Supreme Court on Electoral Bonds : चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानिए ये बड़ा बातें - instathreads

Supreme Court on Electoral Bonds : चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानिए ये बड़ा बातें

इस वक्त की बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट से आ
रही है जहां चुनावी बंड वाले मामले पर
सुप्रीम कोर्ट में फैसला पढ़ा जा रहा है
जो सीजे आए डी वाय चंद्रचूर वो फैसला पढ़

रहे हैं आपको बता दें चुनावी बंड पर फैसला
आना शुरू हो गया
है फैसला फिलहाल पढ़ा जा रहा है पॉलिटिकल
कब बा हम सीधे आपको लेकर चलते हैं मेरे

साथ मेरे सहयोगी अंकित गुप्ता इस वक्त
मौजूद है जरा जानते हैं अंकित गुप्ता से
अभी तक क्या बड़ी बातें जो फैसला पढ़ा जा
रहा है उसमें सामने आई है अंकित

रोमाना वैसे तो यह संविधान पीठ का फैसला
है लेकिन एक चीज साफ कर दी गई है यह फैसला
एक मत वाला है यानी कि इसमें जो मतभेद
नहीं है एक फैसला आ रहा है और फैसले में
जो है दो मुख्य बिंदु है जिसका जो है

मुख्य न्यायाधीश ने जिक्र किया है फैसला
पढ़ते हुए उन्होंने कहा है पहली चीज कि
क्या जो है यह जो सूचना का अधिकार है उसके
तहत ये जो पॉलिटिकल पार्टीज को फंडिंग

होती है वो आती है या नहीं आती पहला इशू
यह है और दूसरा यह है कि क्या जो चंद्रा
मिलता है वो अनियंत्रित होना चाहिए यानी
कि उसका कोई हिसाब किताब होना ही नहीं

चाहिए कि किसी भी पार्टी को कितना भी चंदा
मिल जाए और किसी को कुछ भी ना मिले इस
तरीके के जो सवाल उठाए गए थे उस पर जो है
सुप्रीम कोर्ट की एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी

सामने आई है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि
मतदाताओं को वो बातें जानने का अधिकार है
जो उनके मतदान पर असर डालती है क्योंकि
चुनी हुई सरकार या उनके वो जिस पार्टी को

मतदान कर रहे हैं उसको कितना पैसा मिल रहा
है कैसे मिल रहा है यह एक मतदाता को जानने
का अधिकार है एक और महत्त्वपूर्ण टिप्पणी
सामने आई है आर्थिक असमानता के चलते एक आम

आदमी राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित
नहीं कर सकता नीतियों को प्रभावित नहीं कर
सकता लेकिन जो लोग बड़े पैमाने पर चंदा

देते हैं मुमकिन है कि वो जो नीतियां बनाई
जाती हैं उस पर भी असर डाले यह सुप्रीम
कोर्ट की एक बहुत महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है
सरकार ने इस योजना के काले धन पर रोक

लगाने की दलील दी थी सरकार ने जब दलील दी
थी तो यह कहा गया था कि इस तरीके से जो
इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए गए हैं उससे
काले धन पर रोक लगाने में मदद मिलेगी
लेकिन इस दलील से लोगों के जानने के

अधिकार को पर असर नहीं डाला जा सकता यानी
कि इसका मतलब यह नहीं है कि आप गोपनीय
तरीके से कुछ भी करते रहे इस यह कहते हुए
कि काले धन पर रोक लगा रहे हैं लोगों को

यह जानने का अधिकार है कि वह जिस पार्टी
को मतदान कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं
लेकिन वह चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है

उसको पैसा कहां से मिल रहा है इलेक्टोरल
बॉन्ड अनुच्छेद 19a के तहत हासिल करने का
मौलिक अधिकार का हनन करती है यानी कि
सुप्रीम कोर्ट जो अभी पहला बिंदु है ना कि

राइट टू इंफॉर्मेशन वह जानकारी हासिल करना
जो एक मतदाता का अधिकार है जिस पार्टी को
वो मतदान कर रहा है उसका हनन है ये एक
बहुत बड़ी खबर है सुप्रीम कोर्ट से अब तक

जो फैसला पढ़ा गया है क्योंकि सुप्रीम
कोर्ट ने साफ तौर पर य मान लिया है कि जो
गोपनी चंदा दिया जाता है वो ठीक तरीका
नहीं है आपको ब्लैक मनी पर रोक लगानी है

काले धन पर रोक लगानी है ठीक है लेकिन एक
कोई गुपचुप तरीके से चंदा दे देता है उसके
बारे में कोई जानकारी नहीं सामने आती है
यह भी ठीक नहीं है और यह क्यों

महत्त्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
के दौरान लगातार जो लोग इसका विरोध कर रहे
थे यानी कि इलेक्टोरल बॉन्ड के ऊपर सवाल
उठा रहे थे उनका यही कहना था आज की तारीख

में हुआ क्या है कि जो 70 रूड पार्टी हैं
उनके पास में 65 से 70 फ यानी कि करीबन 2
तिहाई चंदा पहुंच रहा है जबकि जो बाकी
राजनीतिक दल हैं उनके पास में 30 से 32

फीदी चंदा पहुंच रहा है और इस लिहाज से यह
जो है बहुत सारी चीजों को इशारा करता है
बहुत तरह के सवाल खड़े करता है सहयोगी
निपुण सैगल ने एक और अपडेट भेज दिया है

हालांकि हर चंदा सरकारी नीतियों को
प्रभावित करने के लिए नहीं होता
जिस बात का मैं जिक्र कर रहा था ना कि
नीतियों को प्रभावित करना यह एक बड़ी दलील

दी गई थी तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है हर
चंदा सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के
लिए नहीं होता राजनीतिक लगाव के चलते भी
लोग चंदा देते हैं इसको सार्वजनिक करना

सही नहीं होगा यह सुप्रीम कोर्ट अब अपनी
बात को आगे बढ़ा रहा है मतलब अंकित गुप्ता
जो महत्वपूर्ण बात सामने निकल कर आ रही है
कि चुनावी बंड वाला मामला विवादों में इसी

वजह से आया था कि साहब कहीं ना कहीं
पारदर्शिता की इसमें कमी है जिसको लेकर
मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच पचा पिछले
साल नवंबर में इस मामले में सुनवाई पूरी

हुई और अब आज इस मामले में फैसला पढ़ा जा
रहा है और जो सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कहा
गया है सरकार की तरफ से जो गोपनीयता का
हवाला दिया गया था कि साहब सूचना के

अधिकार के तहत इसको लाया जाना चाहिए ये
अपने आप में टिप्पणी बेहद महत्त्वपूर्ण हो
जाती है अंकित इस पूरे मामले
में बेहद बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इशारा कर रहा है कि
यहां पर महत्त्वपूर्ण यह है कि जो एक
मतदाता है उसको भी जानने का अधिकार है ना
कि किस पार्टी को किसने जो कितना बड़ा
चंदा दिया और खास तौर पर जो कॉर्पोरेट

फंडिंग की बात होती है वो एक बहुत
महत्त्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट की इसी
सिलसिले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने
आई है सहयोगी निपुण सैकल के हवाले से ये

