Supreme Court ENDS Electoral Bonds! | Will Modi Govt Comply With Orders? | - instathreads

Supreme Court ENDS Electoral Bonds! | Will Modi Govt Comply With Orders? |

15 फरवरी 2024 का दिन सुप्रीम कोर्ट के
इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा
क्योंकि एक अरसे बाद एक ऐसा फैसला आया है
जो देश की डेमोक्रेसी को पूरी तरीके से
नीलाम होने से बचाने की कोशिश करता है 5

साल देर से ही सही लेकिन बचाने की कोशिश
करता है उन देशभक्तों को आशा की एक किरण
देता है जो चाहते हैं कि देश की
डेमोक्रेसी नियम कानून कांस्टिट्यूशन के
अनुसार चले ना कि कॉर्पोरेट आका के फेंके
गए पैसों से सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल
बॉन्ड केस की सुनवाई के बाद एक ऐसा

ऐतिहासिक और यूनानिमिटी
का झटका लग गया है एक ऐसा जजमेंट जो एक
इलेक्शन से ठीक पहले कॉर्पोरेट और
पॉलिटिकल नेक्सस को एक्सपोज कर सकता है एक

ऐसा जजमेंट जिसको हो सकता है सरकार ना
माने जिस पर इलेक्शन कमीशन अमल ना करें वो
क्यों उस पर अभी आते हैं लेकिन पहले
2017 में देश पर ठू सा गया था इलेक्टोरल

बंड्स वो भी बैकडोर एंट्री से फाइनेंस
एक्ट में अमेंडमेंट करके इलेक्टोरल बंड को
मनी बिल बनाकर संसद में लाया गया जिससे
राज्यसभा को बायपास कर दिया जाए सरकार ने

कहा कि हम कर रहे हैं कुछ सोच कर ही कर
रहे होंगे यह नहीं बताया कि देश के लिए
सोच रहे हैं या
अपनी सरकार का लॉजिक था कि कैश को ये जो

बोरियो में कैश आता है इलेक्टोरल पर्पसस
के लिए उसको रोकना होगा इलेक्शन फंडिंग को
डिजिटल बनाना होगा बैंकिंग चैनल्स का
इस्तेमाल करना होगा ट्रांसपेरेंसी लाना
होगा और साथ ही साथ क्यों ना हम डोनर को

गुमनाम बना दें अरे ताकि उससे कोई ना कोई
पार्टी कोई पॉलिटिशियन परेशान ना करें कि
तुमने इस पार्टी या उस पार्टी को इतना
पैसा क्यों दिया हैं ये तुम्हारा लॉजिक

अब आप तो जानते ही हैं कि फ्रीडम ऑफ चॉइस
और प्रवेसम में यह सरकार कितनी सीरियस है
अबे यार एडिटर यार ये रात को ना उल्टी
सीधी चीजें देखना बंद करो ये सारा

इन्फ्लुएंस तुम्हारी एडिटिंग में आ जाता
है एनीवेज बैक टू सीरियस टॉपिक एसोसिएशन
फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एडीआर सीपीआईएम
और कांग्रेस लीडर जया ठाकुर ने सुप्रीम
कोर्ट में गोहार लगाई सम पॉइंट्स पॉइंट

नंबर वन कि इलेक्टोरल बंड्स वोटर के राइट
टू इंफॉर्मेशन का उल्लंघन करती है कौन सी
पॉलिटिकल पार्टी ने कहां से कितने पैसे
लिए यह वोटर का जानने का अधिकार है उसको
हक बनता है पॉइंट नंबर टू कि इलेक्टोरल

बॉन्ड इलेक्शन डेमोक्रेसी दोनों में ही
ट्रांसपेरेंसी को लाता नहीं मारता है
इलेक्शंस जीतने के बाद जीतने वाली पार्टी
जानती है किसने कितना पैसा दिया तो बदले
में उनका क्या कांट्रैक्ट मिल रहा है कौन

सी फंडिंग दी जा रही है कौन से कॉरपोरेट्स
बेनिफिट कर रहे हैं यह हमें तो मालूम ही
नहीं चलता है तीसरा पॉइंट शेल कंपनीज के
डोनेशंस अलाउ करने से हमारे देश की

