Supreme Court on Electoral Bond: चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, जानें क्या वजह? - instathreads

Supreme Court on Electoral Bond: चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, जानें क्या वजह?

से कितना इलेक्टोरल बॉन्ड दिया गया
है तो सीधे रुक करते हैं मेरे सहयोगी
रविंद्र लगातार जुड़े हुए हैं रविंद्र एक
तरीके से माना जाए सुप्रीम कोर्ट का ये जो

बड़ा फैसला है सरकार के लिए इलेक्टोरल बंड
की इस व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है
क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था के
ऊपर फिलहाल तत्काल रोक लगाने का

आदेश जाहिर सी बात है सरकार ने 2017-18
में जब उस समय वित्त मंत्री अरुण जेटली थे
तो पारदर्शिता को लेकर ही इस बंड को लाया
गया था और लोकसभा में काफी दलीलें दी गई

थी दोनों तरफ से कुछ कुछ किसी ने विरोध भी
किया था लेकिन सरकार ने इस फैसले को सही
ठहराते हुए बिल को पारित करा था और विद
विधेयक के रूप में जिससे कि राज्यसभा में
वोटिंग कराने की नौबत ना हो क्योंकि वहां

पर जो सरकार का बहुमत कम था और इसलिए इसे
वित विधेयक के रूप में लेकर आया गया था और
इस पर भी केसेस चले थे बाद में कहा गया कि
सर शायद कोर्ट द्वारा कि ये वित विधायक के

लिए सही केस है लेकिन अब इस पर फिलहाल रोक
लगाई गई है तो जाहि ी बार सरकार के लिए
काफी झटका है क्योंकि वो जो दलील थी अब
उसे सरकार की तरफ से जो दलीलें दी गई
तुसार मेहता की तरफ से दलीलें दी गई कि हम

ठीक है इसमें जो लूफ हॉल से कमी उसे दूर
करने की पूरी कोशिश करेगी सरकार लेकिन
फिलहाल इस पर इलेक्ट्रॉन बन पर रोक लगाया
बकुल रविंद्र सवाल इस चीज को लेकर भी उठे

थे अमेंडमेंट किया गया था यानी जो विदेशी
कंपनियां है उनके जरिए भी वो भी इलेक्टोरल
बंड का इस्तेमाल कर सकती है यह भी चिंता
जो है सुप्रीम कोर्ट के अंदर जताई गई थी
जो याचिका करता है उनकी तरफ से भी दायर की
गई

थी बिल्कुल रविद्र मैं लौटूंगा आपके पास
में लेकिन हमारे साथ में अंजलि भी जुड़ गई
है मेरी सहयोगी और अंजली के साथ में
याचिकाकर्ता मौजूद है एक तरीके से कहा जाए

इले ब को कैंसिल किया है निश्चित रूप से
यह हमारे देश में एक बड़ा इंपैक्ट डालेगा
जी देखिए बिल्कुल जया ठाकुर इस समय हमारे
साथ है मैम जहां तक बात करें अब कोर्ट ने

कहा है कि संवैधानिक करार दिया तो क्या
कहना है आप जी मैं बहुत खुश हूं जिस मुहिम
को हम काफी टाइम से आगे लेकर चल रहे थे और
उसकी लड़ाई लड़ रहे थे मुझे बहुत खुशी है

कि सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को समझा है और
हमारी मांगों को माना है और इलेक्टोरल बंड
जो एक हमारे संविधान पर खतरा था उसको रद्द
किया है चंदा देने की जो सीमा निर्धारित

करने को कहा है व सरकार के फैसले को यह
मनमाना करार दिया है कोर्ट ने अपने फैसला
पढ़ते हुएय कहा गया है निश्चित रूप से कुछ
चीजें हमारे हित में कुछ अहित में है बट

मैं खुश हूं एटलीस्ट ये रद्द हुआ है आप
इसको जो तमाम याचिका करते हैं आप इसको एक
बड़ी जीत मानते हैं अपने लिए निश्चित रूप
से ये सभी के लिए एक बहुत जीत का विषय है

और यह आगे चलके आम आदमी के हित में जाएगा
स्कीम प तुरंत रोक लगाने की बात की गई है
मैम जी ये बहुत खुश हूं कि इसको स्कीम को
रोका गया है क्योंकि यह बहुत मनी ब्लैक

मनी को बढ़ावा दे रहा था जो आपने आज में
क्या आपकी तरफ से दलीलें रखी गई थी मैम जी
मेरी दलील थी इलेक्टोरल बंड रद्द होना
चाहिए और मुझे खुशी है कि हमारी हमारी बात

मानी गई कोर्ट में और जो है आज ये स्कीम
रद्द हुई है थैंक यू तो देखिए डॉक्टर जया
ठाकुर जो कांग्रेस नेता है और इस मामले
में याचिका करता भी है कह रही है कि तमाम

याचिकाकर्ताओं के लिए एक बड़ी यह जीत
मानती है और उनका कहना है कि जो दलीलें दी
गई थी याचिकाकर्ताओं की ओर से उसकी अंततः
यह जीत हुई है यह जो फैसला आया है कोर्ट

की ओर से बिल्कुल अंजली याचिका कर्ताओं को
एक बड़ी राहत कहा जाए एक बड़ा जो समर्थन
है वो मिला है कहीं नाना कहीं सुप्रीम
कोर्ट के इस फैसले से और उनको जिस तरीके

से उन्होंने अपील दाखिल की थी चुनावी
बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक करार दिया है
सुप्रीम कोर्ट ने चंदे की सीमा पर सरकार
का फैसला मनमाना है ये भी सुप्रीम कोर्ट
की तरफ से कहा गया है और इन टिप्पणियों के

साथ ही चुनावी बॉन्ड की जो व्यवस्था है
इलेक्टोरल बॉन्ड की जो व्यवस्था 201617 के
बजट के अंदर लाई गई थी 2018 जनवरी के अंदर