जानकारी निकल के सामने आई है कि इसलिए
छोटे चंदे की जानकारी सार्वजनिक करना गलत
होगा यानी कि जो छोटे-छोटे चंदे दिए जाते

हैं किसी को कोई पार्टी पसंद है उसने चंदा
दे दिया समझ में आता है उसकी जानकारी
सार्जी करना गलत होगा किसी व्यक्ति का
राजनीतिक झुकाव निष्ठा के अधिकार के तहत

आता है यानी कि अगर जो है कोई कोई व्यक्ति
किसी एक पर्टिकुलर पार्टी को सपोर्ट कर
रहा है वो समझ में आता है लेकिन इसका मतलब

क्या अब तक जो फैसला आया है उसका
इंटरप्रिटेशन तो अब तक का ये निकल रहा है
कि जो बड़े जो राजनीतिक जो फंडिंग होती है

बड़ी इंडस्ट्रीज करते हैं कॉरपोरेट्स करते
हैं और शेल कंपनीज इनका बार-बार जिक्र
किया गया था वो जो फंडिंग होती है संभवत
सुप्रीम कोर्ट उसको लेकर के कुछ सोच रही

है अब तक के फैसले से ऐसा लग रहा है सारा
का सारा सवाल तो अंकित गुप्ता उस छोटे
चंदे को लेकर ही था जिसको लेकर सुप्रीम
कोर्ट की तरफ से जो टिप्पणी की गई है तो
वो तो ऐसा लग रहा है कि ये कहीं ना कहीं

एक राहत वाली दिशा की ओर बढ़ता हुआ फैसला
नजर आ रहा है सुप्रीम कोर्ट का सरकार के
लिए क्योंकि सारा का सारा जो दारोमदार था
वो तो चंदे के छोटी राशि को लेकर ही था ना

कि वो छोटी-छोटी राशि में इस तरीके से
भुगतान किया जाता है जिसका कोई डाटा नहीं
होता है जिसका किस किसी तरीके का कोई
हिसाब किताब सामने नहीं आ पाता और वो
पारदर्शिता खत्म हो जाती है

अंकित निश्चित तौर पर देखिए यहां पर दो
पहलू थे पहला पहलू यह था कि जो छोटा-छोटा
चंदा आता और दूसरा पहलू ये था कि जो बड़
बड़े कॉरपोरेट घराने हैं या शेल कंपनीज

जिनका बार-बार जिक्र किया गया था सुनवाई
के दौरान वो जो फंडिंग करती हैं क्योंकि
उनका भी कोई हिसाब नहीं होता हालांकि
इसमें जो है पेच क्या आता है पेच ये आता

है कि जो बड़े जो कॉरपोरेट हाउसेस होते
हैं या जो कंपनीज होती हैं वो भी ऐसा नहीं
है कि करोड़ों रुपए एक साथ फंडिंग कर दी
वो भी छोटे-छोटे हिस्सों में करती हैं तो

ऐसे में उस उस प्रक्रिया के तहत वो बच
निकलती हैं तो यहां पर ये देखना दिलचस्प
होगा कि सुप्रीम कोर्ट इसको कैसे देखता है
ये निपुण साइकल के हवाले से एक और खबर

सामने आई है सुप्रीम कोर्ट के फैसले से
इनकम टैक्स एक्ट में 2017 में किया गया एक
बड़ा बदलाव यह जो है बड़े चंदे को भी
गोपनी रखना यह असंवैधानिक है बहुत बड़ा यह
टिप्पणी बहुत बड़ा फैसले का यह पॉइंट है

जिसमें यह कहा गया है कि जो बड़े चंदे आते
हैं उसको भी गोपनी रखना वो संवैधानिक है
यह बात कर रही है सुप्रीम कोर्ट
जनप्रतिनिधित्व कानून में 2017 में हुआ

बदलाव भी अ असंवैधानिक है यानी कि साफ तौर
पर जिस बात का अभी हम लोग चर्चा कर रहे थे
ना कि जो बड़ी फंडिंग आती है राजनीतिक
दलों के पास में उसके बारे में भी कोई

जानकारी सामने नहीं आती है तो सुप्रीम
कोर्ट ये कह रही है कि वो गलत है यानी कि
छोटे-छोटे जो फंड आते रहते हैं ठीक है
लेकिन जो बड़ी-बड़ी जो है कंपनीज जो

फंडिंग करती हैं कॉर्पोरेट जो हाउसेस
फंडिंग करते हैं राजनीतिक दलों को वो
संवैधानिक बताया जा रहा है कंपनी एक्ट में
हुआ बदलाव भी असंवैधानिक ये लीजिए सुप्रीम

कोर्ट ने ये जो बदलाव किए गए थे फिर चाहे
वो इनकम टैक्स एक्ट में हो कंपनीज एक्ट
में हो उसको अनकंस्टीट्यूशनल यानी कि
असंवैधानिक करार दिया है इसका मतलब क्या

है रोमाना अगर हम एक आसान शब्दों में
समझाना चाहे अपने दर्शकों को उदाहरण के
तौर पर जो है एक कोई व्यक्ति है जो एक एक
पार्टी को 000 का चंदा देता है 2000 का
देता

है पहले ये बताइए कि ये जो बड़ी बातें अब
कह दी गई है सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
जिसमें सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कहा जा
रहा है कि साहब बड़े चंदे को गोपनीय रखना

असंवैधानिक ये सुप्रीम कोर्ट कह रहा है और
कंपनी एक्ट और इनकम टैक्स एक्ट में इसी के
तहत जो बदलाव किए गए वो गलत असंवैधानिक ये
जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो क्या यह एक

तरीके से पूरा का पूरा फैसला आ चुका
है जी नहीं अभी फैसला पढ़ा जा रहा है यह
फैसले का एक हिस्सा है वो पहला हिस्सा
जिसमें यह कहा गया है कि क्या यह निष्ठ का

अधिकार यह कह देना या फिर जो है राइट टू
इंफॉर्मेशन के तहत य आता है या नहीं आता
है यह फैसले का पहला पार्ट है और यह फैसला
अभी पहला जो हिस्सा है उस पर दिया जा रहा
है लेनदेन के उद्देश्य से दिए गए चंदे की

जानकारी भी इन संशोधनों के चलते छुपती है
यानी कि साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट का अब
तक का क्या मानना है सुप्रीम कोर्ट का अब
तक का ये मानना है कि जो बड़े कॉर्पोरेट
हाउसेस जो करोड़ों रुपए फंडिंग करते हैं

राजनीतिक दलों को उनके बारे में जानकारी
सामने नहीं आना ये सही नहीं है और उसके
लिए जो संशोधन किया गया था फिर चाहे वो
इनकम टैक्स एक्ट हो या कंपनीज एक्ट और

उसमें क्या कहा गया था कि जानकारी गोपनी
रखी जाएगी बड़ी-बड़ी कंपनीज भी अगर जो है
फंडिंग करती हैं कॉर्पोरेट हाउसेस फंडिंग
करते हैं राजनीतिक दलों को तो वो जानकारी

गोपनी रखी जाएगी सुप्रीम कोर्ट ने उसको
असंवैधानिक करार दिया है ब चंदा गोपनीय
रखना अवैधानिक यह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
कहा गया है यह बहुत बड़ी खबर है इलेक्टोरल

