UCC Explained in Hindi_What Is Uniform Civil Code_UCC से बदलेगी भारतीय मुस्लिमों की जिंदगी ? - instathreads

UCC Explained in Hindi_What Is Uniform Civil Code_UCC से बदलेगी भारतीय मुस्लिमों की जिंदगी ?

भारत आज के समय में लगभग सभी बड़े धर्म
जाति भाषाएं और संस्कृतियों की व्यवस्थाओं
को एक साथ रखने वाला देश है भारत के पास
जितनी विशालता और विविधता है वो इस देश को
अपने आप में खास बनाता है मगर इस विविधता

को जिस तरह की एकता और समानता देने की बात
संविधान में कही गई थी वह इस देश में
लोगों को आज तक नहीं मिल पाई है दुनिया का
सबसे बड़ा संविधान अपने लोगों को बिना
किसी भेदभाव के समान अधिकार देने की बात

करता है लेकिन इसके लिए जो कानून बनाने की
जरूरत है उसके लिए संविधान देश की सरकार
को बाध्य नहीं करता है भारत की सरकारें इस
कानून को लागू करने पर 76 सालों तक क्यों

मौन बनी रही और किस तरह यह कानून जिसे
यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का नाम दिया जाता
है वो भारत जैसे देश के लिए जरूरी है यह
कानून आखर क्या है और क्या भारत अभी इस
कानून के लिए तैयार है यह सब कुछ आज हम
आपको इस वीडियो में बताने वाले हैं तो

चलिए शुरू करते हैं नमस्कार मेरा नाम है
अनुराग सूर्यवंशी और आप देख रहे हैं नार
टीवी भारत में अगर कोई व्यक्ति किसी भी
तरह के क्राइम में दोषी साबित हो जाता है
तो फिर वोह चाहे किसी भी धर्म जाति समाज
और लिंग का हो उस पर कानूनी कारवाई और सजा

देने के मामले में देश का अपना एक समान
नियम है इस मामले में किसी भी धर्म के
ग्रंथ वेद पुराण और बाकी किताबों के हिसाब
से चलने की जरूरत देश में नहीं है मगर इसी
जगह पर अगर मामला फैमिली मैटर्स से जुड़ा

हुआ है यानी कि कोई मामला अगर पर्सनल लॉज
के अंतर्गत आता है तो उस स्थिति में भारत
के लोगों के लिए अपने-अपने नियम कानूनों
और धार्मिक रिवाजों के हिसाब से चलने की
आजादी है शादी तलाक उत्तराधिकार और ऐसे ही

अन्य मामलों में भारत के पास अपना कोई
समान कानून नहीं है और इसलिए इस देश में
अलग-अलग धर्मों की महिलाएं अलग-अलग
माइनॉरिटी और बच्चे जिंदगी भर भेदभाव
प्रताड़ना और धार्मिक रिवाजों के जीवन

जंजाल से जूझते रहते हैं क्योंकि कानून के
हाथ इस मामले में बंधे हुए हैं भारत में
अलग-अलग धर्मों के लोगों के पर्सनल लाज को
समान रूप से सबके लिए एक जैसा स्पष्ट
बनाने के लिए यूसीसी यानी समान नागरिक
संहिता कानून लाने का प्रयास किया जा रहा

है जिसके तहत देश में सभी लोगों के पर्सनल
कानूनों को बिना किसी धार्मिक और अन्य
भेदभाव से अलग एक समान छत के नीचे लाया
जाना है भारत में संविधान के अनुच्छेद 44
में देश के सभी नागरिकों को बिना किसी
भेदभाव के समानता का हक दिलाने के लिए

प्रयास करने की कोशिश करने के बारे में
बताया गया है मगर यह एक नीति निदेशक तत्व
है यानी देश की सरकार को इसके लिए बाध्य
नहीं किया जा सकता है इसलिए 76 साल के बाद
किसी भी सरकार ने देश के लोगों को सही
मायनों में समानता दिलाने का प्रयास नहीं
किया संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 देश

में लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता का
अधिकार भी देते हैं और इसी कंट्रक्शन के
कारण देश में यूसीसी को लेकर कोई
सर्वमान्य मसौदा तैयार नहीं हो पाया था
गोवा देश में पहला ऐसा राज्य है जहां समान
नागरिक कानून लागू किया गया था जिसे गोवा

फैमिली लॉबी कहा जाता है गोवा पर
पुर्तगाली शासन के दौरान यह कानून पारित
किया गया था जिसे बाद में भारत सरकार ने
बदलने का प्रयास नहीं किया यानी कि भारत