इसे लागू किया गया था उस चुनावी बॉन्ड की
इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था को बंद करने
उसे उस पर रोक लगाने का फैसला किया गया है

बॉन्ड से चंदे की दें जानकारी यह भी
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कहा गया है
चुनावी चंदे पर एसबीआई को सुप्रीम कोर्ट
का निर्देश है 2019 से लेकर अब तक किस

पार्टी में किस व्यक्ति ने कितना चंदा
दिया है कितना एनकैश किया गया है उसकी
जानकारी सार्वजनिक करने को का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दिया गया है

जानकारी मांगी है एसबीआई स्टेट बैंक ऑफ
इंडिया से क्योंकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
ही वो निर्धारित संस्था है जो इलेक्टोरल

बॉन्ड इशू करती है और देश के 29 शहरों के
अंदर जो निर्धारित संस्थाएं हैं वही जारी
कर सकती है इलेक्टोरल बंड 31 मार्च तक

इलेक्शन कमीशन की जानकारी वेबसाइट पर दे
इलेक्शन कमीशन यह जानकारी सार्वजनिक करें
यानी राइट टू इंफॉर्मेशन सूचना के अधिकार
मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है यह

जानकारी जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने यह
जानकारी दी और सीधे रुक करते हैं मेरे
सहयोगी अरविंद हमारे साथ जुड़ गए हैं
अरविंद कहा जाए आज का फैसला बड़ा और

महत्त्वपूर्ण फैसला है 2024 के चुनाव से
पहले क्या कुछ बड़ी बातें सुप्रीम कोर्ट
ने अपने इस फैसले में कही
है देखिए संविधान पीठ का जो एक पत से
फैसला है उसमें संविधान पीठ ने माना है कि

जो इलेक्टोरल बंड स्कीम है वह वोटर के
सूचना के अधिकार के हनन करती है अगर वोटर
को यह जानने का हक है कि किसी अ वो जिस
उम्मीदवार को वोट दे रहा है उसका अपराधिक

अतीत क्या है उसकी चला चल संपत्ति क्या है
तो वोटर को यह भी जानने का हक है कि आखिर
जिस राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार को वोट
दे रहा है उससे कितनी फंडिंग मिली है और

उसको फंडिंग करने वाला कौन है तो कोर्ट ने
माना कि यह वोटर के उम्मीदवार के बारे में
राजनीतिक पार्टी के बारे में जानने के
अधिकार का हनन करती है और यह आर्टिकल 191

191 ए के तहत जो अधिकार मिला हुआ है

जिसमें सूचना का अधिकार भी शामिल है उसका
सीधे तौर पर उल्लंघन है दूसरी
महत्त्वपूर्ण बात यह कि कोर्ट ने माना कि
सरकार की तरफ से जो यह दलील दी गई थी कि
ब्लैक मनी पर लगाम कसने के लिए इस स्कीम

को लाया गया है इससे पहले चूंकि दानकता यह
नहीं चाहते थे कि उनकी जानकारी का खुलासा
हो इस इस लिहाज से जब यह स्कीम नहीं लाई
गई थी उससे पहले वह को कैश के जरिए देने
के लिए बाध्य थे और इस स्कीम के बाद में

यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है
सरकार की तरफ से कि सिर्फ बैंकिंग माध्यम
से ही सही तरीके से कमाया हुआ पैसा ही
राजनीतिक पार्टियों तक पहुंचे कोर्ट ने इस

दलील को खारिज कर दिया है कोर्ट ने यह कहा
कि ब्लैक मनी पर लगाम कसने की दलील का
हवाला दे अ अगर बड़े फैसले की बात की जाए
तो आज से जो कॉज एंड इफेक्ट की अगर बात की
जाए तो अब क्या व्यवस्था होगी इलेक्टोरल

बॉन्ड की व्यवस्था तत्काल रोक दी गई है
साथ ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कहा गया
है कि एसबीआई तमाम जानकारी जो है 31 मार्च
तक सार्वजनिक करें और साथ ही यह जानकारी

हो बिल्कुल कोर्ट ने जो इलेक्टोरल बॉन्ड
स्कीम है उसको असंवैधानिक करार दिया उसको
रद्द कर दिया है एसबीआई को निर्देश दिया
है कि इलेक्ट्रोल बंड स्कीम के तहत वो बंड

निकालना बिल्कुल बंद करें अभी तक जो कुछ
जानकारी एसबीआई के पास है जिन जिन
राजनीतिक पार्टियों को जिस जिस कॉरपोरेट
कंपनी से चंदा मिला है उसकी जानकारी वो
इकट्ठा करके इलेक्शन कमीशन को दे इलेक्शन

कमीशन इसको वेबसाइट पर डाले और यह पब्लिक
करे कि आखिर किस राजनीतिक पार्टी को किस
कॉरपोरेट कंपनी से कितना चंदा मिला है और
जिन राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक बंड को
अगर कैश नहीं कराया है तो वो बैंक को यह

बंड वापस करें और बैंक इसके अवेज में
उन्हें कोई पैसा नहीं देगा तो आप समझ सकते
हैं कि पूरी तरीके से इस स्कीम के लागू
होने पर तत्काल प्रभाव से सुप्रीम कोर्ट

ने रोक लगा दी है अरविंद इस चीज को लेकर
भी चिंताएं जताई गई थी कि कई कंपनियां जो
हैं वो अपने कुछ प्रतिनिधियों के जरिए जो
है इलेक्टोरल बॉन्ड लेती हैं उनके जरिए

ट्रांजैक्शंस हुआ है ऐसे में सीधे-सीधे
किसी कंपनी की सीधे-सीधे किसी दानदाता तक
पहुंचना या उसकी जानकारी को सार्वजनिक
करना कितना मुमकिन होगा इस मामले को लेकर
कोर्ट के ऑब्जर्वेशंस में कोर्ट की