इलेक्टोरल इंटीग्रिटी को खत्म किया जा रहा
है नेट नेट बोले तो तो चाइना की एक कंपनी
शेल कंपनी के द्वारा बड़े-बड़े पार्टीज को
डोनेशन इंडिया में दे सकती है और फिर

चाइना कोई भी एक्शन ले हम कुछ नहीं करेंगे
वह हमारे देश पर घुस आए हमारा जमीन ले ले
लेकिन हम चाइना से इंपोर्ट्स और ज्यादा
करते रहेंगे क्या इसे मदर ऑफ डेमोक्रेसी

का मदर सिस्टर नहीं हो जाता है बात तो सही
है सुप्रीम कोर्ट को भी लगा कि बात में दम
तो है क्योंकि सुनवाई के दौरान ही जस्टिस
चंद्रचूर लेड कांस्टीट्यूशनल बेंच ने कई
सवाल उठाए सरकार से कि क्या इलेक्टोरल

बॉन्ड्स सिलेक्टिवली एनोनिमस है यानी
सरकार भली भाती जानती है कि विपक्षी
पार्टी को कौन पैसा दे रहा है कितना पैसा
दे रहा है लेकिन विपक्षी पार्टी को कुछ
पता नहीं चलता है कोर्ट ने कहा कि

इलेक्टोरल बॉन्ड से किकबैक्स कैसे रुकती
हैं ट्रांसपेरेंसी कैसे आती है एनोनिमिटी
कैसे होती है यह तो उन्हें दिख ही नहीं
रहा है और इस बात की लॉजिक कोर्ट ने समझने

की कोशिश की कि पहले एक कंपनी अपने मुनाफे
सिर्फ अपने मुनाफे का 75 प्र किसी
पोलिटिकल पार्टी को डोनेट कर सकती थी और
वो भी रिकॉर्ड रखने के बाद और यह एक कैप
था 75 प्र का अब यह लॉस मेकिंग कंपनी भी

डोनेशन दे सकती है कोई शेल कंपनी 100%
अपना रेवेन्यू का डोनेशन दे सकती है अब
भला यह क्यों है यह फकीरी क्यों अलाव की
गई है यह कोर्ट ने जानने की कोशिश की अगर
यह सब सुनकर आप परेशान हैरान हो रहे हो और

इलेक्टोरल बंड्स का एबीसी भी भूल गए हो
देश की नीलामी कैसे हो रही थी नहीं जानते
हो तो हम ने एक डिटेल एपिसोड बनाया था
इसको लेकर तीन महीने पहले ही पूरा एपिसोड

बनाया था पूरा ये जो खेल है उसको समझाया
था और उस एपिसोड में जो जो चीजों की आशा
हमने की थी सुप्रीम कोर्ट से वो सारी
चीजों की सुनवाई हुई है उन सारी चीजों पर

आज डिसीजन आई है इसीलिए हम इस एपिसोड को
कह सकते हैं इन अ वे डेमोक्रेसी ऑन सेल
पार्ट टू कांस्टिट्यूशन बेंच ने लंबा
चौड़ा ऑर्डर दिया है लेकिन देशभक्त फैमिली
के लिए ऑपरेटिव पार्ट मैं आपको बताता हूं

इसके लिए लॉयर होने की भी जरूरत नहीं है
ना इसको समझने में और ना इसके निष्कर्ष
में पहुंचने के लिए कॉमन सेंस की बात की
है सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हां 5 साल
देर से ही सही लेकिन चलो भाई बात तो की ना

इसका मलाल रहेगा यह डिले का एनोनिमस
इलेक्टोरल बंड्स आर वायलेट ऑफ द राइट टू
इंफॉर्मेशन अंडर आर्टिकल 191 ए ऑफ द
कॉन्स्टिट्यूशन अकॉर्डिंग द स्कीम हैज बीन
स्ट्रक डाउन एज

अनकंस्टीट्यूशनल हिंदी में बोले तो
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि नागरिकों का हक
बनता है कि वो जान पाए कि उनके तेजस्वी
नेता के पार्टी को कौन और कितने पैसे दे
रहा है सोरस पैसे दे रहा है चाइना पैसे दे

रहा है या कोई नॉर्मल पूंजीपति पैसे दे
रहा है चीफ जस्टिस ने इस अधिकार को
हाईलाइट किया और बोला कि यह ओपन गवर्नेंस
का एक अहम हिस्सा बनता है दूसरा पॉइंट
पैसों का फंडिंग जानना जरूरी है क्योंकि