में लगभग 50 से भी ज्यादा सालों से गोवा
यूसीसी के अच्छे परिणामों का सबसे बड़ा
उदाहरण बना हुआ है आज दुनिया में कई
अलग-अलग देशों में समान नागरिक कानून लागू
हो गया है और भारत में यह कानून हमेशा से

ही देशव्यापी मुद्दा रहा है जिस पर भारतीय
जनता पार्टी ने अपना मत साफ करते हुए साल
2014 और 2019 में अपने मेनिफेस्टो के जरिए
ये साफ कर दिया था कि इस कानून को लागू
करने के पक्ष में है हालांकि पूरे देश में
यह कानून पारित नहीं हुआ है लेकिन

उत्तराखंड के जरिए एक पहल जरूर हो गई है
हां पर पुष्कर सिंह धामी सरकार ने फरवरी
2024 में यह कानून अपने राज्य में लागू कर
दिया है भारत में य कानून अभी तक इसलिए
लागू नहीं हो पाया है क्योंकि कुछ लोगों
के अनुसार इस तरह के कानून से

अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यक के नियम कानून
थोपने का प्रयास किया जाएगा मुस्लिम पक्ष
शरीयत कानून को छोड़ने के लिए राजी नहीं
है समान नागरिक संहिता को देश के आदिवासी
और पिछड़े लोगों के लिए भी कुछ लोग गलत
मान रहे
हैं भारत में क्राइम लाज पर हमेशा से ही

सभी तरह के लोगों को आईपीसी के तहत सजाओ
का प्रावधान है मगर जब बात सिविल लॉज की
आती है तो सभी नियम और फैसले हिंदू और
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बनाए और बेहतर

किए जाते हैं साल 1835 से माना जाता है कि
अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय समाज
व्यवस्था को सुधारने के लिए अलग-अलग कान
कानून लाने का प्रयास किया गया था और
अंग्रेजी हुकूमत ने हिंदू और मुस्लिम धर्म

कानूनों को
वेस्टर्नाइज्ड के अनुसार अंग्रेजों की फूट
डालो राजक नीति का परिणाम है साल 1937 में
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ को लागू किया
गया था और बाद में 50 के दशक में हिंदू
धर्म के लिए भी अलग कानून व्यवस्था आ गई
कहा जाता है कि हिंदू कोर्ट बिल पर नेहरू

सरकार ने यह सोचते हुए मोहर लगाई थी कि
शायद इस तरह के कानून से हिंदू लोगों की
सुधरती स्थिति को देखते हुए बाकी लोग भी
देश में कानून को लेकर के राजी हो जाए
लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि मुस्लिम पक्ष

के लिए शरीयत कानून को छोड़ना लगभग
नामुमकिन था संविधान निर्माण के दौरान भी
जब अनुच्छेद 44 और 25 से 28 की बारी है तो
इन पर काफी गंभीरता से बहस हुई जिसमें

भीमराव अंबेडकर का मानना था कि देश को एक
यूनिफॉर्म लॉ की जरूरत है और इस मामले में
उनको कुछ बड़े नेताओं जैसे हंसा मेहता
राजकुमारी अमृत कौर और ए मुंशी का समर्थन
भी हासिल हुआ था मगर साथ में विरोध भी

झेलना पड़ा जिसकी अगुवाई तीन प्रमुख नेता
कर रहे थे कहा जा जाता है कि अंबेडकर देश
में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना चाहते
थे मगर संविधान निर्माण के समय देश में चल

रहे खराब हालात यानी पार्टीशन और हिंदू
मुस्लिम दंगों को देखते हुए उन्होंने
मानकर यूसीसी को नीति निर्देशक तत्व में
रखने का फैसला किया कि अभ इस नियम कानून
के लिए सही समय नहीं है और जब हालात सुधर
जाएंगे तब इस कानून को जरूर लागू करना

चाहिए संविधान निर्माण और नेहरू सरकार के
बाद भी इस कानून को लेकर अलग-अलग तरह से
बातें होती रही सभी लोगों ने अपनी-अपनी
राय भी इस मुद्दे पर तैयार कर ली थी और
इसके बाद शाहबानो केस के फैसले और
प्रक्रिया को देखते हुए भारत में यह कानून

बहुत बड़ा मुद्दा बन गया शाहबानो केस में
हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हर
जगह पर्सनल लॉ को किनारे रखकर संविधान के
अनुसार शाह बानों को न्याय दिया गया था
पहले इस फैसले का स्वागत राजीव गांधी ने
भी किया था लेकिन फिर देश में मुस्लिम

