Supreme Court Electoral Bond Verdict: चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, Modi सरकार को झटका - instathreads

Supreme Court Electoral Bond Verdict: चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, Modi सरकार को झटका

जब तक नाम डिस्क्लोज नहीं होगा तब तक काफी
सारे मुद्दे हैं जो सामने आएंगे और काफी
सारी परेशानियों को साथ लेके
आएंगे नाम डिस्क्लोज होना चाहिए कि आखिर

कितनी धनराशि किसने
द स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शल सबमिट द
डिटेल्स ऑफ पॉलिटिकल पार्टीज व्हि हैव
रिसीवड कंट्रीब्यूशन थू इलेक्टरल बंड
सुप्रीम कोर्ट ने हमारे मुद्दे को समझते

हुए आज जो इस इलेक्टोरल बंड को कैंसिल
किया है निश्चित रूप से यह हमारे देश में
एक बड़ा इंपैक्ट
डालेगा चुनावी बंड्स पर सुप्रीम कोर्ट की

पांच जजों की बेंच ने एक बड़ा फैसला
सुनाया है अदालत ने चुनावी बॉन्ड खरीदने
वाले लोगों के नाम उजागर करने का आदेश
दिया है संवैधानिक बेंच का कहना है कि

इलेक्टोरल बॉन्ड तो रहेगा लेकिन उसे
खरीदने वाले लोगों और संस्थाओं के नामों
की जानकारी देनी होगी बेंच ने कहा यदि
इलेक्टोरल बॉन्ड बेनामी खरीद के तहत लिए

जाते हैं तो यह सूचना के अधिकार के नियम
का उल्लंघन है चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़
की अगवाई वाली बेंच ने कहा कि जनता को यह
जानने का हक है कि आखिरकार राजनीतिक दलों
के पास पैसा कहां से आता है और कहां जाता

है बेंच ने कहा कि सरकार को चुनावी
प्रक्रिया में काला धन रोकने के लिए कुछ
और तरीकों पर विचार करना चाहिए अदालत ने
साफ किया कि इलेक्टोरल बंड की व्यवस्था तो

रहेगी लेकिन इसमें गोपनीयता का नहीं नहीं
रहेगा अब तक जो नियम था उसके मुताबिक
इलेक्टोरल बॉन्ड पर आरटीआई दाखिल नहीं की
जा सकती थी कोर्ट ने कहा कि ऐसा नियम

बनाना गलत है इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ
दायर अर्जियों में कहा गया था कि इस तरीके
का नियम बनाना गलत है इससे ब्लैक मनी खत्म
नहीं होती बल्कि बढ़ सकती है वहीं सरकार

का पक्ष था कि सिर्फ जनता के पास ही
जानकारी नहीं रहेगी सरकार बैंक और आयकर
विभाग के पास यह डाटा रहेगा ऐसे में किसी
भी तरह की गड़बड़ी नहीं हो सकती सरकार के

स्तक को अदालत ने खारिज कर दिया कि जनता
को इलेक्टोरल बॉन्ड की जा जानकारी देने
में कुछ गलत नहीं है बेंच ने कहा कि ऐसा
नियम तो आरटीआई का उल्लंघन है जनता को यह

जानने का हक है कि वह जिन राजनीतिक दलों
को वोट देती है उनके पास पैसा कहां से आता
है और कहां जाता है संविधान का उल्लंघन है
यदि जनता को चुनावी फंडिंग के बारे में
जानकारी नहीं दी जाती इस प्रकार शीर्ष

अदालत ने 2018 में आए चुनावी बॉन्ड की
व्यवस्था पर बड़ा फैसला दिया इस मामले में
अदालत ने चुनाव आयोग की भी खिंचाई की और
सवाल पूछा कि आखिर यह चुनावी बॉन्स की

जानकारी अपने पास क्यों नहीं रखते इस तरह
अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था को
कायम रखा है लेकिन उसमें गोपनीयता का नियम
खत्म करने के लिए कहा है संवैधानिक बीठ का

फैसला सर्वसम्मति से आया है लेकिन दो
फैसले लिख लिए गए हैं इसकी वजह यह है कि
बेंच में शामिल जस्टिस संजीव खन्ना के

विचार थोड़े अलग थे इसलिए उन्होंने अलग से
फैसले को लिखा जस्टिस डीवाई चंद्रचूर ने
कहा कि चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक दल
अहम पक्ष है उनकी फंडिंग कैसे होती है

कहां से हो रही है इसकी जानकारी लोगों को
मिलनी चाहिए एक ट्रांसपेरेंसी नहीं है
इसमें आप किसी भी किसी का नाम डि क्लोज
नहीं हो रहा इसके पहले नाम डिस्क्लोज होता
था और एक निश्चित 000 से ज्यादा आप अगर

नहीं दे सकते थे कैश में अब इन्होंने
कितने भी रुपए आप जो है बंड खरीदिए बैंक
में जाके और पार्टी को डोनेट कर दीजिए
इससे ट्रांसपेरेंसी तो पूरी तरीके से खत्म

हो गई और निश्चित रूप से कहीं ना कहीं
डेमोक्रेसी के लिए बहुत बड़ा खतरा है तो
मैंने इसमें पिटीशन दायर करी थी कि इस
स्कीम को रद्द किया जाए इट शुड बी

ट्रांसपेरेंट लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह
भी कहा है कि जो जानने का अधिकार है
आरटीआई के तहत व नागरिकों को मिलना ही
चाहिए निश्चित रूप से देखिए यह तो

इंपोर्टेंट है ही जब तक नाम डिस्क्लोज
नहीं होगा तब तक काफी सारे मुद्दे हैं जो
सामने आएंगे और काफी सारी परेशानियों को
साथ लेके आएंगे जितना भी ब्लैक मनी है या

मनी लरिंग है वो एक बहुत बड़ा मुद्दा है
जो इस चीज से जुड़ सकता है इन फ्यूचर
जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 19 का
भी हवाला दिया है कि जो 192 के तहत अगर

रोक नहीं है तो जानने के अधिकार से नहीं
रोका जाना चाहिए था नहीं बिल्कुल देखिए
राइट टू इंफॉर्मेशन तो हमारे देश में हमें
अधिकार दिया ही गया है और यह बहुत
इंपॉर्टेंट है एक नाम डिस्क्लोज होना
चाहिए कि आखिर कितनी धनराशि किसने दी है

सुप्रीम कोर्ट ने हमारे मुद्दे को समझते
हुए आज जो इस इलेक्टोरल बंड को कैंसिल
किया है निश्चित रूप से यह हमारे देश में
एक बड़ा इंपैक्ट डालेगा

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