर पर
आते हैं 2019 के लोकसभा चुनाव में इस तरह
रिजेक्ट की हुई मशीनों की संख्या में

बढ़ोतरी हुई नाइ को आरटीआई से जानकारी में
पता चला कि ईवीएम में ये गड़बड़ी केवल
पहले लेवल के चेक के दौरान नहीं हुई तब भी
हुई जब चुनाव के समय ईवीएम में
प्रत्याशियों के नाम और सिंबल फिट किए जा

रहे थे ईवीएम के फेल होने का रेट इतना था
कि नागालैंड अरुणाचल प्रदेश आंध्र प्रदेश
बिहार कर्नाटक और केरल यहां के राज्य
निर्वाचन अधिकारियों ने इलेक्शन कमीशन ऑफ
इंडिया को चिट्ठी लिखी कि और ईवीएम भेजी

जाए क्योंकि बहुत सारी मशीनें जो हमारे
पास हैं वो टेस्टिंग में फेल हो रही हैं
अब यहां पर एक बात समझिए आधिकारिक तौर पर
ईसीआई ने ऐसा कोई कट ऑफ जारी नहीं किया कि
अमुक संख्या से ऊपर खराब हुई मशीनों को
ज्यादा या कम माना जाए लेकिन रिपोर्ट में

सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि 5
प्र मशीनें अगर रिजेक्ट हो तो वो सामान्य
है लेकिन 2019 में ये रिजेक्शन रेट 30 फ
तक पहुंच गया उदाहरण देखें नवंबर 2018
उत्तराखंड के उपचुनाव आयुक्त ने स्टेटस

रिपोर्ट भेजी कि ईवीएम की कंट्रोल यूनिट
में 38 फी का रिजेक्शन रेट है दिसंबर 2008
18 दिल्ली के मुख चुनाव आयुक्त नेने
रिपोर्ट भेजी कि साउथ नॉर्थ वेस्ट और ईस्ट
दिल्ली में वीवीपैट फेल हो रहे हैं और कहा
कि इन्हें बदला जाए फिर मार्च 2019 में
अंडमान के चुनाव आयुक्त ने खत लिखा कि

लगभग आधी वीवीपट मशीनें खराब हुई हैं और
और मशीनें भेजी जाए फिर अप्रैल 2019 में
कर्नाटक के चुनाव आयुक्त ने लिखा कि 12
फीदी पीवी पेट फेल हुई हैं अप्रैल 2019
में ही केरल चुनाव आयुक्त ने भी लिखा कि
कन्नूर में 14 फीदी कंट्रोल यूनिट फेल हुई

गौर करिए कि यह राज्य में सभी सीटों पर हो
रहा हो या एक सीट के सभी यूनिट्स में हो
रहा हो ऐसा नहीं था लेकिन जहां से भी
शिकायतें आ रही थी उसका एक रेशो आपके
सामने प्रस्तुत किया गया पर यह शुरुआत थी
इसके बाद भी मशीनों के खराब होने का
सिलसिला चलता रहा 2020 के बिहार चुनाव

2022 के पंजाब उत्तराखंड और यूपी चुनाव
में भी फर्स्ट लेवल के चेक में शिकायतें
आती रही इन शिकायतों के बाद इलेक्शन कमीशन
ऑफ इंडिया ने साल अक्टूबर 2021 में
निर्माता कंपनियां यानी बीएल और ईसीआई एल
को चिट्ठी लिखी और कहा कि ये जो बड़ी

संख्या में ईवीएम फर्स्ट चेक पर खराब हो
रही हैं इन पर आपका क्या रुख है और इसके
करेक्शन के लिए आप क्या कर रहे हैं इस
बारे में क्या जवाब आया जानकारी नहीं है
हमारे पास इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने भी

इन कंपनियों को सवाल भेजे वहां से जवाब
नहीं आया पर चुनाव आयोग ने एक काम जरूर
किया अखबार को भेजे अखबार ने जब सवाल भेजे
ईसीआई को तो उन्होंने अपनी वेबसाइट पर जो
सवाल-जवाब वाला पेज है उसमें एक पैरा

जोड़ा और इसमें क्या लिखा हर चुनाव के बाद
खराब ईवीएम और वीवीपैट मशीन की जांच की
जाती है ताकि उनका परफॉर्मेंस बढ़ाया जा
सके और चुनाव के वक्त रिप्लेसमेंट की दर
कम की जा सके साल 2019 के आम चुनाव के बाद

टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी ने बीएल और ईसीआई
के साथ एक जांच की कोरोना महामारी की वजह
से इसमें देर हुई और जांच में पता चला कि
कुछ सुधारों की और जरूरत है ताकि चुनाव
में वीवीपैट रिप्लेसमेंट रेट को कम किया

जा सके यह चुनाव आयोग का जवाब अब जिज्ञासा
भरा सवाल कि ईवीएम खराब होती तो चुनाव
आयोग करता क्या है और क्या इससे वोटों की
गिनती पर असर पड़ता है इन सवालों के जवाब
सुनिए पूर्व चुनाव अधिकारियों से जहां तक
इलेक्शन कमीशन की ईवीएम की प्रणाली है व

एक पुख्ता प्रणाली है और अगर
किसी मशीन में कोई किसी किस्म की त्रुटि
आती है या अनमल पाई जाती है तो उसको उस
सिचुएशन को कैसे हैंडल किया जाए उसके लिए
पूरी एक प्रक्रिया बनी हुई है तो अगर कहीं

चुनाव में यह मशीन है कभी भी किसी वक्त
कोई त्रुटि नजर आ सकती है ऐसा नहीं कह
सकते कि कोई मशीन कभी भी खराब नहीं हो
आफ्टर ल इट्स मैकेनिकल डिवाइस तो जब खराब
होती है मशीन या उसके अंदर कोई किसी किस्म

की डिस्क्रिपेंसी पाई जाती है तो उसको
बदलने का पूरा एक तरीका है और वह तरीका
मैं समझता हूं काफी पारदर्शी है तो उसमें
किसी
संदेह मुझे तो लगता नहीं कि कोई संदेह
होना चाहिए आज के ललन टॉप शो में इतना ही

लोकतंत्र पर अपनी निगहबान बनाए रखिए ताकि
हमें और आपको एक बेहतर पारदर्शी सरकार
मिले अपना और अपनों का ख्याल रखिए

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