पक्ष के लोगों का इस फैसले को लेकर विरोध
प्रदर्शन देखते हुए राजीव गांधी ने कोर्ट
के फैसले को बदलने के लिए एक नया नियम
लाने का फैसला किया जिससे कि चुनाव में
उनको मुस्लिम धर्म का समर्थन मिल जाए

शाहबानो को आखिरकार साल 2001 में न्याय
मिल गया था मगर ये केस देश के लोगों को
जगाने में सफल हो गया गया था इस केस पर
अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने

राजीव गांधी सरकार को समान नागरिक कानून
लागू करने के लिए कहा था और उसके बाद भी
सरकार ने अपने एक बड़े वोट बैंक को साधने
के प्रयास में इस तरफ ध्यान देने का
प्रयास नहीं किया शाहबानो केस के बाद सरला

मुद्गल केस में भी फैसला सुनाते हुए
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यूसीसी पर
विचार करने के लिए कहा था क्योंकि
धीरे-धीरे ही सही लेकिन लोग अपने और दूसरे
धर्म के पर्सनल लॉ का फायदा गलत तरीके से

उठा रहे थे जिससे देश की सामाजिक व्यवस्था
खराब हो रही थी सरला मुद्गल केस में दरअसल
एक हिंदू पुरुष धर्म परिवर्तन सुक मुस्लिम
धर्म सिर्फ इसलिए अपनाना चाहता था क्योंकि
इसके जरिए वो मुस्लिम बनकर चार शादियां
करने के लिए आजाद था आगे सहरा बानो तीन

तलाक केस में भी इस मुद्दे पर कोर्ट ने
सरकार को सोचने के लिए कहा और यह जाहिर
किया था कि देश को अब एक समान कानून
संहिता की जरूरत है बीजेपी सरकार ने इसके
बाद देश में तीन तलाक को खत्म करने का

फैसला किया और अपने घोषणा पत्र के जरिए यह
भी तय कर दिया था कि राम मंदिर बनाने और
धारा 370 हटाने के बाद उनका तीसरा सबसे
बड़ा मुद्दा यूसीसी कानून लाना ही रहेगा
हाल ही में जब उत्तराखंड में पुष्कर धामी

सरकार आई तो उनका सबसे पहला मुद्दा यही था
कि वो अपने राज्य में यूसीसी लागू करेंगे
अपनी बात को पूरा करते हुए उत्तराखंड में
इसी महीने यूसीसी लागू हो गया
है कुछ विशेषज्ञों की माने तो ये बात
सामने आती है कि यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का

 

आधार सिर्फ धर्म पर ठिका हुआ नहीं है और
ना ही यह कानून किसी विशेष समूह को अपर
हैंड देने की कोशिश करता है इस कानून के
तहत एक देश को अपना एक कानून देने की बात
कही जाती है जिसमें सभी धर्मों की कुछ
अच्छी बातों को लेकर एक सामूहिक नियमावली

 

पूरे देश के लिए लागू की जाती है जो बिना
किसी भेदभाव के सभी लोगों पर लागू की
जाएगी जिससे महिलाओं और अल्पसंख्यकों को
अपने पर्सनल लॉ के कारण होने वाली
मुश्किलों से छुटकारा मिल जाएगा दूसरी बात

यह है कि संविधान के अनुसार यूसीसी पर
कानून बनाने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार
के पास नहीं है यानी कि इसके तहत अलग-अलग
राज्य अपने हिसाब से लोगों को ध्यान में
रखते हुए कानून प्रक्रिया का निर्माण कर
सकते हैं संविधान से लेकर सुप्रीम कोर्ट

और बहुत से बुद्धिजीवी भी अब यूनिफॉर्म
सिविल कोर्ट को समय-समय पर जरूरी बताते
रहे हैं मगर एक सवाल है जो इन सभी तथ्यों
और कहानियों के बाद सामने आता है कि क्या
हमारा देश इस कानून के लिए तैयार है क्या

वो स्थिति अब तैयार हो गई है जिसका इंतजार
भीमराव अंबेडकर कर रहे थे जब उनके हिसाब
से यह कानून पारित हो जाना चाहिए था अगर
ऐसा नहीं है तो फिर वो कौन सी मुश्किलें
हैं जिस रास्ते में है और क्या यह कानून

सच में देश के लिए जरूरी भी है या ये
कानून सिर्फ वोट बटोरने के लिए एक एजेंडा
भरी है तो सबसे पहले अगर बात करें भारत
तैयार है या नहीं इस पर अलग-अलग लोगों के
अपने अलग-अलग विचार हैं दिल्ली हाई कोर्ट

ने अपने एक सुनवाई के दौरान कहा था कि
भारत में अब इस कानून के लिए सही समय है
लेकिन दूसरी तरफ बात यह भी है कि आज भी
भारत में अपनी संस्कृति और धर्म के