बंड को लेकर उसमें पारदर्शिता में कमी को
लेकर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था आप
जानते हैं देश में इलेक्टोरल बॉन्ड की जो
व्यवस्था है 2018 से लागू की गई है और ऐसे

में पिछले साल नवंबर में इस पूरे मामले
में सुनवाई पूरी हुई और अब आज सुप्रीम
कोर्ट की तरफ से फैसला सुनाया जा रहा है
बड़ी बात जो अब तक सामने निकल कर आ रही है

चुनावी बंड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
बड़े चंदे को गोपनीय रखना असंवैधानिक इसके
लिए जो कंपनी एक्ट में बदलाव किए गए जो
आईटी एक्ट में संशोधन किए गए वो
असंवैधानिक मतलब अभी तक का यह फैसला और

फैसले के यह हिस्से अंकित गुप्ता जो हम और
आप बता रहे हैं दर्शकों को यह तो सरकार के
लिए झटका माना
जाएगा निश्चित तौर पर झटका माना जाएगा

क्योंकि देखिए सरकार की तरफ से लगातार यही
दलील दी जा रही थी कि अगर हम इसको गोपनी
नहीं रखते हैं तो मुमकिन है कि अलग-अलग
राजनीतिक दल जो है द्वेष की भावना से ऐसी

कंपनीज के खिलाफ ऐसे लोगों के खिलाफ अपनी
जो बदले की भावना से जो है कारवाई करें
अभी नहीं तो बाद में लेकिन सुप्रीम कोर्ट
ने साफ तौर पर कहा है कि जो बड़ी फंडिंग

होती है फिर मैं एक उदाहरण के तौर पर अगर
हम अपने दर्शकों को समझा सके 30 सेकंड में
कि एक उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति 000
चंदा देता है तो वो इस दारे में नहीं आ

रहा है लेकिन वहीं अगर कोई एक व्यक्ति 100
करोड़ चंदा दे रहा है हजार करोड़ चंदा दे
रहा है तो वो इस दायरे में आ रहा है और
सुप्रीम कोर्ट का साफ तौर पर हमें मानना

है कि ऐसे लोगों के बारे में जो 100 करोड़
हजार करोड़ या 5000 करोड़ चंदा दे रहे हैं
उनके बारे में जानकारी साजिक होना जरूरी
है क्यों जरूरी है यह भी बता देता हूं

पहले एक जानकारी निपुण सैगल ने दी है
कंपनी एक्ट की धारा 182 में बदलाव
कॉर्पोरेट कंपनियों को राजनीतिक राजनीति
में दखल की अनुमति देता है ये लीजिए

सुप्रीम कोर्ट ने उसको क्लेरिफाई भी कर
दिया है कि ये जो कंपनी एक्ट में बदलाव
किया गया है उसका मतलब क्या है उसका मतलब
यह है कि अगर कोई कंपनी जो है हजार करोड़

र का चंदा दे रही है तो मुमकिन है कि जो
सरकारी जो नीतियां बने वो ऐसी कंपनियों को
फायदा पहुंचाने के लिए भी बन जाए और यह एक
तरीके से बहुत बड़ा जो है सवाल था सुप्रीम
कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बेरोकटोक और

बेहिसाब चंदे की अनुमति देता है सुप्रीम
कोर्ट साफ तौर पर यही कह रहा है कि ये जो
बड़ी फंडिंग होती है क्योंकि ऐसा नहीं है
रोमाना जितना हम लोग भी देख रहे हैं सालों

से राजनीतिक दलों को उनके पास जो
छोटा-छोटा फंड आता है वो तो है ही लेकिन
सवाल वहां खड़े होते हैं जहां पर एक साथ
हजारों करोड़ का चंदा आता है बड़े-बड़े
कॉर्पोरेट हाउसेस से आता है और कहा यह
जाता है कि मुमकिन है कि वो जो सरकार की

नीतियां बन रही हो उसको भी इन्फ्लुएंस
करें अपने हिसाब से क्योंकि अगर किसी को
जो है इतना बड़ा कोई फायदा मिला है तो
मुमकिन है दूसरी तरफ से भी उसको जो है

फायदा देने की कोशिश की जाए इस तरीके के
आरोप लगते रहे हैं यह जानने के यह जानने
के अधिकार का हनन करती है यानी कि सुप्रीम
कोर्ट साफ तौर पर कह रही है इलेक्टोरल

बॉन्ड योजना असंवैधानिक है सहयोगी निपुण
साइकल के हवाले से खबर इलेक्टोरल बंड
योजना असंवैधानिक है यह जानने के अधिकार
का हनन करती

है दर्शको को दहरा देते हैं सुप्रीम कोर्ट
की तरफ से बड़ा फैसला आ गया है इलेक्टोरल
बंड को लेकर इलेक्टोरल बंड योजना
संवैधानिक ये इस वक्त की बड़ी खबर सुप्रीम
कोर्ट की तरफ से फैसला पढ़ा जा रहा है

इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का
बड़ा फैसला आया है चुनावी बॉन्ड स्कीम
असंवैधानिक है यह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
कह दिया गया है चुनावी बॉन्ड स्कीम जिसके

तहत राजनीतिक दलों को चंदा मिल रहा था और
बार-बार ये खबरें आ रही थी किस तरीके से
इस स्कीम के जरिए सीधा फायदा सत्ताधारी
पार्टियों को पहुंच रहा था और ऐसे में यह

मामला सुप्रीम कोर्ट जब पहुंचा इस मामले
में पारदर्शिता की कमी को लेकर सुनवाई
पूरी होने के बाद आज इस मामले में सुप्रीम
कोर्ट का बड़ा फैसला चुनावी बॉन्ड स्कीम

असंवैधानिक इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम
असंवैधानिक है सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा
फैसला सुनाया है बड़े चंदे को गोपनीय रखना
असंवैधानिक यह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
कहा गया कंपनी एक्ट में बदलाव असंवैधानिक

ये सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कहा गया इनकम
टैक्स एक्ट में जो बदलाव किया गया इस बड़े
चंदे को गोपनीय बनाए रखने के लिए वो भी
असंवैधानिक मतलब संविधान के खिलाफ है

चुनावी बॉन्ड स्कीम इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम
संविधान के खिलाफ असंवैधानिक सुप्रीम
कोर्ट ने लगाई मोहर अंकित
गुप्ता बिल्कुल सुप्रीम कोर्ट ने मोहर लगा
दी और इसी में एक और अपडेट आ गया है कि जो

बैंक यानी कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
इलेक्टोरल बंड को जारी करती थी उस पर अभी
से रोक लग जाएगी यानी कि इलेक्टोरल ब जारी
होना बंद हो जाएंगे यह इसी में एक और बड़ा

अपडेट है और इतना ही नहीं स्टेट बैंक ऑफ
इंडिया को बताना होगा कि वह जो उन्होंने
टोल इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए थे उसकी
डिटेल्स क्या है यानी कि किस-किस पॉलिटिकल

पार्टीज के नाम पर ये जारी हुए थे यानी कि
साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट से यह जो राज जो
केंद्र सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड की स्कीम
लेकर के आई थी उस पर एक बड़ा झटका है