पैसे देता कौन है उस पॉलिटिकल पार्टी को
उसे ही पॉलिटिशियन के पास एक्सेस मिलता है
वही जा पाता है पे चर्चा करने के लिए और
यही चर्चा फिर बन जाती है पॉलिसी मेकिंग

तो यह जानना जरूरी है कि किसका पैसा मिला
है पार्टी को और उससे क्या पॉलिसी बना है
और उस पॉलिसी से उन कांट्रैक्ट से लाभ
किसको पहुंचा है क्या इसमें एक डायरेक्ट

कोरलेन है अगर डायरेक्ट को रिलेशन है तो
डेमोक्रेसी के लिए अच्छी बात नहीं है एक
और इंपॉर्टेंट मुद्दा अनलिमिटेड कॉर्पोरेट
फंडिंग फॉर पॉलिटिकल पार्टीज अमेंडमेंट टू
सेक्शन 1821 ऑफ द कंपनीज एक्ट करके बीजेपी

सरकार ने यह मुमकिन कर दिया था कि कोई भी
कंपनी असली कंपनी शेल कंपनी प्रॉफिटेबल
कंपनी या लॉस मेकिंग कंपनी जी हां लॉस
मेकिंग कंपनी वो कुछ भी अमाउंट ऑफ डोनेशन
दे सकती है पार्टीज को 1 प्र हो या 100%

हो वो डोनेशन दे सकती है बिना किसी रोक
टोक के बिना किसी एक्सप्लेनेशन के बिना
किसी अकाउंटिंग के वाह सबसे पहले कोर्ट ने
कॉमन सेंस लगाया कि एक कंपनी एक पॉलिटिकल
पार्टी को मोटा पैसा क्यों देगी शक्ल पसंद

है इसलिए तो नहीं देगी ना कंपनी का अहम
काम मेन काम नाम होता है प्रॉफिट जनरेशन
तो वो तो प्रॉफिट अपना ढूंढेंगी ना और
इलेक्टोरल बॉन्ड से देशवासियों को पता
नहीं चलेगा कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने

वाले को क्या-क्या मुनाफे मिल रहे हैं
क्या-क्या कांट्रैक्ट मिल रहा है
क्या-क्या पॉलिसी चेंज हो रही है
इलेक्टोरल बॉन्ड जो खरीद रहा है उसको
मुनाफा हो रहा है और जो पार्टी जिसको
मुनाफा हुआ था वो ये सारी चीजें दे रही है

आपस में डीलिंग चल रही है और फिर सुप्रीम
कोर्ट ने बोला कि ये जो आपने लॉस मेकिंग
कंपनीज को डोनेशन अलाव किया है इसके पीछे
तो गहरा राज होगा ना ये तो ओबवियस नहीं है
ना कि लॉस मेकिंग पार्टी तभी देगी हां जब

उसे एक और कोई नया पॉलिसी चाहिए होगा
क्योंकि वो बंद होने के गगर पर होगी तो इस
अमेंडमेंट को भी स्ट्राइक डाउन कर दिया
गया सरकार की दलील एक और जगह फ्लैट पड़ गई
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इलेक्टोरल बॉन्ड

सीक्रेट नहीं है उसे ट्रेस किया जा सकता
है देयर आर सफिशिएंट गैप्स इन द इलेक्टोरल
बंड स्कीम व्हिच इनेबल पॉलिटिकल पार्टीज
टू नो द पर्टिकुलर ऑफ द कंट्रीब्यूशंस टू
देम सुप्रीम कोर्ट रिजेक्ट्स द यूनियंस

आर्गुमेंट दैट पॉलिटिकल पार्टीज वट बी एबल
टू नो द आइडेंटिटी ऑफ द कंट्रीब्यूटर जो
मूल आधार था इलेक्टोरल बंड्स का उसी को ही
हटा दिया सुप्रीम कोर्ट ने उसी को ही गिरा
दिया क्योंकि यह मूल आधार नहीं मूल झूठ भी

था संक्षिप्त में बोले तो सुप्रीम कोर्ट
ने इलेक्टोरल बंड्स को ना लीगल पाया है ना
ट्रांसपेरेंट पाया है ना कॉन्स्टिट्यूशन
पाया है एपिसोड की शुरुआत में मैंने कहा
था कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इसे एक