रिवाजों में बदलाव पर नाराज होने वाले लोग
बहुत ज्यादा हैं बहुत से लोगों का यह
मानना है कि इस कानून से देश की एकता पर
खतरा बढ़ जाएगा हलक ऐसा कुछ नहीं है मगर
जो लोग या सब कुछ मान रहे हैं उन्हें
देखते हुए लगता है कि देश में अभी भी वो
माहौल तैयार करना मुश्किल है जिसमें यह

कानून पारित किया जाना चाहिए मगर एक बात
यह भी है कि अगर कुछ पक्षों को इस कानून
का सही दायरा और मतलब के साथ-साथ बाकी कुछ
जरूरी बातें समझाई जा सकती हैं और इस
कानून को लेकर सोशल मीडिया और

इसके लिए भी जरूरी इंतजाम किए जाएंगे यानी
कि मुस्लिम महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यकों
के नजरिए से और एक धर्म के तौर पर यह
कानून किसी भी तरह से उनके खिलाफ नहीं है
इन सब बातों पर मुस्लिम पक्ष को राजी करना

जरूरी है जो वर्तमान स्थिति को देखते हुए
मुश्किल लग रहा है दूसरी मुश्किल यह है कि
नॉर्थ ईस्ट इंडिया का एक बड़ा हिस्सा भी
इस कानून को लेकर डरा हुआ है क्योंकि इस
हिस्से में बड़ी आबादी आदिवासियों और

अलग-अलग छोटे समुदायों की है लेकिन उनका
डर भी सही नहीं है आदिवासियों के किसी भी
अधिकार का हनन इस कानून में नहीं होता है
हालाकि यह मुमकिन है कि सिविल मामलों में

समानता से आदिवासी लोगों को मुख्य धड़े
में लाना आसान हो सकता है जो इन लोगों के
लिए जरूरी है आज समान नागरिक संहिता भारत
देश के लिए सही मायनों में बहुत अहम है
क्योंकि इससे जुडिशियस सिस्टम में धार्मिक
मामलों के केस में लगने वाला समय कम हो

जाएगा इस तरह के मामलों में एक सही और
सटीक फैसले लिए जा सकेंगे एक बड़े देश को
अपने समान नियम कानून और अधिकार मिल
जाएंगे सरकार के लिए योजनाएं और कार्यक्रम
आयोजित करना भी आसान हो जाएगा और सबसे

ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि इससे
महिलाओं को और अल्पसंख्यकों का जीवन यापन
आसान हो जाएगा जिस देश के सामाजिक विकास
के लिए बहुत जरूरी है इस कानून के तहत
महिलाओं के विवाह की उम्र भी सभी धर्मों

में समान करने की कोशिश होगी जिससे
महिलाओं को भी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने का
मौका मिल जाए अल्पसंख्यकों के लिए भी
नियमावली बहुसंख्यक के समान होगी और उनको
समान अधिकार हासिल होंगे इस तरह से इस बात
से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत को

आज इस नियम की सबसे ज्यादा जरूरत है और यह
देश सामाजिक तौर पर इस नियम के जरिए मजबूत
बन सकता
है आज दुनिया में अमेरिका से लेकर
बांग्लादेश और पाकिस्तान तक कई देशों में

में यूसीसी का कानून तैयार है मगर भारत
में इस कानून को कुछ लोग संविधान के खिलाफ
मानते हैं तो कुछ कहते हैं कि इस देश में
क्रिमिनल लॉज भी जब अलग-अलग होकर इतने
अच्छे से इंप्लीमेंट हो सकते हैं तो फिर
सिविल लॉ को बदलने की क्या जरूरत है कुछ
लोगों का कहना है कि भारत जैसे डावर्स देश
में एक कानून सब पर थोपना गलत है और
इन्हीं वजहों के चलते भारत में मुस्लिम
हिंदू क्रिश्चियन और अलग-अलग धर्मों की

कानूनी प्रक्रिया अपने अपने पर्सनल लॉ के
हिसाब से ही चलती आ रही है ये कुछ विचार
उन लोगों के हैं जो इस कानून के खिलाफ
खड़े होते हैं इस कानून को समर्थन देने
वाले कुछ विचार और लोगों के बारे में हमने
आपको बता दिया है अब आप किस तरह इस कानून
को देखते हैं और कौन सी तरफ से हैं ये
हमें जरूर बताइएगा और वीडियो कैसी लगी ये

भी बताइएगा और वीडियो अच्छी लगी हो तो
प्लीज इसे लाइक करें शेयर करें  नमस्कार

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