टिप्पणियों के अंदर कुछ स्पष्ट
हुआ देखिए कोर्ट का सुनवाई के दौरान भी
कोर्ट का यह मानना रहा था कि इस मामले में
जो स्कीम है उसमें गोपनीयता बहुत सीमित है
सरकार चाहे तो अपनी जांच एजेंसियों के

जरिए इस बात का पता लगा सकती है कि अ उसके
अलावा विपक्षी पार्टी को किस कॉर्पोरेट
कंपनी ने चंदा दिया लेकिन विपक्षी पार्टी
अगर चाहे तो ये पता नहीं कर सकती कि सरकार

को या सत्तारूढ़ पार्टी को किसने चंदा
दिया तो इस मामले में जो गोपनीयता है वो
बहुत सीमित है हालांकि सरकार की तरफ से ये
कहा गया कि ऐसा नहीं है कि सरकारी एजेंसी

अगर चाहे तो किसी दानकता का यूं ही पता
लगा सकती हैं सिर्फ कोर्ट के दखल के बाद
ही कोर्ट के आदेश के बाद ही दानकता का पता
चलाया पता चल सकता है लेकिन कोर्ट का सवाल
ये था कि ये गोपनीयता बहुत लिमिटेड है

आरबीआई के पास सरकारी जांच एजेंसियों के
पास जानकारी हो सकती है दोनों तरह के डोनर
की चाहे वो सरकारी पार्टी को दान देने
वाले हो या पहले जब आखरी सुनवाई 2 नवंबर

को हुई थी तो उसम सॉलिट जनरल तुषार मेहता
ने खुद इस चीज को अपने ऑब्जर्वेशन में
माना था और उन्होंने तत्कालीन उस समय के
जो फाइनेंस मिनिस्टर उनको कोट करते हुए

कहा था कि ऑनलाइन और चेक से जो पेमेंट है
वही सबसे ज्यादा रोब और ट्रांसपेरेंट
पेमेंट माना जा सकता है ऐसे में क्या
वैकल्पिक किसी व्यवस्था का सुझाव भी

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के अंदर सामने
आया
है देखिए अभी जो आदेश पढ़ा गया है उसमें
तो इस स्कीम को लेकर के ही बात हुई
और इस स्कीम को कोर्ट ने असंवैधानिक करार

दिया है कोर्ट ने माना कि यह सूचना के
अधिकार का हनन है ब्लैक मनी पर लगाम कसने
की दलील देकर या दानकता के हितों की
सुरक्षा की दुहाई देकर उसकी निजता के

अधिकार की दुहाई देकर के इस स्कीम को
बरकरार नहीं रखा जा सकता अगर आने वाली
टाइमलाइन की बात की जाए तो एसबीआई को कब
तक की मियाद दी गई है कि उसे जो तमाम

दानदाताओं की सूची है जो जानकारी है व व
सबमिट करनी
है देखिए जो एसबीआई है उसको 6 मार्च तक का
वक्त दिया गया है और उसके बाद इलेक्शन
कमीशन से कहा गया है कि वो एक हफ्ते के

अंदर वेबसाइट पर सारी जानकारी डालें और
उसके अलावा जिन राजनीतिक पार्टियों ने अभी
तक बॉन्ड को कैश नहीं कराया गया है वो
बैंक को वापस करेंगे उसकी अवेज में उनको
कोई पैसा नहीं मिलेगा तो ये एक डेडलाइन

कोर्ट की तरफ से तय की गई है लेकिन जैसा
मैं कह रहा था कि सुनवाई के दौरान भी
कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए थे कि जो
पुरानी अ कैश वाली जो व्यवस्था है जिसके

जरिए दानकता कैश के जरिए राजनीतिक
पार्टियों को चंदा देते हैं उस पर तो लौटा
नहीं जा सकता और इस स्कीम को लाने के पीछे

जो सरकार की मंशा है उस पर भी हम सवाल
नहीं खड़ा कर रहे हैं हम चाहते कि इस
स्कीम की खामियों को दुरुस्त किया जाए
लेकिन आज जो कोर्ट का आदेश आया है वो उन

ऑब्जर्वेशन के खिलाफ गया है उन ऑब्जर्वेशन
से मिलता जुलता नहीं और कोर्ट अय स्पष्ट
कीजिएगा एसबी को या स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
को यह जानकारी जो है वो इलेक्शन कमीशन के

पास सबमिट करनी है क्या अगले 20 दिनों
में बिल्कुल इलेक्शन कमीशन के पास सबमिट
करनी है इलेक्शन कमीशन उसको वेबसाइट पर
डालेगा और इलेक्शन कमीशन जब वेबसाइट पर
डालेगा तो वो जानकारी सार्वजनिक होगी कि

आखिर किस राजनीतिक पार्टी को किस कॉरपोरेट
कंपनी से कितना चंदा मिला है जी
महत्त्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं अरविंद
आप साथ ही अगर ऑब्जर्वेशन की बात की जाए

शुरुआत के अंदर पांच जजों की बेंच ने इसकी
मामले की सुनवाई की थी और उसी समय कहा गया
था कि फैसले दो हैं लेकिन निष्कर्ष एक है
इसके क्या मायने

हैं इसका मायने यह होते हैं प्रणय कि जब
संविधान पीठ फैसला पढती है तो कई बार
फैसले अलग-अलग होते हैं जजों की राय भी
अलग होती है लेकिन कई बार जो फैसले होते
हैं वो अलग-अलग लिखे जा सकते हैं जजों के

द्वारा लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्कीम
को लेकर उनके निष्कर्ष एक नहीं है जैसे
किसी जजमेंट में अगर तीन जजों ने कोई
फैसला लिखा है दो जज कोई अलग से अपनी बात
कहना चाहते हैं लेकिन निष्कर्ष में व ही