सुनहरा दिन माना जाएगा वो इसलिए भी
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ गलत या
अनकंस्टीट्यूशनल नहीं राया इलेक्टोरल
बंड्स को उससे भी आगे गई है सुप्रीम कोर्ट

क्योंकि अक्सर होता यह है कि कड़ी निंदा
करने के बाद सुप्रीम कोर्ट गिल्टी पार्टी
का कान पकड़ती है और कह देती है इस बार
जाने दे रहा हूं अगली बार मत करना नो
पनिशमेंट लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने

कुछ अहम आदेश दिए हैं नंबर वन सुप्रीम
कोर्ट ने कहा है एसबीआई तुरंत इलेक्टोरल
बंड्स इशू करना बंद कर दे यानी आज से
इलेक्टोरल बंड्स देश की डेमोक्रेसी में
काला धब्बा था है नहीं था इट्स हिस्ट्री

पॉइंट नंबर टू उससे भी अहम सुप्रीम कोर्ट
अप्रैल 12th 2019 माने जिस दिन सुप्रीम
कोर्ट का इलेक्टोरल बंड्स के मैटर में एक
इंटिम ऑर्डर आया था क्योंकि सुनवाई तो तब

से चल रही है उसके बाद इस डेट के बाद
खरीदे गए सारे बॉन्ड्स उनके डेट ऑफ परचेस
किसने खरीदा कितना खरीदा यह सारी जानकारी
इलेक्शन कमीशन को भेजी जाएगी साथ ही 12
अप्रैल 2019 के बाद जितनी भी पॉलिटिकल

पार्टीज को इलेक्टोरल बंड्स मिले हैं
जितने भी इन कैश किए गए हैं वो सारे
डिटेल्स इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के पास
जाएंगे किस पार्टी ने कितने बॉन्ड इन कैश
करवाए और कहां से यह सारी इंफॉर्मेशन

इलेक्शन कमीशन के पास 6 मार्च तक पहुंचना
होगा यह हिदायत है सुप्रीम कोर्ट ऑफ
इंडिया की एंड उसके बाद सबसे सिग्निफिकेंट
चीज जो हो या शायद ना हो इलेक्शन कमीशन ऑफ

इंडिया को यह सारा इंफॉर्मेशन अपने
वेबसाइट पे 13 मार्च तक पब्लिश करना होगा
यानी पूरा काला चिट्ठा देश के सामने रखना
होगा अगर कोई इलेक्टोरल बंड जिसे खरीदा
गया है उसे इन कैश नहीं कराया गया है तो

बॉन्ड को बैंक परचेज को रिफंड भी कर देगी
अब इलेक्टोरल बंड्स को इन कैश करने का समय
सिर्फ 15 दिन का होता है अगर आप 15 दिन के
अंदर कोई पॉलिटिकल पार्टी उ से इन कैश
नहीं कराती है तो वो प्राइम मिनिस्ट्रियल

रिलीफ फंड में चले जाता है तो शायद रिफंड
का कोई अमाउंट बाकी ना हो लेकिन ये 2019
से आज तक का इलेक्टोरल बंड परचेस का नाम
आगे आना यह पब्लिश होना यह एक राजनीतिक

भूकंप ला सकती है और हो सकता है सत्ताधारी
बीजेपी इसे रोकने की कोशिश करे इस ऑर्डर
को चैलेंज करे या कम से कम इलेक्शन के बाद
तक पोस्टपोन करने की कोशिश करें क्योंकि
किसी भी स्मार्ट अपोजिशन पार्टी को बस अब

यह करना है कि उसे साफ साफ देखना है कि
किस कॉर्पोरेट ने कितना पैसा दिया और उसे
क्या-क्या और क्या गलत मुनाफा मिला क्या
क्या डिस्प्रोशियम
मुनाफा मिला क्या रूल तोड़कर मुनाफा मिला
इससे इलेक्शन में भारी भूकंप आ सकती है 13

मार्च का इंतजार हमें भी रहेगा देखि
इलेक्शन कमीशन इस मैटर को पब्लिश करती है
या नहीं करती है अब इस जजमेंट का भी तो
इंतजार इतने सालों से लोग कर रहे थे हम भी
इंतजार कर लेते हैं आपका क्या कहना है