केंद्र सरकार को क्योंकि एक तो असंवैधानिक
करार दिया है दूसरा यह कह दिया है कि आज
से अभी से इलेक्ट रल बॉन्ड जारी होना बंद
हो जाएंगे और यह जो केंद्र सरकार की जो
लगातार दलील थी यह कहते हुए कि इससे

पारदर्शिता आएगी काले धन पर रोक लगेगी
सुप्रीम कोर्ट ने उसको दरकिनार किया और
इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया

है जी ये बड़ी खबर इस वक्त की सरकार की
तमाम दलीलें खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट
ने इलेक्टोरल बॉन्ड चुनावी बंड को
असंवैधानिक करार दिया है सुप्रीम कोर्ट की

तरफ से इलेक्टोरल बॉन्ड चुनावी बंड पर आज
से अभी से रोक लगाने का आदेश सुना दिया
गया है चुनावी बंड पर सुप्रीम कोर्ट ने
फौरन तत्काल रोक लगाने का आदेश दिया

चुनावी बंड स्कीम असंवैधानिक सुप्रीम
कोर्ट ने बड़े चंदे को गोपनीय रखना
असंवैधानिक माना है एक बार फिर से जल्दी
से लेकर चलते हैं आपको अंकित गुप्ता के
पास अपडेट के लिए

अंकित जी वही जो सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई
को कहा है निपुण सकल के हवाले से और
ज्यादा स्पष्टता मिल गई है सुप्रीम कोर्ट
के फैसले की कि एसबीआई सभी पार्टी को मिले

चंदे की जानकारी 6 मार्च तक चुनाव आयोग को
दे यानी कि किस पार्टी को कितना चंदा मिला
है उस बारे में जानकारी चुनाव आयोग को दे
चुनाव आयोग 13 मार्च तक ये जानकारी अपनी
वेबसाइट पर प्रकाशित करें यानी कि 6 मार्च

तक चुनाव आयोग को जानकारी दी जाए एसबीआई
की तरफ से और चुनाव आयोग 13 मार्च तक वो
जानकारी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करें अ
और क्टी दीजिए अंकित और क्लेरिटी दीजिए आप
बता रहे हैं कि 6 मार्च तक एसबीआई सारी

जानकारी चुनाव आयोग को दे 13 मार्च तक
चुनाव आयोग यह सारी जानकारी चुनावी बंड को
लेकर अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करें और
एगजैक्टली यह जानकारी क्या मतलब किस

पार्टी को किससे कितना चंदा मिला उनके नाम
सार्वजनिक करने की बात की जा रही है किस
सोर्स से कितना
चंदा जी अभी यह जरूर कहा गया है कि किस
सोर से कितना चंदा मिला है वो सार्वजनिक

किया जाए हालांकि यहां पर एक पेच ये है कि
जो भी जो है इस तरीके से इलेक्टोरल बॉन्ड
जारी करता था उसको जो अपना नाम रिवील करना
जरूरी नहीं होता था तो अब ऐसे में सुप्रीम

कोर्ट के इस आदेश के बाद में एसबीआई किस
तरह से क्या जानकारी है जो चुना चुनाव
आयोग को दे देता है देखना दिलचस्प होगा
लेकिन एक और बड़ा अपडेट जो इस फैसले से

जुड़ा हुआ है वो यह है कि अभी तक जो बॉन्ड
कैश नहीं हुए हैं राजनीतिक दल उसे बैंक को
वापस करें ये लीजिए सुप्रीम कोर्ट ने ये
भी कह दिया है कि जो बॉन्ड जारी हो चुके

हैं लेकिन कैश नहीं हुए हैं उसको राजनीतिक
दल बैंक को वापस करें इसका मतलब यह फैसला
अभी से तो लागू हुआ है लेकिन इसका असर
थोड़े और पहले से देखना होगा क्योंकि जिन
लोगों ने मान लीजिए कि कुछ दिलोग पहले

इलेक्टोरल बॉन्ड जारी या इशू करवाए थे
राजनीतिक दलों के लिए लेकिन वो कैश नहीं
हुए हैं वो भी बैंक को वापस हो जाएंगे तो
निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत
बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता

लाने के लिए ये फैसला दिया है लगातार
सरकार की तरफ से कहा जा रहा था कि काले धन
पर रोक लगाने के लिए हम ये लेल ब आए होगा
अ गुप्ता मैं लौटू आपके पास देखिए चुनावी

बंड पर रोक जो सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
लगाई गई है जो आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया
है उसमें ना सिर्फ नए चुनावी बंड अब से
अभी से जारी होना बंद बल्कि जो चुनावी बड
जारी हुए हुए हैं पहले से से वो भी कैश

नहीं होंगे ये इस वक्त की बड़ी खबर है
चुनावी बॉन्ड स्कीम असंवैधानिक सुप्रीम
कोर्ट ने करर दी है इलेक्टोरल बॉन्ड पर
सुप्रीम कोर्ट ने फौरन रोक लगा दी है इतना

ही नहीं जो इलेक्टोरल बॉन्ड कैश नहीं हुए
हैं वो भी अब कैश नहीं होंगे
अंकित बिल्कुल देखिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ
तौर पर कह दिया है कि अनकंस्टीट्यूशनल है
यानी कि असंवैधानिक है सरकार भले ही 2017

में जोब स्कीम लेक के आई थी जब ये 2018 से
लागू हुई थी कहा ये गया था इससे
पारदर्शिता आएगी लेकिन जो दूसरा जो पक्ष
है यानी कि जो विरोधी पक्ष है वो सवाल ये

खड़े कर रहा था कि जो टोटल चंदा आ रहा है
उसमें कहां से चंदा आ रहा है कुछ पता नहीं
है और उस चंदे में से में से भी 2 तिहाई
से ज्यादा चंदा सिर्फ जो है जो चुनी हुई
सरकार है या जो चुनी हुई पार्टियां हैं

उसके पास जा रहा है और इसी वजह से इसके
ऊपर सवाल उठ रहे थे इतना ही नहीं कहा ये
भी जा रहा था कि जो शेल कंपनीज हैं उसके
जरिए भी जो ये चंदा आ रहा है और किसी के
बारे में कोई जानकारी नहीं है तीसरी

महत्त्वपूर्ण चीज ये कही गई थी थी कि
क्योंकि इतना बड़ा चंदा जैसे सरकार से
जुड़ी हुई जो पार्टीज है उनके पास सिटीजन
सो इट शुड बी ट्रांसपेरेंट एंड द मनी

व्हाट अमाउंट ऑफ मनी एंड व्हिच पीपल गिव
इट इट शुड बी डिस्क्लोज्ड टू एवरी पीपल
व्हाट आर द व्ट आर द रूल्स एंड रेगुलेशन
टू
द सी इन 2018 व्हेन दिस इलेक्टोरल बंड

स्कीम प्रपोज्ड इन दिस स्कीम इट शुड बी
सेड के यू कैन बाय बंड फ्रॉम द बैंक एंड
यू कैन गिव द मनी
टू द पार्टी वच यू वांट टू गिव एंड योर
नेम इ इ डजन डिस्क्लोज वच इज अ व् इज

अगेंस्ट राइट टू इंफॉर्मेशन एंड इट शुड बी
डिस्क्लोज सो आई फाइल अ पिटीशन इन सुप्रीम
कोर्ट इन व्हिच आई सेड कि इट शुड बी
ट्रांसपेरेंट एंड दे शुड गिव द नेम एंड