यही चाहते हैं कि इस स्कीम को रद्द होना
चाहिए तो फैसले भले ही अलग हो लेकिन उसके
निष्कर्ष एक ही होंगे अरविंद अगर
याचिकाकर्ताओं के लिहाज से अगर बात की जाए

तो उन्हें किन-किन पॉइंट्स के ऊपर कामयाबी
मिली है क्योंकि ये एक बड़ा बड़ा और
महत्त्वपूर्ण फैसला है याचिकाकर्ता अपनी
जीत का जश्न जरूर मना रहे हैं इस

समय देखिए अगर याचिकाकर्ताओं की दलील की
बात करें तो तीन महत्त्वपूर्ण बिंदु थे
जिन पर दलील उनकी आधारित थी उनका पहला यही
कहना था कि इस मामले में चंदा देने वाले
के सोर्स का पता नहीं चलता और ऐसी सूरत

में सत्तारूढ़ पार्टी चाहे तो वह पता कर
सकती है कि विपक्षी पार्टी को भी के सूचना
के अधिकार के खिलाफ है जो कि एक मौलिक
अधिकार है जनता का और साथ में उन्होंने तो
ये जितने भी अमेंडमेंट्स आए थे कंपनीज

एक्ट में इनकम टैक्स एक्ट में
रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट में सबको रद्द
कर दिया है इलेक्टोरल बंड स्कीम को जो ला
रहे थे दूसरी बात उन्होंने यह भी बोला है

कि यह जो अमेंडमेंट करा गया था
कि कंपनीज जो हैं कितना भी पैसा पॉलिटिकल
पार्टीज को दे सकती हैं पहले जो
रिस्ट्रिक्शन था कि अपना एनुअल प्रॉफिट से

75 पर से ज्यादा नहीं दे सकती वह भी रद्द
कर दिया है कि यह हमारे इलेक्टोरल
डेमोक्रेसी के खिलाफ है क्योंकि यह लेवल

प्लेइंग फील्ड को हटाता है और बड़ी-बड़ी
कंपनियों को इलेक्शन इन्फ्लुएंस करने देता
है साथ में उन्होंने यह भी बोला है कि

जितने भी इलेक्टोरल बंड्स खरीदे गए और जो
जमा करे गए पॉलिटिकल पार्टियों ने जो अपने
खातों में जमा करे उसका पूरा
बेरा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जिसके पास यह
सारी इंफॉर्मेशन है व इलेक्शन कमीशन को दे

और यह पब्लिक वेबसाइट पर डाला जाए जिससे
कि जनता को पता लगे कि किसने य इलेक्टोरल
बंड खरीदे और किस पॉलिटिकल पार्टी को द न
जमा हुई थी इले ब से क्या उसका खुलासा
सरकार ने सुनवाई के दन किया नहीं नहीं

नहीं किया था ना तो उन्होंने यह बोला था
कि
हम एक इंटरम ऑर्डर था कि भाई यह तुम सारा
इंफॉर्मेशन रखो इसकी और इलेक्शन कमीशन को
सील्ड कवर में दो तोब उन्होने बोला है कि
ये सारी इंफॉर्मेशन जो है जो अभी तक सील्ड

कवर में थी वो सारी अब पब्लिक करी जाएगी
और एक पब्लिक वेबसाइट पर डाली
जाएगी
आइएगा तो वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को आप
सुन रहे थे याचिकाकर्ता भी हैं वरिष्ठ
वकील प्रशांत भूषण इस पूरे मामले के अंदर

और सुप्रीम कोर्ट से याचिकाकर्ताओं को एक
बड़ी राहत कहा जा सकता है इस पूरे मामले
के अंदर मिली है इलेक्शन कमीशन के को कहा
गया है निर्देश दिया गया है कि चुनावी
चंदे को लेकर जो इलेक्टोरल बंड से किस

पार्टी ने कितना पैसा एन कैश किया है
किसको किस दानदाता ने कितना पैसा दिया है
यह तमाम जानकारी 6 मार्च तक एसबीआई चुनाव
आयोग को देगा और उसके बाद 31 मार्च तक

चुनाव आयोग अपनी वेबसाइट के ऊपर यह
जानकारी सार्वजनिक करेगा और सीधे रुक करते
हैं मेरे सहयोगी ब्रह्म प्रकाश दुबे भी
हमारे साथ जुड़ गए हैं चुना मुख्तार
अब्बास नकवी उनके साथ हैं ब्रह्म प्रकाश

जाहिर तौर पर सरकार के लिए बीजेपी के लिए
एक बड़ा
झटका बिल्कुल बिल्कुल देखिए प्रण इस पर
बात करने के लिए हमारे साथ बीजे बपी के
सीनियर लीडर हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री

मुख्तार अब्बास नकवी जी नकवी जी सुप्रीम
कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया है इलेक्टोरल
बड पर चुनावी बड पर और कहा इस स्कीम को
रद्द कर दिया है संशोधन को भी अभद माना
गया देखिए उन्होंने जो सुप्रीम कोर्ट का

फैसला है वह क्या है मैंने पूरा देखा नहीं
है
लेकिन जो चुनाव के सुधार और इलेक्ट्रोल
रिफॉर्म से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण
काम इस दौरान हुए हैं जिसमें कि 100% जो
वोटर्स हैं उनको डी कार्ड मुहैया कराया

गया है उसके अलावा और भी तमाम चीजें हुई
है जिससे कि चुनाव पारदर्शी हो निष्पक्ष
हो भयमुक्त माहौल में हो और साथ ही साथ जो
पॉलिटिकल
ब्लैक मनी की फंडिंग तमाम तरह की थी चोरी
चुपे चोरी चोरी चुप्पे चुप्पे और छिपे