सरकार ये होने देगी अपना पोल खुलने देगी
इलेक्शन से पहले नीचे कमेंट सेक्शन प
लिखिए बंड लिखकर अपना कमेंट लिखिए तभी समझ
में आएगा कि यहां तक एपिसोड देखा है आपने
देखिए कुडोस टू द कांस्टीट्यूशनल बेंच ऑफ

द सुप्रीम कोर्ट जस्टिस डी वाय चंद्रचूर
जस्टिस संजीव खन्ना जस्टिस गवाई जस्टिस
पारदी वाला जस्टिस मनोज मिश्रा आप लोगों
ने दिखा दिया कि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में
माइट इज नॉट द ओनली राइट लॉ भी एक चीज

होती है कांस्टीट्यूशन भी एक चीज होती है
बैलेंस ऑफ पावर भी एक चीज होती है लेकिन
फिर भी सवाल बहुत सारे हैं और दुख इस बात
का है कि इलेक्टोरल बंड्स अनकंस्टीट्यूशनल

हो गए लेकिन 16000 करोड़ रुपए 16000 करोड़
रुपए के बंड्स जो पार्टी के पास आए जो गलत
पैसा है जो अनकंस्टीट्यूशनल पैसा है वह आज
भी उनके पास ही है चोरी पकड़ी गई चोर को
बोला जा रहा है रख लो पैसा आगे चोरी मत

करना और यही चोरी का पैसा आने वाले
इलेक्शन में इस्तेमाल होने वाला है और
उससे भी दुखद बात यह है कि इलेक्टोरल
बंड्स की पैदाइश से लेकर परवरिश तक सब
नाजायज थी और यह बात सामने आ भी चुकी थी
लेकिन तब कोर्ट ने कुछ नहीं किया

इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट सौरभ दास के
आरटीआई ने 2020 से पहले ही यह बात दिखा दी
थी इस बात का खुलासा कर दिया था कि लॉ
मिनिस्ट्री ने इलेक्टोरल बंड्स को गलत
माना था यह भी बोला था कि इस तरीके से मनी

बिल लाना एक हैबिट मत बना दीजिएगा लेकिन
अपनी आपत्ति जताने के बाद हस्ताक्षर भी कर
दिए कॉर्पोरेट मिनिस्ट्री के पास कोई
रिकॉर्ड नहीं है दलील क्या दी गई थी कि
भाई बिजनेस हाउसेस ने बोला है कि इसको

सीक्रेट डोनेशन बना दो जिससे हमें
प्रोटेक्शन मिले कोई बिजनेस हाउस ने ऐसी
कोई रिक्वेस्ट नहीं नहीं डाली है
जर्नलिस्ट नितिन सेटी के पास इस मुद्दे पर
इतने लेख हैं इतने लेख हैं कि वह पूरा का

पूरा किताब छाप दें क्योंकि इतना
इन्वेस्टिगेशन उन्होंने किया था ये सारे
लेख आपको मिल जाएंगे फ्री ऑफ कॉस्ट
रिपोर्टर collect.in में लेकिन पढ़ता कौन

है अच्छे पत्रकारिता आज के डेट में हम तो
सब 9:00 बजे लगे हुए हैं या
whatsapp2 में ही यह पता चल जाता कि
आरबीआई को कैसे चकमा दिया गया था
इलेक्टोरल बंड्स को लाने के लिए कैसे

इलेक्शन कमीशन से झूठ बोला गया था मोदी
सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट ने गलत
इंफॉर्मेशन दिया इलेक्शन कमीशन को ताकि
इलेक्शन कमीशन से कोई ऑब्जेक्शन रेज ना हो
पाए वाह सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में जाकर
यह बात मानी कि इलेक्टोरल बॉन्ड सीक्रेट

नहीं है लेकिन यह बात 5 साल पहले नितिन
सेटी ने दिखा दी थी एक सीक्रेट नंबर बेस
सिस्टम से सारे इलेक्टोरल बंड्स को सरकार
ट्रैक कर सकती थी ये कोई सीक्रेट नहीं है
जो आज सुप्रीम कोर्ट ने पाया ये सारे