अमाउंट हु डोनेट द अमाउंट टू द
पार्टी इस वक्त की बहुत बड़ी खबर है ये
सरकार को बड़ा झटका लगा है इलेक्टोरल
बॉन्ड स्कीम जो सरकार लेकर आई थी
पारदर्शिता का हवाला देकर उसी को सुप्रीम

कोर्ट ने असंवैधानिक करार दे दिया है और
फौरन चुनावी बंड पर रोक लगा दिए ना सिर्फ
नए चुनावी बंड जारी करने पर रोक बल्कि जो
बंड अभी तक कैश नहीं हुए हैं उन पर भी

सरकार उन पर भी सुप्रीम कोर्ट की तरफ से
रोक लगा दी गई है निपुण सेकल हमारे सहयोगी
अब हमारे साथ जुड़ गए निपुण सैगल खुद
कोर्ट रूम के भीतर थे जब यह फैसला पढ़ा जा

रहा था डिटेल्स निपुण सैगल दर्शकों को अब
बताइए बिल्कुल देखिए रोमाना सबसे बड़ी बात
जो सुप्रीम कोर्ट ने क है कि यह बात सही
है कि गोपनीयता अगर आप किसी पार्टी को

पसंद करती हैं उसको चंदा देती हैं तो यह
गोपनीयता रहनी चाहिए कि आपका रुझान क्या
है किसी को पता ना चले लेकिन यह बात बड़े
चंदे पर लागू नहीं होती है जो 00 से ऊपर
का चंदा है या जो बड़ी-बड़ी कंपनियां

बेहिसाब चंदा दे रही है करोड़ों का उसको
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि राजनीतिक झुकाव
के चलते दे रहे हैं कहीं ना कहीं वह
सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में लाने का

प्रयास होता है उनका और लोकतंत्र में
लोगों को यह जानना जरूरी है जिस तरह से
पहले यह अधिकार दिए गए हैं कि जो
उम्मीदवार है उसके अपराधिक रिकॉर्ड के

बारे में आप जान सक उसके पास कितने पैसे
हैं उसके बारे में आप जान सके उसकी डिग्री
के बारे में जान सके उसी तरह से मतदाता को
जानने का अधिकार है कि कौन किस पार्टी को

कितना चंदा दे रहा है छोटा चंदा अगर कोई
छोटा दुकानदार है कोई छात्र है किसी
पार्टी को झुकाव के चलते देता उसमें कोई
समस्या नहीं है लेकिन करोड़ों का चंदा

दिया जा रहा है और इलेक्टोरल बंड योजना
उसको गोपनीय बनाए रखने की व्यवस्था करती
है यह गलत है सूचना का अधिकार है लोगों को
यह मौलिक अधिकार है और उस अधिकार का हनन
हम होने नहीं दे सकते हैं सरकार कहती है

कि काले धन पर लगाम लगाने के लिए योजना
लाई गई तो काले धन पर लगाम लगाने के लिए
कुछ और तरीके आप अपना ले यह तरीका जहां पर
लोगों को जानने का जो हक है उसका हनन किया
जा रहा है उसकी अनुमति नहीं दी जाएगी यह

योजना असंवैधानिक है और अब एक पैसा भी
इलेक्टोरल बंड के जरिए राजनीतिक पार्टियों
को नहीं मिलेगा यानी किसी को बॉन्ड मिला
हुआ है और वो अ उसको कैश नहीं करा पाया है

तो उसे बैंक में जाकर वापस करना पड़ेगा और
बैंक में अगर वह कैश कराने जाएगा तो बैंक
उसको अब कोई पैसा नहीं देगा 6 मार्च तक
चुनाव आयोग को स्टेट बैंक बताएगा कि किस

पार्टी को कितना चंदा मिला है और उसके एक
सप्ताह के भीतर यानी 13 मार्च तक चुनाव
आयोग अपनी वेबसाइट पर सारी जानकारी डाल
देगा कि किस कंपनी ने किस पार्टी को कितने

पैसे दिए अब तक इलेक्टोरल बंड के जरिए तो
तो मतलब जितना भी चंदा जिसने जिस पार्टी
को दिया है वो सारी जानकारी चुनाव आयोग की
वेबसाइट पर 13 मार्च तक आ जाएगी या इसके
लिए 20000 से ज्यादा का चंदा जो दिया गया

है सिर्फ उसी की जानकारी सार्वजनिक की
जाएगी इसको लेकर कोई जानकारी
रिपोर्ट रोमाना मैं आपको यह बता रहा था कि
जो चंदा इलेक्टोरल बंड के जरिए दिया गया

20000 से नीचे का चंदा इलेक्टोरल बंड से
नहीं दिया जाता है वह आप दे सकते हैं किसी
पार्टी को जाकर क्योंकि वो आप आप मिडिल
क्लास के या एक छोटे व्यक्ति हैं गांव के
रहने वाले और किसी पार्टी को आप

₹5000000 चंदा देते हैं या ₹1 चंदा देते
हैं व जानकारी हमेशा गोपनीय रहेगी आप उस
पार्टी के कार्यकर्ता हो सकते हैं समर्थक
हो सकते हैं लेकिन आप बड़ी कंपनी है और

करोड़ों का चंदा दे रहे हैं तो वह चंदा आप
इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद कर ही 2018 से लेकर
अब तक दे रहे थे यानी आप बैंक में जाते थे
बॉन्ड खरीदते थे स्टेट बैंक से और वह जाकर

अपनी पसंदीदा पार्टी को या जिस पार्टी से
आपको फायदा मिल सकता है उसको दे देते थे
वो जानकारी अब नहीं छुप सकेगी गोपनीयता की
जो बात सरकार कह रही थी सुप्रीम कोर्ट ने
उसे नहीं माना है और इलेक्टोरल बंड के

जरिए 2018 से लेकर अब तक जिस पार्टी को
जितना चंदा जिसने दिया वायलेट द लेवल
प्लेइंग फील्ड इन ए डेमोक्रेसी

सो द पिटीशन फाइड बाय अस हैव बीन
कंप्रिहेंसिवली अलाउड बाय द सुप्रीम
कोर्ट सो दे हैव आल्सो डायरेक्टेड द स्टेट
बैंक ऑफ इंडिया टू फर्निश कंप्लीट

इंफॉर्मेशन अबाउट हु परचेज द बंड्स हु एन
कैश द बंड्स एंड ऑल दिस इंफॉर्मेशन विल
हैव टू बी सबमिटेड टू द इलेक्शन कमीशन हु
विल हैव टू डिस्प्ले इट ऑन अ पब्लिक

वेबसाइट सो दैट द पीपल कम टू नो हु परचेस
द बंड्स एंड हु कंट्रीब्यूटेड बाय वे ऑफ
इलेक्टोरल बंड्स टू दिस टू विच पॉलिटिकल
पार्टी अमाउंट स्पेसिफाइड बाय द

गवर्नमेंट नहीं अब हिंदी में एक बार बोल
देते हैं देखिए आज एक बहुत ही
महत्त्वपूर्ण फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया
जिसका कि बहुत लंबा असर होगा हमारी पूरी
चुनावी लोकतंत्र के ऊपर उन्होंने यह