होती थी उस पर भी जो है वह अंकुश लगे और
पारदर्शी तरीके से जो राजनीतिक दल हैं वो
इलेक्टोरल बांड के जरिए जो है वो स्पष्ट
तरीके से अपनी फंडिंग ले सके यह एक

व्यवस्था की गई थी लेकिन उसमें सुप्रीम
कोर्ट ने क्या कहा है उसके क्या कारण है
उसका देखेंगे न जी आपकी सरकार ब्लैक मनी
पर लगाम लगाने के लिए और पारदर्शिता लाने
के लिए चुनावी बंड की स्कीम लाई थी लगता

है आपकी सरकार की उस स्कीम है उस स्कीम को
बड़ा झटका लगा है नहीं झटका क्यों लगा है
हम तो ईमानदारी के साथ कई इलेक्टोरल
रिफॉर्म की दिशा में कदम उठाए गए और वह
कदम बहुत सार्थक और बहुत सफल रहे हैं जहां

तक सवाल है इस पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों
कहा कैसे कहा इस पर मैं बहुत ज्यादा टिपली
नहीं करूंगा क् मैंने अी पूरा देखा नहीं
है जी नकवी जी एक सवाल कोर्ट ने ये कहा है

कि लोगों को ये जानने का हक है कि किसने
पैसा दिया और इस स्कीम एक उनके मैं लाइन
पढ़ना इस स्कीम के जरिए ब्लैक मनी पर लगाम
कसने की दलील देकर वोटरों के दलों की

फंडिंग के बारे में जानने के अधिकार से
वंचित नहीं किया जा सकता दलों की फंडिंग
के बारे में समय-समय पर चुनाव
आयोग को जो है वो पहली बात तो हर पॉलिटिकल
पार्टी को चुनाव आयोग को अपना लेखा जोखा

देना ही होता है ये
कोई ढकी छुपी बात नहीं है और ज चुनाव आयोग
उसे सार्वजनिक रूप से अपनी चाहे साइट पे
चाहे उसको अखबारों में के माध्यम से देता
ही रहता है जी तो एक अंतिम सवाल दानकता के

हितों की सुरक्षा की दुहाई देकर दुरुपयोग
की आशंका के मंदे नजर फंडिंग को पूरी तरह
से गोपनीय रखना ठीक नहीं है यह भी देखिए
मुझे उसम कोई टिप्पणी नहीं करनी है लेकिन
मैं इतना मानता हूं

कि बलक प्रकाश मुख्तार अब्बास नकवी से अगर
आप पूछ सके तो ये भी पूछेगा कि चकि यह
पूरा मामला आरटीआई से जुड़ा हुआ है यानी
सूचना के अधिकार और मतदाता से पारदर्शिता

का है क्या बीजेपी अपने दानदाताओं की सूची
वेबसाइट पर उपलब्ध कराएगी सुप्री सुप्रीम
कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन को कहा ही

है कि ये चूंकि पूरा मामला पारदर्शिता से
जुड़ा हुआ है रिजर्व बैंक जो है कह कि
फंडिंग की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है तो
इस पर आगे सरकार किस तरह से कदम उठाएगी
अगर सरकार तय करेगी सरकार बताएगी लेकिन
निश्चित तौर से जो सरकार ने बहुत ही साफ

नियत के साथ
पारदर्शी हो सके सारी व्यवस्था उस उसकी
दृष्टि से तो देखिए नकवी जी कह रहे हैं कि
आगे सरकार किस लिहाज से कदम तय करना है उस
पर विचार करेगी और सुप्रीम कोर्ट ने क्या

फैसला दिया है उस पर भी पूरा मंथन होगा और
वो ये भी कह रहे हैं कि सरकार जो चुनावी
बंड लाई थी वो पारदर्शिता के लिए लाई थी
और जो ब्लैक मनी है उस पर लगाम ल बीजेपी

अपनी दलीले हैं ब्रम प्रकाश आप बने रहे
हमारे साथ में साथ ही रविंद्र भी मेरे साथ
जुड़े हुए हैं लेकिन सबसे पहले मैं अरविंद

आपका रुख करना चाहूंगा जो महत्त्वपूर्ण
संशोधनों की बात की जा रही थी इलेक्टोरल
बॉन्ड की व्यवस्था के अंदर जो संशोधन किए
गए थे उन्हें भी असंवैधानिक करार दिया है
यानी कहा जाए कि सरकार को किन-किन पॉइंट्स

के ऊपर इलेक्टोरल बॉन्ड की इस व्यवस्था के
ऊपर रोक लगाने के साथ-साथ हिदायत सुप्रीम
कोर्ट ने दी
है जी प्रणय अपना सवाल दोह राइए जी अरविंद

मेरा सवाल इस चीज को लेकर है कि सुप्रीम
कोर्ट ने अपने ऑब्जर्वेशन के अंदर
इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था पर इस समय
रोक लगाने का तो फैसला दिया ही है लेकिन
कई जो संशोधन किए गए थे उन्हें भी

असंवैधानिक करार दिया है इसके अंदर एक
बड़ा संशोधन था खास तौर पर जो कॉर्पोरेट
फंडिंग है यानी कंपनियों के मुनाफे के 1
प्र को बढ़ाकर उसे असीमित करने का जो

प्रावधान था उन्हें खारिज किया गया
है अ बिल्कुल एक बड़ा सवाल इसमें यह भी था
कि जो कॉरपोरेट कंपनी द्वारा दिए जाने
वाले चंदे की जो अधिकतम सीमा है उसको भी

इस स्कीम के जरिए हटा लिया गया था उससे
पहले यह प्रावधान था कि जो कॉरपोरेट कंपनी
का जो शुद्ध मुनाफा है पिछले 3 साल का
उसके वार्षिक औसत का सिर्फ 75 फीदी ही
चंदा दिया जा सकता था लेकिन सरकार ने इस