खुलासे होते गए सुप्रीम कोर्ट में
याचिकाएं लगती गई तारीख पे तारीख मिलती गई
डेमोक्रेसी की नीलामी चलती रही अरे स मोटो
एक्शन की बात छोड़ो कभी सुप्रीम कोर्ट ने
यह नहीं सोचा या इलेक्शन कमीशन ने ये नहीं
पूछा कि नियम के हिसाब से तो एक सीट पर 1

करोड़ का खर्चा आना चाहिए वही अलाउड होता
है पर बीजेपी ने पिछली इलेक्शन में तो 60
करोड़ से ज्यादा एक सीट पर खर्चा किया था
क्योंकि स्पें स्पेंडिंग लिमिट तो
कैंडिडेट पर होती है पार्टी पर तो कोई

स्पेंडिंग लिमिट है ही नहीं जब 50 60
करोड़ रुपए एक सीट पर खर्चा होगा तो यह
पैसा वापस भी तो देना होगा ना मोटा भाई को
सूद समेत इसीलिए जिसका पैसा उसी की पॉलिसी
जिसका पैसा उसी की डेमोक्रेसी फार्म लॉज

लेबर लॉज में किए गए बदलाव माइनिंग कंपनी
जंगल काट के कितना भी प्रदूषण फैला दे ठीक
है मगर आप ऑड इवन अगर करिएगा एक दिन इधर
उधर करिएगा तो फाइन भरिए
पॉलिटिक्स अब सीईओ के मीटिंग रूम से पनपती
है डेमोक्रेसी नहीं पूंजी कृषि चल रही है
एकदम लीगलाइज्ड करप्शन आरटीआई मूवमेंट के

दौरान एक नारा काफी मशहूर हुआ था
इंफॉर्मेशन इज पावर यानी जब तक आपके पास
सच पता करने का साधन हो तब तक आपकी आजादी
है देश में आरटीआई के प्रिंबल में तक लिखा
हुआ है कि एक इनफॉर्म सिटीजनरी हमें
क्रिएट करना है इसी आरटीआई के वजह से जो
अब जिसका अब गला घोटा जा रहा है इसी

आरटीआई के वजह से हमें पता चला कि कैसे
बीजेपी सरकार ने आरबीआई इलेक्शन कमीशन और
पार्लियामेंट को साइडलाइन करके इलेक्टोरल
बंड्स को लीगलाइज किया था जिन लोगों ने इस
सच को बाहर निकाला उन्हें हमारा सलाम आज

प्रशांत भूषण जैसे लॉयर्स हमारे हक के लिए
सुप्रीम कोर्ट में लड़ तो रहे हैं सिस्टम
को हिला तो रहे हैं लेकिन क्या उन्हें
हमारा सपोर्ट है आज जीत देशभक्तों की हुई
है डेमोक्रेसी की हुई है कांस्टिट्यूशन की

हुई है और एक ख भी मिली है कि सत्य का
रास्ता ट्रुथ का रास्ता कितना भी सुना हो
उस पर चलना जरूरी है इलेक्टोरल बंड्स
हमारे देश का एक घिनौना सच बन गया था हमने
उसे एक्सेप्ट कर लिया था लेकिन उसे बदला

गया कुछ लोगों ने मिलकर उसे बदला देर से
ही सही सुप्रीम कोर्ट जगी जनता को भी
थोड़ा सतर्क रहना पड़ेगा कुछ भी नेता
घुट्टी पिला देते हैं हम बैठ के पी लेते
हैं लेटेस्ट हुआ है फार्मर
है कम से कम फेक न्यूज करो नया लाओ फेक

न्यूज़ डोंट बी सो लेजी अगर इतने ही लेजी
बन जाओगे तो जागरूक देशभक्त नागरिक कैसे
बनाओगे अगर सवाल नहीं पूछोगे परफॉर्मेंस
डिमांड नहीं करोगे अगर सिस्टम को थोड़ा
हिलाओ ग नहीं तो कोई लॉयर कोई कोर्ट कोई

सुप्रीम कोर्ट कोई सिविल सोसाइटी कोई भी
देश को नहीं बचा सकता है देश को बचाने के
लिए एक अहम काम हुआ है आज बहुत और
डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशंस हैं इसे बचाने
की जरूरत है सवाल है कि आप इस मुहीम में
शामिल होंगे या नहीं जय हिंद

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