इलेक्टोरल बंड की स्कीम कंप्रिहेंसिवली
स्ट्राइक डाउन कर दी है यह कहते हुए कि
इसमें जो
एनोनिमस एलिमेंट इन्होंने लाया कि भाई
किसी को पता नहीं लगे कि भई इलेक्टोरल बंड

किसने खरीदे और किसको दि दिए यह बिल्कुल
हमारे जनता के सूचना के अधिकार के खिलाफ
है जो कि एक मौलिक अधिकार है जनता का और
साथ में उन्होंने तो ये जितने भी
अमेंडमेंट्स आए थे कंपनीज एक्ट में इनकम

टैक्स एक्ट में रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल
एक्ट में सबको रद्द कर दिया है इलेक्टोरल
बंड स्कीम को जो ला रहे थे दूसरी बात

उन्होंने यह भी बोला है कि यह जो
अमेंडमेंट करा गया था कि
कंपनीज जो हैं कितना भी पैसा पॉलिटिकल
पार्टीज को दे सकती हैं पहले जो

रिस्ट्रिक्शन था कि अपना एनुअल प्रॉफिट से
75 पर से ज्यादा नहीं दे सकती वह भी रद्द
कर दिया है कि यह हमारे इलेक्टोरल
डेमोक्रेसी के खिलाफ है क्योंकि यह लेवल

प्लेइंग फील्ड को हटाता है और बड़ी-बड़ी
कंपनियों को इलेक्शन इन्फ्लुएंस करने देता
है साथ में उन्होंने यह भी बोला है कि
जितने भी इलेक्टोरल बंड खरीदे गए और जो
जमा करे गए पॉलिटिकल पार्टियों ने जो अपने

खातों में जमा करे उसका पूरा
बरा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जिसके पास यह
सारी इंफॉर्मेशन है वह इलेक्शन कमीशन को
दे और यह पब्लिक वेबसाइट पर डाला जाए
जिससे कि जनता को पता लगे कि किसने य

इलेक्टोरल बंड्स खरीदे और किस पॉलिटिकल
पार्टी को द जमा हुई थी इलेक्टरल बंड से
क्या उसका खुलासा सरकार ने सुनवाई के
दौरान किया नहीं नहीं नहीं किया था ना तो
उन्होंने यह बोला था

हम एक इंटरम ऑर्डर था कि भाई य तुम सारा
इंफॉर्मेशन रखो इसकी और इलेक्शन कमीशन को
सील्ड कवर में दो तो अब उन्होंने बोला है
कि य सारी इंफॉर्मेशन जो है जो अभी तक
सील्ड कवर में थी वह सारी अब पब्लिक करी

जाएगी और एक पब्लिक वेबसाइट पर डाली
जाएगी तो इस वक्त की बहुत बड़ी खबर है
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जो इलेक्टोरल बंड
स्कीम है उसको असंवैधानिक करार दे दिया

गया है चुनावी बंड असंवैधानिक और उस पर
फौरन रोक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लगा दी
गई है ना सिर्फ नए चुनावी बॉन्ड जारी करने
पर रोक बल्कि जो जारी किए गए पहले से
चुनावी बॉन्ड है उनको कैश करने पर भी

सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है हमारे साथ
हमारे सहयोगी लगातार बने हुए हैं निपुर
सगल हमारे साथ मौजूद है आशीष कुमार सिंह
हमारे साथ मौजूद है और आशीष एक सवाल लेना
चाह रहे हैं निपुण आपसे आशीष आइए सवाल
पूछिए अपना जल्दी से निपुण अगर आप मुझे

सुन पा रहे हैं एक थोड़ा सा मेरी भी
क्लेरिटी और हमारे दर्शकों की क्लेरिटी के
लिए दो चीजें अ सुप्रीम कोर्ट ने कहा
इलेक्टोरल बंड्स पॉलिसी इज
अनकंस्टीट्यूशनल और उन्होंने साथ में यह

भी कहा कि एनोनिमस इलेक्टोरल बंड्स स्कीम
इज वायलेट ऑफ़ आर्टिकल 19 क्लॉज 1a एंड
राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट बस अगर आप समझा
सकें निपुण कि क्या आज से यह मान लिया जाए

कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स की
व्यवस्था को ही रद्द कर दिया या वह
व्यवस्था आज से आगे कायम रहेगी बस
उन्होंने यह कहा है कि इसको दायरे में

लाइए और इसको जो भी इस तरह के बॉन्ड्स
देता है पॉलिटिकल पार्टीज के उनके नाम को
सार्वजनिक करें क्योंकि थोड़ा सा
कांट्रडिक्ट्री लग रहा है अगर आप क्लीयरली
समझा दें क्योंकि उन्होंने एक तरह से इसको

अनकंस्टीट्यूशनल भी तो कह दिया
देखिए देखिए बिल्कुल आशीष बिल्कुल आपने जो
आपने आखिरी वाक्य कहा वही अभी की
वास्तविकता है कि चुनावी बंड की यानी

इलेक्टोरल बंड की जो योजना है जो अपने
मौजूदा स्वरूप में अभी है वह संवैधानिक
करार दी गई है वह खत्म हो गई है आज से अभी
से कोई पार्टी इलेक्टोरल बंड के जरिए चंदा

नहीं ले सकती है ना कोई चंदा दे सकता है
और अगर किसी पार्टी को चंदा देने के लिए
इलेक्टोरल बंड दिया है किसी भी कॉरपोरेट
घराने ने और वह कैश नहीं करवा पाई है व

राजनीतिक पार्टी तो व जाकर बैंक को वापस
सबमिट कर दे उससे अब उसको एक पैसा नहीं
मिलेगा यानी इलेक्टोरल बंड योजना आज से
खत्म हो गई है जो आपके सवाल का पहला
हिस्सा था उसका जवाब यह है कि अगर सरकार

चाहती है कि नहीं यह योजना अच्छी है और यह
अच्छी थी तो सुप्रीम कोर्ट ने जो आज बातें
कही है उसके आधार पर दोबारा इस से लाए और
अब पारदर्शिता के साथ लाए लेकिन फिलहाल जो

मौजूदा स्वरूप है उसमें यह योजना खत्म हो
गई है अभी से 2018 की इलेक्टोरल बंड योजना
जो थी असंवैधानिक करार देकर बंद कर दी गई
है सरकार अगर चाहती है तो दोबारा उसे बदले
हुए स्वरूप में ला सकती है इस पर सुप्रीम

कोर्ट ने कुछ नहीं कहा है चुनावी बंड
स्कीम फिलहाल असंवैधानिक सुप्रीम कोर्ट की
तरफ से करार दे दी गई है और इस पर तत्काल
रोक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लगा दी गई है
यह बिल्कुल क्लियर हो गया है और ऐसे में

निपुण सहगल जो खामिया यहां पर इस वाई के
दौरान उजागर हुई जिसका जिक्र सुप्रीम
कोर्ट की तरफ से भी किया गया वह ना सिर्फ
पारदर्शिता की कमी कि साब कौन दे रहा है
किसको दे रहा है बल्कि कितना दे रहा है और

इसकी कोई सीमा नहीं कि पहले जो प्रावधान
था कि कंपनी अगर एनुअल प्रॉफिट है अपना
उसमें से करीब साढे फीदी ही दे सकती थी