स्कीम के जरिए उस बाध्यता को खत्म कर दिया
और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया
था सुप्रीम कोर्ट का यह कहना था कि
कॉरपोरेट कंपनियों का काम चंदा देना नहीं

है उनका काम बिजनेस करना है और अगर इस
तरीके से इस सीमा को हटा दिया जाता है तो
यह गलत मैसेज जाएगा और आज कोर्ट ने माना

कि यह जो सीमा को हटाया गया था यह भी गलत
था इस स्कीम को लाने के लिए जो संशोधन किए
गए वह भी गलत है और दानकता के हितों की
सुरक्षा को दुहाई दे कर के जो पॉलिटिकल
फंडिंग की ट्रांसपेरेंसी है उससे समझौता

नहीं किया जा सकता यह कोर्ट का निष्कर्ष
रहा और यही वजह है कि कोर्ट ने कहा बिलकुल
अरविंद आप बने रहिए हमारे साथ में लेकिन
मैं रविंद्र का भी रो करूंगा रविंद्र अगर

बात की जाए इलेक्टोरल ंड की व्यवस्था तो
खारिज हो गई रद्द हो गई उसके ऊपर रोक लग
गई तो ऐसे में चुनाव आने वाले हैं लो
लोकसभा के चुनाव 2024 के ऐसे में कौन सी

व्यवस्था इस समय लागू है अगर कोई व्यक्ति
दान देना चाहता है किसी राजनीतिक पार्टी
को तो इस समय कौन सी स्कीम इस समय ऑपरेशनल
मानी
जाए प्रणय जाहिर सी बात है कि यह सुप्रीम

कोर्ट को बताना चाहिए था कि हमने जो 1718
का कानून है इसे रद्द कर दिया है इस पर
रोक लगा दिया यानी इलेक्ट्रोल जो बंड के

तहत जो फंडिंग होती है उस पर पूरी तरह से
रोक लेकिन यह नहीं बताया कि अब कोई चंदा
देना चाहे तो कैसे जा सकता है अब ये सरकार
को तय करना है क्योंकि अब 1718 के पहले का
जो पोजीशन था यानी वो तो लागू रहेगा उस पर

तो किसी तरह कोई टिप्पणी नहीं की है
सुप्रीम कोर्ट ने यानी आप अगर चंदा देना
चाहे किसी पार्टी को तो कैश दे सकते हैं
चेक से दीजिए इलेक्टोरल बंड के जरिए नहीं

दे सकते जो मेरी समझ है हालांकि अरविंद
बताएंगे इस पर लेकिन जो समझ आ रही है कि
अब आप पुरानी व्यवस्था लागू हो गई क्योंकि
पुरानी व्यवस्था पर कोई रोक नहीं है चंदा

किसी को देना है तो कैश दे दीजिए उठा के
और या फिर चेक से दीजिए इस पर कोई रोक
नहीं है इलेक्ट्रोल बॉन्ड पर रोक लगाया
गया है जो सुप्रीम कोर्ट ने है तो ये जो

पारदर्शिता की बात होती थी ब्लैक मनी की
बात होती थी जो सरकार की दलित थी और या
फिर बहुत लोगों के मानना था कि कैश
बड़े-बड़े औद्योगिक घराने तो कैश अभी भी
दे सकते हैं चेक के जरिए दे सकते हैं और

जो वा लेकिन यहां सारा मामला जो था वो
पारदर्शिता का था और जो सबसे बड़ा जो
ऑब्जर्वेशन कहा जाए सुप्रीम कोर्ट के इस
फैसले के अंदर वो आरटीआई को लेकर है यानी

मतदाता का जानने का जो अधिकार है अरविंद
अगर बात की जाए कि मौजूदा व्यवस्था इस समय
मौजूदा व्यवस्था कौन सी होगी क्योंकि कैश
की जो डीलिंग है उस पर पहले ही नियंत्रण
है आरबीआई की गाइडलाइंस हैं और ऐसे में

कितना जो कैश है क्योंकि आपने पूरी
हियरिंग भी ये सुनी है ऐसे में अगर मतदाता
देना चाहता है दानदाता देना चाहता है तो
वह कितना किसी पार्टी को चंदा दे सकता है
मौजूदा व्यवस्था कौन सी

ऑपरेशनल देखिए रविंद्र जी ने बिल्कुल सही
कहा कि जो पुरा वस् है वह बहाल हो गई है
हालांकि प्रणय संकेत इस बात के मिल रहे थे
सुनवाई के दौरान कि पूरी तरीके से शायद ये
व्यवस्था खत्म नहीं होगी इलेक्टोरल बंड

स्कीम की और कोर्ट इस स्कीम की जो खामियां
है उनको दुरुस्त करने की दिशा में आगे बढ़
बढ़ेगा लेकिन कोर्ट ने माना किय स्कीम
पूरी तरीके से अवैध है असंवैधानिक है और

इसको रद्द होना चाहिए अब नए बंड जारी नहीं
होंगे इसका मतलब जो पुरानी व्यवस्था है वो
लागू हो जाएगी और उसमें दानकता के पास
विकल्प रहेगा कि वो अगर चाहे

तो कांग्रे नेता अखिलेश प्रताप सिंह हमारे
साथ जुड़ गए हैं अखिलेश जी कहा जाए
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 2024 के लोकसभा
चुनाव से ठीक पहले आया है ऐसे में कहा जाए
चुनावी पारदर्शिता और भारत के चुनावों को

अधिक लोकतांत्रिक बनाने और मतदाता को
जागरूक बनाने के लिहाज से अहम
देखिए पूरा फैसला तो माननीय सुप्रीम कोर्ट
का अभी हमने देखा नहीं है लेकिन जो आप लोग

के मीडिया में आ रहा है कि इस इलेक्टरल
बंड को सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है और
इसे संवैधानिक बताया है पारदर्शिता के
खिलाफ बताया है यह बात तो जब यह ला रहे थे
तभी कांग्रेस पार्टी ने सदन ने भी कहा कि

आप भ्रष्टाचार कम करने के बजाय े तो आप
बढ़ावा देंगे और इसमें तो बड़े लंबे
घोटाले भी हैं इस बंड में तमाम लोगों ने
कई बार मीडिया रिपोर्ट भी आई है तो यह
सरकार के जो नीति है उसम सुप्रीम कोर्ट का

आजय बहुत ब तमाचा है आप करप्शन को बढ़ावा
देते लेकिन अखिलेश जी इसका लाभ जो है वो
सभी राजनीतिक दलों ने लिया है कांग्रेस
पार्टी ने भी इलेक्टोरल बंड की व्यवस्था
का लाभ लिया है उसको एनकैश कराया है नहीं

मुझे पता था आप ये कहेंगे लेकिन न आप बड़े
नेता है सर आपको तो पता ही होगा नहीं नहीं
पता है लेकिन तीन तीन चौथाई तो अकेले
बीजेपी ने किया बीजेपी से ले आई क्यों ले
आई बीजेपी ने क्यों लाया जब ला रहे थे तभी

मना किया जा रहा था और यह इसी तरह से
प्रधानमंत्री केयर फंड है वो भी इसी तरह
का है कि हम बताएंगे नहीं सरकार से पैसे
लेंगे लेकिन उसकी कोई जानकारी नहीं देंगे
तो ये जो सरकार अखिलेश जी सुप्रीम कोर्ट

का जो आज का फैसला है उसम बहुत जोर है
लोकतंत्र की दृष्टि से बहुत ही अच्छा
डिसीजन है क्योंकि कोर्ट ने पूरे
इलेक्टोरल फंडिंग प्रोसेस में एक
ट्रांसपेरेंसी इंट्रोड्यूस कर दी है और यह

कहा है कि आप जो इस तरह से बिल्कुल
सीक्रेट फंडिंग जो एक इलेक्टोरल बॉन्ड
स्कीम चला रही थी जो सीक्रेट में फंडिंग
हो रही थी वह एक लोकतंत्र में और एक
संवैधानिक लोकतंत्र में भारत जैसे बिल्कुल

अलाउड नहीं है तो ये कोर्ट की बेसिक
रीजनिंग थी और साथ में कोर्ट ने ये भी कहा
कि जो कंपनीज एक्ट में अनलिमिटेड फंडिंग
कंपनी को पावर दे दी गई थी चाहे आप लॉस
मेकिंग हो या नहीं हो प्रॉफिट मेकिंग हो

और कितने भी आप दे सकते हो पहले क्या था
कि आप सिर्फ अगर प्रॉफिट मेकिंग हो तो 75
पर अपने प्रॉफिट तक का आप डोनेशन कर सकते
हो पॉलिटिकल पार्टी को अब वो सारी लिमिट

ये खत्म कर दी गई थी तो उसको भी कोर्ट ने
कहा है कि उसको भी स्ट्रैक डाउन कर दिया
है वो आर्बिट्रेरी कहते हुए तो अब वो जो
पहली 2017 से पहली जो पोजीशन थी कि आप 75
पर प्रॉफिट तक ही अगर प्रॉफिट मेकिंग

कंपनी होने चाहिए पहले और मैक्सिमम डोनेशन
आप पॉलिटिकल पार्टी को 75 पर ऑफ योर
प्रॉफिट तक कर सकते हो सर फैसले में जो
मतदाता हैं उनके राइट टू इंफॉर्मेशन का भी
जिक्र किया है बहुत स्ट्रांग इसपे

स्टेटमेंट दिया गया है इसको कैसे देखते हो
क्या मेन ग्राउंड्स रहे हैं इस पूरे फैसले
देखिए हमारी मेन बहस भी जो थी सब सारे
पक्षों की पिटिशन के तरफ से जो सारे वकील

और जो पक्ष थे कि यह एक राइट टू पब्लिक का
राइट टू नो है डेमोक्रेसी में इस तरह की
सीक्रेट फंडिंग नहीं हो सकती है हमारे
आर्टिकल 191 के अंदर पब्लिक का राइट टू नो
बनता है और उस राइट के परसंस में इसे
अनकंस्टीट्यूशनल करार दिया जाए और उस

कोर्ट ने मोटा मटी उस बहस को और आर्गुमेंट
को एक्सेप्ट किया है और चंदे की सीमा
निर्धारित करने का जो सरकार का फैसला था
उसको भी मनमाना करार दिया है कोर्ट ने हां
तो जो वही मैं कह रहा था जो चंदे की सीमा

जो कॉरपोरेशंस का था वो पहले एक लिमिट
होती थी 75 पर अपने अगर आप कोई कंपनी 00
प्रॉफिट बना आती है तो 75 वो डोनेट कर
सकती थी पॉलिटिकल पार्टी को एज पर द लॉ
उससे ऊपर 8 नहीं डोनेट कर सकती थी लेकिन

ये जब अमेंडमेंट आया तब उन्होंने
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के तहत इसे भी खत्म
कर दिया और कहा कि आप साढ़े के ऊपर भी जा
सकते हो आप लॉस मेकिंग भी हो तब भी डोनेट
कर सकते हो कोई फर्क नहीं पड़ता ठीक है तो

वो सारे जो चेंजेज है वो हटा दिए गए तो अब
जो पहला 2017 में पोजीशन थी कि 75 पर
प्रॉफिट मेकिंग और सिर्फ 75 पर वो सीमा
वापस आ गई है एक आखरी सवाल लोकसभा चुनाव
से ठीक पहले य ब बेहद अहम फैसला आया है