उससे ज्यादा नहीं यह सीमा भी हटा दी गई थी
इसको लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने अपनी
आपत्ति दर्ज
कराई बिल्कुल आपत्ति दर्ज कराई है सुप्रीम

कोर्ट ने देखिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक
पार्टी को आप चंदा दे सकते हैं कोई भी दे
सकता है लेकिन जो बातें मतदान को प्रभावित

करती है एक मतदाता को प्रभावित करती है
राजनीतिक नीतियों को प्रभावित करती हैं
अगर कोई पार्टी सरकार में आ जाएगी तो वह
कैसी नीति बनाएगी मेरे और आपके चंदे से उस
पर फर्क नहीं पड़ता है लेकिन अगर किसी ने

000 करोड़ का चंदा दिया है तो निश्चित रूप
से वो फर्क डाल सकता है तो एक तो यह
जानकारी वोटर को जानने का अधिकार है दूसरा
राजनीतिक पार्टियों को अ जो चंदा जो

बेहिसाब देने की अनुमति कंपनीज एक्ट की
धारा 182 में संशोधन के बाद जो दी जा रही
थी तो यह साफ था कि जो कंपनी भी चंदा दे
रही है वो इतना ज्यादा दे सकती है कि
जिसका कोई हिसाब नहीं होगा यानी कोई उस

परे नियंत्रण नहीं होगा तो निश्चित रूप से
वो प्रभावित कर सकती है अ यह तमाम बातें
और एक बात और मैं बताना चाहूंगा लेवल
प्लेइंग फील्ड की बात इस मामले की सुनवाई
के दौरान बार-बार यह बात निकल कर आई कि
पिछले 6 सालों में जो चंदा दिया गया है

राजनीतिक पार्टियों को इलेक्टोरल बंड के
जरिए उसका लगभग 75 पर 75 फीसद बीजेपी को
मिला है सत्ताधारी केंद्र की जो पार्टी है
उसको मिला है तो साफ तौर पर लेवल प्लेइंग

फील्ड नहीं है हालांकि सरकार ने यह कहकर
बचाव किया कि जो पार्टी सत्ता में है उसको
लोग चंदा देते हैं क्योंकि राज जो
कॉरपोरेट घराने उनका हित जुड़ा होता है
उनको लगता है यह पार्टी अच्छी सरकार चला
रही है हमारा व्यापार अच्छा चल रहा है

लेकिन कोर्ट कहीं ना कहीं सहमत नहीं हुआ
है और उसने माना है कि यह जो व्यवस्था है
जिसमें आप बेहिसाब और गोपनी नेता के साथ
चंदा दे सकते हैं वहां पर सत्ताधारी

पार्टी को फायदा साफ तौर पर मिल रहा है
बिलकुल तो लगातार इस बड़े कवरेज पर हम बने
हुए हैं कानूनी पहलुओं पर हम लगातार
जानकारी आप तक पहुंचा रहे हैं सहयोगी
निपुण सैगल के जरिए बस छोटे से ब्रेक के

लिए यहां पर रोक रहे हैं सरकार को बड़ा
झटका लगा है चुनावी बन स्कीम जो सरकार
लेकर आई थे उसको सुप्रीम कोर्ट ने
असंवैधानिक करर दिया इस वक्त की बहुत बड़ी
खबर सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार को लगा

है बड़ा झटका मोदी सरकार की लाई चुनावी
बंड स्कीम को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक
करार दिया और इसको फौरन रद्द करने का आदेश
दिया है चुनावी बंड पर तत्काल रोक लगाने
का आदेश सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दिया गया

है इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई
को 6 मार्च तक सारी जानकारी चुनाव आयोग को
देने का आदेश और फिर चुनाव आयोग से 13
मार्च तक सारी जानकारी अपनी वेबसाइट पर

सार्वजनिक करने का आदेश दिया है चुनावी
बंड स्कीम को लेकर सरकार को लगा है बड़ा
झटका सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बंड योजना
को असंवैधानिक करार दिया है चुनावी बंड पर
तत्काल रोक लगाने का सुप्रीम कोर्ट ने
आदेश दिया है चुनावी बंड सूचना के अधिकार

का उल्लंघन चुनावी बंड पर सुप्रीम कोर्ट
ने लगाई तत्काल रोक इतना ही नहीं सुप्रीम
कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को 6 मार्च
तक जितने भी बंड अब तक जारी हुए हैं और
जिसके लिए जारी हुए हैं वह सारी जानकारी

चुनाव आयोग तक पहुंचाने का आदेश दिया है
और फिर चुनाव आयोग को वो सारी जानकारी 13
मार्च तक अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने
का आदेश दिया है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है

कि जो बॉन्ड अभी तक कैश नहीं हुए हैं भले
ही वो जारी कर दिए गए हो उन्हें कैश ना
किया जाए उन्हें वापस लिया जाए सीधे आपको
लेकर चलते हैं हमारे साथ हमारे तीन सहयोगी
इस वक्त मौजूद हैं निपुण सगल सुप्रीम

कोर्ट परिसर से हमारे साथ जुड़ रहे हैं
जिस वक्त ये फैसला सुनाया जा रहा था वहीं
सुप्रीम कोर्ट के भीतर मौजूद थे और अब यह
फैसला जो आया है इसके राजनीतिक मायनों पर
चर्चा करने के लिए मेरे साथ मेरे दो

सहयोगी नीरज को आप देख रहे हैं और आशीष
सिंह को आप देख रहे हैं हमारे साथ जुड़ गए
हैं सबसे पहले आपको निपुण के पास लेकर
चलेंगे और जरा जानेंगे निपुण सैगल से
सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला जो सीधे-सीधे

सरकार के लिए है बड़ा झटका चुनावी बॉन्ड
स्कीम पर फौरन
रोक बिल्कुल बिल्कुल बड़ा झटका है क्योंकि
सरकार ने बहुत पुरजोर बचाव किया था इस
योजना का यह कहते हुए किससे काले धन पर
रोक लग रही है काला काला धन जो राजनीति

में प्रवाहित हो रहा था उस पर रोक लगी है
क्योंकि अब कोई बड़ा चंदा देना चाहता है
तो उसको बैंकिंग रूट से ही आना पड़ेगा
यानी एसबीआई में जाना पड़ेगा बॉन्ड खरीदना

पड़ेगा और बॉन्ड लाकर देना पड़ेगा तो काले
धन पर रोक लगेगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने
कहा है कि हो सकता है काले धन पर रोक
लगेगी लेकिन जो गोपनीयता की बात आप कह रहे

हैं कि चंदा देने वाले के बारे में कोई
जानकारी आम आदमी जान ही नहीं पाएगा यानी
मैं एक मतदाता हूं और मैं जिस पार्टी को
वोट देने जा रहा हूं उसने किससे बड़ा चंदा
पाकर अपनी पॉलिसी को बदला है या बदल सकती

है मुझे पता नहीं चलेगा यह गलत है इसलिए
ये योजना असंवैधानिक है रहिए मेरे साथ
हमारे बाकी सहयोगी भी लगातार हमारे साथ
बने हुए हैं तो सुप्रीम कोर्ट से सरकार को