इसको कैसे देखते हैं आप क्या असर पड़ने
वाला है आगामी चुनाव देखिए मैं वो एक
राजनीतिक सवाल है और मैं उसका इसलिए जवाब
नहीं दूंगा लेकिन उसका क्या असर होगा वो

तो हम देखेंगे बट कोर्ट का ये मैटर जो है
ये 6 साल से पेंडिंग था और फाइनली कोर्ट
ने इसे सुनवाई देकर के एक टाइमली सुनवाई

अभी दी फिर नवंबर में टाइम निकाला
स्पेसिफिकली लिस्ट किया कांस्टीट्यूशन
बेंच को रेफर किया सुना और अब डिसीजन भी आ
गया है तो ये एक बहुत ही अच्छी अच्छी
प्रक्रिया हुई है और अब ये कोर्ट जो है

अभी काफी सारे संवैधानिक बेंच मैटर एक के
बाद एक जो बहुत दिनों से अटके थे उसे सुन
रही है और डिसाइड कर रही है तो मेरे हिसाब
से यह सब सारे लोगों के लिए वकीलों के लिए

और सारे लोगों के लिए बहुत ही अच्छी एक
प्रक्रिया है और इससे जो बहुत सारे डिसीजन
पेंडिंग रहे हैं बहुत सालों से वो डिसाइड
हो जाएंगे तो शदान फरासत जिन्हें आप सुन

रहे थे सीपीआईएम की ओर से पूरे मामले तो
देखिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इलेक्टोरल
बॉन्ड की स्कीम को असंवैधानिक करार देते
हुए जो कुछ कहा गया है वह आपको बता रहे
हैं स्क्रीन पर देख लीजिए इलेक्टोरल बॉन्ड

की स्कीम को असंवैधानिक करार दिया गया है
दूसरा स्कीम से वोटर्स के अधिकारों का हनन
हो रहा है यानी सूचना के जानकारी के उनके
अ अधिकार का हनन होता है यह भी सुप्रीम

कोर्ट की तरफ से कहा गया साथ ही रिश्वत का
जरिया बन सकता ही है यह व्यवस्था यह भी
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बड़ी टिप्पणी की

गई साथ ही सरकारी नीतियां प्रभावित हो
सकती हैं और साथ ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ
से कहा गया कि राजनीतिक दलों की फंडिंग की
जानकारी यह जरूरी है तो सुप्रीम कोर्ट की

तरफ से इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था जो
201617 के अंदर इंट्रोड्यूस की गई थी और
2018 से इसे लागू किया गया था उसे रद्द कर
दिया है उस पर रोक लगाई गई साथ ही एसबीआई

यानी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कहा गया है
कि तमाम दानदाता की जो जानकारी है व वो
चुनाव आयोग को दे और चुनाव आयोग 31 मार्च
तक यह जानकारी सार्वजनिक करें यानी हर

मतदाता अब यह जान पाएगा कि किस पार्टी को
किसने कितना चंदा दिया है किस कॉरपोरेट
घराने की तरफ से दिया गया है किसने कितना
चंदा दिया है इसकी जानकारी सार्वजनिक होगी
इलेक्टोरल बंड के जरिए और साथ ही यह भी

कहा गया है कि इलेक्टोरल बंड अगर किसी
पार्टी के पास है तो उसको वो वापस एसबीआई
को लौटाए और इसे एनकैश ना किया
जाए तो तत्काल प्रभाव से रद्द होगी चुना
नावी बंड की सु की जो स्कीम है उस पर
सुप्रीम रोक कहा जा रहा है इसे बड़ी

टिप्पणी रिश्वत का जरिया बन सकती है यह
चंदे की व्यवस्था तो शदान फरासत को भी
सुना अरविंद आपने अरविंद भी लगातार हमारे
साथ जुड़े हुए हैं उसके याचिकाकर्ता भी थे

कई जाहिर तौर पर वकीलों के लिए जिस तरीके
से जो थे याचिका करता उनको एक बड़ी
कामयाबी इसके अंदर मिली है लेकिन कैश
ट्रांजैक्शन और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन

पारदर्शिता चुनावी व्यवस्था के अंदर कितनी
हो कैसी हो उसके लिहाज से भी आज का फैसला
बड़ा और महत्त्वपूर्ण फैसला
अरविंद

बिल्कुल प्रणय यह बड़ा फैसला है मैं एक
जानकारी और दे दूं इसमें जोड़ दूं कि जो
शुरुआत में जो तारीख दी गई वह 31 मार्च तक
की दी गई थी लेकिन बाद में जो बेंच का

पूरा फैसला आया है उस मुताबिक 6 मार्च तक
एसबीआई को इलेक्शन कमीशन को जानकारी देनी
है कि आखिर किस राजनीतिक पार्टी को कितना
चंदा मिला है उसके बाद इलेक्शन कमीशन से

कोर्ट ने कहा है कि 13 मार्च तक यानी
तकरीबन एक हफ्ते के बाद इलेक्शन कमीशन
अपनी वेबसाइट पर डालेगा और इस बात का
खुलासा करेगा कि आखिर किस राजनीतिक पार्टी

को कितना चंदा कि कॉर्पोरेट कंपनी से मिला
है यानी 13 मार्च तक की अब डेडलाइन है
इलेक्शन कमीशन के पास अपनी वेबसाइट पर डाल
के लिए राजनीतिक पार्टी और साथ में कहा

जिन तिक पार्टियों ने अभी तक अन कश है
जिनके पास बंड पड़े हैं वो बैंक को वापस
करेंगे एसबीआई को म जाका दे रहे हैं आप
अगले 20 दिनों के अंदर एस यानी स्टेट बैंक

जान सार्वजनिक करनी होगी और साथ ही अगले
एक हफ्ते में यानी 13 मार्च तक चुनाव आयोग
को यह जानकारी सार्वजनिक करनी होगी

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