यह झटका और इस फैसले से क्या विपक्षियों
को मिल गया है नया हथियार वह भी इस चुनावी
माहौल में इस वक्त की बड़ी खबर है चुनावी
बन स्कीम असंवैधानिक करार देते हुए
सुप्रीम कोर्ट ने इसको रद्द करने का फैसला

सुना दिया है सीधे रुख करते हैं बीजेपी की
तरफ से हमारे साथ पार्टी के प्रवक्ता हैं
वरिष्ठ वकील भी हैं नलिन कोली साहब वो
मौजूद है जरा उन्हीं से समझते हैं किस रूप

में देख रहे हैं नलिन जी आप सुप्रीम कोर्ट
के इस फैसले को चुनावी बन स्कीम जो आपकी
सरकार लाई वो असंवैधानिक
कोई भी कानून जो बनता है संसद उसे पार
करता है लेकिन कानून के ऊपर में एक लीगल

चैलेंज है माननीय सुप्रीम कोर्ट उसे देखती
है कि भाई यह कानून जो है संवैधानिक रूप
से कोई कहीं उल्लंघन तो नहीं हो रहा है तो
जो चना जो माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला
आता है वह मान्य हो जाता है जो उनकी

चिंताएं हैं उन्हें दूर करने के लिए एक
सोच लानी पड़ती है यदि कोई नया कानून अगर
आगे लाना हो इस विषय को इस रूप से देखे कि
चुनाव के अंदर में पारदर्शिता हो चुनाव
में स्वच्छ चंदा जाए मतलब काला धन ना जाए

बैंक से केवाईसी के तहत जो व्यक्ति जो है
धन उसका पैसा चुनाव की प्रक्रिया में जाए
ताकि स्वच्छता आए पारदर्शिता आए उस सोच के
साथ य स्कीम आई यदि माननीय सुप्रीम कोर्ट

को लगा कि स्कीम का यह पहलू उचित नहीं है
जहां पर लोगों के जो छिपाया जा रहा था कि
उनकी आइडेंटिटी इस रूप से छुपाया गया था
ताकि कोई दूसरा राजनीतिक दल उन परे कोई
दबाव ना डाले व इस सोच के साथ जो एक

प्रकार
से सीक्रेसी रखी गई सर अब वो सीक्रेसी तो
खोलनी पड़ेगी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले
में ये भी कह दिया चुनाव आयोग 13 मार्च तक
सब कुछ सार्वजनिक करे किसने किसको कितना
चंदा दिया ऐसे में चुनावी माहौल गरमा

जाएगा निशाने पर बीजेपी आएगी आपको लगता है
विरोधियों को हथियार मिल जाएगा नहीं मैं
राजनीतिक रूप से तो सहमत नहीं होगा
क्योंकि यह जो बात है यह सारे राजनीतिक दल

जो इस पर ज्यादा कूदने के प्रयास कर रहे
हैं 2019 में उन्होंने रफेल का विषय उठाया
था रफेल प बहुत कुछ कहा वो तो सुप्रीम
कोर्ट ने माना नहीं देश हित में माना कि
रफेल खरीदे गए तो यह सारे राजनीतिक दल इन

विषयों पर इसलिए ज्यादा बोल रहे हैं
क्योंकि मोदी जी के नेतृत्व के सामने कुछ
कर नहीं पा रहे मोदी जी की सरकार के सामने
कुछ कर नहीं पा रहे जो अपना एक गठबंधन

बनाना चाहते हैं वो पैदा होने से पहले मर
रहा है तो इसीलिए उनके विषय जो है वो जनता
से जुड़े विषय नहीं है ठीक है सर बहुत
शुक्रिया नि कोली साहब एपी न्यूज पर अपनी
प्रतिक्रिया देने के लिए तो इस वक्त की

बड़ी खबर यही है सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी
बंड पर रोक लगाने का आदेश दिया है और
कांग्रेस की तरफ से इस फैसले का स्वागत
किया गया है नोट से ज्यादा ताकतवर होगा

वोट यह है कांग्रेस की पहली प्रतिक्रिया
हम सीधे आपको लेकर चलते हैं हमारे साथ
हमारे सहयोगी नीरज पांडे इस वक्त मौजूद है
जरा जानते हैं नीरज पांडे से ये तो
सीधे-सीधे विपक्ष को हथियार मिल गया है

सरकार की घेराबंदी का प्रतिक्रिया क्या
मिल रही है सरकार की तरफ से सूत्र कुछ बता
रहे हैं
नीरज देखिए रोमाना अभी फिलहाल इस पर कोई
प्रतिक्रिया देने को तैयार नहीं है ननिल

कोहली ने जैसे पहले ही कहा कि सुप्रीम
कोर्ट का जो निर्णय है वो अपने आप में
कोर्ट के निर्णय को चैलेंज नहीं किया जा
सकता जरूर उसके कुछ कानूनी पहलु को देखना
होगा यह बात सही है कि सरकार ने इसका

भरपूर बचाव किया था आपके पास हमारे साथ इस
वक्त मनीष तिवारी जी मौजूद है कांग्रेस के
सांसद है उन्हीं का रिएक्शन लेते हैं जरा
मनीष सर ये जो सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल
बंड को असंवैधानिक करार देते हुए इन पर

फौरन रोक लगा दी आप किस रूप में देख रहे
इस फैसले को
सर ठीक फैसला है उचित फैसला है सकारात्मक
फैसला है रचनात्मक फैसला है जनहित में
फैसला

अच्छा फैसला
है सर सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि
कुछ कमी पेशी होगी तो फिर देखेंगे उसको
ठीक करके दोबारा से लाएंगे तो आपको क्या
लगता है किस तरीके का बदलाव इसमें किया
जाना

चाहिए देखिए अभी तो सुप्रीम कोर्ट ने उसको
अव करार दे दिया है एक संवैधानिक खंडपीठ
ने कहा है कि यह जो इलेक्टोरल बंड की
स्कीम जो सरकार लेकर आई थी जिसके तहत जो
पैसा बंड द्वारा दिया जाता था उसकी

जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती थी उसको
अवेट करार दे दिया है जी और साथ-साथ
उन्होंने कहा है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
जो यह स्कीम चला रहा था इलेक्शन कमीशन को
सारी जानकारी देगा और इलेक्शन कमीशन उसको
अपनी वेबसाइट पर पब्लिश करेगी जी अभी तो
जो फैसला है वो बड़ा साफ है ठीक है सर
आपको क्या लगता है सर चुनावी राजनीति पर
इस फैसले का क्या कोई असर
होगा
जरूर होगा
अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को
क्रियान्वित किया जाएगा और लोगों को यह
जानकारी मिलेगी कि कौन से राजनीतिक दल को
किस व्यक्ति ने या
किस कॉरपोरेट घराने ने कितना पैसा दिया है
और कहीं उसके पीछे कोई छुपा हुआ क्विड

प्रो को तो नहीं है इस सबको उजागर करने
में यह एक बहुत रचनात्मक फैसला है बहुत
शुक्रिया मनी सर एबीपी न्यूज़ से बात करने
के लिए मनीष तिवारी कांग्रेस के सांसद को

आप सुन रहे थे जो कह रहे थे सुप्रीम कोर्ट
का यह फैसला चुनावी राजनीति पर इसका असर
पड़ना तय है

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